Monday, June 12, 2017

सोवियत संघ क्यों ढहा

1990 के आसपास सोवियत संघ और उससे जुड़े देशों में कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं के एकाएक ढह जाने का सबसे प्रकट कारण वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं का जड़ हो जाना था। इस स्थिति को मार्क्सवादी सिद्धांत, जो निजी लाभ की प्रेरणा को सामूहिक हित के लक्ष्य में रूपांतरित करता है, की विफलता के तौर पर भी देखा गया। कम्युनिज्म को एक कृत्रिम व्यवस्था और निजी लाभ को एक नैसर्गिक प्रवृत्ति मानने वालों के लिए यह समूचा विघटन एक स्वाभाविक चीज था, जिसे देर-सबेर घटित होना ही था।
लेकिन इस निष्कर्ष की कुछ खामियाँ हैं। पहली मुश्किल ये खड़ी होती है कि फिर हम रूस में करीब 73 साल तक चले समाजवादी प्रयोग और उसकी उपलब्धियों को कैसे देखें! बहुत से कम्युनिज्म विरोधी इन्हें तानाशाह व्यवस्था की डंडे के जोर पर अर्जित उपलब्धियाँ मानते रहे हैं, पर सच्चाई की कसौटी पर यह एक खामखाँह किस्म की बात ही है। पहले विश्वयुद्ध के बाद खस्ताहाल एक देश पहले तो एक नई व्यवस्था में खुद को खड़ा करे, फिर खुद पर थोपे गए दूसरे विश्वयुद्ध का विजेता बन जाए, और तत्पश्चात शुरू हुए शीत युद्ध में अन्वेषण के कई मोर्चों पर अमेरिका को मात दे सके, आदि उपलब्धियों को डंडे के जोर पर अर्जित मानना बुद्धिहीनता अथवा दुराग्रह की ही निशानी कही जाएगी। ऐसी उपलब्धियों के लिए बाकी चीजों के अलावा एक बड़ा राष्ट्रीय जज्बा भी चाहिए होता है, जो किन्हीं भी कारणों से उस वक्त के रूस में मौजूद था। इसका एक संकेत हमें अपने दौर के प्रसिद्ध ब्रिटिश बुद्धिजीवी बरट्रेंड रसेल की उन पंक्तियों में मिल सकता है जो उन्होंने 1920 में रूस गए एक ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में वहाँ के हालात देखने के बाद लिखी थीं। उन्होंने लिखा कि रूस के कामरेड सब कुछ भूलभालकर 16-16 घंटे काम कर रहे हैं, उनके कोई निजी उद्देश्य नहीं हैं, और वे बगैर कोई ढील दिए नए समाज के निर्माण में जुटे हुए हैं। हालाँकि यह सब लिखने के बाद रसेल ने यह राय भी रखी कि रूस में इन दिनों जीवन वैसा ही है जैसा शुद्धतावादी-इंग्लैंड के दिनों में होता था—इंसानी फितरत के खिलाफ जाता हुआ। अगर बोल्शेविक परास्त होते हैं तो यह ठीक-ठीक उसी कारण होगा जिस कारण अंग्रेजों के शुद्धतावाद का पतन हुआ। वक्त आएगा जब लोग इस बात को कबूल करेंगे कि जीवन का आनंद किसी भी शुद्धतावादी मूल्य से ज्यादा मूल्यवान होता है।
मुद्दा ये है कि रसेल जिन समाजवादी उसूलों को शुद्धतावाद कह रहे थे उनमें वो कौन सा लोचा आ गया था कि स्तालिनोत्तर शीत युद्ध की अपेक्षाकृत आसान परिस्थितियों में वे कारगर साबित नहीं हो पाए, और चार दशक से भी कम समय में पूरा समाजवादी तंत्र यूँ चरमरा गया?
लेकिन इस बारे में कोई भी विचार करने से पहले हमें विश्व राजनीति के प्रचार तंत्रों द्वारा बनाई गई उन छवियों से बाहर आना होगा, जहाँ जापान पर दो-दो बम गिराने की औचित्यहीन संहारक कार्रवाई के लिए तो एक तार्किक निरूपण मौजूद होता है, पर बेहद विषम परिस्थितियों से निबटने में हुई अतिरिक्त सतर्कता या ज्यादतियों को क्रूरता और तानाशाही घोषित कर दिया जाता है। बेहतर है कि ऐसे जटिल मसलों में हम चीजों को कार्य-कारण आधार पर ही जाँचें। 
यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि स्टालिन की मृत्यु सोवियत नीति में टर्निंग प्वाइंट का सबब बनी, जिसके प्रणेता निकिता ख्रुश्चेव थे। कभी स्टालिन के खास सहयोगी रहे ख्रुश्चेव का रवैया पूरी तरह अप्रत्याशित था। उन्होंने सत्ता में आते ही स्तालिनवाद की इस कदर धज्जियाँ उड़ानी शुरू कीं कि कम्युनिस्ट पार्टी ही नहीं, पूरा देश ही कुछ वक्त के लिए सकते में आ गया। ऐसा उन्होंने जिस भी वजह से किया पर इतना अचानक और बगैर तैयारी के किया कि रूस के लिए यह एक बड़े झटके की तरह था। इसके बाकी परिणाम तो इतिहास में तथ्यों के रूप में स्पष्ट हैं, पर जो परिणाम महसूस करने की चीज था वह था एक जज्बे को गफलत की स्थिति में डाल देना। और ऐसा करते हुए उनके पास कोई स्पष्ट दिशा ही रही हो यह भी नहीं था। वे खुलापन लाए, पर इस खुलेपन के झोल बहुत स्पष्ट थे। पास्तरनाक प्रकरण के जरिए रूस को बंद समाज की ज्यादा कुख्याति उन्होंने ही दिलाई। सवाल है कि अगर वे खुद स्टालिन की आलोचना कर सकते थे तो उनके समय की ज्यादतियों को कहने वाले साहित्य से उन्हें क्या परहेज था? उन्होंने खुलापन लाने की जो कवायद की वह खुद उन्हीं से बर्दाश्त नहीं हुई। मालूम पड़ता है कि वे एक आत्मविश्वास से भरे कन्फ्यूज्ड व्यक्ति थे, जिन्होंने बगैर तैयारी के बहुत सी ऐसी नीतियाँ लागू कीं जिन्हें या उन्हें खुद ही वापस लेना पड़ा या वे असफल साबित हुईं। उनकी खुलेपन की नीति के तहत लगी एक अवाँ गार्द कलाकारों की चित्र प्रदर्शनी को देखकर पहले तो उन्होंने उसे कुत्ते का गू कहा, फिर कलाकारों से सीमा में रहने की राजकीय चेतावनी निकाली। इसी तरह अनाज के अतिशय उत्पादन की उनकी सनकपूर्ण नीति भी सफल नहीं हो पाई। ऐसा मालूम देता है कि स्टालिन के बारे में अपने निजी आग्रहों को बगैर वृहत्तर संदर्भों में आकलित किए ख्रुश्चेव ने एक प्रतिक्रियामूलक राष्ट्रीय नीति में तब्दील कर दिया। इससे कई तरह के अंतर्विरोध पैदा हुए। 
समाजवादी व्यवस्था कृत्रिम है या नहीं पर वह इंसानी आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने वाली एक सप्रयास बनाई गई व्यवस्था जरूर है। यह उसी तरह की बात है कि जो हाथ प्रकृति ने मनुष्य को भोजन करने के लिए दिए उनसे वह सितार बजाने लगा। भोजन हासिल करना वह नहीं भूल सकता पर अगर छोड़ दे तो सितार बजाना अवश्य भूल सकता है। लिहाजा ऐसी व्यवस्था के साथ एक एहतियात आवश्यक है। उसे गतिशील बनाए रखने की चुनौती है। स्तालिन कालीन सोवियत रूस अपने वक्त की भीषण उठापटक में समाजवादी जज्बे से जिस गतिशीलता को बनाए रहा, वह उसके परवर्ती शासक बनाए नहीं रख पाए। ऐसा शायद इसलिए ही था कि उन्होंने जो भी आधे-अधूरे सुधार किए वे राजनीति या समाज के सुपरस्ट्रक्चर तक ही थे—समाजवादी अर्थशास्त्र को कैसे पश्चिमी अर्थतंत्र के समांतर ज्यादा गतिशील बनाया जाए इस असल चुनौती पर ध्यान नहीं दिया गया।
बहुत से लोगों का मानना है कि लोकतंत्र की कमी के कारण सोवियत तंत्र की जकड़न अभिव्यक्त नहीं हो पाई और यह उन व्यवस्थाओं के टूटने का कारण बनी। लेकिन ऐसा तर्क देने वाले क्या इस बात का जवाब देंगे कि भारत जैसे देश में लोकतंत्रीय प्रणाली की प्रचुरता भी कोई परिवर्तन क्यों नहीं कर पा रही? कारण यही है कि अर्थतंत्र पर नए बने बूर्ज्वा वर्ग की पकड़ी इतनी मजबूत है कि उसका ये लोकतंत्र कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। 
सोवियत रूस ने अर्थशास्त्र के समाजवादी मॉडल को एक स्वयंभू मॉडल की तरह लिया। समाजवादी अर्थव्यवस्था कई तरह के लीकेज को खत्म करके उत्पादन को बढ़ा देती है। इस किस्म की प्रचुरता समाजवादी देशों में विघटन के ठीक पहले तक भी मौजूद थी। मैंने उन्हीं दिनों बुल्गारिया में विजिटिंग प्रोफेसर रहे कर्णसिंह चौहान के संस्मरणों में सोफिया के जनरल स्टोरों से तुर्की लोगों द्वारा बेहद सस्ता राशन और सब्जी खरीद ले जाने की बात पढ़ी है। लेकिन बाद के दिनों में पनपे भ्रष्टाचार ने वितरण के तंत्र में भी बाधाएँ खड़ी कीं और सरकारी दुकानों पर लोगों की कतारें लगने की बात सामने आईं। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीयतावाद के समर्थन में क्यूबा और भारत सहित अस्सी देशों को जाने वाली विकराल संपदा भी मार्क्सवाद की रटंतू और किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का सत्यानाश करने वाली कार्रवाई थी। भारत में ब्रिटिश दौर में देश से बाहर संपदा का ऐसा ही प्रवाह कई अकालों की वजह बना, जबकि ब्रिटिश दौर के टैक्स मुगलों के वक्त के जैसे ही और कई बार उनसे कम भी थे।
स्टालिन के बाद की सोवियत सत्ता ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों और युद्ध उद्योग को तो अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता के जज्बे में आगे बढ़ाया, पर अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पश्चिम की चुनौती पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। इसके बजाय प्रचुरता को गुणवत्ता का समानार्थी मानने की रटी हुई नीति पर कायम रहे। इस तरह ये एक ऐसा समाज बन गया जहाँ किसी तरह की कोई चुनौती नहीं बची थी। तलाकों की तादाद इसलिए ज्यादा थी क्योंकि वे विवाह और सरकारी सुविधाओं के कारण सुरक्षित जीवन में थोड़ी हलचल पैदा करते थे। इसे लोगों ने व्यक्तिगत प्रेरणाओं के अभाव की व्यवस्था समझा, जबकि ये आगे बढ़ने की हसरतों से विपन्न एक व्यवस्था थी। इसका कोई उद्देश्य नहीं था और इसका वास्तविक पतन उसी दिन शुरू हो गया था जब इसने स्टालिन मॉडल की प्रतिक्रिया को ही अपना जमीर बना लिया था।
सोवियत समाजवाद की विडंबना शायद यह थी कि उसे हर समय बेहद गतिमान पश्चिम के मुकाबले में रहना था। उन यूरोपीय समाजों के मुकाबले जिन्होंने वैयक्तिकता और सामूहिकता को एक-दूसरे के बरक्स खड़ा करना छोड़कर उनमें सामंजस्य के संतुलन बिंदु तलाशने शुरू कर दिए थे। विज्ञान की तरक्की आम लोगों को ज्यादा निजी समय दे पाए इसके रास्ते तलाश करने शुरू कर दिए थे। जिसका नतीजा है कि नीदरलैंड्स जैसे देश में साप्ताहिक कार्य अवधि आज सिर्फ 21 घंटे की है, और अमेरिका जैसे देश की कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को अपने काम के निर्धारित घंटे खुद चुनने की आजादी दे रही हैं। कल्पना करें कि सोवियत संघ का यह मुकाबला अगर किसी एशियाई देश से होता तो यह संकट नहीं होता। एशियाई सभ्यताएँ अपने में मशगूल होने से उन्हें गति की वैसी आवश्यकता नहीं होती। वहाँ के लिए प्रचुरता निस्संदेह एक बड़ा मूल्य है। भारत तो कुछ सदी पहले तक प्रचुरता की ही सभ्यता थी, जिसने उसे सर्वसमावेशी हिंदू जीवन का अनोखा उपहार दिया। खुद सोवियत संघ भी ज्यादातर एशियाई ही है, जिसने वहाँ के समाजवाद को जहाँ का तहाँ पड़े रहने की अजगरी वृत्ति दी। हम यह भी कह सकते हैं कि यूरोपीय सिर ने रूस को क्रांति दी और एशियाई धड़ ने उसे निष्क्रिय बना डाला। 
1990 के आसपास भूमंडलीकरण के रूप में अभिव्यक्त हुआ पश्चिमी पूँजीवाद दुर्दमनीय शै थी, जिससे बचना नामुमकिन था। इसे सही समय पर और सही ढंग से एक ही व्यक्ति ने पहचाना, जो थे माओ के बाद के चीन के शीर्ष नेता देंग श्याओ पिंग। उन्होंने अस्सी के दशक में ही वे प्रक्रियाएँ शुरू कीं जिन्होंने चीन को आज वाली रफ्तार दी। चीन में समाजवाद के राजनीतिक और पूँजीवाद के आर्थिक तंत्र का फ्यूजन है। लेकिन चीन का मॉडल क्या सोवियत मॉडल का एकमात्र विकल्प है? क्या यह चीन फिर से कभी समाजवाद की ओर लौट पाएगा? ये ऐसे सवाल हैं जो भूत की तरह आज दुनिया के सोचने-समझने वालों के सिर पर सवार है। 
सोवियत विघटन की परिघटना का ये संदेश है कि विचारों को भावुकतावादी और रटंतू होने से बचना चाहिए, क्योंकि जडता का आरंभ यहीं से होता है। उसे वैयक्तिकता और व्यक्तिवाद के बीच के फर्क को समझना चाहिए। अगर सोवियतों ने ये समझा होता तो उन्हें अपनी ही जनता की जासूसी करने के बजाय अपनी आंतरिक ग्रोथ पर खर्च करने के लिए ज्यादा वक्त मिलता। और यह भी कि भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में बहुत फाँक करके देखना ठीक नहीं। लोगों को अपने आत्मिकता की तरह भौतिकता में भी निरंतर ग्रोथ की आवश्यकता होती है।   

