Sunday, December 25, 2016

न्यायप्रियता जहाँ ले जाती है

अल्बेयर कामू के नाटक जस्ट एसेसिन उर्फ जायज़ हत्यारे को परवेज़ अख्तर ने न्यायप्रिय’ शीर्षक से मंचित किया है। नाटक कामू के प्रिय विषय एब्सर्ड’ की ही एक स्थिति पेश करता है, और शायद समाधान भी। इसकी थीम 1905 के दौरान सोवियत क्रांतिकारियों के एक ग्रुप से जुड़ी एक वास्तविक घटना पर आधारित है, पर प्रस्तुति में इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा गया है। एक अंग्रेज अफसर की हत्या की जानी है। लेकिन ऐन बम फेंके जाने के वक्त दो बच्चे वहाँ मौजूद होने से क्रांतिकारी मस्ताना बम नहीं फेंक सका। ग्रुप के एक क्रांतिकारी तेजप्रताप को ऐतराज है कि उद्देश्य की राह में भावुकता को आड़े क्यों आने दिया गया। लेकिन मस्ताना के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वह बच्चों के ऊपर बम फेंक पाए। बहरहाल दूसरी कोशिश में अफसर मार दिया जाता है, और मस्ताना जेल में है। यहाँ एक दूसरा एब्सर्ड अफसर की बीवी के आगमन के रूप में पेश आता है। वह अपने मार दिए गए अफसर पति के कई मानवीय पक्षों के बारे में बताती है, और उसका यह बताना एक नया विरोधाभास पैदा करता है। उसके जाने के बाद एक सरकारी एजेंट का प्रवेश होता है जो एक कबूलनामे के एवज में उसे और उसके साथियों के फायदे का एक प्रस्ताव, और न मानने पर उसे एक विश्वासघाती के तौर पर प्रचारित करने की धमकी, देता है। लेकिन मस्ताना के लिए इन सब प्रलोभनों का कोई अर्थ नहीं। उसने अगर अपने किए की सजा को नहीं भुगता तो खुद को हत्यारे के रूप में देखने के अलावा कोई रास्ता उसके लिए नहीं होगा।
कामू ने यह नाटक 1949 में लिखा था। यह वही वक्त था जब मार्क्सवाद के मुद्दे पर सार्त्र से उनके स्थायी मतभेद सामने आए थे। वही सार्त्र जिनके नाटक मेन विदाउट शेडो में भी कुछ क्रांतिकारी कैद में एक ऐसी ही दुविधापूर्ण स्थिति का सामना कर रहे हैं-- उनके साथ का एक कमउम्र लड़का उनके सीक्रेट्स को उजागर करके संभावित सजा से बच निकलने की धमकी देता है। लेकिन उस नाटक का एक विद्रोही अपने कॉज के लिए लड़के की हत्या कर देता है। जबकि इसीसे मिलते-जुलते कारण से मस्ताना पहली बार में बम नहीं फेंक पाया था।
कामू ने अपने पहले नाटक कालिगुला में इसी नाम के रोमन बादशाह का चरित दिखाया था, जिसका जीवन सबसे बड़ी समस्या एब्सर्ड को जीवनशैली के रूप में चुनने का उदाहरण था, जिस वजह से उसकी हत्या कर दी गई थी। क्या वह एक तरह की आत्महत्या ही नहीं थीबाद में अपनी किताब मिथ ऑफ सिसिफस में जीवन के व्यर्थताबोध की मीमांसा करते हुए कामू आत्महत्या को एक नतीजे के रूप में चुनने के विचार को खुद ही एब्सर्ड मानते हुए ठुकरा चुके थे। वे इस नतीजे पर पहुँचे कि जीवन की असंगति का समाधान है उसे कबूल कर लेना। इससे जीवन जीने के लिए एक उद्देश्य का चुनाव किया जा सकता है। नाटक जस्ट एसेसिन का नायक इसी विचार का प्रतिनिधि है। उसने जीवन को मृत्यु के आमंत्रण के तौर पर आत्मसात कर एक उद्देश्य का चुनाव किया है, और इसी क्रम में उद्देश्य से जुड़ी गतिविधि और नतीजे का भी। लेकिन मुश्किल यही है कि जो तार्किक समाधान है वह मानवीय समाधान साबित नहीं हो पा रहा।
प्रस्तुति न्यायप्रिय में स्थितियों का एक साफ-सुथरा किंतु भावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया गया है। कामू के नाटक में उद्देश्य एक पात्र की समस्या के तौर पर है, पर हिंदुस्तानी परिवेश में उच्चतर भावना की चीज समझा जाता है। यह फाँक प्रस्तुति में निरंतर दिखाई देती है। पात्रों की भावनाएँ कई बार इतनी प्रत्यक्ष हैं कि इससे बात का तनाव डाइल्यूट होता है। मस्ताना की प्रेमिका रही दमयंती का दर्द में डूबा चेहरा इतनी देर तक दृश्य में दिखाई देता है कि एक आनुषंगिक संदर्भ प्रमुख प्रसंग की तरह उभरा दिखाई देने लगता है। बम फेंकने जैसी कार्रवाई में असमर्थ यूसुफ का भी यही हाल है। इतने भावुक लोगों में तेजप्रताप का किरदार कुछ विलेन जैसा होकर रह जाता है। ऐसा होने की एक वजह शायद यह है कि अपने आइडिये में आश्वस्त पात्र हमारे परिवेश की चीज ही नहीं हैं। बहरहाल प्रस्तुति की अच्छी बात ये ही किभावना के अतिरिक्त और कुछ भी उसमें बाहरी नहीं है—न रंगमंचीय युक्तियाँ, न संगीत का शोर। उस अर्थ में यह एक ठोस यथार्थवादी नाट्य प्रस्तुति है। यानी मंच पर दृश्य का कोई अतिरिक्त तामझाम नहीं है। बस उतनी ही चीजें हैं कि लोकेशन का संकेत हो जाए, और पूरा नाटक पात्रों के परस्पर व्यवहार से ही निकलता है। यह यथार्थ हिंदी नाटक में अब दुर्लभ हो चला है। हर फाँसी के बदले में सजा में एक साल की छूट पाने वाले जल्लाद कैदी का किरदार अच्छा बन पाया है। वैसे नाटक की एक अन्य समस्या शायद उसके अनुवाद में भी है, कई बार कुछ शब्द बनावटी मालूम देती है। 

