Tuesday, October 18, 2016

दारियो फो : एक खरे मसखरे का जाना

अभी तीन साल पहले जीवन और रंगमंच में 60 साल तक उनकी सहचर रहीं पत्नी फ्रांका रेमे का निधन हुआ था, और अब इस 13 अक्तूबर को इतालवी नाटककार दारियो फो भी 90 साल की उम्र में दुनिया को विदा कह गए। फो अपने जीते-जी रंगमंच में प्रतिरोध की बहुत बड़ी आवाज थे। उनके लिखे 80 नाटक दुनिया की तीस से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद होकर खेले गए, जिनके कारण उन्हें भरपूर मात्रा में प्रशंसक और दुश्मन दोनों मिले और 1997 में नोबल प्राइज भी।
फो के नाटकों की विशेषता थी- समकालीन मुद्दों से उनका जुड़ाव, अपने वक्त की तल्खियों पर तीखी व्यंग्यात्मकता और नाटकीयता का एक ऐसा ढाँचा जिसमें स्थितियाँ अपनी विचित्रताओं में बहुत तेजी से घटित होती हैं। उनके दो नाटक पूरी दुनिया में (और हिंदी में भी) सबसे ज्यादा खेले गए—एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट और चुकाएँगे नहीं (‘can’t pay? won’t pay!’)। इनमेंचुकाएँगे नहीं महँगाई के विषय पर केंद्रित नाटक है। शहर में बढ़ती कीमतों के बीच किसी स्टोर पर खाद्य पदार्थों की लूट हो गई है। एंटोनिया भी इस लूट में सामान ले आई है। अब उसे इस बात को अपने पति से छिपाना है, जो चुराए गए खाने की तुलना में भूखों मर जाना पसंद करेगा। इसी बीच एक पुलिसवाला लूट की जाँच करते हुए आ पहुँचा है। तब एंटोनिया की सहेली मार्गरीटा एक गर्भवती के तौर पर सारे सामान को अपने कपड़ों में छिपा लेती है। अब हड़बड़ी में हुई गलतबयानी से स्थितियाँ और उलझ गई हैं, और इसी से एक गहरा हास्य पैदा होता है। इसी तरह एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट एक सच्चे वाकये पर आधारित नाटक है। 1969 में इटली के मिलान शहर में एक बम ब्लास्ट हुआ था जिसमें 16 लोग मारे गए थे। ये ब्लास्ट हुआ तो राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण था, पर इसमें गलत ढंग से एक रेल कर्मचारी को पकड़ लिया गया, जिसकी पूछताछ के दौरान थाने में ही मौत हो गई थी। इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर ये नाटक लिखा गया। नाटक के केंद्र में ऐसा आरोपी है जो भेस बदलकर तरह-तरह के रूप धरता है। वह पागल है और डॉक्टरों की जाँच में उसका एक्टिंग मैनियाक होना पता चला है। वो अब तक बारह बार तरह-तरह के रूप धर चुका है। आखिरी बार उसने एक मनोचिकित्सक के रूप में एक लड़के को सीजोफ्रीनिक घोषित किया था और अपनी फीस के रूप में दो सौ पाउंड वसूले थे; यह ऊँची फीस उसके मुताबिक इसलिए जायज थी कि बगैर इसके लड़के के माँ-बाप ने उसे संजीदगी से न लिया होता। मैनियाक अब जज बनना चाहता है क्योंकि बाकी सभी पेशों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ इंसान की वकत घटती जाती है पर जज के साथ इसका उलट होता है। और आखिरकार गफलत और हालात की उलटबाँसी में मैनियाक अपनी ख्वाहिश पूरी कर ही लेता है। वह पुलिस मुख्यालय में जज के रूप में खुद को पेश करके सब कुछ उलट-पलट कर देता है। नाटक में स्थितियाँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि उसकी नाटकीयता को संतुलित बनाए रखना ही निर्देशक के लिए एक चुनौती बन जाती है। फो ने अपने इस नाटक को एक त्रासद प्रहसन के बारे में लिखा गया बेढंगा प्रहसन कहा था।
