Monday, June 12, 2017

सोवियत संघ क्यों ढहा

1990 के आसपास सोवियत संघ और उससे जुड़े देशों में कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं के एकाएक ढह जाने का सबसे प्रकट कारण वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं का जड़ हो जाना था। इस स्थिति को मार्क्सवादी सिद्धांत, जो निजी लाभ की प्रेरणा को सामूहिक हित के लक्ष्य में रूपांतरित करता है, की विफलता के तौर पर भी देखा गया। कम्युनिज्म को एक कृत्रिम व्यवस्था और निजी लाभ को एक नैसर्गिक प्रवृत्ति मानने वालों के लिए यह समूचा विघटन एक स्वाभाविक चीज था, जिसे देर-सबेर घटित होना ही था।
लेकिन इस निष्कर्ष की कुछ खामियाँ हैं। पहली मुश्किल ये खड़ी होती है कि फिर हम रूस में करीब 73 साल तक चले समाजवादी प्रयोग और उसकी उपलब्धियों को कैसे देखें! बहुत से कम्युनिज्म विरोधी इन्हें तानाशाह व्यवस्था की डंडे के जोर पर अर्जित उपलब्धियाँ मानते रहे हैं, पर सच्चाई की कसौटी पर यह एक खामखाँह किस्म की बात ही है। पहले विश्वयुद्ध के बाद खस्ताहाल एक देश पहले तो एक नई व्यवस्था में खुद को खड़ा करे, फिर खुद पर थोपे गए दूसरे विश्वयुद्ध का विजेता बन जाए, और तत्पश्चात शुरू हुए शीत युद्ध में अन्वेषण के कई मोर्चों पर अमेरिका को मात दे सके, आदि उपलब्धियों को डंडे के जोर पर अर्जित मानना बुद्धिहीनता अथवा दुराग्रह की ही निशानी कही जाएगी। ऐसी उपलब्धियों के लिए बाकी चीजों के अलावा एक बड़ा राष्ट्रीय जज्बा भी चाहिए होता है, जो किन्हीं भी कारणों से उस वक्त के रूस में मौजूद था। इसका एक संकेत हमें अपने दौर के प्रसिद्ध ब्रिटिश बुद्धिजीवी बरट्रेंड रसेल की उन पंक्तियों में मिल सकता है जो उन्होंने 1920 में रूस गए एक ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में वहाँ के हालात देखने के बाद लिखी थीं। उन्होंने लिखा कि रूस के कामरेड सब कुछ भूलभालकर 16-16 घंटे काम कर रहे हैं, उनके कोई निजी उद्देश्य नहीं हैं, और वे बगैर कोई ढील दिए नए समाज के निर्माण में जुटे हुए हैं। हालाँकि यह सब लिखने के बाद रसेल ने यह राय भी रखी कि रूस में इन दिनों जीवन वैसा ही है जैसा शुद्धतावादी-इंग्लैंड के दिनों में होता था—इंसानी फितरत के खिलाफ जाता हुआ। अगर बोल्शेविक परास्त होते हैं तो यह ठीक-ठीक उसी कारण होगा जिस कारण अंग्रेजों के शुद्धतावाद का पतन हुआ। वक्त आएगा जब लोग इस बात को कबूल करेंगे कि जीवन का आनंद किसी भी शुद्धतावादी मूल्य से ज्यादा मूल्यवान होता है।
मुद्दा ये है कि रसेल जिन समाजवादी उसूलों को शुद्धतावाद कह रहे थे उनमें वो कौन सा लोचा आ गया था कि स्तालिनोत्तर शीत युद्ध की अपेक्षाकृत आसान परिस्थितियों में वे कारगर साबित नहीं हो पाए, और चार दशक से भी कम समय में पूरा समाजवादी तंत्र यूँ चरमरा गया?