Saturday, December 24, 2016

तोलस्तोय, भारत और गांधी

तोलस्तोय को हमारे देश में अक्सर गांधी के प्रसंग से याद किया जाता है। गांधी अपने आरंभिक दौर में उनसे गहरे प्रभावित रहे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक तोलस्तोय आश्रम भी बनाया। ईश्वर, अहिंसा, निजी संपत्ति और शाकाहार पर गांधी के विचार लगभग वही थे जो तोलस्तोय के थे। इस अर्थ में गांधीवाद काफी हद तक तोलस्तोय के विचारों का ही राजनीतिक सूत्रीकरण मालूम देता है। तोलस्तोय हिंसा को सबसे बड़ी बुराई और ईश्वर को मनुष्य का ध्येय मानते थे।
इस क्रम में जिस तरह वे राज्यसत्ता की हिंसा और अंततः राज्य के ही मुखर विरोधी थे, उसके कारण उनके विचारों को अराजकतावादी भी माना गया। तोलस्तोय का मानना था कि राज्य को बुरे लोग क्रूर ताकतों के समर्थन से चलाते हैं, और एक सुसंगठित राज्य लुटेरों से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है। अपने परवर्ती जीवन में वे विज्ञान और राज्य के पश्चिमी मॉडल के इस कदर खिलाफ थे कि भारत जैसे देश की ओर उम्मीद से देखते थे। हालांकि उनकी यह उम्मीद भारत की परिस्थितियों के बारे में उनकी कम जानकारी और संभवतः बुद्ध की जन्मभूमि के रूप में कुछ ज्यादा ही ऊंची धारणा पर आधारित थी। उन्होंने बुद्ध के विचारों का बहुत गहराई से अध्ययन किया था और भारत को वे एक परंपरानिष्ठ और ऐसे देश के रूप में देखते थे, जहां से उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विकास का कोई सूत्र मिल सकता था।
भारत के बारे में तोलस्तोय की सारी समझ या तो किताबों से बनी थी या भारत में रह चुके कुछ लोगों से सुनी बातों के आधार पर। जाहिर है कि भारतीय जीवन के असंख्य विरोधाभास उनकी निगाह में नहीं आ पाए थे। लेकिन भारतीय दर्शन और विचार पद्धति के विरोधाभास उनकी पैनी निगाह- गोर्की के मुताबिक जिससे कुछ भी छिपा नहीं रह सकता था- ने जरूर देखे थे। उन्हें शंकराचार्य की जीवन के बारे में मूलभूत आध्यात्मिक कल्पना ठीक लगती थी, पर कुल मिलाकर उन्हें उनमें बहुत सारे अंतर्विरोध दिखाई देते थे। तोलस्तोय को वेदों के ज्ञान की जानकारी थी और रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का लेखन भी उन्होंने पढ़ा था। वे ज्ञान की इस परंपरा के प्रशंसक थे, और उन्हें इसमें बहुत कुछ अपने काम की बातें दिखाई देती थीं। लेकिन ऐसा लगता है कि तोलस्तोय के आत्मिक ज्ञान और भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के बीच कोई ऐसा बहुत बड़ा फर्क था, जो उन्हें असंतुष्ट करता था। उनका यह असंतोष शायद भारतीय ज्ञान परंपरा की अति व्यक्तिनिष्ठता से था। उन्हें परमात्मा में लीन हो जाने वाले एकांतिक अध्यात्म की नहीं, बल्कि समाज में सहज रूप से सम्मिलित और क्रियाशील व्यक्ति के आत्मबोध से उपजे अध्यात्म की तलाश थी। उन्हें लगता था कि भारतीयों ने सदियों में विज्ञान से दूर प्राकृतिक जीवन जीते हुए इसे हासिल कर लिया है। उन्हें भारत एक ऐसी जगह लगती थी जहां भले ही गरीबी थी, लेकिन जहां के लोगों में कृत्रिमता और बनावट नहीं थी, और विज्ञान से दूर वे उन्हें प्रकृति और ईश्वर के ज्यादा निकट लगते थे। तोलस्तोय को यह भी लगता था कि अंग्रेज अपने लालच के लिए भारतीय जीवन प्रणाली को चौपट कर रहे हैं, और गुलाम होने के बावजूद भारतीय इस मायने में अंग्रेजों से श्रेष्ठ हैं कि 'वे अंग्रेजों के बिना जी सकते हैं, लेकिन अंग्रेज उनके बिना नहीं।' ऐसे में तोलस्तोय को भारतीय विद्वानों के बताए अध्यात्म के फार्मूले विचित्र लगते थे। उन्हें उच्च समाधि अवस्था तक पहुंचने के लिए बताई गई भारतीय पद्धति में- पीठ सीधी रखते हुए बैठना, दोनों आंखें नासिकाग्र पर एकाग्र करना और ओम् शब्द जपना मूर्खतापूर्ण लगता था।  अपने एक परिचित के साथ भारत संबंधी चर्चा में उन्होंने कहा था- 'भगवान करे वहां विज्ञान का विकास न हो।'
तोलस्तोय का अहिंसा का विचार सर्वसमन्यवयवादी भारतीय मानस से मेल खाता था। यही वजह रही कि गांधी उसे एक राजनीतिक थ्योरी में बदलने में कामयाब रहे। अहिंसा को एक पूर्ण राजनीतिक विचार के रूप में लागू करने पर गांधी को अपने देशवासियों के बीच ही भारी आलोचनाएं भी सहनी पड़ीं। गांधी और तोलस्तोय में यह मूल अंतर है कि गांधी जहां अपने विचारों को लेकर आश्वस्त नजर आते हैं, वहीं तोलस्तोय में खुद अपनी ही धारणाओं को लेकर सर्वत्र एक बेचैनी दिखाई देती है। वे अपने हर विचार को कई कोणों से परखते हैं, और एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद भी मानो संदेह से भरे रहते हैं। जीवन के प्रश्नों पर आत्मा, बुद्धि, हृदय के इतने बहुविध तर्कों से इतना स्पष्ट ढंग से संसार में शायद ही किसी और  ने सोचा हो। एक स्थान पर वे विचार को ही बुराई बताने वाली सूक्ति का इस वजह से समर्थन करते दिखाई देते हैं, कि विचार आस्था को नष्ट करता है। माना जाता है कि तोलस्तोय जीवन भर चीजों के औचित्य की खोज में जीवन के अपने ही अंतर्भूत अतर्कवाद से जूझते रहे।
तोलस्तोय के विचारों का सिद्धांतीकरण गांधीवाद में देखने पर सवाल खड़ा होता है कि ऐसा कैसे संभव हुआ? तोलस्तोय अपने जिन विचारों के लिए अराजकतावादी करार दिए गए, वही विचार गांधीवाद में आखिर कैसे स्वीकार्य हुए? इसकी दो वजहें हैं। पहली, गांधी अहिंसा पर आधारित अपनी थ्योरी का एक कहीं व्यावहारिक संस्करण तैयार करते हैं, जिसमें वे अराजकतावाद की एक मूलभूत स्थापना- राज्य के निषेध- पर एक ढीलाढाला परहेज बरतते हुए राज्य से न्याय और सत्य के पक्ष में खड़े होने की उम्मीद करते हैं।  इसके अलावा दूसरी वजह को समझने के लिए यहां जापानी विद्वान दाइसाकु इकेदा के उस विचार को उद्धृत करना उपयोगी होगा जिसमें वे भारत को एक अतर्कवादी समाज बताते हैं। अतर्कवाद की यह विशेषता होती है कि वहां प्रक्रिया और परिणाम में किसी समुचित सामंजस्य की जरूरत नहीं समझी जाती। गांधीवाद इस विशेषता को शुरू से अपने में समाहित किए रहा और सफल माना गया। भारत जैसी मुफीद जगह में गांधीवाद की सफलता दरअसल एक अतर्कवादी सफलता ही है, जहां प्रक्रिया और परिणाम में कोई भेद नहीं माना जाता, और हर अच्छा-बुरा एक निरंतरता में जीवन का हिस्सा भर होता है। नतीजा यह है कि दुनिया जितने ताज्जुब से गांधीवाद के प्रयोगों को देखती थी, उतने ही ताज्जुब से आज गरीबी रेखा कही जाने वाली मृत्यु रेखा के नीचे रह रहे देश की 37 फीसदी आबादी को देखती है। गोरों के रंगभेद के अलावा तमाम तरह के रंगभेद तरह तरह की नई नई शक्लों में भेस बदलते हुए यहां कायम ही हैं और हिंसा के तो कहने ही क्या!
दिलचस्प यह है कि तोलस्तोय की निगाह इस अतर्कवाद पर भी गई है। 'आन्ना कारेनिना' के एक पात्र स्वियाज्स्की के बारे में ये पंक्तियां पढ़ने लायक हैं- 'उसके लिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं था कि उसका तर्क-वितर्क उसे किस नतीजे पर पहुंचाता है। उसे तो केवल तर्क-वितर्क की प्रक्रिया से ही मतलब था। उसका तर्क-वितर्क जब उसे अंध गली में ले जाता था, तो उसे अच्छा नहीं लगता था। उसे यह पसंद नहीं था और वह इससे बचता था तथा बातचीत को किसी सुखद और मधुर दिशा में मोड़ ले जाता था।'
तोलस्तोय कम्युनिस्टों के खिलाफ उनके हिंसात्मक दर्शन की वजह से थे। उन्हें साम्यवाद का सदियों से चली आई व्यवस्था को आमूलचूल उलट देने का विचार भी अटपटा लगता था। लेकिन निजी संपत्ति के उन्मूलन के साम्यवादी विचार से वे खुद जीवन भर जूझते रहे। इस सवाल तक वे अपने मौलिक रास्ते से पहुंचे थे, न कि साम्यवाद के रास्ते। परवर्ती जीवन में अपनी निजी जायदाद को किसानों के नाम कर देने का उनका विचार उनके घर में निरंतर कलह का कारण बना रहा। उनके उपन्यासों 'आन्ना कारेनिना' का लेविन और 'पुनरुत्थान' का नेख्लूदोव भी निरंतर इस प्रश्न से जूझते दिखाई देते हैं। वे स्पेंसर और अमेरिकी विचारक हैनरी जॉर्ज के सिद्धांतों से प्रभावित हैं, जो कहता है- भूमि पर किसी का स्वामित्व नहीं हो सकता। जिस भांति जल, वायु तथा धूप का क्रय-विक्रय नहीं किया जा सकता, उसी भांति जमीन को भी खरीदा और बेचा नहीं जा सकता।'
तोलस्तोय का मानना था कि राज्य समाज के संपन्न वर्ग के फायदे के लिए काम करता है, और सरकार का तो मतलब ही है सुसंगठित हिंसा। विडंबना यह है कि तोलस्तोय की मृत्यु के सौ साल बाद भी राज्य का कोई ऐसा मॉडल संसार में दिखाई नहीं दे रहा है, जिसपर आम लोगों की आजादी और व्यापक हितों के लिए यकीन किया जा सके। भारत जैसे देश में संसदीय लोकतंत्र से फायदा उठाने वाले लोग इसकी लोकप्रियता का तूमार खड़ा किया करते हैं, जबकि देश की तीन चौथाई आबादी को जीवन का न्यूनतम मुहैया कराने में भी यह तोलस्तोयकालीन रूसी राज्य से कहीं ज्यादा विफल है। यह अलग बात है कि तोलस्तोय जिसकी वकालत किया करते थे उस सरकार विहीन राज्य के अराजकतावाद के मॉडल की भी कोई स्पष्टता नहीं है, लेकिन ज्यादा बड़ी दिक्कत यह है कि आज हमारी दुनिया में कोई तोलस्तोय भी नहीं है जो राज्य की ज्यादतियों और विकास की विसंगतियों पर उसी शिद्दत से उंगली उठाए। जो कहे कि हमारे देश को राष्ट्रमंडल खेलों के दिखावे और मेट्रो ट्रेन जैसे महंगे और एकांगी विकास की नहीं, बल्कि एक समेकित और विकेंद्रीकृत विकास की जरूरत है, जिसका फायदा देश की बहुसंख्य आबादी को मिल सके। तोलस्तोय ने ऐसा ही विरोध जताया था, जब रूस के तूला प्रदेश में ट्रेन लाइन बिछाई जा रही थी। उनका मानना था कि रूस में रेल लाइन अर्थव्यवस्था के यूरोपीय पैटर्न को लागू करने के लिए बिछाई जा रही है। उन्होंने लिखा- 'रेलें प्रलोभन बढ़ाती हैं, जंगलों को नष्ट करती हैं, कामगार छीन लेती हैं, अनाज के भाव बढ़ा देती हैं और घोड़े पालने के धंधे को तबाह कर देती हैं।'
वर्जीनिया वुल्फ ने तोलस्तोय को दुनिया का महानतम लेखक माना, तो इसकी वजह फ्लाबेयर की उस राय में ढूंढ़ी जा सकती है, जिसमें वे उन्हें एक अद्भुत कलाकार और मनोविश्लेषक बताते हैं। तोलस्तोय के नैरेटिव और सच को देखने की उनकी निगाह का कोई सानी नहीं है। वे साहित्य में रूमानवाद को 'सच्चाई से आंखें न मिला पाने का साहस' मानते थे और अपने जीवन को भी उन्होंने उसी बेबाकी से परखा और कबूल किया था। 34 साल की उम्र में अपने विवाह से पहले उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी को वह डायरी दी थी जिसमें उनके 20 सालों तक बिताए 'पापपूर्ण जीवन' के ब्योरे दर्ज थे। यह पाप था उनकी जमींदारी में काम करने वाली किसान और मजदूर स्त्रियों से रहे उनके दैहिक संबंध। ऐसे एक संबंध से हुई एक संतान का भी इस डायरी में उल्लेख था। उनकी पत्नी इन ब्योरों को पढ़कर गहरे तक विचलित हुई थीं, पर फिर भी वे विवाह के लिए राजी हुईं। उस दौर के रूस के द्विवर्गीय जीवन में इस तरह के संबंध बहुत आम बात थे। यहां तक कि तोलस्तोय ने अपने पिता के इसी तरह के एक संबंध के नतीजे में हुए अपने एक 'भाई' का भी जिक्र किया है, जो दीन-हीन अवस्था में उनके पास कभी-कभार चंद रुपए मांगने आता था, और जिसे देखकर वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाया करते थे।
तोलस्तोय के पापबोध और पुनरुत्थान में ईसाइयत की गहरी झलक है। क्या गांधी का 'वैष्णव जन' भी उसीसे मिलती जुलती आस्था का ही एक भारतीय परावर्तन नहीं है?