भूमंडलीकरण ने मार्क्सवाद में वर्णित श्रम और वर्ग विभाजन को बेहद जटिल और भ्रष्ट कर दिया है। ऐसे में सोवियत पतन का असली सवाल यही है कि क्या सामूहिकता के लक्ष्य के लिए की गई कार्रवाइयाँ वाकई रसेल का कहा शुद्धतावाद ही हैं, जो छोटे वक्त के लिए तो कारगर हो सकती है, पर उसे किसी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बनाया जा सकता। और यही वो बिंदु है जिसका कोई ठोस सैद्धांतिक प्रत्युत्तर सोवियत विघटन के बाद मार्क्सवादी पेश नहीं कर पाए हैं। यह निरुत्तरता मौजूदा वैश्विक अर्थशास्त्र के उपभोक्तावादी कोलाहल, बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी और वंचनाओं की एक नई बनती दुनिया में कितनी सांघातिक है इसे सहज ही समझा जा सकता है। 

Friday, June 2, 2017

रीवा में रंग-अलख

रीवा में मनोज मिश्रा ने एक बैंक्वेट हॉल को प्रेक्षागृह की शक्ल दे दी है। मशक्कतों से तैयार किया गया इसका स्टेज अच्छा-खासा किंतु अस्थायी है। शादियों के सीजन में उसे उखाड़ देना पड़ता है। रंग-अलख नाट्य उत्सव में इसी स्टेज पर मंडप आर्ट्स की प्रस्तुति ‘एक विक्रेता की मौत’ देखने को मिली। कुछ साल पहले बघेली में ‘वेटिंग फॉर गोदो’ कर चुके मनोज ने आर्थर मिलर के इस नाटक को भी बघेली भाषा में ही मंचित किया है। मुख्य किरदार का नाम यहाँ रमधरिया है और उसके बेटों का बुधी और सुक्खी। यह एक शहरी हकीकत की आंचलिक भाषा में प्रस्तुति ही नहीं है, बल्कि आज की उत्तरआधुनिकता में एक खारिज होती जा रही जीवन शैली के मूल्यों का पाठ भी है। अपने बारे में जरूरत से ज्यादा सोच रहा आज का इंसान अचानक से रिश्तों की एक दुनिया में जा पहुँचता है, जहाँ हालात के अपने बहुत से द्वंद्व एक मारक यथार्थ रचते हैं। अमरीकियों द्वारा लिखे गए नाटकों में जॉन स्टीनबैक के ‘ऑफ माइस एंड मेन’ की तरह ही ‘डेथ ऑफ ए सेल्समैन’ भी यथार्थ की उन अंतर्भूत त्रुटियों को दिखाता है जहाँ से एक नियति गहरे संवेदनात्मक रूप में प्रकट होती है।
यह प्रस्तुति का प्रारंभिक शो था। इस तरह के खालिस यथार्थवादी नाटकों में अच्छा अभिनय एक ऐसी चीज है जो अपने तईं ही प्रस्तुति की बाकी कमियों को ढँक देता है, और यही निर्देशक ने किया भी है। मुख्य दोनों भूमिकाओं में विपुल सिंह गहरवार और पुनीत तिवारी ने पात्रों की इमेज और स्थिति के तनाव को बहुत अच्छी तरह सँभाले रखा है। इसके अलावा बाकी पात्र भी अपने चरित्रांकन में काफी ठोस हैं। हालाँकि मंच के यथार्थ में ऐसा कुछ खास नहीं है, पर स्थितियों में एक निरंतरता है, जिससे पाठ की स्पष्टता दर्शक के लिए बनी रहती है। रमधरिया यूँ नाटक में टोकरी और सूप बेचने का काम करता है, पर प्रस्तुति के कुल स्वरूप में भाषा के अलावा आंचलिकता के तत्त्व अलग से दिखाई नहीं देते।
नाट्योत्सव में नीरज-रोशनी की ‘कर्णभारम्’ भी कुल मिलाकर तीसरी बार देखी, और फिर से इसका मुरीद हुआ। हालाँकि रीवा के दर्शकों को बताए जाने की आवश्यकता है कि नाटक के दौरान बेवजह ताली पीटना अच्छी बात नहीं है।
मंडप आर्ट की रंग-अलख ने रीवा में युवा कलाकारों की एक अच्छी-खासी तादाद तैयार कर दी है। नाटकों को देखने के लिए शहर के चित्रकार-मूर्तिकार सुधीर सिंह, नाटककार योगेश त्रिपाठी, संगीत संयोजक अभिषेक त्रिपाठी आदि भी आए हुए थे जिनसे मुलाकात हुई और बातें भी।

