Thursday, February 27, 2014

सम्राट अशोक की विडंबना

दयाप्रकाश सिन्हा का नया नाटक सम्राट अशोक अपने प्रोटागोनिस्ट को एक नई छवि में पेश करता है. यह एक सत्तालोलुप अशोक है, जो अपने मंत्री की मदद से बड़े भाई का हक हथियाता है. वह कामुक है, कुरूप है और एक उपेक्षित संतान भी. उसके चेहरे पर उसे असुंदर बनाने वाला एक काला धब्बा है, जिसकी वजह से पिता बिंदुसार उसे पसंद नहीं करता. कालांतर में पिता की उपेक्षा अशोक की मनोग्रंथि बन चुकी है, जिससे उबरने के लिए उसने अपना नाम प्रियदर्शी रखा. पर उसकी ग्रंथियाँ इससे कम न हुईं और वह क्रमशः अपने ही अंतर्विरोधों में घिरा एक किरदार बनता गया. वह भिक्खु समुद्र को आग पर जलाकर मार देने का आदेश देता है, क्योंकि भिक्खु ने भाई के रक्त में सने उसके अशुद्ध हाथों से भिक्षा ग्रहण करने से इनकार कर दिया था. फिर अपने अपराधबोधों से बाहर आने के लिए वह बुद्ध की शरण में जाता है, पर यहाँ भी वह एक अतिवादी साबित होता है. सारी जनता और सभी धर्मों के प्रति समान रूप से अपने शासकीय कर्तव्यों को पूरा करने के बजाय उसकी निष्ठा सिर्फ एक ही धर्म के प्रति है. बौद्ध मठों के लिए राजकोष खुले हैं, पर जैन, आजीवक, वैदिक धर्मों आदि की उसे कोई परवाह नहीं. पिछले दिनों दयाप्रकाश सिन्हा के ही निर्देशन में श्रीराम सेंटर में हुई ढाई घंटे की प्रस्तुति में अशोक के किरदार के उतार-चढ़ावों को आकार देते अभिनेता जेपी सिंह के लिए यकीनन यह एक चुनौतीपूर्ण भूमिका रही होगी.

कुछ साल पहले दिल्ली के ही रंगकर्मी तोड़ित मित्रा ने भी अशोक पर देवानामपिया नाम से एक बांग्ला नाटक खेला था जिसमें उसकी प्रचलित छवि को उलट दिया गया था. आधुनिक इतिहास में करीब डेढ़ सौ साल पहले प्रोमिथ्यु अनबाउंड और मेघनादेर बध काव्यजैसी काव्यात्मक उदभावनाओं के जरिए प्राचीन साहित्य के खलनायकों को नायक बनाया गया था; अब ये- नायक को प्रतिनायक बनाने की- परंपरा विपरीत दिशा में शुरू हुई है. एक इतिहासबोधविहीन देश, जिसे दो सौ साल पहले अशोक नाम के राजा का नाम भी पता नहीं था, अब सारी संभावनाएँ इतिहास में ही तलाश लेना चाहता है. बहरहाल, लेखक-निर्देशक दयाप्रकाश सिन्हा के नाटक की एक समस्या यह भी है कि वह करने की तुलना में बोलता ज्यादा है. कई जगहों पर जहाँ एक्शन की स्पष्ट जरूरत दिखती है वहाँ भी कथोपकथन से काम चला लिया गया है. आखिर वह कैसा सम्राट है, जिसे उसके ही मंत्री ने बंदी बना लिया है, और वह कुछ करने की तुलना में कातर ढंग से बोले जा रहा है? इतना क्रूर और विध्वंसक शासक इतना निरीह कैसे है? अशोक की विडंबना की व्यूहबंदी के चौतरफा आयोजन में उसे बौद्ध भिक्षु हो गए अपने ही पुत्र महेंद्र के पैर छूने पड़ते हैं. दयाप्रकाश सिन्हा धर्म के इस पाखंड प्रकरण के जरिए अशोक के किरदार का मनोविश्लेषण करने की कोशिश करते हैं : भौतिक महत्त्वाकांक्षाओं की अति में फँसा व्यक्ति अपने कुकृत्यों की आत्मग्लानि में इसी तरह धर्म की शरण में जाता है, और उसके विगलित कर देने वाले कर्मकांड का शिकार होता है. नाटक की हैपनिंग इस लिहाज से किंचित औपन्यासिक टच लिए हुए है. कई मौकों पर स्थितियों का अनावश्यक विस्तार और लंबे संवाद विषय के फोकस को धूमिल करते हैं. इसकी एक वजह चीजों को स्याह और सफेद के निष्कर्षों में देखने की लेखकीय दृष्टि भी हो सकती है. नाटक के ज्यादातर किरदार नीति और अनीति के पारंपरिक पैटर्न से बँधे हुए मालूम देते हैं. इस लिहाज से भिक्षु सागरमते नाटक का एक रोचक किरदार है. वह शूद्र था और अपनी प्रेमिका को पाने के लिए बौद्ध बन गया, और फिर अशोक की दूसरी पत्नी की साजिश में भी शरीक हो जाता है. रोहित त्रिपाठी ने अपने अभिनय में इस किरदार को एक अच्छी कॉमिक रंगत दी है, जिसमें उसके हावभाव में एक दिलचस्प मौकापरस्ती टपकती रहती है.

