Saturday, November 30, 2013

जन्नत में जम्हूरियत का घपला

अरसे बाद मुश्ताक काक ने दिल्ली में कोई प्रस्तुति की है। श्रीराम सेंटर रंगमंडल के लिए व्यंग्यकार शंकर पुणतांबेकर की रचना पर आधारित उनकी प्रस्तुति डेमोक्रेसी इन हेवनअच्छी-खासी रोचक है। एक नेता अपनी एक असिस्टेंट और चमचे के साथ एक रोड एक्सीडेंट में मारा जाता है। तीनों यमराज के दरबार में और फिर वहां कुछ घपला करके स्वर्ग पहुंच जाते हैं। इस तरह स्वर्ग के सात्विक माहौल में इन तीन घपलेबाजों की उपस्थिति और भावभंगिमाओं का सिलसिला देखने लायक है। अपनी फितरत के मारे तीनों अली, बली, कली में से कली अदा फेंककर कहती है- फिक्र मत करो सर, मैं चित्रगुप्त को ऐसा कांटा लगाऊंगी कि... उधर ऐंठा हुआ नेता अपनी आदत के अनुसार आरोप लगा रहा है कि यमराज कायर है, उसने पीछे से मारा। तीसरा चमचा बली है, जो नेता द्वारा अपना कान उमेठे जाते ही हांक लगाने लगता है- ओए चाबी बनवा लो, ताले बनवा लो।
हिंदी-व्यंग में पारलौकिक दुनिया में जा पहुंचने की फंतासी का इस्तेमाल खूब हुआ है। थिएटर को स्थिति-वैचित्र्य का यह कंट्रास्ट खूब रास भी आता है। हरिशंकर परसाई के इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर से लेकर रेवतीशरण शर्मा की परमात्मा तक एक लंबी श्रृंखला है। मंच पर भगवान जी का लिबास पहले पात्रों की हकीकत के पात्रों से मुठभेड़ की दृश्यात्मकता में एक आसानी होती है। लेकिन यह दृश्यात्मकता अब एक रूढ़ि भी बन चुकी है। अपनी प्रस्तुति में मुश्ताक काक टाइम और स्पेस की अपनी समझ से इस रूढ़ि से निजात पाते हैं। नाटक के नेताजी मरने के बाद भी अपने वीआईपी रुतबे के नशे में हैं। उनके दोनों असिस्टेंटों द्वारा उन्हें बताए जाने पर कि वे मर चुके हैं वे झांक कर पृथ्वी पर देखते हैं और उनकी हवाइयाँ उड़ने लगती हैं। शुरू का एक्सीडेंट का दृश्य इस लिहाज से अच्छे से तैयार किया गया है। बली कार चला रहा है, और नेता अली और कली किसी कार्टून फिल्म की तरह होंठों को गोल किए किस की मुद्रा में हिला रहे हैं। तभी ब्लैक आउट होता है और क्षणभर बाद रोशनी के आने पर तीनों अलग-अलग जगह जमीन पर गिरे पड़े हैं। मंच पर कुछेक ऊंचे-नीचे प्लेटफॉर्म और छत से लटकती चंद पट्टियां ही उसकी कुल सज्जा, जिसपर तीनों पात्र यमलोक से स्वर्ग की यात्रा के दौरान नदी, बस्तियाँ वगैरह पार करते हैं; जिस सफर में उन्हें तुलसीदास से लेकर नेहरू जी और बापू तक मिलते हैं।