ग्वालियर में तीन नाटक


ग्वालियर के नाट्य मंदिर प्रेक्षागृह में जाने से लगता है मानो आप वक्त के किसी लंबे वक्फे का हिस्सा हों। यहाँ की दीवारों, कुर्सियों, पंखों तक में कई दशक पुराना माहौल आज भी अक्षुण्ण है। प्रेक्षागृह का स्वामित्व आर्टिस्ट कंबाइन नाम की जिस 75 साल पुरानी संस्था के पास है उसके साथ मिलकर योगेन्द्र चौबे ने यहाँ तीन नाटकों का एक समारोह आयोजित किया। योगेन्द्र चौबे अभी डेढ़ साल पहले ही शहर की मानसिंह तोमर यूनीवर्सिटी के ड्रामा विभाग प्रमुख मुकर्रर हुए हैं। वे जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में छात्र थे तब उनका जो काम देखा था वह अब तक भूल भाल गया था। लेकिन इस समारोह में अपने छात्रों के लिए निर्देशित दो नाटकों में योगेन्द्र डिजाइन के बिल्कुल नए तेवरों के साथ नमूदार हुए। पहली प्रस्तुति ‘युगद्रष्टा’ में उन्होंने हिंदी की कुछ कविताओं को एक थीम में बाँधा है। प्रारंभिक दृश्य में लंबे सफेद कपड़े के आरपार व्यास जी और गणेश जी बैठे हैं। इस तरह शुरू हुई कथा चीरहरण के दृश्य की उत्तेजक बहस ‘उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएँगे‘ की काव्यात्मकता तक पहुँचती है। संवादों में अच्छी वक्रोक्तियाँ हैं, जिनमें धर्म को निर्वस्त्र कहा गया है, और हस्तिनापुर के लोगों को अविश्वसनीय। फिर एक सूत्रधार प्रकट होता है जो आधुनिक कोट-पैंट वाली वेशभूषा में है। और अच्छी बात ये है कि इन सब चीजों के साथ एक अच्छी रवानगी भी बनी हुई है। इसमें गीता का उपदेश देते चार कृष्ण हैं, जो बड़े सलीके से कर्म, अकर्म, विकर्म की व्याख्या करते हैं। और फिर ‘हर पंचायत में पांचाली अपमानित है’, ‘राजा बने कोई प्रजा को तो रोना है’ जैसे यथार्थवादी मिसरे भी हैं। ‘जो सीमेंट से नहीं बनाया गया’ उससे पूछा जाता है- ‘बीड़ी पियोगे द्वारपाल?’ और फिर बड़े ही प्रयोगात्मक तरह से पूरे दृश्य पर आड़ी-तिरछी गिरती विजुअल्स की एक श्रृंखला है। इस भरी-पुरी प्रयोगात्मक प्रस्तुति के अलावा तीसरे रोज न दिखने वाले वस्त्र पहने नंगे राजा के अदना से कथानक पर तैयार ‘ग्लोबल राजा’ भी अच्छा दिलचस्प नाटक है। कहानी को खींचा अवश्य गया है, पर पर्याप्त चुटीलेपन के साथा। राजा को झाँसा देने वाले लोग यहाँ अमरीकी हैट लगाए किसी पश्चिमी मुल्क से आए हैं, और इस बात से हतप्रभ हैं कि राजा का मंत्री उनसे भी घूस खा गया। दोनों ही प्रस्तुतियों में डिजाइन और अभिनय की अच्छी चमक थी और रोशनी, वस्त्रभूषा, स्टेज डिजाइन और दृश्य-तरकीबों की अच्छी योजनाएँ भी। 
तीसरी आर्टिस्ट कंबाइन संस्था की प्रस्तुति ‘कहे ईसा सुने मूसा’ में स्टेज बिल्कुल खाली था। विजय मोडक निर्देशित विभु कुमार का ये नाटक किताबी ढंग से कुछ जरूरी बातें कहता है। उसके एक संवाद के मुताबिक ‘कोई कुछ सोच नहीं रहा है, पर लोग सोचने का ढोंग कर रहे हैं’। हर फेडआउट के बाद अभिनेताओं की टोली अलग-अलग वेशभूषा में आकर कभी अस्पताल का, कभी बस के भीतर का, कभी कॉलेज का दृश्य बनाती है। ऐसा वे थोड़ा-बहुत भंगिमाओं और ज्यादातर संवादों के जरिए करते हैं। नाटक में हकीकतबयानी की जो चमक शुरुआत में दिखती है वह थोड़ी देर बाद घटनाविहीन दोहरावों में बुझ जाती है। हालाँकि प्रस्तुति के सपाटपन के बावजूद अभिनेताओं की टीम अच्छी ऊर्जा के साथ मंच पर थी। 
 नाटकों के अलावा ‘रंगमंच में वैश्विकता बनाम स्थानीयता’ विषय पर दो दिवसीय एक सेमिनार का आयोजन भी किया गया। अन्य वक्तागण तो विषय से इधर-उधर की बातें ज्यादा करते रहे, पर रानावि निदेशक वामन केन्द्रे ने विषय पर कायम रहते हुए कहा कि कोई अभिव्यक्ति वैश्विक हो ही नहीं सकती (यानी वह मूलतः स्थानीय ही होती है)। और यह कि शेक्सपीयर को ब्रिटिश ने सोच-समझकर दुनियाभर में पहुँचाया, लेकिन शेक्सपीयर में दम था इसलिए वह टिक पाया, पर संस्कृत नाटक पश्चिम में क्यों नहीं पहुँचा! क्या हमने यह कोशिश की? नहीं की, इसलिए संभावना होते हुए भी हम स्थानिक रह गए। उन्होंने कहा कि वैश्विकता की राजनीति को समझने की आवश्यकता है और यह भी कि टेक्नालाजी इसमें किस तरह अपनी भूमिका अदा कर रही है। उन्होंने कहा कि अनुकरण का मतलब वैश्विक हो जाना नहीं है, जबकि हमारे यहाँ के तो फिल्म अवार्ड समारोह भी ऑस्कर की कॉपी मालूम देते हैं। वामन ने कहा कि हमें अपनी स्थानीयता को दूसरों के जरिए जानने की जरूरत नहीं है। वामन केन्द्रे से एक रोज पहले इस विषय पर बोलते हुए जो कुछ मैंने कहा उसका आशय यह था कि रंगमंच और हमारी सभ्यता का मूल स्वभाव ही स्थानीयता का है। रंगमंच का तो प्रारंभ ही स्थानीयता से होता है, और हमारी सभ्यता, जैसा कि अल बरूनी ने पाया था, अपनी स्थानीयता में प्रसन्न एक सभ्यता थी। इसीलिए भारतीयों को कभी बाहर जाने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। और यह कि सिनेमा मुनाफे की गरज से एक वैश्विक संवेदना की तलाश करता है। लेकिन जिस हॉलीवुड ने ये काम सबसे ज्यादा किया वही (दूसरी सभ्यताओं का मर्दन करके बना ‘विश्ववादी’) अमेरिका आज राष्ट्रवाद की स्थानीयता की ओर लौट रहा है। ऐसी ही कुछ और बातें।
समारोह में भोपाल से आए पत्रकार-बुद्धिजीवी गिरजा शंकर, दिल्ली से आए अजित राय, शिवकेश मिश्र, नागपुर से आईं रंगमंच की अध्यापिका संयुक्ता, जम्मू से आए नाट्य विशेषज्ञ मक्खनलाल सर्राफ, भोपाल से आए पत्रकार विकास शर्मा आदि ने भी अपनी-अपनी बातें रखीं। अच्छी बात यह थी कि यूनिवर्सिटी की कुलपति लवली शर्मा प्रायः सत्रों में उपस्थित थीं। सरकारी तंत्र वही होता है, पर अचानक किसी एक इंसान की ऊर्जा उसी तंत्र को कुछ ज्यादा गतिशील बना देती है। यही काम यहाँ योगेन्द्र चौबे ने अपने युवा साथी हिमांशु द्विवेदी के सहयोग से किया। लगता है आने वाले दिनों में थिएटर के परिदृश्य में ग्वालियर एक अहम मुकाम बनने वाला है।

वसंत काशीकर की प्रस्तुतियाँ

जबलपुर के दिनेश ठाकुर स्मृति प्रसंग में वसंत काशीकर की प्रस्तुति ‘खोया हुआ गाँव’ देखी। वसंत काशीकर में आंचलिकता की अच्छी सूझ है। उनकी पिछली प्रस्तुति ‘मौसाजी जैहिंद’ में तो फिर भी पड़ोस के बुंदेलखंड का परिवेश था, पर इस बार तो बिल्कुल ही बेगानी जगह कश्मीर को दिखाया गया है। मोतीलाल केमू के इस नाटक में पाँच गाँवों के डाकघर में सारंगी का शौकीन एक नया डाकिया आया है। डाकिए की लोककलाकारों के उस गाँव में बड़ी रुचि है जहाँ कोई चिट्ठी नहीं आती। वह वहाँ जाने की तरकीब निकालता है। इसी बीच एक प्रेम कहानी भी नत्थी होती है। कहानी तो जो है सो है, पर असली चीज है उसकी छवियाँ। प्रस्तुति के पात्र कुछ लोककथानुमा हैं। डाक को इकट्ठा करने में तन्मय डाक बाबू उम्र की ताजगी लिए नए डाकिये को चारों गाँवों के बारे में बता रहा है। फिर रास्ते में डाकिये को भेड़ों का रेवड़ लिए आ रहा एक चरवाहा मिलता है। चरवाहे को आँख मिचमिचाने की आदत है। कपड़ों के मुखौटों के पीछे उसकी भेड़ों की व्यग्रता भी देखते ही बनती हैं। चरवाहा जब उन्हें समेटकर विंग्स की तरफ ले जा रहा है तो एक उनमें से निकलकर औचक भाग खड़ी हुई है। साइकिल पर जा रहे डाकिये को अपनी बेटी को पीट रहा एक पिता मिलता है, जिससे उसकी बहस होती है। डाकिए के आने से गाँव वालों में अपने अधिकारों की जागरूकता आ जाती है, और इस तरह उनके आंदोलन-प्रदर्शन के कुछ दृश्य प्रस्तुत होते हैं। हालाँकि कथानक का सिलसिला नाटक में बहुत युक्तिसंगत नहीं है, पर वसंत काशीकर तरह-तरह के दृश्यों में उसे रुचिकर बनाए रखते हैं। समूह नृत्य में कोरियोग्राफी और संगीत काफी सुंदर, कर्णप्रिय और ताजगीपूर्ण है। उनके पात्र किसी सुनाए जा रहे किस्से की सी आभा लिए हैं। यह भावों की एक दुनिया है, जहाँ वेशभूषा और देहभाषा पर काफी अच्छे से काम किया गया है। नाटक का मुख्य पात्र बताता है कि उसके अंदर ‘इंसानी हमदर्दी है, मदद करने का जज्बा है।’ इसी हमदर्दी से वह बूढ़े से ब्याही जा रही लड़की का भला करता है।
वसंत काशीकर की पिछली प्रस्तुति में उन्होंने खुद से झूठ बोलने वाले मौसाजी की भी अच्छी छवि बनाई थी। उदयप्रकाश की कहानी में किरदार की झूठी लंतरानियों में उसकी विस्थापित ईगो ज्यादा दिखाई देती है, पर प्रस्तुति मौसाजी को एक ठेठ गँवई किरदार में तब्दील करती है। इस तरह वे मंच पर ज्यादा स्वाभाविक मालूम देते हैं, और पात्र की आंतरिक विडंबना ज्यादा प्रामाणिक बन पाती है। निर्देशक वहाँ पात्र की मार्फत ही एक माहौल बनाते हैं। इस माहौल में मौसाजी अपने महत्त्व की एक खोखली दुनिया रचता है जो दूसरों के लिए (यहाँ तक कि दर्शकों के लिए भी) रंजक बन जाती है। मौसाजी के किरदार में खुद वसंत ही मंच पर थे, और क्या खूब उन्होंने पात्र के दारुण को मंच पर रचा था।
‘खोया हुआ गाँव’ में वसंत काशीकर कई मुश्किल दृश्यों को काफी सलीके से हैंडल करते हैं। हाकिम, उसके गुर्गों और गाँव वालों से उनकी मुठभेड़ का दृश्य इस लिहाज से यकीनन मुश्किल था। लेकिन उन्होंने पात्रों के आपे और दृश्य की टेंशन को कभी भी अनुपातहीन नहीं होने दिया है। स्थितियों के मिजाज का यह संतुलन उनके निर्देशन की बड़ी चीज है। ब्रजेश अनय की प्रकाश योजना में प्रस्तुति के प्रायः दृश्य फ्रीज के पुराने ढंग पर समाप्त अवश्य होते हैं, पर काफी व्यवस्थित तरह से।

