Sunday, February 21, 2016

भारंगम में फिल्म वालों के नाटक


बर्फ : सौरभ शुक्ला
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यह एक तीन पात्रों की अजीबोगरीब कहानी है। कश्मीर गया हुआ एक डॉक्टर किसी गफलत में अपने टैक्सी ड्राइवर के एक बीहड़ एकांत में स्थित गाँव में पहुँचा हुआ है। ड्राइवर का घर इस निर्जन गाँव का अकेला आबाद घर है, जहाँ वह अपनी बीवी के साथ रहता है। पार्श्व में एक विशाल सफेद कपड़े से बर्फीले पहाड़ का मंजर बनाया गया है और आगे की ओर ड्राइवर का दोमंजिला घर भी कहानी के माहौल के लिहाज से काफी ठीकठाक है। इन दोनों के बीच में कुछ मकानों की खिड़कियों में रोशनी दिखती है। सिनेमा की तर्ज के म्यूजिक और कमोबेश साफ-सुथरे चरित्रांकन में लगता है कुछ निकलकर आएगा। लेकिन ऐसा होने के बजाय कहानी एक साथ लोककथा, रहस्यकथा और नीतिकथा होने के घनचक्कर में फँस गई है। डॉक्टर की बीवी कुछ साइको-नुमा है, जो एक गुड्डे को अपना बच्चा समझती है, और रूहों से निर्देश लेती है। ड्राइवर अपनी मोहब्बत में दिन-रात बीवी की गलतफहमी बनाए रखने की जुगत किया करता है। अब डॉक्टर बीमार होने के कारण लगातार सो रहे बच्चे का इलाज करने के लिए एक तरह से यहाँ बंदी बना लिया गया है। इससे आगे कहानी में जो होता है वह इमोशन का जलजला है। डॉक्टर की समझ के सच और ड्राइवर की सटकी हुई बीवी के झूठ की लड़ाई में इमोशन के कंधे पर चढ़कर झूठ जीत जाता है। यह इमोशन सतही है, बनावटी है, झूठ पर आधारित है या जो भी है, पर दर्शक इसपर तालियाँ पीटते हैं। हो सकता है कुछ दर्शकों को कहानी से कुछ ज्यादा निकलने की उम्मीद रही हो, उन्हें बेशक मायूस होना पड़ा होगा। डॉक्टर बने विनय पाठक यूँ तो ठीक थे, पर कई बार उनके अभिनय में भेजा फ्राई वाली शैली का क्लीशे दिखता है। 

दोपहरी : पंकज कपूर 
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पंकज कपूर की वाचन-प्रस्तुति दोपहरी लखनऊ की उन गलियों की दास्तान है, जहाँ एक अकेली बुजुर्ग महिला अम्मा बी की हवेली गुजश्ता यादों के साथ मौजूद है। पंकज खुद की लिखी कहानी को मंच-सज्जा के ठियों पर पांडुलिपि में से पढ़ते रहे। अगले दिन निर्देशक से मिलिए कार्यक्रम में उन्होंने इस वाचन को थिएटर का एक प्रकार याकि शैली बताया। कोई अन्य क्षेत्र होता तो कमेटी गठित करके हकीकत का पता लगाया जा सकता था, पर कला के क्षेत्र में ऐसा कोई चलन न होने से यह ठीक-ठीक पता नहीं लगाया जा सकता कि पंकज कपूर ने मंच पर जो किया वह कला थी या नहीं। मुझे याद आया कि बरसों पहले जब हर्षद मेहता के प्रतिभूति घोटाले की अखबारों में बड़ी चर्चा थी, तो कवि नागार्जुन (वो हमारे मोहल्ले में ही रहते थे) कहते थे—हिंदी कविता में बड़ा भारी अनुभूति घोटाला चल रहा है कहीं उसकी खबर भी है क्या!.... नागार्जुन तो नहीं रहे, पर क्या है कोई दुस्साहसी जो कलाओं की दुनिया के शैली-घोटालों पर रोशनी डाले!