Thursday, November 24, 2016

नरेंद्र मोदी के लिए छह सुझाव

नोटबंदी पर तमाम आलोचनाओं के कुल दो निचोड़ निकल रहे हैं—पहला, इससे लोगों को लाइन वगैरह में लगने की परेशानी हो रही है; दूसरा, बीजेपी ने अपने फायदे के सारे बंदोबस्त करने के बाद इसे लागू किया है। इन दोनों बातों को अगर बगैर किसी जिरह के मान भी लिया जाए तो भी नोटबंदी से होने वाले फायदों की तुलना में ये बहुत क्षुद्र किस्म के नुकसान हैं। 1991 के बाद बनी अर्थव्यवस्था बड़ी पूँजी की फूँक से फुलाई हुई अर्थव्यवस्था है। किसी भी अर्थव्यवस्था की जाँच का वास्तविक तरीका उसके सबसे गरीब लोग होते हैं। लेकिन इस फुलाई हुई अर्थव्यवस्था ने सिद्धांततः गरीबी को अप्रासंगिक और व्यवहारतः उसे ज्यादा दयनीय बनाया है। सबसे गरीब आदमी फटीचर यूनीफॉर्म पहने दफ्तरों और सोसाइटियों के बाहर गार्डगीरी करता दिखता है और दिन के बारह घंटे नौकरी में गिरवी रखने के बाद उतना गरीब मालूम नहीं देता; जबकि उसकी जिंदगी पहले की तुलना में बहुत कम उसकी अपनी है। भौतिक रूप से पुराने फुटपाथ के दिनों से उसकी हालत जितनी बेहतर हुई है उसकी तुलना में ऊपर वाले लोगों की हालत उनकी वर्गीय हस्तियों के हिसाब से कई-कई गुना ज्यादा बेहतर होती गई है—इसलिए अंततः उसकी स्थिति ज्यादा हीन ही हुई है। इसे संक्षेप में कहें तो वैश्वीकरण का फायदा उठाकर भारतीय राज्य-व्यवस्था ने यहाँ की प्रिय सामाजिक प्रवृत्ति हाइरारकी (ऊँच-नीच) को एक आर्थिक दिशा देकर उच्चतम अवस्था में पहुँचा दिया है। ऐसा विश्वपूँजी को छुट्टा छोड़ने और अपने तईं मुद्रास्फीति को बढ़ावा देने से हुआ है। विश्व पूँजी गैरजरूरी उत्पाद बनाती है और लोगों के पास मुद्रा का इजाफा उन्हें इन गैरजरूरी चीजों का ग्राहक बनाता है। भारत के दीन यथार्थ में कार से लेकर डियो तक जैसी चीजें अगर इसी क्रम में आवश्यक होती गईं, तो इसका कारण सरकारी प्रयत्नों से तैयार की गई एक कृत्रिम अमीरी थी। 1996 में लागू की गईं पाँचवें वेतन आयोग की बंपर सिफारिशें ऐसा पहला बड़ा प्रयत्न और देश के निचले तबके के लोगों के साथ की गई एक विलक्षण गद्दारी थी। जनता के टैक्स का पैसा एक तबके को उपभोक्ता बनाने के लिए खर्च किया जाने लगा। ऐसा वेतन जिसके लिए उत्पादकता का कोई लक्ष्य न हो एक कृत्रिम और अर्थव्यवस्था-घातक अमीरी रचता है, और अंततः सामाजिक ताने-बाने को भी नकली बना देता है, जिसकी असंख्य मिसालें हम आज देख सकते हैं। सन 1996-97 तक जिस मद में सरकारी कोष से 21,885 करोड़ खर्च होता था, 1999 में निन्यानबे फीसद बढ़कर 43,568 करोड़ हो गया। यह इतना खतरनाक कदम था कि विश्व बैंक ने इसे देश और यहाँ के सार्वजनिक वित्त के लिए अकेला सबसे बड़ा घातक झटका कहकर भर्त्सना की थी। लेकिन हमारे अनोखे देश की सरकारें कोई आत्मालोचना करने के बजाय सरकारी कर्मचारियों के अगले वेतन निर्धारणों में भी यह ज्यादती करती रहीं, और इस तरह एक ऐसी अर्थव्यवस्था आकार लेती रही जिसने पूरी दुनिया को ताज्जुब में डाल दिया कि ग्रोथ रेट ठीकठाक होने के बावजूद यहाँ गरीबी क्यों नहीं घट रही।
गरीबी इसलिए नहीं घट रही क्योंकि पूरा विकास बिना उत्पादकता के अमीर बनाने और फिर इन अमीरों के जरिए एक नकलची अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को बढाने की संभावना पर टिका है। यानी एक वस्तुस्थिति-निरपेक्ष मुनाफा शेयर बाजार के सूचकांक को तय करता है। यह महानगरमुखापेक्षी छद्म अर्थव्यवस्था है, जिसने कालांतर में ऐसा तंत्र विकसित कर लिया है कि वास्तविक उत्पादन न करने वाली पूँजी निरंतर बड़ी होती गई है। मसलन आज देश में विज्ञापन उद्योग लगभग 52 हजार करोड़ रुपए का हो गया है। जरा इस उद्योग के फूले पेट की तुलना वास्तविक उत्पादन करने वाले कृषि क्षेत्र से करें—जहाँ हर साल सैकड़ों की तादाद में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 
ऐसा ढाँचा है कि कुछ लोग भयानक रूप से शोषित और कुछ लोग सिर्फ मौज करने के लिए पैदा हुए हैं। याद करें पिछले दो दशकों को, जब एक देश में जहाँ सात सौ ग्राम चावल प्रतिदिन की उपलब्धता पर गरीबी रेखा का निर्धारण था उस देश में बेइंतहा कारें उतार दी गईं, जगह कम पड़ने लगी तो नई-नई सड़कें और फ्लाईओवर बनाए गए;  टेलीविजन, एयरकंडीशनर, फ्रिज वगैरह की खपत बनी रहे इसके लिए बिजली की उपलब्धता बढ़ाई गई। अमीरों को गुणवत्ता मुहैया कराने के लिए अमेरिकी नकल पर हर चीज की पैकेजिंग कर दी गई। और विकास की इस पूरी प्रक्रिया में गाँव और गरीब कहीं नहीं थे। उनके लिए एक ही विकल्प था कि थोड़े-बहुत लाभ रिस-रिस कर उन तक भी पहुँच जाएँ। कुछ मूर्ख लोगों ने इसे कृषि युग के पिछड़ेपन से औद्योगिक युग के अगड़ेपन की ओर का अगला चरण माना।
यहीं सवाल खड़ा होता है कि क्या हम सिविल समाज हैं? एक व्यवस्था है जो अपने अधिसंख्य नागरिकों के जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा किए बगैर अन्य के लिए विलासिता के सामान का बंदोबस्त करने में जुटी है और समाज को इन बेडौल नीतियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर ये कैसा समाज है! ऐसा नहीं है कि इस तरह बनाई गई व्यवस्था के विरोधाभास कोई छुपी हुई चीज हैं। जिस तरह सरकारी राजस्व से उपभोक्तावाद का सूत्रपात किया गया उसी तरह अब मनरेगा जैसी योजना के जरिए कृत्रिम तरह से ग्रामीण रोजगार सृजित किए जा रहे हैं। क्या मनरेगा का पैबंद उदारवादी अर्थव्यवस्था के हमारे मॉडल की नाकामी का ही एक सबूत नहीं है।
