Saturday, June 22, 2013

युद्ध के विरोध में ब्रह्मचर्य

वरिष्ठ नाट्य निर्देशक वामन केंद्रे लिखित और निर्देशित प्रस्तुति नो सेक्स प्लीज एक काल्पनिक कथावस्तु पर आधारित प्रहसन है। एक राजा है जो युद्ध का प्रणेता है। दर्शक शुरू के दृश्यों में उसके द्वारा लड़े गए युद्धों पर उसका हास्यजनक संभाषण सुनते हैं, जिसमें वह हर चौराहे पर युद्ध देवता के पुतले खड़े कर देने का आह्वान करता है और अपने सैनिकों से कहता है- घाव तुम झेलोगे, वेदना हम झेलेंगे; खून तुम्हारा निकलेगा, आँसू हमारे। लेकिन चूँकि युद्ध हमेशा ही विभीषिका को जन्म देता है, जिसकी शिकार बनती हैं स्त्रियाँ. नगर की स्त्रियाँ तय करती हैं कि अब वे ऐसा नहीं होने देंगी; और संगठित गृहणियाँ और गणिकाएँ मिलकर पुरुषों से कह देती हैं- नो सेक्स प्लीज।
नाटक का कथासूत्र एरिस्टोफेनस के लिखे एक प्राचीन ग्रीक प्रहसन से लिया गया है; ऐसा छोटा  प्रहसन जिसे प्रसिद्ध ग्रीक त्रासदियों के मध्य कॉमिक रिलीफ के तौर पर पेश किया जाता था। इसे पूरी लंबाई के नाटक में तब्दील करते हुए वामन केंद्रे ने दृश्यात्मकता के एक पारंपरिक मुहावरे में आबद्ध किया है. उनके पात्र मंच पर चटक रंग वाले कास्ट्यूम में नजर आते हैं। उनकी देहगतियों में एक लय और लास्य है। इस तरह यह ऐसा शैलीबद्ध दृश्य बनता है जिसे आप एक जैसेपन के बावजूद देर तक देखते रहते हैं। इस दृश्य को अरसे बाद किसी नाटक में दिखाई दिए लाइवसंगीत का ठोस समर्थन प्राप्त है। सीधे-सीधे संवादों को खुद वामन केंद्रे द्वारा ही तैयार इस संगीत के जरिए ऐसी गीतात्मक रंगत दी गई है कि बहना अब तू न आंसू बहाना जैसे पंक्ति एक छोटे-मोटे कोरस में तब्दील हुई रहती है.
बावजूद इसके कि नाटक के कथ्य में कोई ठोस उत्सुकता या वास्तविक द्वंद्व नहीं है, प्रस्तुति दर्शकों को कई तरह की दृश्य योजनाओं के जरिए बाँधे रखती है. निर्देशक कथ्य के एक सीधे-सरल अदना से सिरे को एक झंझावाती आयोजन में बदल देते हैं. शरीर की ख्वाहिश सिर्फ हास्य का विषय नहीं है। हास्य की दो-चार स्थितियों के बाद पुरुष इसे लेकर दबंग हो उठा है- पत्नी को उसकी औकात बता देने पर आमादा। ऐसे में स्त्रियाँ थाली को बेलन से पीट रही हैं; उनकी घंटियों की सामूहिक ध्वनियों ने मंच को घेर लिया है। यह एक समुदाय के गुस्से की रंगमंचीय व्यंजना है; एक हल्की-फुल्की कहानी का ठोस दृश्यात्मक संस्कार है। ठेठ वामन केंद्रे शैली का दृश्य, जहाँ मंच पर हर चीज एक शास्त्रीय अनुशासन में बरती जाती दिखाई देती है। वे लंबे संवाद, जिनमें नैरेटिव का झोल साफ दिखाई देता है, भी पात्रगण पूरे इतमीनान और साफ-सुथरे ढंग से अंजाम दे रहे हैं। पात्रों की यह संलग्नता एक कमजोर दृश्य में ग्लूकोज की तरह का काम करती है।