डियर फादर :  दिनकर जानी
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इस प्रस्तुति में परेश रावल थोड़ा खब्ती हो गए पिता और पिता के साथ हुई दुर्घटना की जाँच करने आए पुलिस अधिकारी की दोहरी भूमिका में थे। परेश रावल तो थे ही, बीच-बीच में उनकी राजनीतिक चुहुल भी थी, जिनमें कभी नरेन्द्र मोदी की तारीफ थी तो कभी सोनिया गाँधी पर निशाना। लेकिन बावजूद इन चंद जुमलों के यह पेशेवर रंगमंच की एक पर्याप्त चुस्त प्रस्तुति थी। परेश रावल दो बिल्कुल जुदा किरदारों में जितनी सहजता से खुद को रूपांतरित करते हैं वह बड़ी बात है। न सिर्फ इतना बल्कि अपनी खब्त में रहने वाले इंसान की कई बारीक छवियाँ भी उन्होंने अच्छे से उतारी हैं। कहानी में एक गति है और स्थितियाँ लगातार बदलते रहने से एक सतत उत्सुकता बनी रहती है। नाटक में फ्लैट के ड्राइंगरूम का सेट काफी भव्य और शानदार था, और परेश रावल के अलावा अन्य अभिनेता भी अच्छी लय में थे। लोकरुचि का खयाल रखकर तैयार की गईं इस तरह की प्रस्तुतियाँ महानगरों में रंगमंच को पेशेवर शक्ल देने में कारगर हो सकती हैं। प्रस्तुति में न इमोशन की अतिरंजना है, न कहानी को डाइल्यूट करने वाला मेलोड्रामा-- ये दोनों चीजें अपने यहाँ एक बीमारी की तरह हैं और जिंदगी की वास्तविक टेंशन और ड्रामे में झाँकने की मेहनत से बचने के कारण पनपती हैं। प्रस्तुति के निर्देशक दिनकर जानी गुजराती और हिंदी में रंगकर्म के अलावा टीवी सीरियल शक्तिमान का निर्देशन भी कर चुके हैं। निर्देशकीय में उन्होंने आज की सरपट दौड़ती दुनिया में पीढ़ियों के अंतराल की बाबत एक-दूसरे का ध्यानाकर्षण और प्यार हासिल करने के लिए कई तरह की जोड़-तोड़ को आवश्यक बताया हैं।   

Tuesday, February 16, 2016

रतन थियम का मैकबेथ

रतन थियम के थिएटर का मूल तत्त्व मौन है, जिसमें ध्वनि और स्वर खिलकर सामने आते हैं। इसी तरह वे अँधेरे का इस्तेमाल भी करते हैं, जिसमें रोशनियाँ मानो अपने क्लासिक अभिप्रायों में बरती जाती दिखती हैं। बेसिक रंग अक्सर ही उनके यहाँ अपने तीखेपन के साथ दिखाई देते हैं। तीसरी चीज है समय। रंग हो, कोई ध्वनि हो या संवाद ये सब एक निश्चित समय के दौरान अपने आरोह-अवरोह की लय में ही उनके यहाँ मुकाम पाते हैं। इन सारी बातों को आसान भाषा में कहा जाए तो उनका नाटक एक सभ्य दर्शक को छींकने-खाँसने, ताली बजाने की मोहलत और इजाजत नहीं देता। उनका थिएटर अपने व्याकरण, अनुशासन, सौंदर्यबोध और संजीदगी में इब्राहीम अलकाजी की परंपरा को थोड़ा और परिष्कार के साथ लेकिन अपने ही मुहावरे में आगे ले जाता है।