प्रस्तुति में तरह-तरह के पात्र कई तरह के कास्ट्यूम में लगातार एक भव्य दृश्य के रूप में प्रस्तुत होते हैं. लाइट डिजाइनर आरके ढींगरा, जिन्हें लाइट एंड साउंड शोज का अच्छा अभ्यास है, इस भव्यता में अपनी बहुरंगी रोशनियों से एक अतिरिक्त चमत्कार पैदा करते हैं, जो कई मौकों पर संजीदा स्थितियों में एक गैरसंजीदा शै के रूप में भी दखल देती है. अशोक की भूमिका में जेपी सिंह अलग-अलग मौकों पर लगभग विपरीत आचरण करते चरित्र का अच्छा निबाह करते हैं. एक दृश्य, जिसमें आत्मधिक्कार से घिरे अशोक को अपनी पत्नी देवी की छवि दिखाई देती है, में अच्छी निर्देशकीय कल्पनाशीलता सहज ही दिखती है. डालचंद द्वारा तैयार कास्ट्यूम भी प्रस्तुति की एक विशेषता हैं. लगभग हर पात्र अपने पहनावे में मंच पर काफी सुघड़ दिखाई दे रहा था.

भाव-आडंबर की लयकारी

पिछले महीने हुए भारत रंग महोत्सव की शुरुआत इसी प्रस्तुति से हुई थी। कावलम नारायण पणिक्कर निर्देशित प्रस्तुति छाया शाकुंतल। पणिक्कर संस्कृत की उस शास्त्रीयता के सबसे बड़े रंगकार माने जाते हैजो कई तरह की आलंकारिकताओं का एक संयोजन होती है। उदयन वाजपेयी के रूपांतरण पर आधारित इस प्रस्तुति में छोटी-छोटी स्थितियां देर-देर तक मंथर फैलाव में चलती रहती हैं। इस चाक्षुष यज्ञ में हाथों का लहराया जाना है; नेत्रों की चतुर-चपल-कारुणिक भंगिमाएँ हैं; सखियों की मधुर ठिठोली और नायिका की सलज्ज मुद्राएं हैं रौद्र रस वाले दुर्वासा और विशाल दाढ़ी वाले कण्व ऋषि हैं। शास्त्रीय का अर्थ है—रस सिद्धांत के रसों का संयोजन। मनुष्य-स्वभावों का कोईकन्फ्लिक्ट या द्वंद्व यहां नहीं है। कथावस्तु का एकमात्र द्वंद्व या पंगा है- नायक का अपनी प्रेमिका को भूल जाना। यह भूल जाना भी यथार्थ की किसी वजह से नहीं बल्कि दुर्वासा के शाप के कारण है। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। बात यह है कि कथावस्तु का महत्त्व ही यहां निमित्त मात्र के तौर पर है। असली चीज है इस निमित्त का बनाव श्रृंगार। कथ्य के दुख, वियोग, सौंदर्य सब इस शास्त्रीयता में करीने से सजाए हुए हैं। यह वास्तविकता से परे जीवन की एक आभासी संकल्पना है, जिसे भारतीय शास्त्रीय परंपरा कहा जाता है। कालिदास भारत की इस रेटॉरिक आधारित परंपरा के सबसे बड़े कवि-नाटककार हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सिपुर्द बहुत से कामों में से एक इस परंपरा के संरक्षण का भी है, जिसके अधीन विद्यालय रंगमंडल ने इस प्रस्तुति को तैयार किया।