मल्लाह टोली

मल्लाह टोली
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नीलेश दीपक की प्रस्तुति ‘मल्लाह टोली’ एक बस्ती का वृत्तचित्र है। ‘कैमरा’ यहाँ ठहर-ठहरकर कई घरों के भीतर जाता है, और एक छोटे से परिवेश में तरह-तरह के किरदारों से बनी एक दुनिया को दिखाता है। यह मिथिलांचल के तीन बड़े कथाकारों में से एक राजकमल चौधरी की कहानी है, जिसमें एक आम यथार्थ के भीतर कुछ खास पात्र दिखाई देते है। ये पात्र अचानक कोई ऐसी हरकत कर बैठते हैं कि उससे एक घटना पैदा होती है। हट्टा-कट्टा महंता अपने खास दोस्त से मारपीट कर उसकी नई ब्याहता को हड़प लेता है। सब शराब के साथ मछली खाते हुए जश्न मना रहे हैं कि उसकी उपेक्षित हस्ती ऐसा उबाल मारती है कि वो जाकर पिरितिया से लिपट जाता है और छुड़ाने आए उसके पति को उठाकर पटक देता है। ऐसी एक्शनपैक्ड स्थितियों से जो रुचि बनती है उसे नीलेश ने लोक संगीत के साथ नत्थी कर एक निरंतरता बनाए रखी है। कहानी में एक ओर दबंग की बीवी होने को मजबूर पिरितिया है, तो वहीं अपने अशक्त पति की सेवा-सुश्रूषा में पूरी मोहब्बत से जुटी केतकी भी है, जो काफी लंबे अंतिम दृश्य में तिरपित मिसिर की गुप्ती उसी के पेट में उतार देती है। प्रस्तुति में नए-नए पात्रों और स्थितियों की यह आवाजाही शुरू से अंत तक बनी रहती है।
मछली पकड़ने के बड़े-बड़े जालों से मंच पर परिवेश का अच्छा संकेत बनाया गया है। इसी तरह फूस वगैरह की कारगुजारी से घरों के संकेत। नाव, नदी, मछली के जाल फेंकने वगैरह के दृश्यों में भी अच्छी मेहनत और युक्ति दिखाई देती है। इसी युक्ति से केतकी के बेहद कामचलाऊ घर में ब्रा और ब्लाउज को काफी प्रमुखता से टाँग दिया गया है। कारण ये है कि अगले दृश्य में कामातुर तिरपित मिसिर उन्हें सूँघेगा। जो भी हो इन्हीं सब कारणों से नीलेश की ये प्रस्तुति अपनी बुनावट में कुछ अलग तरह की है। किरदारों में भी उन्होंने नाटकीयता और हकीकत का अच्छा पुट दिया है। बीमार बच्चे का इलाज करने वाला डॉक्टर इस लिहाज से काफी रोचक है, और कमली के किरदार में भी उसके भलेपन और हीन हैसियत का अच्छा समावेश है। हालाँकि बीमार पति की पत्नी केतकी के बनाव-श्रृंगार का तुक कुछ स्पष्ट नहीं होता, पर दृश्य बना कुछ ऐसा है कि दर्शक इसमें भी अटका रहे। अभिनय प्रस्तुति में यूँ ठीकठाक है, पर रिहर्सल की कमी कुछेक जगह दिखाई देती है। प्रस्तुति का नाट्यालेख इस विधा के विशेषज्ञ सुमन कुमार ने तैयार किया है, जो कथानकों के रूप परिवर्तन का ये काम लगातार किए जा रहे हैं।

रायपुर में सखाराम बाइंडर

रायपुर में 20 से 23 मई तक आयोजित ‘रंग-जयंत’ में शामिल प्रस्तुतियों में ‘सखाराम बाइंडर’ सबसे नई थी। यह इसका दूसरा ही शो था। निर्देशक जयंत देशमुख ‘आधे अधूरे’ के बाद एक बार फिर इसमें मंच-सज्जा की एक विशद विवरणात्मकता के साथ मौजूद थे। सखाराम के घर में दो कमरे हैं। छोटा कमरा रसोई है। वहाँ रखी लोहे की अँगीठी में छोटी-छोटी लकड़ियाँ ठुँसी हुई हैं, जिसपर रखे भगोने से धुआँ उठ रहा है। लक्ष्मी जब जलती हुई तीली लकड़ियों में डालती है तो अँगीठी में हिलती हुई लाल रोशनी दिखने लगती है। मैंने विदेशी नाटकों में तो देखा है, पर हिंदुस्तानी थिएटर में इस किस्म की डिटेलिंग एक दुर्लभ चीज है। रसोई में घड़ा, ड्रम, डालडे का पुराना डिब्बा, थाली-बर्तन आदि बहुत कुछ है। एक मुख्य दरवाजा और उसके बाहर एक टप्पर है, जहाँ बारिश की एक रात लक्ष्मी आसरा पाती है। एक लंबे अरसे में इकट्ठा हुआ बहुत सा जरूरी-गैरजरूरी सामान सखाराम के इस घर में पैबस्त है, और इस सज्जा का प्रस्तुति के कुल यथार्थ में एक गहरा दखल है। कमरे और रसोई की खिड़कियों के बाहर भी एक बस्ती, लोग और चिड़िया-कौए आदि हैं, जिनके आभास अनायास (और कई बार प्रत्यक्ष) प्रस्तुति में दाखिल हुए रहते हैं। विजय तेंदुलकर के नाटकों में ‘सखाराम’ अपनी यथार्थपरकता में जितना सर्वथा त्रुटिहीन नाटक है, जयंत देशमुख की यह प्रस्तुति भी उसी अनुपात में 24 कैरेट सॉलिड है। और यह भी कि यह हिंदी की नहीं बल्कि बुंदेली भाषा की प्रस्तुति है। नाटक के भदेस को बनाए रखने के लिए निर्देशक ने इसे बुंदेली में रूपांतरित करवाया। और जिस तरह यह रूपांतरण उसी तरह सटीक चरित्रांकन मिलकर इसे एक ऊँचे दर्जे की प्रस्तुति बनाते हैं। यह एक बेधक यथार्थ है जिसके पात्र दुनियादारी के लिहाज में ज्यादा नहीं पड़ते। ऐसे बेलिहाज पात्रों के तौर तरीकों की एक अपनी ही नाटकीयता है जहाँ देह में लिप्त या उससे निढाल सखाराम और चंपा देर तक बेपरवाह टाँगें फैलाए लेटे दिखाई देते हैं। लेकिन पूजापाठ करने वाली लक्ष्मी का सताया हुआ वजूद अपने लिए एक शुचिता ढूँढा करता है। और सखाराम के साथ चिलम की दिव्य दोस्ती निभाने वाला दाऊद है। कश मारने के बाद दोनों बोलते हैं बमबमबम। गणपति बप्पा की क्या मजाल कि इस दोस्ती में दखल दें-- ये साली लक्ष्मी ढोंग करती है। चिलम की आग इसी हाथापाई में गिर गई है। लक्ष्मी उसे उठा रही है। दर्शक देखते हैं कि ये सचमुच के सुलगते हुए कोयले हैं। 
 अभिनय जब छवि में तब्दील होता है तो एक सच्चा किरदार निकलकर आता है। यहाँ सभी किरदार इसी पाए के हैं। अपनी जैविकी में दो टूक ढंग से जीने वाले सखाराम को शायद याद भी नहीं कि दाऊ मुसलमान है। लक्ष्मी के खोखले दुराव पर उसकी नफरत देखते ही बनती है। उसकी जरूरियात बिल्कुल स्पष्ट हैं--- उसे एक औरत चाहिए, बदले में वह उसे जिंदा रहने का सामान मुहैया कराता है। यह बात खोखले वजूद वाली लक्ष्मी को कभी समझ नहीं आती, पर चंपा को आती है। कुल मिलाकर यह निम्नवर्गीय जीवन की वैसी ही असंतुष्ट दुनिया है जैसी कि ‘आधे अधूरे’ के मध्यवर्गीय पात्रों के जरिए एक रोज पहले भी ‘रंग जयंत’ में नमूदार हुई थी। जयंत देशमुख निर्देशित ‘आधे अधूरे’ की यह प्रस्तुति जब पहले देखी थी तब भी अच्छी लगी थी, पर इस बार यह और ज्यादा कसी हुई थी। काफी ब्योरों में विन्यस्त प्रस्तुति का सेट यहाँ भी पूरी शिद्दत से मौजूद था। अलबत्ता इस बार सावित्री बनी गरिमा मिश्रा अपनी ऊर्जा में अलग से नजर आईं। हालाँकि यही बात सखाराम बाइंडर के बारे में नहीं कही जा सकती-- वहाँ सभी अभिनेता-- शोबित खरे, लता साँगड़े, अजय श्रीवास्तव, बिशना चौहान-- अपने अपने प्रभाव के साथ मौजूद थे। बिशना चौहान ने इसका रूपांतरण भी किया था।