वैश्वीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जो गति दी थी उसे यहाँ की बेढंगी सरकारी नीतियों और भ्रष्टाचार ने बेडौल परिणामों की ओर मोड़ दिया। जो लोग इस बात से खुश नजर आते हैं कि उदार अर्थव्यवस्था के कारण ही गरीब के पैर में चप्पल नजर आने लगी थी वे यह बात भूल जाते हैं कि उदारीकरण ने दुनिया के तमाम देशों में भौतिक विकास के बहुत अच्छे परिणाम दिए हैं, जिनके मुकाबले ये चप्पल-विकास कुछ भी नहीं। और उदारीकरण ने दुनियाभर में जो समस्याएँ दी हैं उन समस्याओं को जटिल से जटिलतम की ओर ले जाने के मामले में हम नंबर एक पर हैं। यह एक निरंकुश उत्पादन के जरिए लागू की गई विकास की नीति थी, जिसका परिणाम था कि आबादी बढ़ रही है, कारें बढ़ रही हैं, कूड़ा बढ़ रहा है, शोर बढ़ रहा है, असमानता बढ़ रही है—जिनको मिलाकर अंततः एक दारुण यथार्थ निरंतर और अराजक होता जा रहा है।
पाँचवें वेतन आयोग ने गैरआनुपातिक ढंग से सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाते हुए यह लक्ष्य भी निर्धारित किया था कि आने वाले दिनों में सरकार का आकार घटाया जाएगा। लेकिन सन 2010 के आँकड़ों के मुताबिक बीस साल के उदारीकरण के बावजूद सरकारी क्षेत्र की नौकरियाँ निजी क्षेत्र से 1 के मुकाबले 1.8 के अनुपात में बहुत ज्यादा थीं। 2010 में ये पौने दो करोड़ कर्मचारी करीब दस करोड़ का उपभोक्ता वर्ग बना रहे थे। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों तक देश की औसत प्रति व्यक्ति आमदनी के मुकाबले सरकारी वेतन 1 के मुकाबले 4.8 था; जो कि विकसित देशों में पाए जाने वाले 1.2 या 1.4 के अनुपात से बहुत ज्यादा था। उसके बाद सातवाँ वेतन आयोग भी लागू कर दिया गया है। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि देश का 94 फीसदी श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करता है, जिसके आर्थिक या मानवीय अधिकारों की किसी भी स्तर पर कोई फिक्र नहीं की जा रही।   
कैसी अजीब बात है कि एक ओर थॉमस पिकेटी जैसा अर्थशास्त्री वैश्वीकरण के बाद वित्तीय पूँजी के बढ़ते संकेंद्रण को लोकतंत्र के लिए संहारक बताते हुए सत्तर फीसद टैक्स तक के सरकारी दखल की जरूरत बताता है, वहीं भारत जैसे देश में सरकारें इसी पूँजी को संकेंद्रित करने की एजेंसी बनी हुई हैं; जिसे भ्रष्टाचार और नकली करेंसी आदि ने और भी व्यापक बना दिया है। ऐसे में सरकार द्वारा नोटबंदी नीचे के आम लोगों के लिए एक फायदेमंद कदम साबित हो सकता है। हालाँकि ये अकेला कोई पर्याप्त कदम नहीं है। जरूरत सिर्फ काले धन पर ही नकेल लगाने की नहीं है, बल्कि स्वयं सरकार द्वारा प्रश्रित आर्थिक फासले को भी कम करने की है। सरकार को चाहिए कि अर्थव्यवस्था को असल उत्पादकता और वास्तविक उत्पादन से जोड़े। जैसे कि भारत जैसे देश में टेलीविजन इंडस्ट्री का इतना बड़ा हो जाना अर्थव्यवस्था के बेडौलपन को ही साबित करता है। भारत को इन सब मामलों में अमेरिका की नकल नहीं करनी चाहिए, और सबसे पहले सभी नागरिकों की समावेशिता वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम करना चाहिए। ये नहीं कि कभी एक हिस्से में सूखा पड़ रहा है, कभी दूसरे हिस्से में बाढ़ आ रही है, और देश की डेढ़ फीसद जनता दिल्ली में अरबों रुपए से बनी अत्याधुनिक मेट्रो ट्रेन में सफर कर रही है।
नोटबंदी के साथ-साथ सरकार को कुछ और कदम भी शीघ्र उठाने चाहिए, जो इस प्रकार हैं-
1.      1- सरकार को एक नया वेतन आयोग गठित करना चाहिए, जिसमें एक कर्मचारी का कुल वेतन 15000 से एक लाख की अधिकतम सीमा के दरम्यान हो।
2- कारों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए कई सौ गुना टैक्स लगाकर कारों को महँगा करने के साथ-साथ यह बंदिश भी हो कि कार वही खरीद सकता है जिसके पास पार्किंग स्पेस हो। कार अर्थतंत्र और पर्यावरण के लिए ही नहीं, भारत जैसे ज्यादा आबादी वाले देश में विचरण के सार्वजनिक स्पेस को घेरने के लिहाज से भी नुकसानदेह है।
5       3- न्यूनतम वेतन कानून को कार्यावधि के साथ नत्थी करके सख्ती से लागू किया जाए। इससे अर्थव्यवस्था का लाभ नीचे तक पहुँच पाएगा, और कीमतों का सही निर्धारण हो सकेगा।
4- स्कूलों में बिल्कुल प्रारंभिक स्तर से इस तरह की शिक्षा दी जाए कि लोग खुद की ही तरह दूसरे के अस्तित्व को भी स्वीकार करें। शिशु अवस्था से शामिल करने पर ये चीज एक संस्कार के रूप में सामाजिक ढाँचे को मजबूत करने वाली होगी। सामाजिकता का अंतर्भूत इलहाम व्यक्ति के स्वार्थ और उसी क्रम में भ्रष्टाचार को कम करेगा। इसे दूसरे शब्दों में इस तरह कहा जा सकता है कि खुद की और दूसरों की वैयक्तिकता का संज्ञान सामाजिकता का मूलाधार है। हिंदुओं के भाववादी समाज में इसकी कमी होने से इस ओर विशेष तवज्जो दी जानी आवश्यक है।
5- लोगों में अपने काम को ठीक से करने की आदत का विकास करने के उपक्रम किए जाएँ। यह आदत कालांतर में अन्वेषी वृत्ति का कारण बनती है, और अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास का आधार बनती है।
6.      6- कृषि को अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक प्राथमिकता वाला क्षेत्र घोषित करके इसे लाभकारी बनाने के उपाय किए जाएँ, जिसके लिए कुछ सुझाव निम्न हो सकते हैं—(क). मदर डेयरी और अमूल डेयरी की तर्ज पर कृषि को समर्पित कुछ ऐसे कोऑपरेटिव बनाए जाएँ जो किसानों से किराए पर जमीन लेकर उनसे ही वहाँ कर्मचारी के रूप में खेती कराएँ। बड़े स्तर पर और आधुनिकतम उपकरणों से खेती का एक मॉडल प्रस्तुत किया जाए। (ख) किसी भी कृषि उत्पाद की अंतिम कीमत में किसान का सर्वाधिक फीसद सुनिश्चित किया जाना चाहिए। (ग) सच्चाई तो यह है कि मध्यवर्ग की गैरआनुपातिक भारीभरकम तन्ख्वाहों को संतुलित किए बगैर किसानों को लाभ देने में हमेशा ही मुश्किल आएगी। इसलिए सबसे पहले उसी दिशा में काम किया जाना चाहिए।
  