फो ने न सिर्फ नाटक लिखने में बल्कि उनके मंचन में भी कई तरह के प्रयोग किए। उन्होंने पार्क में, खंडहर हो गए कारखाने की इमारत में, यूनिवर्सिटी के विरोध प्रदर्शनों में, चर्चों में, जेलों में हर जगह नाटक किए। मकसद था अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचना। उन्होंने भ्रष्टाचार, गर्भपात, संगठित अपराध तंत्र, सत्ता के तौर तरीकों, चर्च के रवैये, एड्स की बीमारी, युवाओं में ड्रग्स की बढ़ती लत आदि तमाम विषयों पर नाटक किए। उन्होंने बात को कहने के नए-नए तरीके खोजे, और किस्सागोई की इतालवी परंपरा में से बहुत कुछ अपने काम का निकाला। उनकी इस निरंतर सक्रियता ने उन्हें अपने देश के सबसे लोकप्रिय लोगों में शुमार कर दिया था। नोबल पुरस्कार देने वाली स्वीडिश अकादेमी ने उनके काम को मध्ययुगीन विदूषकों की शैली में दबे-कुचलों की गरिमा को आवाज देने वाला बताया। नोबल पुरस्कार की घोषणा के वक्त फो रोम से मिलान की ओर जाने वाली सड़क पर अपनी कार से गुजर रहे थे। वे कार चला रहे थे और साथ-साथ एक युवा टीवी पत्रकार को इंटरव्यू भी दे रहे थे। तभी एक कार उनकी कार के बराबर में आई जिसकी खिड़की पर लगे एक बड़े से गत्ते पर लिखा था- दारियो, आपने नोबल प्राइज जीत लिया!’ कुछ देर बाद जब वे मिलान के विआ दि पोर्टा रोमाना थिएटर के बाहर थे तब उन्हीं के शब्दों में- अचानक मुझे चारों ओर से रिपोर्टरों, फोटोग्राफरों और कैमरा लिए टीवी कर्मियों ने घेर लिया। वहाँ से गुजर रही एक ट्राम बिल्कुल अनपेक्षित ढंग से रुक गई। उसका ड्राइवर मुझे बधाई देने के लिए उतर कर आया। फिर सभी यात्री भी उतर कर आए और उन्होंने मेरा अभिनंदन किया। हर कोई मुझसे हाथ मिलाना और मुझे बधाई देना चाहता था।
ऐसा नहीं था कि फो अपने ये तीखे नाटक सहूलियत से करते रहे, बल्कि उन्हें बार-बार इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। 1973 में मिलान पुलिस के कुछ उच्चाधिकारियों द्वारा भाड़े के पाँच फासिस्ट अपराधियों को एक सुपारी दी गई थी। अपराधियों ने फो की पत्नी फ्रांका रेमे का बंदूक की नोक पर एक वैन में अपहरण किया, उनके साथ रेप किया, उनकी पिटाई की, उन्हें सिगरेटों से दागा, रेज़र ब्लेड से उनके शरीर पर कट लगाए, और फिर उन्हें एक पार्क में छोड़ गए। पर इस घटना के महज दो महीने बाद फ्रांका अपने दो नए फासिस्ट विरोधी एकालापों के साथ पुनः मंच पर प्रस्तुत थीं। दस साल बाद 1983 में ग्रुप के एक नाटक द ओपन कपल में फ्रांका ने द रेप शीर्षक अपने एकालाप को नाटक की प्रस्तावना के तौर पर पढ़ा। जरूर उसमें कुछ ऐसा भीषण था कि प्रशासन को प्रस्तुति में अवयस्कों का प्रवेश प्रतिबंधित करना पड़ा।
नौवें दशक के शुरुआती सालों में दारियो फो अमेरिका में सबसे ज्यादा खेले जाने वाले नाटककार थे, पर अमेरिका में उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं थी। कई फिल्मकारों, रंगकर्मियों, नाट्य आलोचकों द्वारा  गुहार लगाने के बावजूद उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया। उनके वैचारिक हस्तक्षेपों के अलावा इटली की कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होना भी इसका एक कारण था। आखिर 1984 में न्यूयॉर्क के ब्राडवे में उनकी ...डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट की प्रस्तुति के प्रीमियर के लिए उन्हें थोड़े समय का वीजा दिया गया। अमेरिकी नीति को लेकर फो का सबसे उत्तेजक बयान सन 2001 की वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले की घटना के बाद आया। एक ईमेल में उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क में तो सिर्फ बीस हजार ही मरे, लेकिन अमेरिका की अधम अर्थव्यवस्था तो हर साल लाखों को गरीबी में धकेलकर मार डालती है। उन्होंने कहा कि बगैर इस तथ्य में जाए कि इस हत्याकांड को किसने अंजाम दिया, यह हिंसा हिंसात्मक संस्कृति, भूख और अमानवीय शोषण की वैधानिक बेटी है।
ऐसा नहीं था कि फो का प्रतिरोध सिर्फ पूँजीवादी देशों के खिलाफ मात्र रहा हो। 1968 में सोवियत संघ द्वारा चेकोस्लोवाकिया में सेना भेजे जाने के खिलाफ उन्होंने वहाँ अपने नाटकों के कॉपीराइट वापस लेकर उनके प्रदर्शन को नामंजूर कर दिया था। उनके इस कदम ने उन्हें तत्कालीन कम्युनिस्ट देशों की आँख की किरकिरी बना दिया था। इसी तरह चीन में 1989 के थिएनअनमन चौक के जनसंहार के विरोध में उन्होंने दो एकालाप लेटर फ्राम चाइना और स्टोरी ऑफ क्यू लिखे। 
राजनीतिक प्रसंगों के अलावा फो ने ऐसे विषयों पर भी नाटक किए जिसके कारण उनपर ब्लासफेमी (ईशनिंदा) के आरोप लगे। 1969 में प्रस्तुत उनके नाटक मिस्टेरो बफो अथवा कॉमिकल मिस्ट्री (मज़किया रहस्य) के टीवी प्रदर्शन को वेटिकन ने टेलीविजन के इतिहास का सबसे ज्यादा ईशनिंदा करने वाला शो करार दिया। यह प्रस्तुति कई एकांकियों की एक श्रृंखला थी, जिसमें पुराने वक्त में सतत यात्रारत रहने वाले उन सैलानियों की मार्फत बातें बुनी गई थीं, जिनके कारण गाँव-देहात तक दुनिया भर की खबरें पहुँच पाती थीं। श्रृंखला की आखिरी प्रस्तुति में ईसा के जीवन और मृत्युदंड को पारंपरिक नाट्य पैशन प्ले के माध्यम से कहा गया। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की सर्वाधिक विवादास्पद मानी गई यह नाट्य प्रस्तुति वेटिकन द्वारा निंदा के बावजूद तीस साल तक यूरोप और अमेरिका में खेली जाती रही। 1987 में क्रिसमस से पहले के एक टीवी शो में फो द्वारा प्रस्तुत फर्स्ट मिरेकल ऑफ इन्फैंट जीसस’ (‘शिशु यीशु का पहला चमत्कार’) को भी वेटिकन द्वारा ब्लासफेमी करार दिया गया। उनके एक अन्य नाटक पोप एंड द विच में एक पोप को दो समस्याएँ हैं। पहली यह फोबिया कि बच्चे उसपर हमला कर देंगे, और दूसरी उसका गठिया रोग। कोशिशों के बाद वह इनसे उबर गया है, लेकिन गठिया से उबरने के क्रम में उसके हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर ही अटके रह गए हैं। पोप अपना सारा काम नन का भेस धरे एक चुड़ैल की सलाह पर करता है। यह चुड़ैल इलाज के लिए हेरोइन के इंजेक्शन लेती है और खिलौना कार, जहरीले तोते और ब्राजीलियन नन के जानलेवा हमलों से बची रही है।
2001 में लिखे उनके नाटक द टू हेडेड एनोमली (दो मस्तिष्कों की अनियमितताएँ) में चेचेन विद्रोहियों दवारा मार दिए गए दिखाए गए व्लादिमीर पुतिन का दिमाग तत्कालीन इतालवी प्रधानमंत्री सिल्वियो बरलुस्कोनी की खोपड़ी में फिट कर दिया जाता है। इस नाटक के लिए फो को मुकदमे का सामना करना पड़ा और उन्हें धमकियाँ भी मिलीं। युवाओं में नशे की लत पर उनका नाटक मदर्स मारिजुआना इज द बेस्ट में घर के दादाजी गलती से नशीले ड्रग को एस्पिरिन समझकर खा लेते हैं, और भ्रांति में अलमारी को ट्राम समझकर यात्रा करते रहते हैं।