रतन थियम के नाटक को उनके इस एस्थेटिक्स के अलावा जो चीज महत्त्वपूर्ण बनाती है वह है विचार। उनकी प्रस्तुति अपने समय-विशेष की किसी प्रवृत्ति को इंगित करने का एक मकसद लिए होती है। जैसे कि यह 'मैकबेथ' (इस टिप्पणी के आखिर में उनके निर्देशकीय से यह बात ज्यादा स्पष्टता से समझी जा सकती है)। एक दृश्य में अपनी लालसा में पति को नियमित हत्यारा बना चुकी लेडी मैकबेथ अपने अपराधबोध से जूझ रही है और उसके चारों ओर व्हील चेयरों पर नर्सें मृत शरीरों को लिए खड़ी हैं। दृश्य के इस फ्यूजन में हमारा वक्त हमें अनायास दिख जाता है। वैसे प्रस्तुति की सारी संरचना देशज जनजातीय वेशभूषा में है जहाँ डंकन के मुकुट पर कई आदिवासी परंपराओं में दिखने वाले सींग दिखाई देते हैं। प्रस्तुति में चुड़ैलों वाला प्रसिद्ध दृश्य काफी प्रभावशाली था, जिसमें चुड़ैलें बरगद की जटाओं और आक्टोपस के जैसी मोटी रस्सियों सी हैं, और लगातार जोर-जोर से हिल रही हैं। बैंको की हत्या और बाद में उसका भूत दिखने के दृश्य भी इसी क्रम में थे।
रतन थियम भाषा के मामले में सख्तमिजाज और दृढ़ धारणाओं वाले व्यक्ति हैं। पर उनकी धारणाएँ कितनी भी दृढ़ क्यों न हों उनकी प्रस्तुतियाँ ('ऋतुसंहार' को छोड़कर) देखते हुए ये हसरत हमेशा उठी है कि काश यह हिंदी में होती!
प्रस्तुति का निर्देशकीय
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"मैकबेथ नाम है एक बीमारी का, जो अविश्वसनीय गति से आज की दुनिया और तथाकथित सभ्यता में फैल रही है। ये एक खतरनाक महामारी है, जिसके लक्षण हैं-- असीमित इच्छा, लालच, हिंसा आदि। लेकिन इस रोग का आसानी से पता नहीं लग पाता, क्योंकि यह ऊपर से नहीं दिखता और दूषित व भ्रष्ट दिमागों में छिपा रहता है। इसका बढ़ना एक ऐसी प्रक्रिया है जो खतरनाक और जटिल है और कुटिलता तथा षडयंत्र से भरी हुई है। अंततः यह हिंसा के रूप में सामने आकर धरती पर मनुष्यता और शांति को नष्ट करती है। लाखों साहित्यिक पाठों, कलाकृतियों, प्रदर्शनकारी कलाओं, वैज्ञानिक ज्ञान, उन्नत तकनीक और संचार, धार्मिक उद्यमों आदि उपायों द्वारा इस बीमारी को खत्म करने की कोशिशों के बावजूद नतीजा संतोषजनक स्थिति से अभी काफी दूर है।
उपचार की हर कोशिश महज बाहरी अंगों पर की जाने वाली सिंकाई से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो पाई, दिमाग के भीतर तक उसकी पहुँच नहीं हो पाई जहाँ से यह बीमारी वास्तव में सक्रिय होना शुरू करती है। मैकबेथ का किरदार मनुष्य प्रजाति का सर्वाधिक घिनौना रूप है जिसकी तादाद दिन-ब-दिन विश्व में हर जगह बढ़ रही है।"