Monday, November 7, 2016

सियारों की छवियाँ

एक गांव में एक बूढ़ा आदमी अपनी बुढ़िया के साथ रहता था। दोनों खेत में बीज बोने गए, तभी उन्हें दो चालाक सियार मिले। एक सियार ने उनसे कहा कि उसने काफी कृषि विज्ञान पढ़ रखा है और अगर उन्हें अच्छी फसल चाहिए तो उन्हें बीज को उबाल कर बोना चाहिए। बूढ़े ने ऐसा ही किया। उधर रात को दोनों सियार अपने साथियों के साथ आए और सबने खेत पर उबले हुए बीजों की जमकर दावत उड़ाई। सुबह बूढ़े दंपती को जब हकीकत मालूम हुई तो सियारों को सबक सिखाने के लिए उन्होंने भी एक चाल चली। बुढ़िया जोर-जोर से रोने लगी कि बूढ़ा मर गया है। आवाज सुनकर सब सियार वहां जमा हो गए। और तब बूढ़े ने अपनी लाठी से जमकर उनकी पिटाई की। आखिरकार परस्पर बदले की इस भावना को समाप्त करने का एक रास्ता निकलता है। 

यह कहानी है उत्तरी त्रिपुरा के धर्मनगर के 'कथा चित्र' ग्रुप की प्रस्तुति 'चुप कथा ना' की, जिसका मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित उत्तरपूर्वी राज्यों की बाल प्रस्तुतियों के समारोह के अंतर्गत श्रीराम सेंटर में सोमवार 20 दिसंबर को किया गया। करीब एक घंटे की इस प्रस्तुति में मंच पर सात-आठ साल से 14-15 साल की उम्र तक के लगभग 32 बाल अभिनेता मौजूद थे। युवा निर्देशक मनोज साइकिया को पता है कि बच्चों की प्रस्तुति में मंच पर छवियां कैसे निर्मित की जाती हैं। पात्रों की (बांग्ला) भाषा समझ न आने के बावजूद प्रेक्षागृह में बैठे बच्चों ने इन्हीं छवियों के सहारे प्रस्तुति का भरपूर मजा लिया। सिर पर सियार का मुखौटा, कमर में सन के रेशों की पूंछ और मुंह पर खींची गईं काले रंग की मूंछों जैसी लकीरें- सियार का यह कुल मेकअप था। कुछ ज्यादा धूर्त सियार काले रंग का ऐनक लगाए थे और इनका मुखिया लाल रंग की टाई पहने था। वो लगातार अपनी गर्दन को घुमाते-फिराते हुए पूरे चौकन्नेपन से किसी भी संदिग्ध हालात की थाह लेता है। उनकी देहभाषा से यह भी जाहिर होता है कि सियार मूलतः डरपोक प्राणी है। बूढ़े-बुढ़िया के पास इनका मुकाबला करने के लिए तीन कुत्ते हैं। इन जांबाज कुत्तों की भूमिका में तीन काफी नन्हे बच्चे थे। एक छोर से जब वे मंच पर आते हैं तो सियारों में खलबली मच जाती है। उनके आते ही स्पीकर पर भूं-भूं का स्वर गूंजने लगता है। सियार इतने धूर्त हैं कि दावत उड़ाने के बाद चिढ़ाने के लिए एक किलकारी के जरिए अपनी उद्दंडता को भी जाहिर करते हैं। लेकिन बूढ़े से पिटाई खाने के बाद कोई अपना सिर पकड़े है, कोई बाजू, कोई पैर। एक सियार हर समय समय ट्रांजिस्टर लिए रहता है। बूढे की पिटाई के दौरान वो अंदर के कमरे में कहीं छुप गया है, लेकिन ट्रांजिस्टर की आवाज से पकड़ा जाता है। इसी तरह मुखिया सियार का बच्चा बोतल से दूध पीता है और कृषि विज्ञानी होने का दावा कर रहा सियार मोटी किताब पढ़ने का स्वांग करते हुए बूढ़े से झूठ बोलता है। 

सियारों के अलावा बूढ़े बुढ़िया की अपनी दुनिया की भी कुछ छवियां हैं। बूढ़ा कान लगाकर आंख फैलाकर सियारों की आवाज सुनता है। बुढ़िया अपनी बेटी के यहां जाती है तो मिलने पर पहले दोनों रोती हैं। बेटी की दो बेटियां हैं, और एक शिशु कपड़े के झूले में झूल रहा है। दोनों लड़कियों में किसी बात पर झगड़ा होता है, छोटी लड़की स्पष्टतः ही ज्यादा जिद्दी दिखाई देती है। बुढ़िया खाना खाने के पहले और बाद में कुल्ला करने के लिए मुंह में पानी भरकर जोर से गुलगुलगुल करती है। मां-बेटी बैठकर बात कर रही हैं तभी कीड़ा या चूहा जैसा कुछ 'दिखने' पर मां हड़बड़ाकर उसे 'भगाती' है। दोनों लड़कियां नानी के पैर छूने में शायद स्थानीय परंपरा के मुताबिक बिल्कुल लेट जैसी जाती हैं।

प्रस्तुति में अनगढ़पन बिल्कुल भी नहीं था और बच्चों की टाइमिंग, दृश्य और चरित्र का उनका बोध बहुत ही अच्छा था। वहीं सब कुछ इतना सहज भी था कि अभिनय वगैरह में कहीं कोई गढ़न दिखाई नहीं देती। प्रस्तुति में इतने बच्चे होने के बावजूद मंच पर कभी भी चीजें ठूंसी हुई नहीं लगतीं, और पूरी प्रस्तुति के दौरान रोचकता और सहजता बनी रहती है। मंच पर दृश्य सज्जा के नाम पर प्रायः कुछ भी नहीं था, लेकिन जंगल के दृश्य को दर्शाने के लिए हरी साड़ी में एक लड़की नीम की कुछ डालियां लिए लगातार खड़ी रहती है। (एक पुरानी समीक्षा)       