1973 में चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर एलेंदे की सुनियोजित हत्या के बाद फो ने एक नाटक द पीपुल्स वार इन चिली तैयार किया, जिसे खूब प्रशंसा हासिल हुई और इटली के अलग-अलग शहरों में इसके बहुतेरे प्रदर्शन हुए। प्रस्तुति में स्थितियों को कुछ इस तरह बुना गया कि नाटक के अंत तक पहुँचते-पहुँचते कुछ दर्शकों को लगा कि सचमुच इटली में तख्तापलट हो गया है। तनाव में एक दर्शक ने भाग निकलने के लिए एक खिड़की का शीशा तोड़ डाला, और एक अन्य ने अपने पास मौजूद कुछ दस्तावेजों को इस मौके पर खतरनाक समझकर उसके दस पन्नों को खा डाला।   
फो हमेशा वामपंथी रहे, पर बाद के सालों में वे भूमंडलीकरण विरोध और पर्यावरण के मुद्दे पर बनी इटली की फाइव स्टार मूवमेंट पार्टी से जुड़ गए थे। वे सोलहवीं सदी के इतालवी नाटककार रूज़ान्ते और सत्रहवीं सदी के फ्रेंच नाटककार मोलियर को अपना गुरु मानते थे। ये दोनों उन्हीं की तरह अभिनेता, लेखक और व्यंग्यकार थे। अपने नोबल पुरस्कार भाषण की शुरुआत ही उन्होंने तेरहवीं सदी के एक इतालवी कानून की याद दिलाते हुए की थी जिसमें विदूषकों के लिए एक सीमा के बाद मौत की सजा मुकर्रर की गई थी। उन्होंने मसखरी के जोखिम को जानते हुए मसखरा बनना कुबूल किया था।   

Wednesday, October 12, 2016

कौन थी अनारकली?

अनारकली की कहानी सबसे पहले गुजिश्ता लखनऊ के लेखक अब्दुल हलीम शरर ने लिखी थी। शरर का जन्म मटियाबुर्ज में हुआ था, जहाँ लखनऊ से बेदखल कर दिए जाने के बाद अवध के नवाब वाजिद अली शाह और उनके साथ गए लोगों को बसाया गया था। वाजिद अली शाह ने अंग्रेजों से मिलने वाली मोटी पेंशन से इमामबाड़ा और लखनवी शैली की इमारतें बनवाकर मटियाबुर्ज में एक छोटा-मोटा लखनऊ खड़ा कर लिया था। इस नकली लखनऊ में रहते हुए शरर में नवाबी दौर और मुस्लिम तहजीब का ऐसा स्मृत्याभास पैदा हुआ कि बाद में वे असली लखनऊ लौट आए और 1926 में जब उनका इंतकाल हुआ तब तक वे मुगलिया माज़ी पर 102 किताबें लिख चुके थे। इन्हीं में एक कहानी अनारकली की थी। दिलचस्प ये है कि शरर ने इसे इतिहास के एक वास्तविक दौर के हवाले से कही गई एक काल्पनिक कहानी बताया था। शरर के बाद 1922 में इम्तियाज अली ताज, जिन्हें आगा हश्र कश्मीरी के बाद के दौर का उर्दू का सबसे बड़ा नाटककार माना जाता है, ने अनारकली के किरदार पर एक नाटक लिखा, जो बहुत मशहूर हुआ और खूब खेला गया। इसी नाटक की शोहरत बाद में अनारकली और मुगले आजम फिल्मों के बनने की वजह बनी।
अब्दुल हलीम शरर ने अनारकली की कहानी को भले ही काल्पनिक बताया हो, पर यह तय है कि इस किरदार के नाम को उन्होंने खुद की ईजाद नहीं बताया होगा; क्योंकि लाहौर में इस नाम का आज तक प्रसिद्ध बाजार तब भी बाकायदा वजूद में था। लाहौर के इस बाजार का नाम अनारकली बाजार इसलिए पड़ा कि यहाँ कथित रूप से किसी असली अनारकली का एक मकबरा हुआ करता था, जिसे सन 1800 में महाराजा रंजीत सिंह की सेना के एक फ्रेंच अफसर के आवास में, फिर अंग्रेजी राज के दौरान चर्च में और उसके बाद पंजाब के रिकॉर्ड ऑफिस में बदल दिया गया।