Sunday, April 2, 2017

भीष्म साहनी के नाटक


हिंदी नाटक में आधुनिकता के कई चरण रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में एक ओर जहाँ विपरीत ध्रुवों पर खड़े प्रसाद और भुवनेश्वर दिखाई देते हैंवहीं उनसे भी थोड़ा पहले 1916 में लक्ष्मण सिंह चौहान कुली प्रथा’ जैसा गठा हुआ यथार्थवादी नाटक लिख चुके थे। लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आजादी का एजेंडा हासिल हो जाने से आधुनिकता की नई प्रवृत्तियाँ सामने आईं। एकाएक व्यक्ति यहाँ प्रमुख हो गया था। वह व्यक्ति जो खुद को दूसरों से खास समझता था पर था उनके जैसा ही। फिर यह आधुनिकता कई तरह के प्रयोग करना चाहती थी। मंच को दर्शक दीर्घा तक ले जाया गयाया दर्शकों को मंच पर उतार दिया गया।....वगैरह। इस सारे कोलाहल के बीच भीष्म साहनी को हम एक ऐसे रचनाकार के रूप में पाते हैं जिनकी आधुनिकता ठेठ भारतीय परंपरा से उपजी है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि पश्चिम में दो-दो महायुद्धों ने व्यक्ति और उसके अस्तित्व के सवाल को जिस तरह केंद्र में ला दिया था वह उस तरह हमारी समस्या नहीं थी। (बावजूद इसके कि इन पश्चिमी प्रवृत्तियों का प्रभाव हिंदी में कई रचनाकारों पर काफी गहरा था; और कुछ ने इसे फैशनेबल ढंग से भी पकड़ा हुआ था।) हमारी समस्या उस समाज की समस्या थी जिसे आजादी के बाद अभी एक रूप हासिल करना था। जिसे नागरिक समाज की बहुत सी बुनियादी समस्याओं को अभी हल करना बाकी था। भीष्म साहनी के नाटक इसी समाज के द्वंद्वों और सवालों के नाटक हैं। वह समाज जो सांप्रदायिकता और सत्ता के अतिचारों के सवाल से जूझ रहा था। जहाँ एक ओर अभी अतीत के सामंती मूल्य अपनी पकड़ बनाए थे, वहीं कई तरह के समांतर प्रतिरोध भी सक्रिय होने लगे थे। इस नजरिये से जब हम देखते हैं तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भीष्म साहनी के यहाँ कालजयी होने की कोई हसरत नहीं हैउनके नाटक पूरी तरह सार्वजनिक वर्तमान के नाटक हैं भले ही कई बार ये वर्तमान किसी ऐतिहासिकता के कलेवर में हों। उदहरण के लिए उनके प्रहसन मुआवजे’ को देखें। मुआवजे’ का हास्य रटंतू पात्रों के रवैये से निकलता है। इन पात्रों का अपने आचरण के बारे में कोई विचार नहीं हैलेकिन इस व्यवस्था की प्रक्रियाएँ उन्होंने सीख रखी हैं। नाटक में एक ही आदमी तमाम नेताओं के भाषण लिखता है। उसके भाषण राजनीति का एक कर्मकांड हैं जहाँ अंत्येष्टि के अवसर पर विवाह के श्लोक पढ दिए जाने जैसी गलतियाँ होती रहती हैं। लोकतंत्र के इस प्रहसन में दंगा होना एक दस्तूर है और अम्न की कार्रवाइयाँ भी एक दस्तूर हैं। यह लोकतंत्र प्रक्रियाओं को तो जानता है पर उनके प्रयोजन को नहीं। इसीलिए जो मुआवजा जिंदगी को बचाने के लिए दिया जाना चाहिए उस मुआवजे के लिए उल्टे लोग जिंदगियाँ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। भीष्म साहनी एक ओर व्यवस्था की मूर्खताओं की खिल्ली उड़ाते हुए एक हास्य रचते हैं वहीं वे उसकी अमानवीयता से बनते स्थिति के विद्रूप को सामने लाते हैं—जिस विद्रूप में एक जीता-जागता आदमी मुआवजे की रकम के लिए लाश हो जाने को तैयार है। नाटक 'मुआवजेएक बहुत संतुलित और तीखा हास्य है। समकालीन हिंदी नाटक में उसके मुकाबले की व्यंग्यात्मकता नजर नहीं आती। यह पोलिटिकली करेक्ट वो भारतीय यथार्थ है जहाँ भाड़े का हत्यारा आखिर खुद ही राजनेता बन जाता है। 1992 में लिखा गया यह नाटक हमारी परवर्ती राजनीति में से मानो एक बानगी पेश करता है। नाटक की भूमिका में भीष्म साहनी ने लिखा था- 'गंभीर विषयवस्तु और उसकी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। न तो हँसी-मजाक को इतना तूल दिया जाए कि नाटक प्रहसन न रहकर भड़ैती बन जाएऔर न ही उसकी गंभीर विषयवस्तु पर इतना अधिक बल दिया जाए कि वह सांप्रदायिकता पर लिखे एक दस्तावेज का रूप ले ले।' ऐसा कहकर वे समकालीन हिंदी रंगमंच की एक प्रवृत्ति को चिह्नित कर रहे थे। उनका नाटक उस प्रवृत्ति के लिए एक चुनौती खड़ी करता है।
उनका नाटक 'कबिरा खड़ा बजार में' रंगकर्मियों के बीच हमेशा से काफी लोकप्रिय रहा है। यों कबीर हमेशा से ही हिंदी साहित्य और नाटक की एक प्रिय शख्सियत रहे हैं, लेकिन भीष्म साहनी के कबीर में एक विलक्षण सादगी है। कबीर तो जैसे हैं वैसे हैं ही, लोई का उनके बारे में खयाल सुनिये- न घर, न दुआर, बापू ने हमें कहाँ लाकर झोंक दिया...एक पगलेट साधु के पास। नाटक में लोई की जिज्ञासाएँ इतनी मासूम और दिलचस्प है कि सुनने वाला सुनता ही रह जाए। लोई पूछती है- तुम झगड़ा-वगड़ा नहीं करते तो तुम्हें पीटते क्यों हैं? हमें कोई गाली दे तभी न हम उसे पीटते हैं! राह जाते को कोई थोड़े ही पीटता है। ......गली-बजार के लोग यह भी कहते हैं कि कबीर जोलाहा पगला गया है।’  और कबीर की सफाई कि मैं तुम्हें पागल नजर आता हूँ लोई कहती है- लोग-लुगाई यों ही थोड़े कहते फिरते हैं। पूरे पागल नहीं तो आधे पागल होगे। आधे पागल भी तो होते हैं। भीष्म साहनी की साहित्यिक अभिव्यक्ति में भले ही कमी-बेशी निकाली जा सकती हो, पर उनके यथार्थ में कोई खोट नहीं है। उनके कबीर ने अपने विचारों के लिए बहुत कुछ खोया और झेला है। उन्हें पानी में डुबोया गया, उनका घर जला दिया गया। नाटक के कबीर सब कुछ झेलते हुए भी मानो यह जानते हैं कि उनकी साधारणता ही उनकी असलियत है। उनकी ख्याति और वास्तविकता को आलेख में बहुत ही अच्छी तरह से बुना गया है। कबीर से कायस्थ का संवाद कथानक में नाटकीयता के लिहाज से एक काफी ठोस स्थिति है, जो कबीर को छंद-अलंकार सीखने की राय देता है; और कवि के रूप में अच्छा कैरियर बनाने के लिए बड़े-बड़े उमरा-वुजरा से मिलने की सलाह देता है। नाटक में कबीर की छवि एक ओर म्यूजिकल की संभावनाएँ लिये हुए है, वहीं उसे शहरी यथार्थवादी ढंग से भी बार-बार मंचित किया गया है।
भीष्म साहनी के रचनाकर्म में स्थितियों के विवरण काफी इत्मीनान से जगह बनाते हैं। इस महादेश में कहानी कहने की परंपरा के इस खास अवयव से वे आधुनिकता के आशयों को कहते हैं। लेकिन उनके दो नाटक हानूश और माधवी इस लिहाज से उल्लेखनीय हैं कि उनमें यह डिटेलिंग ही उनकी कमजोरी बन गई है। खास तौर से माधवी में एक छोटा कथ्य अपने दोहरावों और विस्तार में ऊब पैदा करता है, भले ही रंगकर्मी प्रायः आसान संरचना के कारण इस नाटक की ओर आकर्षित होते रहे हों। यों भी हिंदुस्तानी रंगमंच में पौराणिकता का आकर्षण हमेशा से रहा है। माधवी के कथा-बिंदुओं में ययाति का अहं भी एक कथा-बिंदु है, जो बहुत स्थूल ढंग से सामने आया है। ययाति वानप्रस्थ में भी इससे उबर नहीं पाए हैं। वे अपने शाही अहं की तुष्टि के लिए अपनी बेटी को दान में दे देते हैं। नाटक ययाति के अहं से शुरू होता है और गालव की लालसा तक को दिखाता है। माधवी चौतरफा पुरुष वर्चस्व की शिकार है, लेकिन नाटक का अंत उसके प्रतिकार को दिखाता है। नाटक की समस्या है कि उसकी विवरणात्मकता उसके रूपक पर हावी है और वह पौराणिक संदर्भ का एक साधारण आख्यान होकर रह जाता है। न सिर्फ इतना, बल्कि ययाति जैसा पात्र लेखकीय मंतव्य की पूर्ति के लिए इकहरे ढंग का किंचित बनावटी भी नजर आता है।  हालाँकि हानूश, जो एक चेक दंतकथा पर आधारित है, में यह समस्या उस स्तर पर नहीं है। हानूश ने वर्षों की मेहनत के बाद एक घड़ी बनाई है। यह घड़ी नगर की उपलब्धि है। पर्यटक इसे देखने आएँगे तो राज्य की आय बढ़ेगी; लेकिन निरंकुश राजा हानूश को अंधा करवा देता है। हानूश की अब एक ही चिंता है कि उसके आविष्कार के ज्ञान को उसी के साथ खत्म नहीं हो जाना है, कि कैसे इस ज्ञान को बाकी समाजों और पीढ़ियों के लिए बचाया जाए।  
नाटक में परिवेश की एक फाँक है, पर एक माहौल भी साथ-साथ विस्तार पाता है। नाटक में एक दंतकथा की जाहिर सरलता ही उसकी सीमा है। राजा हानूश को अंधा करवा देने का हुक्म देता है। उसके क्रूर आदेश में कोई युक्ति नहीं है, सिवाय उसकी जालिमाना मंशा के। हानूश में हम किसी जटिल या नई सच्चाई को नहीं देख रहे होते। उसका पूरा ढाँचा एक पुराने किस्म की कहानी के उतार-चढ़ावों से बना है। लेकिन भीष्म साहनी के अन्य नाटकों की तरह हानूश भी रंगकर्मियों को मंचीय यथार्थ में गहराई उत्पन्न करने के काफी मौके देता है। एक अपरिचित माहौल की इस कहानी से गुजरते हुए यह साफ देखा जा सकता है कि भीष्म साहनी मंचीय दृश्य के एक कुशल कारीगर हैं। उनके नाटक के पाठक को सहज ही यह महसूस होता है कि जिन दृश्यों से वह गुजर रहा है उनके विजुअल कितनी अच्छी तरह लेखक के दिमाग में बने हुए होंगे। हानूश का दृश्य विधान रंगकर्मियों के लिए निश्चित ही एक चुनौती पेश करता है।
भीष्म जी के नाट्यलेखन के सिलसिले में उनके एक कम चर्चित लेकिन महत्त्वपूर्ण नाटक रंग दे बसंती चोला की चर्चा भी जरूरी है। रंग दे बसंती चोला जालियाँवाला बाग की घटना पर आधारित नाटक है। नाटक में उक्त घटना से जुड़े तथ्यों, स्थितियों, मनोदशाओं और भावनाओं को एक कथात्मक सूत्र में बाँधा गया है, और यह एक बहुत ही कुशल और वस्तुनिष्ठ नैरेटिव का उदाहरण है। बावजूद इसके कि यह नाटक किसी वृत्त नाटक की तटस्थता में नहीं लिखा गया है यह महत्त्वपूर्ण है कि इसमें किसी तटस्थता का उल्लंघन भी नहीं किया गया है। नाटक से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है मानो जालियाँवाला बाग की घटना सत्ता और शासित के मध्य संघर्ष मात्र का नहीं बल्कि दो सभ्यताओं के संघर्ष का परिणाम हो। नाटक के किरदार डायर और ओड्वायर के तर्कों में जालियावालाँ बाग से दो रोज पहले एक क्रिश्चियन मिशनरी महिला पर हुए जानलेवा किस्म के हमले की घटना का हवाला भी है। वहीं हिंदुस्तानियों में तत्कालीन देशभक्ति के जज्बे के बहुत सुंदर चित्र नाटक में खींचे गए हैं। ये दो सभ्यताएँ हैं जिनके नुमाइंदों के ढंग बिल्कुल अलग हैं, जिन्हें नाटक साफ-साफ पेश करने की कोशिश करता है। नाटक में उल्लेख है कि उक्त घटना के बाद आठ साल जीवित रहे जनरल डायर ने बार-बार इस घटना को फर्ज को अंजाम देना बताया। आश्चर्य है कि यह नाटक अब तक अधिक क्यों नहीं खेला गया। जबकि यह भीष्म जी की नाट्य रचनाओं में एक पाए की कड़ी है।
भीष्म साहनी ने फूजियामा नाम के एक रूसी नाटक का अनुवाद भी किया था। यह कम्युनिस्ट नैतिकता का एक संवाद-बहुल नाटक है, जिसमें जटिल स्थितियों में निजी नैतिकता के सवाल की परख की गई है। लेकिन क्योंकि हर व्यक्ति में अलग-अलग डिग्री के स्वार्थ और आदर्श होते हैं इसलिए झूठ और सच की यह लड़ाई निरंतर पेचीदा होती जाती है। नाटक का मंच एक कृत्रिम संरचना है— एक पहाड़ का अलक्षित सुरम्य शिखर, जहाँ पात्रगण पिकनिक मनाने के लिए जमा हुए हैं; और अतीत वहाँ एक विसंगति के रूप में चला आया है। हर पात्र के अतीत में नैतिकता की कोई न कोई खोट है। सामान्य हिंदी दर्शकों के लिए यह नाटक इसलिए थोड़ा मुश्किल मालूम देता है कि निजी नैतिकताओं में झाँकने का इस तरह का चलन अपने यहाँ नहीं है। जे.बी. प्रीस्ले के एन इंस्पेक्टर काल्स की तरह फूजियामा के पात्रों की सफाइयाँ और द्वंद्व भी दरअसल उनकी अपनी नैतिक चूकों के वाकये हैं। यह हमसे आगे की सिविल सोसाइटी है जहाँ के मौकापरस्त पात्र भी दूसरों को सफाइयाँ देने से पहले खुद को उस सफाई से सहमत कराते हैं।
भीष्म जी के एक अन्य नाटक आलमगीर में वरिष्ठ नाट्य आलोचक जयदेव तनेजा ने प्रायः वही त्रुटि चिह्नित की है जिससे मिलता-जुलता जिक्र यहाँ ऊपर भी किया गया। उन्होंने इस नाटक को सूचनात्मक और शब्दाश्रित बताया है, जिस वजह से इसे नहीं खेला गया। हमें यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि एक नाटक में नाटकीयता का बाहरी तामझाम तब तक असर नहीं करता जब तक कि भीतरी द्वंद्व ठीक से पैबस्त न किए गए हों, जिस वजह से अंधा युग जैसा रेडियो नाटक भी भारतीय रंगमंच की शीर्ष कृतियों में शुमार हुआ। अगर विहंगम रूप से देखें तो भीष्म साहनी के नाटकों की सबसे बड़ी खूबी और सीमा यही है कि उनमें समकालीन यथार्थ की फिक्रें हमेशा दिखाई देती हैं। वे एक हिंदुस्तानी दारियो फो हैं। क्या नाटक मुआवजे का व्यंग्य किसी भी तरह दारियो फो के चुकाएँगे नहीं से कम है? हालाँकि भीष्म जी अपने व्यक्तित्व में उतने तीखे नहीं हैं, पर उनकी रचनाएँ हमेशा तीखी हकीकतों को उठाती रही हैं। उनके नाटक उन दर्शकों के लिए लिखे गए हैं जिन्हें किस्सागोई में बातें सुनने-पढ़ने का लंबा अभ्यास है। यही वजह है कि उनके नाटक लगातार खेले जाते हैं और लंबे समय तक वे प्रासंगिक बने रहेंगे। 