Tuesday, October 18, 2016

दारियो फो : एक खरे मसखरे का जाना

अभी तीन साल पहले जीवन और रंगमंच में 60 साल तक उनकी सहचर रहीं पत्नी फ्रांका रेमे का निधन हुआ था, और अब इस 13 अक्तूबर को इतालवी नाटककार दारियो फो भी 90 साल की उम्र में दुनिया को विदा कह गए। फो अपने जीते-जी रंगमंच में प्रतिरोध की बहुत बड़ी आवाज थे। उनके लिखे 80 नाटक दुनिया की तीस से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद होकर खेले गए, जिनके कारण उन्हें भरपूर मात्रा में प्रशंसक और दुश्मन दोनों मिले और 1997 में नोबल प्राइज भी।
फो के नाटकों की विशेषता थी- समकालीन मुद्दों से उनका जुड़ाव, अपने वक्त की तल्खियों पर तीखी व्यंग्यात्मकता और नाटकीयता का एक ऐसा ढाँचा जिसमें स्थितियाँ अपनी विचित्रताओं में बहुत तेजी से घटित होती हैं। उनके दो नाटक पूरी दुनिया में (और हिंदी में भी) सबसे ज्यादा खेले गए—एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट और चुकाएँगे नहीं (‘can’t pay? won’t pay!’)। इनमेंचुकाएँगे नहीं महँगाई के विषय पर केंद्रित नाटक है। शहर में बढ़ती कीमतों के बीच किसी स्टोर पर खाद्य पदार्थों की लूट हो गई है। एंटोनिया भी इस लूट में सामान ले आई है। अब उसे इस बात को अपने पति से छिपाना है, जो चुराए गए खाने की तुलना में भूखों मर जाना पसंद करेगा। इसी बीच एक पुलिसवाला लूट की जाँच करते हुए आ पहुँचा है। तब एंटोनिया की सहेली मार्गरीटा एक गर्भवती के तौर पर सारे सामान को अपने कपड़ों में छिपा लेती है। अब हड़बड़ी में हुई गलतबयानी से स्थितियाँ और उलझ गई हैं, और इसी से एक गहरा हास्य पैदा होता है। इसी तरह एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट एक सच्चे वाकये पर आधारित नाटक है। 1969 में इटली के मिलान शहर में एक बम ब्लास्ट हुआ था जिसमें 16 लोग मारे गए थे। ये ब्लास्ट हुआ तो राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण था, पर इसमें गलत ढंग से एक रेल कर्मचारी को पकड़ लिया गया, जिसकी पूछताछ के दौरान थाने में ही मौत हो गई थी। इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर ये नाटक लिखा गया। नाटक के केंद्र में ऐसा आरोपी है जो भेस बदलकर तरह-तरह के रूप धरता है। वह पागल है और डॉक्टरों की जाँच में उसका एक्टिंग मैनियाक होना पता चला है। वो अब तक बारह बार तरह-तरह के रूप धर चुका है। आखिरी बार उसने एक मनोचिकित्सक के रूप में एक लड़के को सीजोफ्रीनिक घोषित किया था और अपनी फीस के रूप में दो सौ पाउंड वसूले थे; यह ऊँची फीस उसके मुताबिक इसलिए जायज थी कि बगैर इसके लड़के के माँ-बाप ने उसे संजीदगी से न लिया होता। मैनियाक अब जज बनना चाहता है क्योंकि बाकी सभी पेशों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ इंसान की वकत घटती जाती है पर जज के साथ इसका उलट होता है। और आखिरकार गफलत और हालात की उलटबाँसी में मैनियाक अपनी ख्वाहिश पूरी कर ही लेता है। वह पुलिस मुख्यालय में जज के रूप में खुद को पेश करके सब कुछ उलट-पलट कर देता है। नाटक में स्थितियाँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि उसकी नाटकीयता को संतुलित बनाए रखना ही निर्देशक के लिए एक चुनौती बन जाती है। फो ने अपने इस नाटक को एक त्रासद प्रहसन के बारे में लिखा गया बेढंगा प्रहसन कहा था।
फो ने न सिर्फ नाटक लिखने में बल्कि उनके मंचन में भी कई तरह के प्रयोग किए। उन्होंने पार्क में, खंडहर हो गए कारखाने की इमारत में, यूनिवर्सिटी के विरोध प्रदर्शनों में, चर्चों में, जेलों में हर जगह नाटक किए। मकसद था अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचना। उन्होंने भ्रष्टाचार, गर्भपात, संगठित अपराध तंत्र, सत्ता के तौर तरीकों, चर्च के रवैये, एड्स की बीमारी, युवाओं में ड्रग्स की बढ़ती लत आदि तमाम विषयों पर नाटक किए। उन्होंने बात को कहने के नए-नए तरीके खोजे, और किस्सागोई की इतालवी परंपरा में से बहुत कुछ अपने काम का निकाला। उनकी इस निरंतर सक्रियता ने उन्हें अपने देश के सबसे लोकप्रिय लोगों में शुमार कर दिया था। नोबल पुरस्कार देने वाली स्वीडिश अकादेमी ने उनके काम को मध्ययुगीन विदूषकों की शैली में दबे-कुचलों की गरिमा को आवाज देने वाला बताया। नोबल पुरस्कार की घोषणा के वक्त फो रोम से मिलान की ओर जाने वाली सड़क पर अपनी कार से गुजर रहे थे। वे कार चला रहे थे और साथ-साथ एक युवा टीवी पत्रकार को इंटरव्यू भी दे रहे थे। तभी एक कार उनकी कार के बराबर में आई जिसकी खिड़की पर लगे एक बड़े से गत्ते पर लिखा था- दारियो, आपने नोबल प्राइज जीत लिया!’ कुछ देर बाद जब वे मिलान के विआ दि पोर्टा रोमाना थिएटर के बाहर थे तब उन्हीं के शब्दों में- अचानक मुझे चारों ओर से रिपोर्टरों, फोटोग्राफरों और कैमरा लिए टीवी कर्मियों ने घेर लिया। वहाँ से गुजर रही एक ट्राम बिल्कुल अनपेक्षित ढंग से रुक गई। उसका ड्राइवर मुझे बधाई देने के लिए उतर कर आया। फिर सभी यात्री भी उतर कर आए और उन्होंने मेरा अभिनंदन किया। हर कोई मुझसे हाथ मिलाना और मुझे बधाई देना चाहता था।
ऐसा नहीं था कि फो अपने ये तीखे नाटक सहूलियत से करते रहे, बल्कि उन्हें बार-बार इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। 1973 में मिलान पुलिस के कुछ उच्चाधिकारियों द्वारा भाड़े के पाँच फासिस्ट अपराधियों को एक सुपारी दी गई थी। अपराधियों ने फो की पत्नी फ्रांका रेमे का बंदूक की नोक पर एक वैन में अपहरण किया, उनके साथ रेप किया, उनकी पिटाई की, उन्हें सिगरेटों से दागा, रेज़र ब्लेड से उनके शरीर पर कट लगाए, और फिर उन्हें एक पार्क में छोड़ गए। पर इस घटना के महज दो महीने बाद फ्रांका अपने दो नए फासिस्ट विरोधी एकालापों के साथ पुनः मंच पर प्रस्तुत थीं। दस साल बाद 1983 में ग्रुप के एक नाटक द ओपन कपल में फ्रांका ने द रेप शीर्षक अपने एकालाप को नाटक की प्रस्तावना के तौर पर पढ़ा। जरूर उसमें कुछ ऐसा भीषण था कि प्रशासन को प्रस्तुति में अवयस्कों का प्रवेश प्रतिबंधित करना पड़ा।
नौवें दशक के शुरुआती सालों में दारियो फो अमेरिका में सबसे ज्यादा खेले जाने वाले नाटककार थे, पर अमेरिका में उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं थी। कई फिल्मकारों, रंगकर्मियों, नाट्य आलोचकों द्वारा  गुहार लगाने के बावजूद उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया। उनके वैचारिक हस्तक्षेपों के अलावा इटली की कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होना भी इसका एक कारण था। आखिर 1984 में न्यूयॉर्क के ब्राडवे में उनकी ...डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट की प्रस्तुति के प्रीमियर के लिए उन्हें थोड़े समय का वीजा दिया गया। अमेरिकी नीति को लेकर फो का सबसे उत्तेजक बयान सन 2001 की वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले की घटना के बाद आया। एक ईमेल में उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क में तो सिर्फ बीस हजार ही मरे, लेकिन अमेरिका की अधम अर्थव्यवस्था तो हर साल लाखों को गरीबी में धकेलकर मार डालती है। उन्होंने कहा कि बगैर इस तथ्य में जाए कि इस हत्याकांड को किसने अंजाम दिया, यह हिंसा हिंसात्मक संस्कृति, भूख और अमानवीय शोषण की वैधानिक बेटी है।
ऐसा नहीं था कि फो का प्रतिरोध सिर्फ पूँजीवादी देशों के खिलाफ मात्र रहा हो। 1968 में सोवियत संघ द्वारा चेकोस्लोवाकिया में सेना भेजे जाने के खिलाफ उन्होंने वहाँ अपने नाटकों के कॉपीराइट वापस लेकर उनके प्रदर्शन को नामंजूर कर दिया था। उनके इस कदम ने उन्हें तत्कालीन कम्युनिस्ट देशों की आँख की किरकिरी बना दिया था। इसी तरह चीन में 1989 के थिएनअनमन चौक के जनसंहार के विरोध में उन्होंने दो एकालाप लेटर फ्राम चाइना और स्टोरी ऑफ क्यू लिखे। 
राजनीतिक प्रसंगों के अलावा फो ने ऐसे विषयों पर भी नाटक किए जिसके कारण उनपर ब्लासफेमी (ईशनिंदा) के आरोप लगे। 1969 में प्रस्तुत उनके नाटक मिस्टेरो बफो अथवा कॉमिकल मिस्ट्री (मज़किया रहस्य) के टीवी प्रदर्शन को वेटिकन ने टेलीविजन के इतिहास का सबसे ज्यादा ईशनिंदा करने वाला शो करार दिया। यह प्रस्तुति कई एकांकियों की एक श्रृंखला थी, जिसमें पुराने वक्त में सतत यात्रारत रहने वाले उन सैलानियों की मार्फत बातें बुनी गई थीं, जिनके कारण गाँव-देहात तक दुनिया भर की खबरें पहुँच पाती थीं। श्रृंखला की आखिरी प्रस्तुति में ईसा के जीवन और मृत्युदंड को पारंपरिक नाट्य पैशन प्ले के माध्यम से कहा गया। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की सर्वाधिक विवादास्पद मानी गई यह नाट्य प्रस्तुति वेटिकन द्वारा निंदा के बावजूद तीस साल तक यूरोप और अमेरिका में खेली जाती रही। 1987 में क्रिसमस से पहले के एक टीवी शो में फो द्वारा प्रस्तुत फर्स्ट मिरेकल ऑफ इन्फैंट जीसस’ (‘शिशु यीशु का पहला चमत्कार’) को भी वेटिकन द्वारा ब्लासफेमी करार दिया गया। उनके एक अन्य नाटक पोप एंड द विच में एक पोप को दो समस्याएँ हैं। पहली यह फोबिया कि बच्चे उसपर हमला कर देंगे, और दूसरी उसका गठिया रोग। कोशिशों के बाद वह इनसे उबर गया है, लेकिन गठिया से उबरने के क्रम में उसके हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर ही अटके रह गए हैं। पोप अपना सारा काम नन का भेस धरे एक चुड़ैल की सलाह पर करता है। यह चुड़ैल इलाज के लिए हेरोइन के इंजेक्शन लेती है और खिलौना कार, जहरीले तोते और ब्राजीलियन नन के जानलेवा हमलों से बची रही है।
2001 में लिखे उनके नाटक द टू हेडेड एनोमली (दो मस्तिष्कों की अनियमितताएँ) में चेचेन विद्रोहियों दवारा मार दिए गए दिखाए गए व्लादिमीर पुतिन का दिमाग तत्कालीन इतालवी प्रधानमंत्री सिल्वियो बरलुस्कोनी की खोपड़ी में फिट कर दिया जाता है। इस नाटक के लिए फो को मुकदमे का सामना करना पड़ा और उन्हें धमकियाँ भी मिलीं। युवाओं में नशे की लत पर उनका नाटक मदर्स मारिजुआना इज द बेस्ट में घर के दादाजी गलती से नशीले ड्रग को एस्पिरिन समझकर खा लेते हैं, और भ्रांति में अलमारी को ट्राम समझकर यात्रा करते रहते हैं।
1973 में चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर एलेंदे की सुनियोजित हत्या के बाद फो ने एक नाटक द पीपुल्स वार इन चिली तैयार किया, जिसे खूब प्रशंसा हासिल हुई और इटली के अलग-अलग शहरों में इसके बहुतेरे प्रदर्शन हुए। प्रस्तुति में स्थितियों को कुछ इस तरह बुना गया कि नाटक के अंत तक पहुँचते-पहुँचते कुछ दर्शकों को लगा कि सचमुच इटली में तख्तापलट हो गया है। तनाव में एक दर्शक ने भाग निकलने के लिए एक खिड़की का शीशा तोड़ डाला, और एक अन्य ने अपने पास मौजूद कुछ दस्तावेजों को इस मौके पर खतरनाक समझकर उसके दस पन्नों को खा डाला।   
फो हमेशा वामपंथी रहे, पर बाद के सालों में वे भूमंडलीकरण विरोध और पर्यावरण के मुद्दे पर बनी इटली की फाइव स्टार मूवमेंट पार्टी से जुड़ गए थे। वे सोलहवीं सदी के इतालवी नाटककार रूज़ान्ते और सत्रहवीं सदी के फ्रेंच नाटककार मोलियर को अपना गुरु मानते थे। ये दोनों उन्हीं की तरह अभिनेता, लेखक और व्यंग्यकार थे। अपने नोबल पुरस्कार भाषण की शुरुआत ही उन्होंने तेरहवीं सदी के एक इतालवी कानून की याद दिलाते हुए की थी जिसमें विदूषकों के लिए एक सीमा के बाद मौत की सजा मुकर्रर की गई थी। उन्होंने मसखरी के जोखिम को जानते हुए मसखरा बनना कुबूल किया था।   

