Sunday, January 27, 2013

अनिश्चित और अनायास की लय


लय को अगर क्षणों में तोड़ा जाए तो पेश आने वाले व्यतिक्रमों से भी एक लय बनाई जा सकती है। किसी जमाने में अतियथार्थवाद ने जब यथार्थवाद को उसकी सीमा बताई थी तो शायद उसने यही किया था। पूरी पश्चिमी कला मानो इसी क्षण की दूरबीन से संसार की कैफियत जानने की कोशिश में लगी है। जैसे समय के अनंत भंडार में यह क्षण मौजूद है वैसे ही लोगों के हुजूम में व्यक्ति। सभ्यता के ऊबड़खाबड़ विस्तार में व्यक्ति की हर गति समय से उसके संबंध का सबूत है। बीते दिनों अभिमंच प्रेक्षागृह में हुई पोलिश प्रस्तुतिआफ्टर द बर्ड्स एक कथानक को ऐसी ही बहुत सी गतियों में तब्दील करती है। इस क्रम में शरीर एक स्वयंभू उपकरण हो गया है। इस तरह वह क्षण की वास्तविकता को परखता है। एक लड़की फर्श पर पेट में पैर दिए पड़ी है, दूसरी आकर उसे सीधा करती है। पर पड़ी हुई लड़की किसी रबड़ के बड़े टुकड़े की तरह फिर से वैसे ही मुड़ गई है। प्रस्तुति में पात्रगण बहुत से एकाकी लोगों का समूह नजर आते हैं। वे सहज भाव से शरीर के मुश्किल करतब करते हैं। वे एक कोरस में गाते हुए इधर से उधर जाते हैं। रास्ते में पड़े एक पात्र से बेपरवाह वे चले जा रहे हैं। एक पात्र माइक पकड़े हुए कई तरह के स्वर निकाल रहा है और दूसरे पात्र का शरीर इन स्वरों की लय पर थिरक रहा है। अचानक वह चुप हो जाता है। नाच रहा शरीर हवा में वैसे ही रुक गया है। फिर वह अचानक ऊss बोलता है, शरीर भी उतना ही हिलता है, फिर वे एss बोलता है और शरीर उतना ही जुंबिश करता है। माइक पर स्वर के अवरोह के साथ शरीर की यह जुगलबंदी देखने लायक है। पूरी प्रस्तुति इसी तरह एक अव्यवस्था में मानो लय की युक्तियां तलाश करती है। यह  प्राचीन ग्रीक नाटककार एरिस्टोफेनस के नाटकद बर्ड्स की एक दिलचस्प अभिव्यक्ति है। मंच पर एक मचान है। वहां खड़ी एक पात्र काफी उत्तेजना में कुछ बोलते हुए अपने में ही तल्लीन है। दो बंदे उसे देखते हैं। थोड़ी देर में वह नीचे उतर आई है। उसी तरह तन्मय और उत्तेजित। दर्शकों की ओर मुखातिब वह उत्तेजना में बड़बड़ाते हुए जोर से पैर पटकती है। उसके पीछे खड़े दोनों बंदे पीटे जाते हुए लोगों की तरह डर से कांप रहे हैं। वह फिर पैर पटकती है और वे बिलखने लगते हैं। एक युगल आपस में लिपटा हुए खड़ा है कि अचानक लड़की धड़ाम से गिर पड़ती है। प्रस्तुति में कोरस और एकल गायकी के स्वर भी उसका एक रुचिकर पक्ष हैं। प्रस्तुति कुछ ऐसी है कि हर चीज काफी अनिश्चित और अनायास ढंग से यहां मौजूद है। कई बार किसी स्थिति को बार-बार के दोहराव के जरिए भी खंगाला गया है।
निर्देशकीय वक्तव्य के मुताबिक एरिस्टोफेनस के समय में स्पार्टा से बार-बार के युद्धों की वजह से  पैदा हुए राजनीतिक संकट ने सामाजिक और धार्मिक मूल्यों को काफी कमजोर किया और अलग-अलग गुटों में सत्ता संघर्ष को तेज किया। ऐसे हालात में हमेशा ही कोई मार्गदर्शक सामने आता है जिसके नेतृत्व में आदर्श दुनिया के किसी विचार को पुराने खंडहरों के ऊपर एक अमली जामा पहनाया जा सकता है। इस तरह पराजित और विजित के बीच  लोकप्रिय नारों और गठजोड़ों वगैरह की एक दुनिया बनती है। पराजित और विजय हासिल करने वाली ये दोनों पार्टियां एक-दूसरे के बगैर नहीं रह सकतीं। निर्देशक सवाल करते हैं कि क्या धरती पर स्वर्ग सिर्फ कंटीले तारों की बाड़ से घिरा हुआ होगा? उत्तर कम्युनिस्ट राज्य और वैश्विक आतंकवाद के इस युग में नाटक के खेले जाने के दौरान हम ये प्रश्न सिर्फ एरिस्टोफेनस पर नहीं थोप सकते। उनके मुताबिक यह नाटक इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की एक कोशिश है कि प्राचीन ग्रीक और उनकी संस्कृति के बाद रहा क्या है और हमारे और उनमें क्या है जो सामान्य है। कोरेया और अर्थफुल थिएटर ग्रुपों की यह प्रस्तुति तीन निर्देशकों- जेसिका कोहेन, जिम एन्निस और टोमास्ज रोडोविक्ज- द्वारा तैयार की गई है।