हालाँकि नाटक के आलेख की कुछ खामियाँ भी प्रस्तुति में साफ दिखाई देती हैं। एक अच्छे प्रहसन के लिहाज से बात के सिरों को ठीक से जोड़ने की कोशिश नहीं की गई है। कई मौकों पर उसमें ऐसा स्वच्छंदतावाद है कि राजा के आदेश देते ही एक आधुनिक यंत्र पर बीसवीं सदी की युद्ध-विभीषिकाएँ दिखाई जाने लगती हैं, वहीं ऐसा सायासपन भी कि उसकी पात्र हम जननी हैं, निर्मिति हमारा धर्म है, भविष्य को उजाड़ होते हम नहीं देख सकतीं जैसा संवाद बोलती हैं। वैसे इस लिहाज से कुछ अच्छी स्थितियाँ भी प्रस्तुति में हैं। एक मौके पर पति को झाँसा देने के लिए सास और बहू मिल गई हैं। पति के अंतरंग होने की हर कोशिश के वक्त दाएँ सिरे पर लेटी सास टेर लगाती है-अरे बेटा, खाना खा लिया क्या या अरे बहू, पानी तो पी ले, आदि। सास के स्वर में नाटकीयता का एक अच्छा लहजा है।
अपनी शैली में यह प्रस्तुति किसी ऑपेरा की तरह है। ऑपेरा में कथानक एक सांगीतिक भावबोध के रूप में व्यक्त होता है। यहाँ भी प्रस्तुति पात्रों की अलग से कोई पहचान नहीं बनाती, बल्कि वे सब एक समूह दृश्य का हिस्सा हैं, जिसे कई विधियों से पर्याप्त चाक्षुष और गीतिमय बनाया गया है। कुछ वर्ष पहले अपनी प्रस्तुति जानेमन से हिंदी रंग-समाज में कीर्ति अर्जित करने वाले वामन केंद्रे की इस प्रस्तुति में भी मंच पर चूक या झोल या दृश्य के अंतराल कम ही दिखते हैं। इस तरह अपनी निरंतरता में वे एक लंबा-सा दृश्य मंच पर खींचते हैं, जिससे बाहर आने के मौके दर्शक के लिए ज्यादा नहीं होते। कुछ मौकों पर लंबे उत्सुकताविहीन संवादों की एकरसता या ढीलेढाले नाटकीय मनोरथ वाली दृश्य संरचना जैसी खामियाँ इस लंबे दृश्य में आसानी से खप जाती हैं।
मुंबई की नाट्य संस्था रंगपीठ की इस बिल्कुल नई हिंदी प्रस्तुति का यह पहला प्रदर्शन था, जिसे संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार समारोह के तहत श्रीराम सेंटर में आयोजित किया गया। रंगमंच के क्षेत्र में इस साल वामन केंद्रे और त्रिपुरारी शर्मा को संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।  