इस शास्त्रीयता में भाव-आडंबर की लयकारी ही उसकी पराकाष्ठा है। शुरू के दृश्यों में तबले की थाप के समांतर एक लय में दौड़ती सलज्ज नायिका और पीछे-पीछे नायक दिखाई देते हैं। हरी चोली, हरे कबंध और केशों में गुलदाउदी की वेणी लगाए शकुंतला गुहार लगा रही है- सखियो अनुसूया...प्रियंवदा, मुझे इस भंवरे से बचाओ!’ मटके उठाए हुए सखियां गेंदे के फूलों की माला और वेणी पहने हैं। नायिका की इस दशा पर वे चुहुल कर रही हैं कि तभी भौंरे से छुटकारा दिलाने की मार्फत नायक दुष्यंत का प्रवेश होता है। मंच पर प्रापर्टी लगभग कुछ भी नहीं है। सारा माहौल गतियों, भंगिमाओं और वेशभूषा पर आश्रित है। इसी क्रम में हिरण शावक बनी अभिनेत्रियों की पुतलियों और चाल में दिलचस्प चपलता है। ऐसे माहौल में नायिका को काम-ज्वर ने तपा डाला है, तो नायक तो उसमें जल ही गया है। दूसरी ओर राजा का मित्र विदूषक है, जो राजा के आश्रम में गए होने के दौरान एक नाटकीय एकालाप में व्यस्त है; और मोदक की कल्पना करके जीभ लपलपा रहा है। लेकिन वस्तुतः इस विदूषक की तमाम हरकतें कोई हास्य पैदा नहीं कर पातीं। अलबत्ता कई जगह पर भावों की दीर्घ शास्त्रीय अभिव्यक्ति का लास्य जरूर असंगत सामयिकता में हास्य की वजह बना नजर आता है। दुर्वासा के प्रवेश का दृश्य इस लिहाज से बेहतर बना है, जिसमें लाल दाढ़ी, वस्त्रों और रोशनी में वे नक्कारे की धमक के समांतर रौद्र कदमों से अपने प्रेमी की यादों में खोई शकुंतला की परिक्रमा करके चले जाते हैं।
प्रस्तुति में शैली का बंधापन अभिनेताओं के लिए भले ही एक चुनौती की तरह होता हो, लेकिन दर्शकों के लिए इसमें कुछ विशेष रुचिकर नजर नहीं आता। इसकी वजह है समकालीनता से इसका रत्तीभर तालमेल न होना। एक भाववादी सौंदर्यशास्त्र की रचना को नितांत भौतिकतावादी समय की गतियों में घिरे हम बहुत दूर से देख रहे मालूम देते हैं। उसपर उदयन वाजपेयी के रूपांतरण में उसने पुट्ठों को गर्दन की ओर घुमा लिया है जैसी काव्य पंक्तियां या इसका शरीर बेहद कमजोर लग रहा है. इसे ज्वर है. जैसे संवाद मानो रस-वैचित्र्य का निर्माण करते हैं। वैसे शकुंतला की भूमिका में तीतस दत्ता का स्वर और गायकी जरूर अलग से ध्यान खींचते हैं।