सवाल है कि वो अनारकली कौन थी जिसके नाम पर यह मकबरा बनाया गया था? अनारकली को काल्पनिक मानने वालों का कहना है कि दरअसल अनारकली किसी मकबरे में दफ्न मरहूम का नहीं बल्कि उस बगीचे का नाम था जिसमें यह मकबरा बना था। और यह मकबरा जहाँगीर की एक बीवी और उसके बेटे सुल्तान परवेज की माँ साहिबे जमाल का था। ऐसा दावा करने वालों ने मकबरे के आसपास बगीचा होने के सबूत तो पेश किए, लेकिन सुल्तान परवेज के ननिहाल से सूत्र जोड़ने पर दूसरा दावा ठीक नहीं पाया गया। जबकि इसीके बरक्स अनारकली को एक वास्तविक किरदार मानने वाले सबूतों को देखें, तो एक अलग ही कहानी सामने आती है। 
अनारकली को जीता जागता इंसान मानने के जिक्र उसे बगीचा या काल्पनिक बताने वालों से बहुत पहले के हैं। सबसे पहले इसका जिक्र सन 1625 में प्रकाशित पुस्तक परचास हिज पिलग्रिम्स में आया था। सैमुअल परचास नाम के ब्रिटिश संपादक द्वारा प्रकाशित कराई गई यह किताब दुनियाभर में जाने वाले ब्रिटिश व्यापारियों के यात्रावृत्तांतों का वृहदाकार संकलन थी। इसमें संकलित ईस्ट इंडिया कंपनी के एक व्यापारी विलियम फिंच के रिपोर्ताज में पहली बार अनारकली के प्रसंग का जिक्र मिलता है। फिंच सन 1608 में ईस्ट इंडिया कंपनी के हेक्टर नाम के जहाज से सूरत के बंदरगाह पर उतरा था। अगले कुछ साल हिंदुस्तान में रहने के दौरान वह कई जगह घूमा, जिनमें से एक लाहौर भी थी, जहाँ वह सन 1611 में पहुँचा था। वहाँ उसने बाबा शेख फरीद की मस्जिद के परे अकबर की एक बीवी जिसका नाम अनारकली था-- जो उसके बेटे डेनियल की माँ थी, जिसके साथ शाह सलीम का कोई चक्कर था, जिसके बारे में पता चलने पर अकबर ने शीघ्र ही उसे अपने महल की दीवार में चिनवा दिया, जहाँ उसकी मौत हो गई— का एक सुंदर स्मारक होने का जिक्र किया। और (वर्तमान) बादशाह ने अपनी मोहब्बत की याद में ऊँची दीवारों से घिरे वर्गाकार बगीचे के मध्य तरह-तरह के कमरों और गेट से युक्त पत्थर का आलीशान मकबरा तामीर करने का आदेश दिया, जिसका ऊपरी हिस्सा उसकी इच्छा के मुताबिक सोने से मढ़ा हो। तथ्यों के मुताबिक, विलियम फिंच के देखे जाने तक यह मकबरा अभी बन ही रहा था (जो अंततः सन 1615 में बनकर तैयार हुआ), और अकबर की मौत अभी सिर्फ छह साल पहले ही हुई थी।
फिंच के पाँच साल बाद सन 1616 में भारत में ब्रिटिश सम्राट के दूत सर थॉमस रो के पादरी के तौर पर मौजूद एडवर्ड टैरी ने भी अपनी यात्रा के रिपोर्ताज में अनारकली का जिक्र किया। उसके मुताबिक अकबर शाह ने अपनी सबसे प्रिय पत्नी अनारकली को एब्यूज करने के लिए वर्तमान बादशाह को उत्तराधिकार से वंचित कर देने की धमकी दी थी, जिसे मृत्युशैया पर उसने वापस ले लिया।
इन दोनों जिक्रों में खास बात अनारकली को अकबर की बीवी बताया जाना है। बाद का काल्पनिक साहित्य अनारकली को सलीम की एक ऐसी प्रेमिका के रूप में चित्रित करता रहा है जिसका कमतर हैसियत की कनीज़ होना सलीम के बाप अकबर को रास नहीं आया, लिहाजा उसने उसे दीवार में चिनवा दिया। क्या यह एक वास्तविक त्रासदी को रोमांटिक त्रासदी में तब्दील करना था? क्या उक्त वास्तविक त्रासदी को लेखकगण पचा नहीं पा रहे थे, इसलिए उन्होंने उसका एक ऐसा सहनीय संस्करण तैयार कर दिया, जिससे एक सुखवादी समाज के संस्कारों पर बुरा असर न पड़े? इस सवाल की तहकीकात के लिए इतिहास में थोड़ा और घुसकर देखते हैं।