Thursday, January 26, 2017

झाँसी की रानी से एक मुलाकात

इस संस्मरण के लेखक जॉन लैंग  (1816-1864) का जन्म सिडनी में हुआ था। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने के कुछ साल बाद सन 1842 में वह भारत आ गया। यहाँ आगरा कोर्ट में सन 1851 में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ कंपनी के ही एक कॉन्ट्रैक्टर रहे लाला जोती प्रसाद के मुकदमे में बतौर वकील उसे बड़ी सफलता मिली। मुकदमे में जीत ने उसे हिंदुस्तानियों के बीच प्रसिद्ध कर दिया। रानी झाँसी द्वारा अपने राज्य के अधिकार पुनः हासिल करने की कोशिशों के सिलसिले में उसकी राय जानने के लिए उसे बुलाया जाना उसी प्रसिद्धि का नतीजा था। रानी से उसकी मुलाकात का यह वाकया 1854 का है, जिसपर लिखे संस्मरण को उसने 1859 में प्रकाशित अपनी पुस्तक वांडरिंग्स इन इंडिया में शामिल किया।  

छोटे से राज्य झाँसी को कब्जे में लेने का आदेश दिए जाने के करीब महीने भर बाद, और कब्जे के लिए 13वीं नेटिव इन्फेन्ट्री की एक टुकड़ी के रवाना होने के थोड़ा पहले मुझे रानी झाँसी का एक पत्र मिला। स्वर्ण-पृष्ठ पर फारसी भाषा में लिखे इस पत्र में निवेदन किया गया था कि मैं झाँसी में एक बार उनसे मिल लूँ। पत्र लाने वाले दोनों लोग हैसियतदार हिंदुस्तानी थे। एक दिवंगत राजा का वित्त मंत्री रहा था, दूसरा रानी का मुख्य वकील था।
झाँसी का राजस्व करीब छह लाख सालाना था। सरकार के खर्चे और दिवंगत राजा की सेवा में रहे सैन्य दल का वेतन देने के बाद करीब ढाई लाख बच जाते थे। सैन्य दल ज्यादा बड़ा नहीं, एक हजार के भीतर ही था, और ये मुख्यतः घुड़सवार ही थे। राज्य को कब्जे में लेने के बाद रानी को 60 हजार सालाना की पेंशन मासिक तौर पर दी जानी थी। 
रानी का मुझे मिलने के लिए बुलाने का उद्देश्य मुझसे यह सलाह करना था कि क्या कब्जे के आदेश को रद्द या वापस करवाया जा सकता है। मैं यहाँ जिक्र कर दूँ कि रानी ने मुझसे यह संपर्क राजकीय सेवा में रहे एक सज्जन के कहने पर किया था। ये सज्जन एक समय में ऊपरी प्रांत की एक स्थानीय अदालत में रेजीडेंट अथवा गवर्नर जनरल के एजेंट रहे थे, और भारत में ऊँची हैसियत के अन्य बहुतेरे अफसरों की तरह झाँसी पर कब्जे को अंततः एक बकवास कदम मानते थे —जो न सिर्फ अविवेकपूर्ण बल्कि अन्यायपूर्ण भी था और जिसका कोई तर्क नहीं दिया जा सकता था। कुल तथ्य संक्षेप में ये थे : दिवंगत राजा के अपनी एकमात्र पत्नी (वह महिला जो हमारे देश की औरतों, आदमियों और बच्चों की किले में मौत का कारण थी, और जिसे बाद में दी सलाहों के मुताबिक मार दिया गया*) से कोई संतान नहीं थी, और अपनी मौत से कुछ सप्ताह पहले अशक्त शरीर के बावजूद दृढ़ मस्तिष्क से उन्होंने सार्वजनिक तौर पर एक उत्तराधिकारी गोद लिया, और झाँसी में गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि के उपयुक्त माध्यम को संबोधित करते हुए सरकार को ऐसा करने की सूचना दी। संक्षेप में, ऐसे मामलों में धोखेबाजी से बचने के लिए सरकार की ओर से निर्धारित सभी नियमों का अनुपालन किया गया था। राजा के जमा किए हुए लोगों और गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि की उपस्थिति में बच्चा राजा द्वारा गोद में लिया गया, और फिर इस सारी कार्रवाई का जिक्र करते हुए एक हस्ताक्षरित और सत्यापित दस्तावेज भी तैयार किया गया। राजा एक ब्राह्मण था, और गोद लिया लड़का उसके नजदीकी रिश्ते में था।
झाँसी का राजा ब्रिटिश सरकार का खास विश्वासपात्र रहा था। लॉर्ड विलियम बेंटिक ने दिवंगत राजा के भाई** को एक ब्रिटिश चिह्न और राजा की पदवी देने वाले पत्र दिये थे। इस पत्र में सुनिश्चित किया गया था कि ब्रिटिश सरकार इस पदवी और इसमें निहित आजादी की उसे, यानी राजा को, और उसके वंशजों और (गोद लिए) उत्तराधिकारियों को गारंटी करती है। कोई शक नहीं किया जा सकता कि लॉर्ड विलियम बैंटिक के उस अनुबंध (जिस उद्देश्य के लिए यह कथित रूप से था) का बगैर किसी रत्ती भर दिखावे के उल्लंघन किया गया। पेशवा के वक्त में झाँसी का मरहूम राजा महज एक बड़ा जमींदार हुआ करता था, और अगर वह पदवी-हीन ही बना रहता तो उसकी अंतिम ख्वाहिशों में कम से कम उसकी संपत्ति के मामले को लेकर किसी सवाल से जूझना न पड़ता। यह तो राजा की पदवी को स्वीकारने के कारण ही था कि मामला उसकी संपत्तियों की ज़ब्ती, और ढाई लाख सालाना के बदले 60 हजार सालाना दिए जाने तक पहुँचा। हो सकता है यह पूरा बयान पाठकों को थोड़ा अविश्वसनीय मालूम दे, पर यह पूरी तरह सच है। 
मुझे जब रानी का पत्र मिला तब मैं आगरा में था, और आगरा वहाँ से दो दिन का रास्ता है। बावजूद इसके कि मैं झाँसी से ही आया था मेरी इस महिला से सहानुभूति थी। जिस लड़के को राजा ने गोद लिया था वह सिर्फ छह साल का था, और राजा की ख्वाहिश के मुताबिक उसके बालिग यानी 18 साल का होने तक रानी को ही शासक और लड़के के अभिभावक के तौर पर रहना था। और यह किसी महिला- वो भी हिंदुस्तानी कुलीन महिला- के लिए कोई छोटा मामला नहीं था कि वो ऐसी हैसियत को ठुकराकर एक पेंशनभोगी बन जाए—भले ही वो पेंशन 60 हजार सालाना की क्यों न हो। अब मैं झाँसी में रानी के निवास तक की अपनी यात्रा के विवरणों का वर्णन करता हूँ। मैं गोधूलि के वक्त पालकी में बैठा, और अगली सुबह उजाला होने के वक्त ग्वालियर पहुँच गया। झाँसी के राजा के पास यहाँ छावनी से करीब डेढ़ मील के फासले पर एक छोटा मकान पड़ाव के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। मेरे साथ चल रहे मंत्री और वकील मुझे वहीं ले गए। दस बजे, जब मैं नाश्ता करके अपना हुक्का गुड़गुड़ा चुका तो यह प्रस्ताव आया कि एक ही ठाँव में निकल लिया जाए। दिन बहुत गरम था, लेकिन रानी ने बड़ी ही सुविधाजनक पालकी-गाड़ी भेजी थी। थोड़े में कहें तो यह किसी सवारी से कहीं बड़ी और हर सुविधा से युक्त एक छोटे-से कमरे जैसी थी। यहाँ तक कि इसमें पंखे का इंतजाम भी था, जिसे बाहर फुट-बोर्ड पर बैठा एक नौकर झलता था। वाहन में मेरे, मंत्री और वकील के अलावा एक खानसामा या बावर्ची था, जो अपने घुटनों के बीच पात्रों में ठंडा पानी, और वाइन, और बीयर इस क्रम में रखे बैठा था कि जब भी मैं प्यास महसूस करूँ तो मुझे क्षण भर में ये चीजें मुहैया करा सके। इस विशाल वाहन को घोड़ों की एक जोड़ी पूरी ताकत और वेग से खींच रही थी। दोनों ही खूब ऊँचे घोड़े थे। स्वर्गीय राजा ने इन्हें फ्रांस से 15000 की कीमत पर आयात करवाया था। रास्ता कई जगह काफी ऊबड़खाबड़ था, लेकिन इन सबसे गुजरते हुए हम करीब नौ मील प्रति घंटा की रफ्तार पर थे। दो बार घोड़े बदलने के बाद दिन के करीब दो बजे हमने झाँसी राज्य के क्षेत्र में प्रवेश किया। हमें अभी करीब नौ मील और जाना था। अब तक हमारे साथ महज चार घुड़सवार रक्षाकर्मी थे, पर अब उनकी तादाद बढ़कर करीब पचास हो गई। हर घुड़सवार एक बड़ी सी बर्छी लिए था, और ईस्ट इंडिया कंपनी के अनियमित अश्वारोही दल से काफी कुछ मिलती-जुलती वेशभूषा में था। सड़क के किनारे कुछ-कुछ सौ गज के अंतराल पर घुड़सवार मौजूद थे, और जैसे ही हम गुजरते वो भी इस दल में शामिल हो जाते। इस तरह जब हम किले- यदि निम्न कोटि की नौ तोपों के उस पार की उन कमजोर दीवारों को किला कहा जा सके- के करीब पहुँचे तो झाँसी की कुल अश्वारोही सेना वहाँ उपस्थित थी। सवारी को राजा का बगीचा कही जाने वाली एक जगह की ओर ले जाया गया, जहाँ मैं उतरा, और वित्त मंत्री, वकील और अन्य राज्य कर्मचारियों द्वारा आम के विशाल पेड़ों के झुरमुट के नीचे लगे एक बड़े से तंबू की ओर ले आया गया। यह वही तंबू था जिसमें कि मरहूम राजा ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक और सैन्य अफसरों से मिला करता था। तंबू सलीके से लगाया गया था और उसमें कालीन बिछा था, और कम से कम दर्जन भर घरेलू नौकर मेरे आदेशों को पूरा करने के लिए वहाँ तत्पर थे। मुझे यहाँ यह जिक्र नहीं भूलना चाहिए कि मेरी यात्रा के साथी- मंत्री और वकील- दोनों ही योग्य और खुशनुमा सलीके वाले लोग थे। इसके अलावा वे पढ़े-लिखे जानकार लोग थे, लिहाजा सफर में मेरा समय बहुत ही सुखद ढंग से गुजरा।