Friday, January 25, 2013

क्लासरूम में कश्मीर


राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की डिप्लोमा प्रस्तुतियों में छात्रगण मंच पर काफी कुछ ठूंस देने की आदत के शिकार हैं। इधर के अरसे में इन प्रस्तुतियों में कोई अवधारणात्मक चमक विरले ही दिखाई देती है,अलबत्ता किसी ऊंचे खयाल की एक भंगिमा जरूर होती है। भारत रंग महोत्सव में हुई प्रस्तुति द कंट्री विदाउट ए पोस्ट आफिस’ भी इसी श्रेणी का एक भावुक उच्छवास है। आगा शाहिद अली की कविता पर आधारित कश्मीर समस्या का एक रंगमंचीय रेटॉरिक। मालूम पड़ता है निर्देशक मुजम्मिल हयात भवानी ने रंगमंचीय डिजाइन का हर देखा-सुना अवयव इसमें पैबस्त कर दिया है। प्रवेश करते ही पूरे प्रेक्षागृह में अंतर्देशीय लिफाफे यहां-वहां बिखरे पड़े हैं। दाएं सिरे पर पोस्ट आफिस में बैठा पोस्टमास्टर दिखाई देता है। फिर बीच के गलियारे से पात्रगण यहां प्रवेश करते हैं। वे प्रायः बुरके और पठानी सूट में हैं और गाते हैं- मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको/ नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको.’ फिर वे राष्ट्रगान गाते हैं। दिलचस्प ढंग से सारे दर्शक भी राष्ट्रगान सुनकर खड़े हो गए हैं। फिर क्लासरूम का दृश्यजहां बिंदी-साड़ी वाली अध्यापिका गाय के बारे में पढ़ाती है। स्थिति बदलती है और एक बम धमाके के बाद छत से लटके बहुत से चौखटेंदरवाजे धड़ाम-धड़ाम की आवाज के साथ मंच पर लटकने लगे हैं। फिर मुस्लिम टोपियां लगाए पात्रक्रिकेट का खेल और एक निर्दोष किशोरमोर्चा लगाए बैठा आर्मीमैन,बम और स्टेनगन और देर तक पीछे की स्क्रीन पर चलते वीडियो कोलाज। वीडियो में आजादी की गुहार लगाते लोगकेकड़ेमगरमच्छ और जाने क्या क्या उभरता है। फिर जंजीरों में जकड़ा एक शख्स बीच के गलियारे से मंच पर जाता है। उसकी जंजीर में एक चाभीएक बैंगनएक पिपरी बंधे हुए हैं। वह मंच पर आकर बोलता है- यह तुम्हारा दर्द हैइसे महसूस करना चाहिए।
ऐसा लगता है कि डिप्लोमा प्रस्तुतियां नितांत डिजाइन और हुनर के प्रयोजन से ही तैयार की जाती हैं। एक क्राफ्ट्समैनशिप या शिल्पकारिताजबकि उनसे रंगमंच की मुकम्मल ट्रेनिंग का निचोड़ होने की अपेक्षा की जाती है। यह प्रस्तुति बिखरे ढंग से और बाहरी साधनों से एक चौंध पैदा करने की कोशिश जरूर करती है, पर रुचिदृष्टिसादगीगहराई और अभिनय जैसी चीजों से आकार लेने वाला कोई स्पष्ट रंग-नजरिया उसमें नहीं दिखता। उस दृष्टि से पिछले साल देखी पापा लादेन’ एक कहीं  बेहतर