Tuesday, June 11, 2013

जैकुब स्जेला की अमूर्त कहानी

भारत रंग महोत्सव में पिछले साल देखी एक लाजवाब पोलिश प्रस्तुति 'इन द नेम ऑफ
जैकुब स्जेला' की याद आती है। जैकुब स्जेला उन्नीसवीं शताब्दी का किसान
विद्रोही था, जिसने पड़ोसी देश आस्ट्रिया की मदद से पोलैंड के
ताल्लुकेदारों के खिलाफ रक्तरंजित विद्रोह किया था। प्रस्तुति की
निर्देशिका मोनिका स्त्र्जेप्का के मुताबिक आज का पोलिश मध्यवर्ग उसी
जैकुब स्जेला का वंशज है। लेकिन जैसा कि शीर्षक से भी जाहिर है,
प्रस्तुति का उसके किरदार से कोई लेना-देना नहीं है। यह उसके नाम के
बहाने इंप्रेशनिज्म का एक प्रयोग थी। प्रस्तुति में एक अमूर्त सिलसिले
में बहुत सी स्थितियां लगातार घट रही हैं। यह एक बर्फीली जगह का दृश्य
है। पूरे मंच पर 'बर्फ' फैली हुई है। बिजली या टेलीफोन के खंबे लगे हुए
हैं। पीछे की ओर टूटे फर्नीचर वगैरह का कबाड़ पड़ा है। दाहिने सिरे पर एक
कमरा है जो नीचे की ओर धंसा हुआ है। पात्र उसमें जाते ही किसी गहरे की ओर
फिसलने लगते हैं। मंच के दाहिने हिस्से के फैलाव में पड़ा गाढ़े लाल रंग
का परदा है, जो बर्फ की सफेदी में और ज्यादा सुर्ख लगता है। यह घर से
ज्यादा घर के पिछवाड़े जैसी जगह है। बर्फ पर एक सोफा रखा है, और एक मेज।
कोई कहानी नहीं है, लेकिन कहानी के सारे लक्षण हैं : रोना-बिसूरना,
प्यार-झगड़ा, गुस्सा, कलह, भावुकता, आवेग, वगैरह। प्रस्तुति बहुत सारी
यथार्थ और एब्सर्ड स्थितियों को समेटे हुए है। इसमें आकस्मिकता भी है और
ह्यूमर भी। शुरू के दृश्य में एक औरत औंधी बर्फ में नामालूम सी पड़ी है।
उसकी पीठ में बर्फ हटाने वाला पाना धंसा हुआ है। फिर बाद में वह उसी
घुंपे पाने के साथ सामान्य रूप से पात्रों में शामिल हो जाती है। इन
पात्रों में कुछ घर के लोग हैं, कुछ बाहर के। एक पात्र धंसे कमरे से
निकलता है। किसी हाथापाई में उसके मुंह से खून निकला हुआ है। एक दृश्य
में जैकुब पाना लेकर दूसरे पात्र के सीने में भोंक देता है। उसके सीने पर
बेतरह 'खून' उभर आया है। वह निष्टेष्ट गिर पड़ा है। लेकिन कुछ दृश्यों के
बाद वह कमीज उतार कर अपना खून पोंछ लेता है। और बच रहे निशान के बावजूद
स्वस्थ रूप से मंच पर सक्रिय दिखने लगता है। पीछे की ओर स्थितियों के
शीर्षक लिखे हुए दिख रहे हैं। मसलन- 'क्रिसमस ईवनिंग' या 'आत्महत्या की
रात' या यह स्पष्टीकरण कि 'यह दृश्य कुछ लंबा हो रहा है, लेकिन कुलीनों
के पास कुछ ही तर्क हैं, इसलिए वे उन्हें ही दोहरा रहे हैं।' जैकुब खुद
एक चाकू बेचनेवाला है। वह बाकायदे इसका प्रदर्शन करता है। मीट का एक
विशाल टुकड़ा उसने मेज पर रख लिय़ा है। और दो चाकुओं से वह इसे काट-काट कर
बर्फ पर फेंक रहा है। एक मौके पर एक पात्र बेहद तेजी से कुछ बोल रहा है।
वहीं मौजूद लड़की गुस्से में दृश्य के पीछे की ओर जाकर एक मोटा डंडा उठा
लाई है, और गुस्से में पूरे प्रेक्षागृह में घूम-घूम कर किसी को ढूंढ़
रही है। वह इतने गुस्से में है कि पास बैठे दर्शक थोड़ा सतर्क हो उठते
हैं। लड़की के पीछे पीछे पुरुष पात्र भी चला आया है। वह दर्शकों से उनका
पैसा मांग रहा है। कुछ दर्शक उसे कुछ नोट देते हैं। फिर वह वहां बैठे
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छायाकार त्यागराजन से उनका कैमरा मांगता है।
वे कैमरा नहीं देते तो कैमरे का स्टैंड लेकर वह मंच पर चला जाता है। इसके
थोड़ी देर बाद गुस्से वाली लड़की आंसुओं से लबालब भरी आंखों के साथ कोई
कहानी बता रही है। प्रस्तुति में संवाद लगातार बोले जा रहे हैं, लेकिन
अक्सर वे इतने अटपटे और सरपट हैं कि उनके अर्थ पकड़ पाना मुश्किल है,
हालांकि उनमें सांकेतिकता का एक ढांचा अवश्य है। मसलन 'स्मार्ट किसान भी
आखिरकार किसान ही होता है', कि 'वे मुझे जंगल में ले गए और मेरे शरीर को
जला दिया, पर मुझसे पहले वे खिड़कियां और दरवाजे ले गए'। पूरी प्रस्तुति
किसी जटिल पेंटिंग की तरह है, जिसमें बहुत कुछ सर्रियल एक क्रम में घटित
हो रहा है। थिएटर जैसी सामूहिक कला में यह ढांचा निश्चित ही एक दुष्कर
चीज है। इस लिहाज से यह प्रस्तुति अपने प्रभावों में विलक्षण है।
चरित्रांकन से लेकर अपने स्थापत्य तक में यह इतनी शिद्दत लिए है कि तमाम
ऊबड़खाबड़पन के बावजूद दर्शक बंधा बैठा रहता है।