रानी ने उनके द्वारा प्रश्रय पाने वाले बहुतेरे ब्राह्मणों में से एक से सलाह की थी कि उस परदे, जिसके दूसरी ओर वे बैठती हैं, पर मेरे आने का सबसे अनुकूल समय क्या होगा;  और ब्राह्मण ने उन्हें बताया था कि यह अवश्य ही सूर्य के अस्त होने और चाँद, जो कि अपनी पूर्ण अवस्था में हो, के उदित होने का समय होना चाहिए। दूसरे शब्दों में साढ़े पाँच और साढ़े छह के बीच का समय।
यह महत्त्वपूर्ण मामला मुझे बता दिया गया था, मैंने मिलने के समय को लेकर अपना पूर्ण संतोष जताया, और उसी अनुरूप रात के खाने का आदेश दे दिया। यह होने के बाद वित्त मंत्री ने थोड़ा झेंपते हुए कहा कि वे मुझसे एक नाजुक विषय पर कुछ बात करना चाहते हैं। और कि, अगर मेरी इजाजत हो तो वे मेरे निजी सेवक सहित मेरी आवभगत में लगे नौकरों को तंबू से थोड़ा दूर होकर खड़े होने के लिए आदेश दें। जाहिर ही मैंने हाँ कहा और पाया कि कि मैं छोटे से झाँसी राज्य के केवल आधिकारिक लोगों (आठ या नौ की संख्या में) के साथ वहाँ अकेला रह गया हूँ। वित्त मंत्री मुझसे जो पूछना चाहते थे वह यह था कि क्या मैं इस बात पर सहमत हूँ कि रानी के कक्ष में प्रवेश से पहले मुझे जूते बाहर ही उतार देने होंगे! मैंने पूछा कि क्या गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि ने ऐसा किया था? उन्होंने जवाब दिया कि गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि की रानी से कभी कोई मुलाकात नहीं हुई; और दिवंगत राजा ने कभी किसी यूरोपीय जेंटलमैन की अपने महल के निजी कक्ष में अगवानी नहीं की, बल्कि इसके लिए अलग से एक कक्ष तय था, या इस तंबू में जहाँ इस वक्त हम बात कर रहे थे। मैं थोड़ी मुश्किल में था और नहीं जानता था कि क्या कहूँ, जैसा कि कुछ साल पहले मैंने दिल्ली के बादशाह के यहाँ उपस्थित होने से इनकार कर दिया था, जिसका आग्रह था कि यूरोपियन उसके यहाँ जूते उतारकर आएँ। जूते उतारने का विचार मुझे बहुत गैरवाजिब लग रहा था और मैंने यह बात दिवंगत राजा के मंत्री से स्पष्ट रूप से कही भी। मैंने उससे पूछा कि क्या वह इंग्लैंड की रानी के महल की राजसभा में शामिल होगा, अगर उसे पता हो कि वहाँ उसे अपना सिर (बिना पगड़ी के) खुला रखना होगा, क्योंकि ऐसा ही नियम छोटे से बड़े तक सबके लिए है? इस सवाल का उसने मुझे सीधा जवाब नहीं दिया, बल्कि कहा- आप अपना हैट पहन सकते हैं साहब। रानी उसका बुरा नहीं मानेंगी। बल्कि उल्टे वे तो इसे उनके प्रति सम्मान जताने का एक अतिरिक्त चिह्न मानेंगी। अब यही वो बात थी जो मैं नहीं चाहता था। मैं चाहता था कि मान लो मैं अपने जूते उतारने पर सहमत हो जाता हूँ तो वो मेरे हैट पहनने को अपनी ओर से, और मेरी ओर से भी, एक किस्म का समझौता मानें। खैर, यह मोलभाव जैसा भी था, मुझे इससे खुशी हुई और उसपर मैंने स्पष्ट रूप से उन्हें यह समझाते हुए सहमति जता दी कि इस सहमति को उनके पद और महिमा के प्रति नहीं बल्कि उनके महिला और सिर्फ महिला होने के प्रति शुभकामना के रूप में माना जाए। इस तरह यह महती मुद्दा तय हुआ। मैंने मेरे लिए तैयार किया गया आलीशान भोजन ग्रहण किया, और सूर्य के अस्त या चाँद के उदय होने की धैर्यपूर्वक लेकिन इस दृढ़ता के साथ प्रतीक्षा करने लगा कि मैं काले रंग के निचले हिस्से और सफेद रंग के ऊपरी हिस्से वाली अपनी हैट निश्चय ही पहनूँगा।
आखिर वो वक्त आया, और अपनी विशाल पीठ पर लाल रंग के मखमल से सजा हुआ चाँदी का हौदा लिए एक सफेद हाथी (एक अलबीनो, जो कि पूरे भारत में कुछ ही हैं) तंबू की ओर लाया गया। मैं लाल मखमल से ही सजाए स्टेप्स से ऊपर चढ़ा और अपनी जगह बैठ गया। महावत बहुत ही अच्छी वेशभूषा में था। हाथी के दोनों ओर राज्य के मंत्री सफेद अरबी घोड़ों पर सवार खड़े थे। झाँसी का घुड़सवार दल महल की ओर जाने वाली सड़क पर पंक्तिबद्ध खडा होकर एक वीथिका बनाए हुए था। महल मेरे शिविर की जगह से करीब आधे मील की दूरी पर था।
शीघ्र ही हम मुख्य द्वार पर आ गए, जिसे पैदल अर्दलियों ने जोरदार तरह से खटखटाना शुरू किया। एक छोटा दरवाजा खुला, और फौरन ही बंद हो गया। रानी को सूचना भिजवाई गई, और करीब दस मिनट के विलंब के बाद द्वार को खोलने का हुकुम आया। मैंने हाथी पर बैठे-बैठे भीतर प्रवेश किया, और एक प्रांगण में जाकर उतरा। शाम बहुत ही गर्म थी, और मुझे लगा कि मैं मेरे आसपास जमा हो गए देसी लोगों (आश्रितों) में घुट जाऊँगा। मेरी बेचैनी को देख मंत्री ने उन्हें जोरदार तरह से पीछे ही रहने का आदेश दिया। फिर एक और अदना-सी देरी के बाद मुझसे एक बहुत ही सँकरे पत्थर के जीने पर चढ़ने के लिए कहा गया, और वहाँ ऊपर पहुँचने पर मुझे एक देसी सज्जन मिले, जो कि रानी के कोई रिश्तेदार थे। वे मुझे पहले एक कक्ष में फिर दूसरे में ले गए। ये सभी (छह या सात) एक जैसे कक्ष फर्श पर पड़े कालीन को छोड़कर बिना किसी साज-सज्जा के थे। लेकिन छत पर पंखा और झूमर लटके हुए थे, और दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें और यहाँ-वहाँ विशाल दर्पण थे। थोड़ी देर में मैं एक कमरे के दरवाजे पर ले जाया गया, जिसपर देसी सज्जन ने दस्तक दी। एक स्त्री-स्वर ने भीतर से पूछा- कौन है वहाँ?’
साहब हैं जवाब दिया गया। फिर एक और मुख्तसर देरी के बाद दरवाजा किन्हीं अदृश्य हाथों से खोला गया, और देसी सज्जन ने मुझसे भीतर प्रवेश करने के लिए कहा, और साथ ही बताया कि वह अब वहाँ से जा रहे हैं। इस बार एक तनिक विलंब मेरी ओर से हुआ। मैं बहुत मुश्किल से खुद को जूते उतारने की स्थिति तक लाया; तथापि कुछ देर में यह कार्य संपादित कर मोज़े पहने पैरों के साथ मैं कक्ष में दाखिल हुआ। कक्ष, जिसमें बहुत सुंदर कालीन बिछा हुआ था, के बीचोबीच यूरोप में बनी एक आरामकुर्सी (आर्म चेयर) रखी थी और इसके चारों ओर फूलों की मालाएँ बिखरी हुई थीं (झाँसी अपने सुंदर और सुगंधित फूलों के लिए मशहूर है)। कक्ष के दूसरे सिरे पर एक परदा था, और इसके पीछे कुछ लोग बात कर रहे थे। मैं आर्म चेयर पर बैठ गया, और आदतन अपनी हैट उतार ली; पर अपने निश्चय का खयाल आते ही उसे पुनः पहन लिया—बल्कि इस बार इसे इतनी अच्छी तरह खींचकर पहना कि मेरा माथा ही पूरी तरह इसमें छुप गया। यह शायद मेरी ओर से एक मूर्खतापूर्ण निश्चय था, क्योंकि हैट ने पंखे की हवा को मेरी कनपटियों तक ठंडक पहुँचाने से रोक लिया था।
मैं एक बच्चे से कहे जा रहे स्त्री-स्वरों जाओ साहब के पास को सुन सकता था, और सुन सकता था कि बच्चा ऐसा करने से इनकार कर रहा है। आखिरकार उसे कक्ष में भेज ही दिया गया। मेरे द्वारा बच्चे से सहृदयतापूर्वक बात करने पर उसने मेरी ओर रुख किया, पर बहुत ही संकोच के साथ। उसकी वेशभूषा और पहने हुए जवाहरात से मैं आश्वस्त हुआ कि यह बच्चा दिवंगत राजा का गोद लिया बेटा और झाँसी के छोटे से राजमुकुट का ठुकराया हुआ उत्तराधिकारी ही है। वह एक सुंदर, लेकिन अपनी उम्र के लिहाज से काफी ठिगना और जैसा कि मैंने ज्यादातर मराठा बच्चों में देखा है चौड़े कंधों वाला बच्चा था।