लेकिन इस बारे में कोई भी विचार करने से पहले हमें विश्व राजनीति के प्रचार तंत्रों द्वारा बनाई गई उन छवियों से बाहर आना होगा, जहाँ जापान पर दो-दो बम गिराने की औचित्यहीन संहारक कार्रवाई के लिए तो एक तार्किक निरूपण मौजूद होता है, पर बेहद विषम परिस्थितियों से निबटने में हुई अतिरिक्त सतर्कता या ज्यादतियों को क्रूरता और तानाशाही घोषित कर दिया जाता है। बेहतर है कि ऐसे जटिल मसलों में हम चीजों को कार्य-कारण आधार पर ही जाँचें। 
यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि स्टालिन की मृत्यु सोवियत नीति में टर्निंग प्वाइंट का सबब बनी, जिसके प्रणेता निकिता ख्रुश्चेव थे। कभी स्टालिन के खास सहयोगी रहे ख्रुश्चेव का रवैया पूरी तरह अप्रत्याशित था। उन्होंने सत्ता में आते ही स्तालिनवाद की इस कदर धज्जियाँ उड़ानी शुरू कीं कि कम्युनिस्ट पार्टी ही नहीं, पूरा देश ही कुछ वक्त के लिए सकते में आ गया। ऐसा उन्होंने जिस भी वजह से किया पर इतना अचानक और बगैर तैयारी के किया कि रूस के लिए यह एक बड़े झटके की तरह था। इसके बाकी परिणाम तो इतिहास में तथ्यों के रूप में स्पष्ट हैं, पर जो परिणाम महसूस करने की चीज था वह था एक जज्बे को गफलत की स्थिति में डाल देना। और ऐसा करते हुए उनके पास कोई स्पष्ट दिशा ही रही हो यह भी नहीं था। वे खुलापन लाए, पर इस खुलेपन के झोल बहुत स्पष्ट थे। पास्तरनाक प्रकरण के जरिए रूस को बंद समाज की ज्यादा कुख्याति उन्होंने ही दिलाई। सवाल है कि अगर वे खुद स्टालिन की आलोचना कर सकते थे तो उनके समय की ज्यादतियों को कहने वाले साहित्य से उन्हें क्या परहेज था? उन्होंने खुलापन लाने की जो कवायद की वह खुद उन्हीं से बर्दाश्त नहीं हुई। मालूम पड़ता है कि वे एक आत्मविश्वास से भरे कन्फ्यूज्ड व्यक्ति थे, जिन्होंने बगैर तैयारी के बहुत सी ऐसी नीतियाँ लागू कीं जिन्हें या उन्हें खुद ही वापस लेना पड़ा या वे असफल साबित हुईं। उनकी खुलेपन की नीति के तहत लगी एक अवाँ गार्द कलाकारों की चित्र प्रदर्शनी को देखकर पहले तो उन्होंने उसे कुत्ते का गू कहा, फिर कलाकारों से सीमा में रहने की राजकीय चेतावनी निकाली। इसी तरह अनाज के अतिशय उत्पादन की उनकी सनकपूर्ण नीति भी सफल नहीं हो पाई। ऐसा मालूम देता है कि स्टालिन के बारे में अपने निजी आग्रहों को बगैर वृहत्तर संदर्भों में आकलित किए ख्रुश्चेव ने एक प्रतिक्रियामूलक राष्ट्रीय नीति में तब्दील कर दिया। इससे कई तरह के अंतर्विरोध पैदा हुए। 
समाजवादी व्यवस्था कृत्रिम है या नहीं पर वह इंसानी आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने वाली एक सप्रयास बनाई गई व्यवस्था जरूर है। यह उसी तरह की बात है कि जो हाथ प्रकृति ने मनुष्य को भोजन करने के लिए दिए उनसे वह सितार बजाने लगा। भोजन हासिल करना वह नहीं भूल सकता पर अगर छोड़ दे तो सितार बजाना अवश्य भूल सकता है। लिहाजा ऐसी व्यवस्था के साथ एक एहतियात आवश्यक है। उसे गतिशील बनाए रखने की चुनौती है। स्तालिन कालीन सोवियत रूस अपने वक्त की भीषण उठापटक में समाजवादी जज्बे से जिस गतिशीलता को बनाए रहा, वह उसके परवर्ती शासक बनाए नहीं रख पाए। ऐसा शायद इसलिए ही था कि उन्होंने जो भी आधे-अधूरे सुधार किए वे राजनीति या समाज के सुपरस्ट्रक्चर तक ही थे—समाजवादी अर्थशास्त्र को कैसे पश्चिमी अर्थतंत्र के समांतर ज्यादा गतिशील बनाया जाए इस असल चुनौती पर ध्यान नहीं दिया गया।