घुप्प अंधेरा और श्वेत छवियां

उत्सुशी  
पिछले महीने भारत रंग महोत्सव में हुई जापानी प्रस्तुति उत्सुशी कई तरह की मौन देहगतियों का एक दृश्यात्मक संयोजन है। पूरी प्रस्तुति में सिर्फ एक ही रंग दिखाई देता है—सफेद। लाइट्स ऑफ होते ही मंच के स्याह घुप्प अंधेरे में तीन झक्क सफेद वृत्त नुमाया हुए हैं। हर वृत्त में नख से शिख तक चूने की प्रतिमा जैसी एक आकृति है। धीरे-धीरे संगीत-स्वरों के समांतर उनमें हरकत पैदा होती है। वे देर तक एक ही तरह से हाथों को हवा में लहरा रहे हैं, जैसे कुम्हार चाक पर आकार गढ़ता है। खास तरह से बनाए गए उनके घाघरे हवा भरने से फूल गए हैं। फिर अगले दृश्य में नई नमूदार हुई आकृतियों के चेहरे गायब हैं। उन्हें प्लास्टर ऑफ पेरिस के जरिए चट्टानी बना दिया गया है, जिसे देखना एक अजीब-सा अहसास देता है। उनके कपड़ों पर बहुत से जाले जैसे बने हुए हैं। मानो किसी समाधि से निकलकर आए हों। अगले दृश्य में मंच के दो छोरों से दो पात्र प्रकट होते हैं। उनकी धीमी मुद्राएँ कुछ ऐसी हैं मानो वे गतिशील जीव न होकर मूर्तिशिल्प हों। इतनी सफेदी में उनका मुँह खोलना एक अजीब सी छवि बनाता है। एक मौके पर चार आकृतियाँ इस तरह से खड़ी हैं जैसे मनुष्य के जीववैज्ञानिक विकास को दर्शा रही हों। प्रस्तुति की एक विशेषता मंच पर मौजूद पात्रों की भंगिमाओं की एकरूपता है। हालांकि बाद की स्थितियों में इस एकरूपता को बाकायदे खंडित करके भी कलात्मकता निकाली गई है। विकसित देशों में इसी तरह कला की नई-नई विधियां निरंतर खोजी जाती रहती हैं। यह पिछड़े समाजों  के आक्रोश, संघर्ष और द्वंद्व जैसे विषयों से आगे की दुनिया है। टोक्यो के संकाई जुकु ग्रुप की इस प्रस्तुति के निर्देशक उशियो अमागात्सु हैं।
अलका
इससे पहले रोज कमानी प्रेक्षागृह में उमा झुनझुनवाला निर्देशित प्रस्तुति अलका का मंचन हुआ। मनोज मित्रा का यह मूल बांग्ला नाटक घर-परिवार की कई तरह की समस्याओं से जूझती एक स्त्री की कहानी है, जिसका पति एक दुर्घटना में स्नायविक रूप से विकलांग होकर एक ओर कुर्सी पर बैठा रहता है। गोद ली बेटी दहेज प्रताड़ना की शिकार है, गोद लिया बेटा रैगिंग का। इनके अलावा भी कई किरदार हैं, जिनमें दो पड़ोसिनें काफी दिलचस्प हैं। एक खांटी मोहल्लाई प्रपंची है और दूसरी शराबनोशी करने वाली उन्मुक्त स्वभाव की तलाकशुदा। नाटक में पुराने मध्यवर्गीय जीवन के बहुत सारे खटराग अपनी देशज रंगतों में शामिल हैं। लेकिन कुछ स्थितियों को अनावश्यक रूप से लंबा और जबरिया ढंग से मेलोड्रामेटिक बनाने की कोशिशें बीच-बीच में अखरने वाली भी हैं। क्रिकेट पर अल्का के भाई-भतीजे की हल्की-फुल्की चर्चा बेवजह खींची गई है। इसी तरह खुद अलका भी अक्सर वास्तविक परेशानियों से कहीं ज्यादा खीझी हुई नजर आती है। और बार-बार के दोहराव में उसकी यह खीझ और पूरी स्थिति ही बनावटी नजर आने लगती है।
इसमें कोई शक नहीं कि नाटक में लगातार पेश आने वाली अलग-अलग स्थितियां और कई तरह के किरदार दर्शकों को काफी ठोस ढंग से बांधे रखने वाले हैं। खास बात यह कि इतने यथार्थवादी नाटक के सेट डिजाइन का आधा हिस्सा किसी संस्थापन के जैसा प्रयोगवादी है। पीछे की ओर जहाँ घर का दरवाजा खुलता है, वहां दीवार के नाम पर तिकोने वेधशाला जैसे कट्स हैं। इनके आड़े तिरछेपन में किसी कलाकृति जैसा आकर्षण है। लिटिल थेस्पियन ग्रुप की यह प्रस्तुति अगर आलेख की यथार्थवादी नाटकीयता को थोड़ा अधिक ठोस तरह से बरत पाती तो कहीं और बेहतर होती।     
अग्निपथ
बुधवार को हुई बी. जयश्री निर्देशित प्रस्तुति अग्निपथ एक आकर्षक दृश्य-श्रव्य संयोजन थी। नाटक की थीम महाभारत के कुछ अहम स्त्री-किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। अंबा, गांधारी, कुंती, माद्री, द्रौपदी आदि पात्रों के अंतर को एक नई रोशनी में देखा गया है।  पुरुष समाज के अहं के बरक्स इसमें स्त्री-संवेदना को प्रकट किया गया है। निर्देशिका ने इसमें उत्तरी कर्नाटक की लोक नाट्य शैली गोंदालिगा का इस्तेमाल किया है। प्रस्तुति में इस मुख्यतः गायन-वाचन शैली में यक्षगान की भंगिमाओं को भी शामिल किया गया है। मंच की भव्यता के कई आयाम हैं। वेशभूषा, संगीत, पात्रों की ऊर्जा और अभिनय। भाषा समझ में न आने पर भी पात्रों के आक्रोश और दुख को इसमें समझा जा सकता है। मैसूर के नटना थिएटर ग्रुप की इस कन्नड़ प्रस्तुति की निर्देशिका बी. जयश्री अपनी रंगमंचीय उपलब्धियों के लिए इन दिनों राज्यसभा की नामित सदस्य हैं।