सबूतों के अभाव में इतिहास की किताबों ने अनारकली को एक वास्तविक किरदार के रूप में दर्ज नहीं किया है,  पर उनमें यह जरूर दर्ज है कि सलीम ने अकबर के खिलाफ सन 1600 में बगावत कर दी थी। सवाल है कि ऐसा उसने क्यों किया जबकि वह हमेशा से अकबर का सबसे प्रिय पुत्र और शाही तख्त का लगभग घोषित वारिस था? वह अकबर की मुरादों और शेख सलीम चिश्ती की दुआओं की संतान था। अकबर अजमेर की दरगाह पर अपनी आस्था ज्ञापित करने के लिए सलीम को आगरा से पैदल वहाँ तक लेकर गया था।... और सलीम द्वारा की गई बगावत भी क्या थी—वो ऐसी बगावत थी जिसमें तख्तापलट के इरादे की तुलना में अपनी खुंदक दिखाने की जुर्रत ज्यादा थी। पूरा वाकया यों है कि सितंबर 1599 में अकबर 80 हजार सैनिकों के साथ दक्कन में युद्ध के लिए निकला। जाते हुए उसने सलीम को राजधानी आगरा का कार्यवाहक मुखिया घोषित कर दिया। लेकिन सलीम ने अकबर के जाते ही हर जगह अपने खास लोगों को नियुक्त कर दिया और दक्कन से आने वाले अकबर के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी। न सिर्फ इतना बल्कि उसने आगरा के बादशाही किले पर कब्जा करने की कोशिश भी की, पर किले की हिफाजत अकबर के बेहद खास सिपहसालारों की सैन्य टुकड़ियों के अधीन होने से वह इसपर कब्जा नहीं कर पाया। उधर दक्कन की लड़ाई जीत कर अकबर अप्रैल 1601 में वापस आगरा आया। यहाँ उसे पता चला कि सलीम शहर में तीस हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ सीनाजोरी पर उतरा हुआ है। ऐसे में उसने उसे एक कड़ा पत्र लिखा कि वह शहर छोड़कर यहाँ से धुर पूरब की ओर चला जाए, जहाँ बंगाल और उड़ीसा की सुलतानी उसे मुकर्रर की जाती है। पत्र मिलने पर बिगड़ैल सलीम ने बंगाल जाने के प्रस्ताव को तो दरकिनार कर दिया, पर वह आगरा को उसके हाल पर छोड़कर इलाहाबाद जरूर लौट गया। वहाँ भी अपनी खुंदक निकालने का काम उसने जारी रखा, और बादशाह के समांतर अपने नाम के सिक्के जारी करवा दिए। बाद में उसने अकबर की ओर से समझौते के लिए भेजे गए अबुल फजल की हत्या भी करा दी। इतिहासकारों ने सलीम की इन कारगुजारियों को सत्ता के लिए उसकी व्यग्रता करार दिया है। हालाँकि अगर वैसा था भी तो उसकी बगावत में कोई योजना दिखाई नहीं देती, और अंततः किसी मोहब्बत के लिए कुर्बान हो जाने का भाव ही इसमें ज्यादा दिखाई देता है। और ऐसा हुआ भी। अपनी ऐंठ से बाहर आकर अकबर के आगे समर्पण करने पर उसे छोटी-मोटी कुर्बानी देनी ही पड़ी। सलीम को दस दिन तक कैद में रखा गया। माना जाता है कि उसने समर्पण का यह फैसला उसी साल हुई अकबर के तीसरे बेटे डेनियल की मौत के बाद शाही तख्त का कोई प्रतिद्वंद्वी न बचने के मद्देनजर लिया था। बाद में हालाँकि मानसिंह और मिर्जा अजीज कोका जैसे रसूखवाले मनसबदारों ने सलीम की कारगुजारियों की याद दिलाकर अकबर के सामने खुद जहाँगीर के बेटे खुसरू मिर्जा को ही उत्तराधिकारी के रूप में खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन दरबार के सत्ता-समीकरणों में उनकी यह कोशिश नाकाम हो गई। जो भी हो, प्रश्न आखिर वही खड़ा होता है कि चार साल तक चले सलीम के इस ऊटपटाँग विद्रोह का सबब आखिर क्या था? कहीं यह अनारकली को दीवार में चिनवाने का बदला तो नहीं था?