बहुत से लोगों का मानना है कि लोकतंत्र की कमी के कारण सोवियत तंत्र की जकड़न अभिव्यक्त नहीं हो पाई और यह उन व्यवस्थाओं के टूटने का कारण बनी। लेकिन ऐसा तर्क देने वाले क्या इस बात का जवाब देंगे कि भारत जैसे देश में लोकतंत्रीय प्रणाली की प्रचुरता भी कोई परिवर्तन क्यों नहीं कर पा रही? कारण यही है कि अर्थतंत्र पर नए बने बूर्ज्वा वर्ग की पकड़ी इतनी मजबूत है कि उसका ये लोकतंत्र कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। 
सोवियत रूस ने अर्थशास्त्र के समाजवादी मॉडल को एक स्वयंभू मॉडल की तरह लिया। समाजवादी अर्थव्यवस्था कई तरह के लीकेज को खत्म करके उत्पादन को बढ़ा देती है। इस किस्म की प्रचुरता समाजवादी देशों में विघटन के ठीक पहले तक भी मौजूद थी। मैंने उन्हीं दिनों बुल्गारिया में विजिटिंग प्रोफेसर रहे कर्णसिंह चौहान के संस्मरणों में सोफिया के जनरल स्टोरों से तुर्की लोगों द्वारा बेहद सस्ता राशन और सब्जी खरीद ले जाने की बात पढ़ी है। लेकिन बाद के दिनों में पनपे भ्रष्टाचार ने वितरण के तंत्र में भी बाधाएँ खड़ी कीं और सरकारी दुकानों पर लोगों की कतारें लगने की बात सामने आईं। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीयतावाद के समर्थन में क्यूबा और भारत सहित अस्सी देशों को जाने वाली विकराल संपदा भी मार्क्सवाद की रटंतू और किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का सत्यानाश करने वाली कार्रवाई थी। भारत में ब्रिटिश दौर में देश से बाहर संपदा का ऐसा ही प्रवाह कई अकालों की वजह बना, जबकि ब्रिटिश दौर के टैक्स मुगलों के वक्त के जैसे ही और कई बार उनसे कम भी थे।
स्टालिन के बाद की सोवियत सत्ता ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों और युद्ध उद्योग को तो अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता के जज्बे में आगे बढ़ाया, पर अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पश्चिम की चुनौती पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। इसके बजाय प्रचुरता को गुणवत्ता का समानार्थी मानने की रटी हुई नीति पर कायम रहे। इस तरह ये एक ऐसा समाज बन गया जहाँ किसी तरह की कोई चुनौती नहीं बची थी। तलाकों की तादाद इसलिए ज्यादा थी क्योंकि वे विवाह और सरकारी सुविधाओं के कारण सुरक्षित जीवन में थोड़ी हलचल पैदा करते थे। इसे लोगों ने व्यक्तिगत प्रेरणाओं के अभाव की व्यवस्था समझा, जबकि ये आगे बढ़ने की हसरतों से विपन्न एक व्यवस्था थी। इसका कोई उद्देश्य नहीं था और इसका वास्तविक पतन उसी दिन शुरू हो गया था जब इसने स्टालिन मॉडल की प्रतिक्रिया को ही अपना जमीर बना लिया था।