अंजी का मुहावरा

विजय तेंदुलकर के नाटक अंजी का मुहावरा खासा दिलचस्प है। इसमें स्वांग या प्रहसन के तौर-तरीकों को एक युक्ति के रूप में इस्तेमाल किया गया है। तेंदुलकर इसमें बैकस्टेज के सारे तामझाम को मंच के औपचारिक स्पेस में ले आए हैं। नाटक का सूत्रधार उसकी पूरी कथावस्तु का संचालक है। वह मंच पर एक ओर को हारमोनियम वाले के बराबर में तबले पर बैठा है। ट्रेन के दृश्य में वह भिखारी, चायवाले, हिजड़े आदि के किरदार निभा कर पुनः अपनी जगह आ बैठता है और यदा-कदा नाटक की मुख्य पात्र अंजी दीदी से उसके हालचाल भी पूछ लेता है। दरवाजे पर दी गई किसी दस्तक को वह तबले की थाप के जरिए मुकम्मल बनाता है। नायिका कोई पता ढूंढ़ रही है। सूत्रधार जल्दी से मंच के एक कोने में रखी दरवाजे वाली चौखट लाकर बीच में रख देता है और उसके दूसरी ओर जाकर घर में रहने वाला दुबेजी बन जाता है। नायिका की खटखट पर उससे दरवाजा नहीं खुल रहा। तब वह नायिका को थोड़ा रुकने को कहता है क्योंकि दरवाजा उसने उल्टा रख दिया है। फिर दरवाजे को सीधा करने पर दुबेजी के रूप में प्रकट होकर बताता है कि तिवारी जी का मकान थोड़ा आगे है। और जल्दी से दरवाजा थोड़ा आगे वाली जगह रख कर दुबेजी से तिवारीजी बन जाता है।
नाटक की नायिका सत्तर के दशक के मध्यवर्ग की नौकरीपेशा है। उसकी कुंडली में कोई ऐसा दुष्ट योग है कि 29 साल की उम्र में भी उसकी शादी नहीं हुई है। इसी क्रम में उसके घर और दफ्तर का माहौलउसकी मोहब्बत की ख्वाहिशउसके मध्यवर्गीय डर और आशंकाएं आदि एक परिहासपूर्ण ढंग से सामने आते हैं। नायिका के दफ्तर का छिछोरा प्रभुदयाल उससे किस थ्री फिल्म की चर्चा करता हैतब नायिका को याद आता है कि एक बार दद्दा के साथ फिल्म कण कण में भगवान देखने के वक्त उसने कैसा महसूस किया था। बहरहाल,प्रभुदयाल के छिछोरेपन को देखते हुए सूत्रधार को कहना पड़ता है- प्रभुदयालजीआप बाहर जाइए!’ प्रभुदयाल- क्यों जाऊंएंट्री मेरी थी। सूत्रधार- लेकिन किसी लड़की को आप तंग करेंयह कहां की बात है?’ प्रभुदयाल- मैं नाटक का किरदार हूं। सूत्रधार- यह नाटक किसका है?’ प्रभुदयाल- दर्शक का। सूत्रधार- और?’ प्रभुदयाल- क्रिटिक का। सूत्रधार- और?’ प्रभुदयाल-नाटककार का।  
स्थितियाँ कुछ ऐसी हैं मानो यथार्थ के दानों को प्रहसन के धागे में पिरो दिया गया हो। आशंकित नायिका का नायक घर आ गया है। उसने एक हाथ पीठ के पीछे छुपाया हुआ है। सतर्क नायिका उसे हाथ आगे करने को कहती है। थोड़ी ना-नुकुर के बाद वह हाथ आगे करता है तो उसमें चाकू है। तब नायक काफी आह्वाननुमा ढंग से कबूल करता है कि वह गलत सोहबत में पड़ गया था, गलत रास्ते पर भटक गया था। फिर दोनों ताली बजा-बजाकर नर्सरी राइम नुमा कुछ गाते हैं।