चरित्रांकन के लिहाज से निर्देशक ने जो भी मेहनत की है, उसपर पूरी तरह अपने को खरा साबित किया है—श्रीराम रंगमंडल के पुराने अभिनेता श्रीकांत ने। नेता की भूमिका में उन्होंने अपनी सौ फीसदी प्रतिभा का इस्तेमाल किया है। नेता मुश्किल से ही कातर होता है, और उसकी ऐंठे हुई बेमुरव्वती की क्या रंगतें हैं! एक मौके पर भयानक गुस्से में उबल रहा वह कहता है- प्रचंड गालियाँ देने का मन हो रहा है, और फिर गाली-वमन के जरिए खुद को हल्का करने के लिए उसे पार्श्व में जाना पड़ता है। श्रीकांत यूं तो हर प्रस्तुति में ही अच्छा अभिनय करते हैं, पर इस बार उन्होंने पात्र के मूड को जिस खांटी कॉमिक रंगतों में पकड़ा है, वह बेजोड़ है। इसी क्रम में कुछ स्थितियाँ प्रस्तुति में अच्छी-खासी रंजक हैं। एक दृश्य में अन्यथा चमचा टाइप सेवक बली नेताजी की हरकतों से आजिज आकर उन्हें सड़कछाप गाली दे बैठता है। एक अन्य दृश्य में वह उन्हें कंधे पर लादे हुए है। इसी तरह एक मौके पर नाटक की एक पात्र गंगा मैया बिसलेरी पी रही है; और कली के झांसे में आए चित्रगुप्त राय जाहिर करते हैं कि धरती की ललनाओं के आगे स्वर्ग की अप्सराएं फेल हैं. उधर नेता को भी देवताओं के रहन-सहन को देखकर हैरानी है। वह कहता है- देवता तो मंदिर में रहते हैं. वो भी छोटे से आले में। बाकी जगह में तो पुजारी रहता है।
बली बने थोड़े भारी शरीर के अतुल जस्सी भी एक सहज अभिनेता हैं। मनोरम-शांत स्वर्ग में जम्बूद्वीप भारत नुमा लोकतंत्र का बिगुल फूंक दिए जाने के बाद वह पंजाबी लहजे में दिलचस्प भाषण देता है। ऐसे ही एक भाषण में नेता कहता है- लोकतंत्र के महानायक गब्बर सिंह ने कहा है- जो डर गया वो मर गया, वंदे लोकतंत्र!’
कुल मिलाकर अपनी निर्देशकीय अवधारणा, सुमन कुमार के नाट्यालेख, राजेश सिंह के संगीत संयोजन, और मुख्य तीनों पात्रों में- श्रीकांत मिश्रा, अतुल जस्सी और श्रुति मिश्रा के अभिनय में यह एक खासी दिलचस्प और रोचक प्रस्तुति है।