सोवियत समाजवाद की विडंबना शायद यह थी कि उसे हर समय बेहद गतिमान पश्चिम के मुकाबले में रहना था। उन यूरोपीय समाजों के मुकाबले जिन्होंने वैयक्तिकता और सामूहिकता को एक-दूसरे के बरक्स खड़ा करना छोड़कर उनमें सामंजस्य के संतुलन बिंदु तलाशने शुरू कर दिए थे। विज्ञान की तरक्की आम लोगों को ज्यादा निजी समय दे पाए इसके रास्ते तलाश करने शुरू कर दिए थे। जिसका नतीजा है कि नीदरलैंड्स जैसे देश में साप्ताहिक कार्य अवधि आज सिर्फ 21 घंटे की है, और अमेरिका जैसे देश की कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को अपने काम के निर्धारित घंटे खुद चुनने की आजादी दे रही हैं। कल्पना करें कि सोवियत संघ का यह मुकाबला अगर किसी एशियाई देश से होता तो यह संकट नहीं होता। एशियाई सभ्यताएँ अपने में मशगूल होने से उन्हें गति की वैसी आवश्यकता नहीं होती। वहाँ के लिए प्रचुरता निस्संदेह एक बड़ा मूल्य है। भारत तो कुछ सदी पहले तक प्रचुरता की ही सभ्यता थी, जिसने उसे सर्वसमावेशी हिंदू जीवन का अनोखा उपहार दिया। खुद सोवियत संघ भी ज्यादातर एशियाई ही है, जिसने वहाँ के समाजवाद को जहाँ का तहाँ पड़े रहने की अजगरी वृत्ति दी। हम यह भी कह सकते हैं कि यूरोपीय सिर ने रूस को क्रांति दी और एशियाई धड़ ने उसे निष्क्रिय बना डाला। 
1990 के आसपास भूमंडलीकरण के रूप में अभिव्यक्त हुआ पश्चिमी पूँजीवाद दुर्दमनीय शै थी, जिससे बचना नामुमकिन था। इसे सही समय पर और सही ढंग से एक ही व्यक्ति ने पहचाना, जो थे माओ के बाद के चीन के शीर्ष नेता देंग श्याओ पिंग। उन्होंने अस्सी के दशक में ही वे प्रक्रियाएँ शुरू कीं जिन्होंने चीन को आज वाली रफ्तार दी। चीन में समाजवाद के राजनीतिक और पूँजीवाद के आर्थिक तंत्र का फ्यूजन है। लेकिन चीन का मॉडल क्या सोवियत मॉडल का एकमात्र विकल्प है? क्या यह चीन फिर से कभी समाजवाद की ओर लौट पाएगा? ये ऐसे सवाल हैं जो भूत की तरह आज दुनिया के सोचने-समझने वालों के सिर पर सवार है। 
सोवियत विघटन की परिघटना का ये संदेश है कि विचारों को भावुकतावादी और रटंतू होने से बचना चाहिए, क्योंकि जडता का आरंभ यहीं से होता है। उसे वैयक्तिकता और व्यक्तिवाद के बीच के फर्क को समझना चाहिए। अगर सोवियतों ने ये समझा होता तो उन्हें अपनी ही जनता की जासूसी करने के बजाय अपनी आंतरिक ग्रोथ पर खर्च करने के लिए ज्यादा वक्त मिलता। और यह भी कि भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में बहुत फाँक करके देखना ठीक नहीं। लोगों को अपने आत्मिकता की तरह भौतिकता में भी निरंतर ग्रोथ की आवश्यकता होती है।   

भूमंडलीकरण ने मार्क्सवाद में वर्णित श्रम और वर्ग विभाजन को बेहद जटिल और भ्रष्ट कर दिया है। ऐसे में सोवियत पतन का असली सवाल यही है कि क्या सामूहिकता के लक्ष्य के लिए की गई कार्रवाइयाँ वाकई रसेल का कहा शुद्धतावाद ही हैं, जो छोटे वक्त के लिए तो कारगर हो सकती है, पर उसे किसी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बनाया जा सकता। और यही वो बिंदु है जिसका कोई ठोस सैद्धांतिक प्रत्युत्तर सोवियत विघटन के बाद मार्क्सवादी पेश नहीं कर पाए हैं। यह निरुत्तरता मौजूदा वैश्विक अर्थशास्त्र के उपभोक्तावादी कोलाहल, बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी और वंचनाओं की एक नई बनती दुनिया में कितनी सांघातिक है इसे सहज ही समझा जा सकता है। 

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