Wednesday, October 12, 2016

कौन थी अनारकली?

अनारकली की कहानी सबसे पहले गुजिश्ता लखनऊ के लेखक अब्दुल हलीम शरर ने लिखी थी। शरर का जन्म मटियाबुर्ज में हुआ था, जहाँ लखनऊ से बेदखल कर दिए जाने के बाद अवध के नवाब वाजिद अली शाह और उनके साथ गए लोगों को बसाया गया था। वाजिद अली शाह ने अंग्रेजों से मिलने वाली मोटी पेंशन से इमामबाड़ा और लखनवी शैली की इमारतें बनवाकर मटियाबुर्ज में एक छोटा-मोटा लखनऊ खड़ा कर लिया था। इस नकली लखनऊ में रहते हुए शरर में नवाबी दौर और मुस्लिम तहजीब का ऐसा स्मृत्याभास पैदा हुआ कि बाद में वे असली लखनऊ लौट आए और 1926 में जब उनका इंतकाल हुआ तब तक वे मुगलिया माज़ी पर 102 किताबें लिख चुके थे। इन्हीं में एक कहानी अनारकली की थी। दिलचस्प ये है कि शरर ने इसे इतिहास के एक वास्तविक दौर के हवाले से कही गई एक काल्पनिक कहानी बताया था। शरर के बाद 1922 में इम्तियाज अली ताज, जिन्हें आगा हश्र कश्मीरी के बाद के दौर का उर्दू का सबसे बड़ा नाटककार माना जाता है, ने अनारकली के किरदार पर एक नाटक लिखा, जो बहुत मशहूर हुआ और खूब खेला गया। इसी नाटक की शोहरत बाद में अनारकली और मुगले आजम फिल्मों के बनने की वजह बनी।
अब्दुल हलीम शरर ने अनारकली की कहानी को भले ही काल्पनिक बताया हो, पर यह तय है कि इस किरदार के नाम को उन्होंने खुद की ईजाद नहीं बताया होगा; क्योंकि लाहौर में इस नाम का आज तक प्रसिद्ध बाजार तब भी बाकायदा वजूद में था। लाहौर के इस बाजार का नाम अनारकली बाजार इसलिए पड़ा कि यहाँ कथित रूप से किसी असली अनारकली का एक मकबरा हुआ करता था, जिसे सन 1800 में महाराजा रंजीत सिंह की सेना के एक फ्रेंच अफसर के आवास में, फिर अंग्रेजी राज के दौरान चर्च में और उसके बाद पंजाब के रिकॉर्ड ऑफिस में बदल दिया गया।
सवाल है कि वो अनारकली कौन थी जिसके नाम पर यह मकबरा बनाया गया था? अनारकली को काल्पनिक मानने वालों का कहना है कि दरअसल अनारकली किसी मकबरे में दफ्न मरहूम का नहीं बल्कि उस बगीचे का नाम था जिसमें यह मकबरा बना था। और यह मकबरा जहाँगीर की एक बीवी और उसके बेटे सुल्तान परवेज की माँ साहिबे जमाल का था। ऐसा दावा करने वालों ने मकबरे के आसपास बगीचा होने के सबूत तो पेश किए, लेकिन सुल्तान परवेज के ननिहाल से सूत्र जोड़ने पर दूसरा दावा ठीक नहीं पाया गया। जबकि इसीके बरक्स अनारकली को एक वास्तविक किरदार मानने वाले सबूतों को देखें, तो एक अलग ही कहानी सामने आती है। 
अनारकली को जीता जागता इंसान मानने के जिक्र उसे बगीचा या काल्पनिक बताने वालों से बहुत पहले के हैं। सबसे पहले इसका जिक्र सन 1625 में प्रकाशित पुस्तक परचास हिज पिलग्रिम्स में आया था। सैमुअल परचास नाम के ब्रिटिश संपादक द्वारा प्रकाशित कराई गई यह किताब दुनियाभर में जाने वाले ब्रिटिश व्यापारियों के यात्रावृत्तांतों का वृहदाकार संकलन थी। इसमें संकलित ईस्ट इंडिया कंपनी के एक व्यापारी विलियम फिंच के रिपोर्ताज में पहली बार अनारकली के प्रसंग का जिक्र मिलता है। फिंच सन 1608 में ईस्ट इंडिया कंपनी के हेक्टर नाम के जहाज से सूरत के बंदरगाह पर उतरा था। अगले कुछ साल हिंदुस्तान में रहने के दौरान वह कई जगह घूमा, जिनमें से एक लाहौर भी थी, जहाँ वह सन 1611 में पहुँचा था। वहाँ उसने बाबा शेख फरीद की मस्जिद के परे अकबर की एक बीवी जिसका नाम अनारकली था-- जो उसके बेटे डेनियल की माँ थी, जिसके साथ शाह सलीम का कोई चक्कर था, जिसके बारे में पता चलने पर अकबर ने शीघ्र ही उसे अपने महल की दीवार में चिनवा दिया, जहाँ उसकी मौत हो गई— का एक सुंदर स्मारक होने का जिक्र किया। और (वर्तमान) बादशाह ने अपनी मोहब्बत की याद में ऊँची दीवारों से घिरे वर्गाकार बगीचे के मध्य तरह-तरह के कमरों और गेट से युक्त पत्थर का आलीशान मकबरा तामीर करने का आदेश दिया, जिसका ऊपरी हिस्सा उसकी इच्छा के मुताबिक सोने से मढ़ा हो। तथ्यों के मुताबिक, विलियम फिंच के देखे जाने तक यह मकबरा अभी बन ही रहा था (जो अंततः सन 1615 में बनकर तैयार हुआ), और अकबर की मौत अभी सिर्फ छह साल पहले ही हुई थी।
फिंच के पाँच साल बाद सन 1616 में भारत में ब्रिटिश सम्राट के दूत सर थॉमस रो के पादरी के तौर पर मौजूद एडवर्ड टैरी ने भी अपनी यात्रा के रिपोर्ताज में अनारकली का जिक्र किया। उसके मुताबिक अकबर शाह ने अपनी सबसे प्रिय पत्नी अनारकली को एब्यूज करने के लिए वर्तमान बादशाह को उत्तराधिकार से वंचित कर देने की धमकी दी थी, जिसे मृत्युशैया पर उसने वापस ले लिया।
इन दोनों जिक्रों में खास बात अनारकली को अकबर की बीवी बताया जाना है। बाद का काल्पनिक साहित्य अनारकली को सलीम की एक ऐसी प्रेमिका के रूप में चित्रित करता रहा है जिसका कमतर हैसियत की कनीज़ होना सलीम के बाप अकबर को रास नहीं आया, लिहाजा उसने उसे दीवार में चिनवा दिया। क्या यह एक वास्तविक त्रासदी को रोमांटिक त्रासदी में तब्दील करना था? क्या उक्त वास्तविक त्रासदी को लेखकगण पचा नहीं पा रहे थे, इसलिए उन्होंने उसका एक ऐसा सहनीय संस्करण तैयार कर दिया, जिससे एक सुखवादी समाज के संस्कारों पर बुरा असर न पड़े? इस सवाल की तहकीकात के लिए इतिहास में थोड़ा और घुसकर देखते हैं।