अनारकली का जिक्र इतिहास में इसलिए नहीं है क्योंकि आईने अकबरीमें नहीं है। जाहिर है कि आईने अकबरीमें (अगर वह था तो) ऐसे वर्जित संबंध के जिक्र को शामिल नहीं किया जा सकता था। अलबत्ता अबुल फजल ने उसमें एक अन्य घटना का उल्लेख जरूर किया है। घटना के मुताबिक एक शाम अकबर के हरम में किसी पागल आदमी के घुस आने की खबर फैली, जिसे सलीम ने पकड़ लिया। लेकिन प्रहरियों ने सलीम को ही घुसपैठिया समझकर पीट दिया। अबुल फजल के मुताबिक अकबर ने जैसे ही उस पागल समझे गए आदमी पर तलवार उठाई तब तक वह घूमा तो सबने देखा कि वह सलीम था। यकीनन इतिहास आईने अकबरीके अलावा भी कुछ रहा होगा। जहाँगीर ने लाहौर में जिस अनारकली का मकबरा बनवाया वह आखिर कौन थी?  तथ्यों के मुताबिक वह डेनियल की माँ तो नहीं ही थी, क्योंकि उसकी मौत तो इस घटनाक्रम से चार साल पहले ही हो चुकी थी। लेकिन यह भी सही नहीं मालूम देता कि अकबर जैसा गहरी सूझ वाला बादशाह अनारकली के मात्र कनीज होने की इतनी बड़ी सजा मुकर्रर करे कि भविष्य में इतना बड़ा वितंडा खड़ा हो।
अनारकली के मिथ में एक पहलू उसे दीवार में चिनवाने का भी है। किसी जीते-जागते व्यक्ति को दीवार में चिनवा देना सजा देने का एक अनोखा तरीका ही कहा जा सकता है। सजा देने के ऐसे अनोखे तरीके जिनमें प्रत्यक्षतः क्रूरता न हो अकबर को खूब सूझते थे। एक बार एक सैनिक को काम में लापरवाही की सजा में उसने मरे भैंसे के शरीर के खोखल पर बँधवाकर नदी में लटकवा दिया था। थपेड़ों से बेहाल हो गए सैनिक की चीख-पुकार पर उसे निकालकर गुलाम के तौर पर उसकी नीलामी करवा दी गई। दूध के भाई अदम खाँ को किले की बुर्जी से दो बार नीचे फिंकवाने की बात तो अकबर की कार्यशैली का मशहूर तथ्य है ही। क्या इन उदाहरणों की रोशनी में अनारकली को दीवार में चिनवाने की बात निरी किंवदंती मानी जा सकती है?
अनारकली का किरदार अगर इतिहाससम्मत नहीं है तो उसकी उत्पत्ति का स्रोत क्या है? जिन दो अंग्रेजों ने पाँच साल के अंतराल पर अलग-अलग उसका जिक्र किया, उन्होंने निश्चित है ये कथा कुछ हिंदुस्तानी लोगों से ही सुनी होगी; जिससे जाहिर होता है कि ये अपने वक्त की एक लोकप्रिय दंतकथा थी। इस दंतकथा के रचयिता कौन थे? कहीं वे मिस्त्री तो नहीं जिन्हें इस दंतकथा में दीवार की चिनाई के लिए बुलाया गया होगा? फिर अगर यह मान लिया जाए कि अनारकली की यह कहानी किसी अफवाह पर आधारित एक कल्पनाशील वर्णन मात्र है, तब वो मकबरा आखिर किसका है जिसका जिक्र विलियम फिंच ने किया था? जाहिर है ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब कभी तलाशे नहीं जा पाएँगे।