डेढ़ साल पहले दिवंगत हुए दिनेश ठाकुर निर्देशित यह नाटक उनकी संस्था अंक की एक लोकप्रिय प्रस्तुति रही है। एक बार पहले देहरादून में जब इसे देखा था तो दिनेश ठाकुर खुद सूत्रधार की भूमिका में थे। अब यह भूमिका उनके जैसी ही कद-काठी वाले मुकुल नाग के जिम्मे हैं। मुकुल नाग ने प्रस्तुति के अनौपचारिक मुहावरे में एक मौके पर उसी मिजाज का एक दिलचस्प इंप्रोवाइजेशन भी किया। कुछ दर्शकों के शिकायत करने पर कि हारमोनियम और तबले के स्वरों में उन्हें संवाद नहीं सुनाई दे रहे हैं, उन्होंने तकनीकी पक्ष से जुड़े लोगों से माइक का वाल्यूम कम करने की पुकार लगाई, और फिर अभिनेताओं से दृश्य को रिवाइंड करने के लिए कहकर इस कुछ क्षणों के व्यवधान को भी मानो दृश्य का हिस्सा बना दिया।

अंजी में रंग-निर्देशों के चलन को मानो मरोड़ दिया गया है। उसका नाटकीय खिलंदड़ापन तमाम तरह की रिवायतों और रूढ़ियों को तोड़ने के जरिए आकार लेता है। चाहे वे शिल्प की रूढ़ियां हों या यथार्थ और उसके प्रति धारणाओं की। दद्दा अंजी को लिपस्टिक लगाते देखकर तंज करते हैं- आज लिपस्टिक चुपड़ो, कल सिगरेट और शराब पीना। ये जीवन के बंधे-बंधाएपन से निकाली गई बहुत-सी छवियां हैं। नाटक एक मसखरेपन में इन छवियों की ओर ताकता हुआ मालूम देता है। मुख्य भूमिका में प्रीता माथुर ने इन्हें काफी अच्छी तरह आकार दिया है। अन्य भूमिकाओं में अमन गुप्ता, अतुल माथुर, शंकर अय्यर और मधु श्रीवास्तव ने भी।