Tuesday, November 12, 2013

अनर्थ के जंगल में

रंगकर्मी हनु यादव एमेच्योर साधनों में गुरुगंभीर विषयों को मंच पर पेश करते रहे हैं। बीते दिनों उन्होंने वेटिंग फ़ॉर गोदो का मंचन किया। उनके काम और रंग-ढंग में एक बोहेमियन आत्मविश्वास बहुत साफ झलकता है। शायद इसी की बदौलत वे अपनी निपुणता को कई तरह की लापरवाहियों में गर्क किया करते हैं। वेटिंग फॉर गोदो की इस प्रस्तुति में जाने क्यों उन्होंने बैकड्राप के परदे को पूरी तरह हटवा दिया था। इससे ग्रीनरूम की तरफ खुलने वाले दरवाजे से आ रही रोशनियां और बैकस्टेज का नजारा गँवारू ढंग से मंच पर घुसपैठ किए हुए था। इस खीझ पैदा करने वाले मंजर में जब नाटक शुरू होता है तो गोगो या डीडी में से कोई एक आवश्यकता से कहीं बहुत देर तक अपना जूता उतारा करता है। इस तरह कुछ न किए जा सकने की व्यर्थता को दर्शाने वाली स्थिति एक चालू किस्म की नाटकीय युक्ति में तब्दील हुई रहती है। प्रस्तुति देखते हुए लगता नहीं कि उसके अभिनेताओं ने नाटक की मंशा को आत्मसात करने की कोई चेष्टा की है- इस वजह से उनके द्वारा बोले जा रहे संवाद स्थितियों के मंतव्य को सामने लाने के बजाय अक्सर प्रलाप जैसी शक्ल में नाटक की एब्सर्डिटी को एब्स्ट्रैक्ट में तब्दील करते मालूम देते हैं। यानी मंच पर निरंतर कुछ न कुछ किया तो जा रहा हैपर उससे निकलकर कुछ नहीं आ रहा।
यूं गोदो कुछ न निकलकर आने का ही नाटक है। उसके दोनों पात्र तरह-तरह से अपना समय काट रहे हैं। इसके लिए वे सोनेबहस करनेगाना गाने या आत्महत्या के बारे में सोचने जैसे कई काम करते हैं। इस तरह कहीं कुछ न हो रहे होने के व्यर्थताबोध के साथ मंच पर उपस्थित उन दोनों के संवाद पहले ही पर्याप्त बेतुके से लगते हैं। इस बेतुकेपन की सही से सम्हाल न करने पर उसका गड्डमड्ड होना लाजिम है। गोगो अपने हैट में झांकता हैडीडी अपने जूते में- पर कहीं कुछ नहीं है। फिर वे पोजो और उसके नौकर से मुलाकात के जरिए एक सामाजिकता में प्रवेश करते हैं। वह भी उतनी ही ऊटपटांग है। नौकर लकी हर समय बहुत सा सामान बैल की तरह अपने कंधे पर लटकाए खड़ा हैऔर हद दर्जे के गुलाम की तरह अपने मालिक के तमाम नाजायज आदेशों को पूरी तत्परता से पूरा कर रहा है। यहां तक कि थकान में उसके स्नायु जवाब देने लगते हैंतब भी। फिर वह इन बीच राह में मिले मेहमानों को खुश करने के लिए नाचता और सोचता भी है।
वेटिंग फॉर गोदो में एक तात्विक आशय बगैर गूढ़ हुए दिलचस्प नाटकीय ढंग से प्रस्तुत होता है। इधर हिंदी थिएटर में एब्सर्ड शैली को आशयहीनता में डिजाइन के (प्रायः) ऊटपटांग प्रयोग करने की तरकीब मान लिया गया है। जैसे कि सत्तर के दशक में यह बौद्धिकता के प्रदर्शन का एक जुमला होता था, जिसका बीएम शाह ने तब अपने नाटक त्रिशंकु में उसी जुमलेबाजी के ढंग से मजाक उड़ाया था। लेकिन हनु यादव की प्रस्तुति की समस्या ऐसी कुछ नहीं हैं। उसकी समस्या असामंजस्य से पैदा हुई है। उनके पात्र चरित्रों की स्टाइल में जाने के बजाय उन्हें कुछ अधिक नाटकीय बनाने की चेष्टा करते दिखते हैं। इस क्रम में संवादों की परस्परता में एक आवश्यक सामंजस्य या तादात्म्य जिस अर्थ का निर्माण करता है वह प्रस्तुति में अपनी धुरी से खिसका हुआ है। उधर निर्देशकीय में वेटिंग फॉर गोदो को हमारे समाज की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थिति की बड़ी खूबसूरती से उजागर करने वाला बताया गया है। साथ ही निर्देशक ने यह भी कहा है कि प्रयोग के नाम पर दर्शकों के सामने कुछ भी ऊटपटांग करना उचित नहीं है। कहा जा सकता है कि अर्थहीनता एक जंगल है, जहां अनर्थ के जंगल की तुलना में कहीं ज्यादा रोशनी आती है। यह एक अभिनय कार्यशाला प्रस्तुति थी, जिसमें पात्रों की ऊर्जा यकीनन काफी दुरुस्त थी। आनंद पांडेय और अतुल ध्यानी जैसे युवा अभिनेताओं के साथ ही पोजो की भूमिका में कैलाश चंद जैसे कहीं प्रौढ़ वय के अभिनेता में भी इस ऊर्जा को देखा जा सकता था। लकी मंच पर दो थे। मुख्य लकी की भूमिका में राहुल सागर ठीक थे, हालाँकि उनका नाच उतना ऊटपटांग नहीं था जितना उसे होना चाहिए था.