Wednesday, June 5, 2013

कुछ पुराने अनुवाद


मैं भी जिन दिनों...


कुल्यीन कुल्यीयेव

मैं भी जिन दिनों मेरी कच्ची उम्र थी
बेफिक्र गीत गुनगुनाता था बेपरवाह-
अंतहीन खुशियों से भरी है ये जिंदगी
नहीं वजह खेद करें और भरें आह

यूँ ही ताकता था नीले आसमाँ का नूर
झरनों का पानी पिया मैंने कई बार
पपड़ाई रोटी मेरे स्वाद से थी दूर
ताजा रोटी के लिए नहीं था आभार

अब तो मेरे भीतर भी आ गई है समझ-बूझ
छूट चुके रास्तों पर लौटता हूँ बार-बार
अरे कैसी हो सुबह, लेता हूँ रोज पूछ
ओ झरने के निर्मल जल, तुम्हें मेरा नमस्कार

आकाश, हरे खेत और पैड़ी शुभकामना
सुप्रभात, ओ खरीदी हुई हमारी पावरोटी
जानता हूँ कभी-कभी है ये संभावना
हो सकती हो तुम दुर्लभ और बहुत सूखी भी

मैंने समझ-बूझ पाई जीकर ये लंबा जीवन
गरिमा से फिर कहता हूँ शुभकामना
मेरे विवेक की जगह लेगा जिनका यौवन
उन नौजवानों को जो छुएँगे आसमाँ


रसूल हमजातोव


1
गाँव के एक आदमी की बीवी के
आबनूसी बाल थे
दोनों थे बीस के कि बिछड़ गए
उनकी खुशियों में आए युद्ध के ये साल थे

एक नायक की पके हुए बालों वाली विधवा
बैठी हुई रोती है सोचती-सिसकती
आज उसका बेटा हुआ है इतना बड़ा
नहीं उसका बाप था जितना कभी भी

2
क्या फायदा उस हीरे या सोने का
जिसे रखा गया हो मिट्टी में गाड़
या उन चमकते सितारों के होने का
जिनके आगे आ गई हो बादलों की आड़

दोस्त मैं बात को कहूँगा तनिक मुख्तसर
है ये मेरे लिए बिल्कुल सीधी और स्पष्ट
नहीं जिंदगी के कोई मायने, अगर
ठुकराते हो तुम किसी दूसरे के कष्ट