Wednesday, February 10, 2016

भारंगम उद्घाटन : एक रिपोर्ट

1 फरवरी को हुए अठारहवें भारत रंग महोत्सव के उद्घाटन कार्यक्रम में अनुपम खेर ने एनएसडी के दिनों को और उन दिनों की गुरबत को नॉस्टैल्जिया की तरह याद किया। उनके बाद बोलने आए नाना पाटेकर ने उन्हें दुरुस्त किया कि गुरबत सिर्फ गुरबत नहीं होती, उसके साथ अपमान भी जुड़ा होता है, और इन दोनों के साथ जीने का भी एक अपना 'मजा' है। उन्होंने महाराष्ट्र में किसानों की बुरी हालात के जिक्र किए और बताया कि उन्होंने एक फाउंडेशन बनाया है जिसने चार महीने में 22 करोड़ रुपए जमा किए हैं जिससे सूखा प्रभावित क्षेत्र में जल संचयन आदि के काम किए जा रहे हैं और उन क्षेत्रों में अब वाटर टैंकर भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी; 115 किलोमीटर के क्षेत्र में ये काम अभी चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सरकार इस बारे में क्या कर रही है या पिछली सरकार ने क्या किया, मैं इसपर कोई टिप्पणी नहीं करता, मेरे लिए महत्त्वपूर्ण यही है कि हम क्या कर सकते हैं।
ठसाठस कमानी ऑडिटोरियम के अगले दरवाजे से नाना का प्रवेश होते ही पूरा हॉल तालियों वगैरह से जिस तरह गूँजा वह किंचित अप्रत्याशित था। मानो हर कोई नाना के लिए उस दरवाजे पर निगाह लगाए बैठा हो। जब वे बोलने आए तब भी यही हुआ। नाना ने कहा कि मैंने शुरुआत थिएटर से ही की थी लेकिन इधर पिछले 15 साल से कोई थिएटर नहीं किया। वे हल्का सा रुके, और इस ठहराव में व्यापे सन्नाटे पर उन्होंने कहा कि 'स्क्रिप्ट डायरेक्टर की होती है, पर ये पॉज हमारा-तुम्हारा होता है।' नाना ने अभी विष्णु वामन शिरवाडकर के प्रसिद्ध मराठी नाटक 'नटसम्राट' पर महेश मांजरेकर की फिल्म में काम किया है। उन्होंने कहा कि इस फिल्म ने भीतर का सब कुछ ले लिया, अब फिर से जमा होने में समय लगेगा। ऐसा लगता है कि अब अभिनय सीखना शुरू किया है।
इसके पहले बोलते हुए अनुपम खेर ने कहा कि 456 फिल्मों और 150 नाटकों में काम करने के बाद भी थिएटर में आते हुए वैसी ही घबराहट होती है जैसी कि शुरू में होती थी। उन्होंने इब्राहीम अलकाजी और रीता गांगुली से जुड़े संस्मरण सुनाए। अलकाजी वाला संस्मरण यह था : "रानावि में पढ़ाई के दूसरे वर्ष के दौरान अपना प्रोजेक्ट वक्त पर पूरा न करने वालों के लिए अलकाजी ने विद्यालय से बोरिया-बिस्तर समेट कर चले जाने का आदेश निकाल दिया था। जब एक-एक छात्र से पूछा गया तो सब एक रौ में जवाब दे रहे थे 'आई हैव डन सर' ; अनुपम खेर ने उसी रौ में जवाब दिया 'आई विल डू सर'। बाद में उन्होंने रात भर जागकर वह प्रोजेक्ट पूरा किया। अरसे बाद एक बार जब वे पहलगाम में थे तो संयोग से अलकाजी भी वहाँ गए हुए थे। वे उनसे मिलने गए और उनसे खुद द्वारा की गई उस हरकत के बारे में बताना चाहा तो अलकाजी ने कहा- कौन सी हरकत...'आई विल डू सर' वाली।" बोलने के लिए जाते हुए अनुपम खेर ने नाना पाटेकर के पास झुककर उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने बताया कि यह प्रणाम कोई मजाक नहीं था, बल्कि हाल में देखी नाना की फिल्म 'नटसम्राट' से पैदा हुई अनुभूतियों के कारण था।
इससे पहले रानावि निदेशक वामन केंद्रे ने भारंगम की महत्ता, इस बार आई पौने पाँच सौ प्रविष्टियों और चुने गए 80 नाटकों की संख्या आदि के बारे में बताते हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए मंजूर की गई योजनाओं और भावी कार्यक्रमों के बारे में भी बताया। ये हैं- 1. आर्टिस्ट इन रेजीडेंस (किसी महत्त्वपूर्ण कलाकार को छह महीने के लिए एनएसडी में रहने की सुविधा के साथ बुलाना।); 2. अलकाजी चेयर; 3. रानावि के लिए एक नई इमारत के लिए धन की मंजूरी; 4. थिएटर ओलंपिक (सन 2018 में प्रस्तावित इस आयोजन में दुनियाभर के नाटक एक साथ कई शहरों में आयोजित किए जाएँगे। संभवतः यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रंगमंच का सबसे बड़ा आयोजन साबित हो।)। बाद में अपने वक्तव्य के दौरान नाना ने वामन से कहा-- 'इतना सब तू कैसे सँभालता है वामन!'
फ्लाइट में देर होने से संस्कृति मंत्री महेश शर्मा तो कार्यक्रम में नहीं आ पाए, पर संस्कृति सचिव एनके सिन्हा ने काफी साफ-सुथरी हिंदी में बताया कि रानावि इमारत के लिए 180 करोड़ रुपए मंजूर किए जा चुके हैं। उन्होंने एक ऐसा प्रेक्षागृह बनाए जाने की भी तस्दीक की जो 'स्टेट ऑफ द आर्ट' (नवीनतम तकनीक युक्त) हो और जिसमें ढाई-तीन हजार लोग बैठ सकें। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की शिक्षण विधि की तारीफ की और कहा कि जब विद्यालय के पास जगह है तो उसे टैम्प्रेरी स्ट्रक्चर में क्यों चलना चाहिए!
अंत में रानावि अध्यक्ष रतन थियम ने अंग्रेजी में अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि सभी भाषाएँ बराबर के सम्मान की हकदार हैं, और यह कि थिएटर पर भूमंडलीकरण के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता।
भारंगम के उदघाटन का यह कार्यक्रम हर साल होता है। एक तो हर साल होने की एकरसता, ऊपर से पिछले सालों के दौरान हावी रहे अंग्रेजी, अभिजात्य और औपचारिकता ने मिलकर इसे एक प्लास्टिक-आयोजन जैसा बना दिया था। इस बार यह यह एक देसीपन की रंगत लिए था। कार्यक्रम के अगले सत्र में रतन थियम निर्देशित प्रस्तुति 'मैकबेथ' का मंचन किया गया।