जब मैं बच्चे से बात कर रहा था, एक महीन और बेमेल आवाज पर्दे के पीछे से सुनाई दी, और मुझे बताया गया कि लड़का महाराजा है और हाल ही में भारत के गवर्नर जनरल द्वारा उसके अधिकारों को हथिया लिया गया है। मुझे लगा कि आवाज किसी बहुत वृद्ध महिला की है—शायद किसी सेविका या उत्साही आश्रिता की; लेकिन बच्चे ने अनुमान लगाकर कि उससे ही बोला जा रहा है, जवाब दिया- महारानी!’ और इस तरह मुझे मेरे निष्कर्ष की गलती बताई गई।
और अब रानी ने मुझे परदे के करीब आने के लिए आमंत्रित कर अपनी शिकायतें बताना शुरू किया। जब वह रुकतीं, तो उन्हें घेरकर बैठी औरतों का एक तरह का का कोरस शुरू हो जाता-- उदास उद्गारों, मसलन मैं कितनी दुखी हूँ, कैसा अत्याचार है की एक श्रृंखला। इससे मुझे किसी तईं एक ग्रीक ट्रैजेडी का एक दृश्य याद हो आया—ऐसी हास्यप्रद स्थिति थी।
मैंने वकील से सुना था कि रानी करीब छह या सात और बीस साल*** की उम्र की एक बहुत खूबसूरत महिला हैं और मैं उनकी एक झलक पाने के लिए निस्संदेह बहुत उत्सुक था। मुझे नहीं पता कि यह दुर्घटनावश हुआ याकि यह रानी की ओर से योजनाबद्ध था कि मेरी उत्सुकता शांत हो पाई। छोटे लड़के द्वारा परदा एक ओर को हटाया गया और मैंने उन्हें ठीक से देखा। यह सही है कि यह सिर्फ क्षण भर के लिए था, पर फिर भी मैंने उन्हें इतना पर्याप्त देखा था उनके व्यक्तित्व का निरूपण कर पाऊँ। वो मँझोले कद की महिला थीं—थोड़ी बलिष्ठ, पर बहुत बलिष्ठ नहीं। उनका चेहरा अपनी कम उम्र में काफी सुंदर रहा होगा, और बल्कि अभी भी उसमें काफी आकर्षण था—फिर भी, सौंदर्य के मेरे नजरिये से, यह काफी गोल था। मुखमुद्रा भी बहुत अच्छी, और बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण थी। आँखें विशेष रूप से सुंदर थीं और नाक भी बहुत सुघड़ सुकुमार थी। उनका रंग बहुत गोरा नहीं था, लेकिन काले से भी बहुत दूर था। अजीब था कि उन्होंने सिवाय कानों में सोने की बालियों के कोई आभूषण नहीं पहना हुआ था। उनके वस्त्र अच्छी बुनावट वाले साधारण सफेद मलमल के और इस तरह के टाइट सिले हुए थे कि उनकी देहयष्टि का पता चलता था, और वे यकीनन एक सुंदर देहयष्टि वाली महिला थीं। जो चीज बिगाड़ करती थी वो थी उनकी आवाज, जो थोड़ी फटी हुई थी और उसमें कराहट थी। जब परदा एक ओर को हुआ तो वो बहुत गुस्से में थीं, या ऐसा उन्होंने दिखावा किया। लेकिन अपने प्रस्तुत व्यवहार में वो हँसीं, और खुशमिजाजी के साथ यह आशा व्यक्त की कि उनका दिखना उनकी व्यथाओं के प्रति मेरी सहानुभूति को कम नहीं करेगा, ना ही उनके कारण के प्रति किसी पूर्वाग्रह को जन्म देगा।
मैंने जवाब दिया, उल्टे, यदि गवर्नर जनरल महज उतने भी भाग्यशाली हो सकें जितना कि मैं रहा हूँ, और वो भी सिर्फ पल भर के लिए, तो मैं यह पक्का महसूस करता हूँ कि वो तुरंत झाँसी को इसकी खूबसूरत रानी को शासन के लिए लौटा देंगे।   
उन्होंने भी मेरी प्रशंसा पर कुछ कहा, और अगले दस मिनट इसी किस्म के वार्तालाप में व्यतीत हुए। मैंने उनसे कहा कि पूरी दुनिया में उनकी सुंदरता और महान बुद्धिमत्ता की गूँज है। और उन्होंने मुझे कहा कि इस धरती पर कोई कोना नहीं है जहाँ मेरे अच्छे के लिए प्रार्थना न की गई हों।
फिर हम मुद्दे पर वापस आए—उनका मामला। मैंने उन्हें बताया कि गवर्नर जनरल के पास बगैर इंग्लैंड को बताए कोई अधिकार नहीं है कि वे राज्य को पुनः बहाल कर सकें, और गोद लिए बेटे के दावे को मान्यता दे सकें; और कि उनके लिए सबसे उपयुक्त तरीका यही होगा कि गोद लिया बेटा राजगद्दी के लिए दरखास्त लगा दे और इस बीच वो 60 हजार सालाना की पेंशन इस विरोध के साथ लेती रहें कि यह गोद लिए बेटे के अधिकार को कोई हानि नहीं पहुँचाएगी। पहले तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया, और बल्कि जोर से चिल्लाईं—‘मेरा झाँसी नहीं दूँगी। तब मैंने जितना संभव था उतनी सलाहियत से उन्हें यह बताने की कोशिश की कि किसी भी तरह का विरोध कितना व्यर्थ होगा, और उन्हें वो बताया जो कि सच था कि एक देसी रेजीमेंट की टुकड़ी और कुछ तोपखाने महल से तीन कदम की दूरी पर थे। और मैंने पुनः यह प्रभाव बनाने की कोशिश की कि उनकी बढ़ती का हल्का-सा भी विरोध रानी की हर आशा को मिट्टी में मिला देगा-- और थोड़े शब्दों में उनकी आजादी को जोखिम में डाल देगा। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि उनसे, और उनके वकील से भी, बात करके मुझे यह समझ आया (और मुझे लगा कि वे सच बोल रहे थे) कि झाँसी की जनता ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अधीन नहीं होना चाहती थी।
यह रात के दो बजे का वक्त था जब उस रात मैं महल से निकला। निकलने से पहले मैंने अपनी समझ के मुताबिक रानी को सलाहें दीं। 
अगले रोज मैं आगरा के रास्ते पर ग्वालियर लौट गया। रानी ने मुझे एक हाथी, एक ऊँट, एक अरबी घोड़ा, एक फुर्तीला शिकारी कुत्ता, (झाँसी में बने) रेशम के कुछ कपड़े और भारतीय दुशाले का एक एक जोड़ा भेंट किया। मैंने काफी ना-नुकुर के बाद इन्हें स्वीकार किया। वित्त मंत्री ने काफी अनुनय की कि अगर मैंने इन्हें न लिया तो इससे रानी के मन को चोट पहुँचेगी। रानी ने एक हिंदू देसी व्यक्ति द्वारा बनाया अपना एक चित्र भी मुझे भेंट किया।
झाँसी राज्य में रानी को शासन का पुनराधिकार नहीं दिया गया, और हम जानते हैं कि बाद में उन्होंने परम क्रूर व्यक्ति नाना साहब, जिनके कष्ट उनसे मिलते-जुलते थे, के साथ विद्रोह कर दिया था। सरकार ने नाना साहब को पेशवा के गोद लिए बेटे और उत्तराधिकारी के तौर पर मान्यता नहीं दी थी, जबकि झाँसी की रानी दिवंगत राजा के गोद लिए बेटे की अवयस्कता के दौरान उसकी संरक्षक-शासक के तौर पर मान्यता चाहती थीं।
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*झाँसी के जोखनबाग में 7 जून 1857 को हुई इस घटना में 60 अंग्रेज स्त्री-पुरुष मारे गए थे। यह कृत्य बंगाल इन्फेन्ट्री की विद्रोही टुकड़ी ने उसके एक कमांडर काला खान के कहने पर किया था। अंग्रेजों के आधिपत्य वाले किले में फँसे गोरे लोगों को रानी लक्ष्मीबाई से मदद की उम्मीद थी, जो वे उन्हें मुहैया नहीं करा पाईं। इसका कारण यह था कि वे खुद असहाय स्थिति में थीं।  
** रानी के पति गंगाधर राव के भाई और उनके ठीक पहले राजा रहे रघुनाथ राव तृतीय
*** प्रायः रानी का जन्म 1835 और उस लिहाज से उनकी मृत्यु 23 साल की उम्र में मानी जाती है। पर कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक उनका जन्म 1828 का होना चाहिए। इसका एक प्रमाण ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित झाँसी के खजाने से गंगाधर राव की शादी के लिए किए गए 40 हजार रुपए के भुगतान की एक प्रविष्टि का दस्तावेज है। वैसे में क्या लक्ष्मीबाई की गंगाधर राव से सिर्फ सात साल की उम्र में शादी हो जाना व्यवहार्य माना जा सकता है? अगर वैसा था भी, तो वे अपने से उम्र में 15 साल ज्यादा ठहरने वाले नाना साहब के साथ बिठूर मेंबरछी, ढाल, कृपाण, कटारी से कब खेलीं? स्वयं लैंग इस संस्मरण में उनके कम उम्र में ज्यादा सुंदर रहे होने का अनुमान करता है। अगर 1854 में रानी के वकील के मुताबिक वे 20 साल की थीं, तो सवाल है कि कम उम्र से लैंग का आशय क्या था?

(अनुवाद एवं प्रस्तुति- संगम पांडेय)