सबूतों के अभाव में इतिहास की किताबों ने अनारकली को एक वास्तविक किरदार के रूप में दर्ज नहीं किया है,  पर उनमें यह जरूर दर्ज है कि सलीम ने अकबर के खिलाफ सन 1600 में बगावत कर दी थी। सवाल है कि ऐसा उसने क्यों किया जबकि वह हमेशा से अकबर का सबसे प्रिय पुत्र और शाही तख्त का लगभग घोषित वारिस था? वह अकबर की मुरादों और शेख सलीम चिश्ती की दुआओं की संतान था। अकबर अजमेर की दरगाह पर अपनी आस्था ज्ञापित करने के लिए सलीम को आगरा से पैदल वहाँ तक लेकर गया था।... और सलीम द्वारा की गई बगावत भी क्या थी—वो ऐसी बगावत थी जिसमें तख्तापलट के इरादे की तुलना में अपनी खुंदक दिखाने की जुर्रत ज्यादा थी। पूरा वाकया यों है कि सितंबर 1599 में अकबर 80 हजार सैनिकों के साथ दक्कन में युद्ध के लिए निकला। जाते हुए उसने सलीम को राजधानी आगरा का कार्यवाहक मुखिया घोषित कर दिया। लेकिन सलीम ने अकबर के जाते ही हर जगह अपने खास लोगों को नियुक्त कर दिया और दक्कन से आने वाले अकबर के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी। न सिर्फ इतना बल्कि उसने आगरा के बादशाही किले पर कब्जा करने की कोशिश भी की, पर किले की हिफाजत अकबर के बेहद खास सिपहसालारों की सैन्य टुकड़ियों के अधीन होने से वह इसपर कब्जा नहीं कर पाया। उधर दक्कन की लड़ाई जीत कर अकबर अप्रैल 1601 में वापस आगरा आया। यहाँ उसे पता चला कि सलीम शहर में तीस हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ सीनाजोरी पर उतरा हुआ है। ऐसे में उसने उसे एक कड़ा पत्र लिखा कि वह शहर छोड़कर यहाँ से धुर पूरब की ओर चला जाए, जहाँ बंगाल और उड़ीसा की सुलतानी उसे मुकर्रर की जाती है। पत्र मिलने पर बिगड़ैल सलीम ने बंगाल जाने के प्रस्ताव को तो दरकिनार कर दिया, पर वह आगरा को उसके हाल पर छोड़कर इलाहाबाद जरूर लौट गया। वहाँ भी अपनी खुंदक निकालने का काम उसने जारी रखा, और बादशाह के समांतर अपने नाम के सिक्के जारी करवा दिए। बाद में उसने अकबर की ओर से समझौते के लिए भेजे गए अबुल फजल की हत्या भी करा दी। इतिहासकारों ने सलीम की इन कारगुजारियों को सत्ता के लिए उसकी व्यग्रता करार दिया है। हालाँकि अगर वैसा था भी तो उसकी बगावत में कोई योजना दिखाई नहीं देती, और अंततः किसी मोहब्बत के लिए कुर्बान हो जाने का भाव ही इसमें ज्यादा दिखाई देता है। और ऐसा हुआ भी। अपनी ऐंठ से बाहर आकर अकबर के आगे समर्पण करने पर उसे छोटी-मोटी कुर्बानी देनी ही पड़ी। सलीम को दस दिन तक कैद में रखा गया। माना जाता है कि उसने समर्पण का यह फैसला उसी साल हुई अकबर के तीसरे बेटे डेनियल की मौत के बाद शाही तख्त का कोई प्रतिद्वंद्वी न बचने के मद्देनजर लिया था। बाद में हालाँकि मानसिंह और मिर्जा अजीज कोका जैसे रसूखवाले मनसबदारों ने सलीम की कारगुजारियों की याद दिलाकर अकबर के सामने खुद जहाँगीर के बेटे खुसरू मिर्जा को ही उत्तराधिकारी के रूप में खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन दरबार के सत्ता-समीकरणों में उनकी यह कोशिश नाकाम हो गई। जो भी हो, प्रश्न आखिर वही खड़ा होता है कि चार साल तक चले सलीम के इस ऊटपटाँग विद्रोह का सबब आखिर क्या था? कहीं यह अनारकली को दीवार में चिनवाने का बदला तो नहीं था?
अनारकली का जिक्र इतिहास में इसलिए नहीं है क्योंकि आईने अकबरीमें नहीं है। जाहिर है कि आईने अकबरीमें (अगर वह था तो) ऐसे वर्जित संबंध के जिक्र को शामिल नहीं किया जा सकता था। अलबत्ता अबुल फजल ने उसमें एक अन्य घटना का उल्लेख जरूर किया है। घटना के मुताबिक एक शाम अकबर के हरम में किसी पागल आदमी के घुस आने की खबर फैली, जिसे सलीम ने पकड़ लिया। लेकिन प्रहरियों ने सलीम को ही घुसपैठिया समझकर पीट दिया। अबुल फजल के मुताबिक अकबर ने जैसे ही उस पागल समझे गए आदमी पर तलवार उठाई तब तक वह घूमा तो सबने देखा कि वह सलीम था। यकीनन इतिहास आईने अकबरीके अलावा भी कुछ रहा होगा। जहाँगीर ने लाहौर में जिस अनारकली का मकबरा बनवाया वह आखिर कौन थी?  तथ्यों के मुताबिक वह डेनियल की माँ तो नहीं ही थी, क्योंकि उसकी मौत तो इस घटनाक्रम से चार साल पहले ही हो चुकी थी। लेकिन यह भी सही नहीं मालूम देता कि अकबर जैसा गहरी सूझ वाला बादशाह अनारकली के मात्र कनीज होने की इतनी बड़ी सजा मुकर्रर करे कि भविष्य में इतना बड़ा वितंडा खड़ा हो।
अनारकली के मिथ में एक पहलू उसे दीवार में चिनवाने का भी है। किसी जीते-जागते व्यक्ति को दीवार में चिनवा देना सजा देने का एक अनोखा तरीका ही कहा जा सकता है। सजा देने के ऐसे अनोखे तरीके जिनमें प्रत्यक्षतः क्रूरता न हो अकबर को खूब सूझते थे। एक बार एक सैनिक को काम में लापरवाही की सजा में उसने मरे भैंसे के शरीर के खोखल पर बँधवाकर नदी में लटकवा दिया था। थपेड़ों से बेहाल हो गए सैनिक की चीख-पुकार पर उसे निकालकर गुलाम के तौर पर उसकी नीलामी करवा दी गई। दूध के भाई अदम खाँ को किले की बुर्जी से दो बार नीचे फिंकवाने की बात तो अकबर की कार्यशैली का मशहूर तथ्य है ही। क्या इन उदाहरणों की रोशनी में अनारकली को दीवार में चिनवाने की बात निरी किंवदंती मानी जा सकती है?
अनारकली का किरदार अगर इतिहाससम्मत नहीं है तो उसकी उत्पत्ति का स्रोत क्या है? जिन दो अंग्रेजों ने पाँच साल के अंतराल पर अलग-अलग उसका जिक्र किया, उन्होंने निश्चित है ये कथा कुछ हिंदुस्तानी लोगों से ही सुनी होगी; जिससे जाहिर होता है कि ये अपने वक्त की एक लोकप्रिय दंतकथा थी। इस दंतकथा के रचयिता कौन थे? कहीं वे मिस्त्री तो नहीं जिन्हें इस दंतकथा में दीवार की चिनाई के लिए बुलाया गया होगा? फिर अगर यह मान लिया जाए कि अनारकली की यह कहानी किसी अफवाह पर आधारित एक कल्पनाशील वर्णन मात्र है, तब वो मकबरा आखिर किसका है जिसका जिक्र विलियम फिंच ने किया था? जाहिर है ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब कभी तलाशे नहीं जा पाएँगे।