कच्चेपन के भावबोध की प्रस्तुति

ताऊस चमन का अर्थ है मोर का बगीचा। रंगकर्मी अतुल तिवारी की प्रस्तुति ताऊस चमन की मैना उर्दू कथाकार नैयर मसूद की एक कहानी पर आधारित हैजिसमें नानी-दादी की कहानियों की तरह छोटी-छोटी बातों के बड़े-बड़े विस्तार और वैसी ही भोली सरलता है। इन्हीं सब के जरिए एक छोटी सी कथावस्तु करीब सवा दो घंटे के विस्तार में पसरी हुई है। प्रस्तुति में तीन कैदियों में से एक कालेखां अपनी कहानी सुना रहा है। उसकी सबका खयाल रखने वाली सुखन बीवी अचानक एक रोज दौरा पड़कर गिर जाने से मर जाती है। बेहाल यहां-वहां भटकते कालेखां को राजा के बनवाए ताऊस चमन में नौकरी मिल जाती है। उसकी बेटी को पहाड़ी मैना चाहिए। एक रोज वह वहां से पहाड़ी मैना को चोरी से घर ले जाता है। यही चोरी बाद में उसके जी का जंजाल बन जाती है। नाटक में थोड़ा सा इतिहास भी है। कहानी का राजा वाजिद अली शाह है और ताऊस चमन लखनऊ के कैसर बाग में स्थित बताया गया है। प्रस्तुति में इतिहास के साथ थोड़ी ज्यादती भी है, क्योंकि उसमें ब्रिटिश रेजीडेंट को जोकर और राजा को न्याय और दयालुता की प्रतिमूर्ति की तरह दिखाया गया है। फिर भी प्रस्तुति ऐसी चित्रकथा नुमा है कि देखनेवाले को ऐसी नुक्ताचीनी ज्यादती लग सकती है। प्रस्तुति में तीन तोते बने पात्र तीलियों का एक मुखौटा पहने और कथकली की तरह एक चादर पकड़े उसके पीछे खड़े हैं। उनकी बनावट में कहीं तोतापना नहीं है, पर जब वे रटंतू तरह से बातों को दोहराते हैं तो उनका तोता होना स्पष्ट होता है। इसी तरह कालेखां की बीवी की मौत पर मातमपुर्सी का एक लंबा दृश्य है। पंगत में कई लोग बैठे हैं और एक पात्र बीच में बैठी गा-गाकर सोगवार है। पूरी प्रस्तुति के दौरान प्रायः सभी पात्र एक जैसे सफेद रंग के कपड़े पहने हैं। यह सारा तामझाम कुछ ऐसा है मानो किसी खास शैली में दिखाया जा रहा कोई किस्सा हो। कथावस्तु इसमें चाहे जितनी भी धींमी और सरल हो, पर धीरे-धीरे एक माहौल बनता जाता है। इस माहौल में अभिव्यक्तियों की एक पद्धति है। कालेखां की बात सुनकर दारोगा की च्च च्च और अरे अरे में सहानुभूति के लक्षण काफी रवायती और सुनिश्चित हैं। इसी तरह दुखी पात्र इसमें काफी टकसाली ढंग का दुखी है, और मददगार भी ठेठ उसी ढंग का। विशाल पिंजरे के तमाम पंछियों के लिए अलग-अलग गतियां निश्चित हैं। इनकी वेशभूषा में मोर या मैना जैसा कुछ भी नहीं है, पर उनकी निर्धारित देहगतियों की बार-बार की अभिव्यक्ति में काफी सटीक अनुशासन है। निर्देशक ने इस सारी डिटेलिंग को काफी इत्मीनान से एक संगीत संयोजन के साथ अंजाम दिया है। यह वाकई काफी दिलचस्प है कि अयथार्थवादी अवयवों से इसमें बात का एक वातावरण बनाया गया है, जिसमें मुर्गों की लड़ाइयां दस्ताना-मुर्गों से लड़ी जाती हैं।
प्रस्तुति के सभी पात्र काफी सहज हैं और यही उसकी विशेषता बन गई है। फलकआरा और फलकमैना बनी दोनों छोटी लड़कियां- वियांसा वर्मा और अफसाना अहमद- की इस दृष्टि से तारीफ करनी होगी। शायद कुल प्रस्तुति की सबसे बड़ी बात ही यह है कि उसमें कच्चेपन के भावबोध को आकार दिया जा सका है। वह भावबोध जो एक तरह की मासूमियत के भीतर रहता है और धीरे-धीरे जिंदगियों से दूर होता जा रहा एक पहलू है।
रेजीडेंट और उसकी बीवी का प्रसंग प्रस्तुति में एक फिलर जैसा लगने के बावजूद दृश्य के तौर पर अच्छा लगता है। इसी तरह पिंजरे के इर्द-गिर्द से होता हुआ वाजिद अली शाह का प्रवेश भी एक काफी मौलिक दृश्य संरचना है। इस भूमिका में देवीना मेद्दा की खुशनुमा मुद्रा पूरे माहौल को ही थोड़ा खुशनुमा बना देती है।