प्रस्तुति थी,जिसमें कई हास्यपरक छवियां चरित्रांकन और अभिनय की एक निश्चित सूझ में सामने आती हैं। जबकि यह प्रस्तुति कश्मीर समस्या की एक पुरानी थीम को कोलाज की शैली में नए ढंग से दोहराने का काम करती है। हालांकि निर्देशक में चीजों के मिजाज की एक समझ दिखती है। उनके पात्र और गीत संगीत कहीं भी ज्यादा लाउड नहीं हैं और रह-रह कर एक माहौल बनाते हैं। जाहिर है कि निर्देशक मुजम्मिल हयात भवानी की प्रतिभा फुटकर रूप में जिन चीजों को जानती हैउन्हें वे एक तरकीब के रूप में संयोजित करने की कोशिश करते हैं।
कमानी प्रेक्षागृह में हुई चीन की प्रस्तुति द वारसा मेलोडी’ सोवियत नाटककार लियोनिद जोरिन का 1967 में लिखा नाटक है। यह दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात के परिवेश में एक प्रेमकथा है। लेखक ने इसमें ऐतिहासिक मुद्दों की वजह से लोगों के जीवन में आने वाली पीड़ाओं को कहा है। बाद में दुनियाभर की बहुतेरी थिएटर कंपनियों ने इस नाटक के प्रस्तुतियां कीं। आलोचकों ने नैतिकता,समाज और नागरिकों की असल समस्याओं को उठाने के लिए इस नाटक की तारीफ की। यह दो पात्रीय नाटक एक प्रेमी जोड़े के बीस सालों  के भावनात्मक अनुभवों के माध्यम से बहुत कुछ कहता है। प्रस्तुति में युवा से अधेड़ उम्र तक जा पहुंचे दो प्रेमियों की बतकही ही विभिन्न दृश्यों में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ मौजूद है। उनकी खुशी और नाराजगीमान-मनौव्वल और बहस। उनकी चर्चा के बहुतेरे संदर्भ हैंहांलाकि अंग्रेजी सबटाइटल्स के जरिए यह चर्चा बहुत गर्मजोशी पैदा नहीं कर पाती।

Wednesday, January 23, 2013

फेलिनी के किरदार और बकरी


भारत रंग महोत्सव में नवयथार्थवादी दौर के इतालवी फिल्मकार फेदेरिको फेलिनी की फिल्मों के किरदारों और स्थितियों से प्रेरित प्रस्तुति फेलिनीस ड्रीम का प्रदर्शन किया गया। विश्व सिनेमा में फेलिनी एक बिल्कुल अलग शैली और विषयों की रेंज के लिए जाने जाते हैं। फेलिनी का सिनेमा अपने में ही एक पूरा संसार है। इन फिल्मों के दर्शक रहे दर्शकों के लिए निश्चित ही यह प्रस्तुति ज्यादा रुचिकर रही होगी, लेकिन अनभिज्ञ दर्शकों के लिए भी उसमें काफी कुछ था। यह प्रस्तुति क्या है, निर्देशक पिनो दि बुदुओ का यह बयान इसे ज्यादा ठीक से बता पाता है- यह प्रस्तुति अभिनेता की भूमिका और स्टेज पर उसकी उपस्थिति को आधुनिकतम डिजिटल और प्रकाश तकनीक के साथ संयुक्त करती है। मंच के बीचोबीच लटकते धागों से बना एक विशाल परदा है। इसी पर बहुरंगी रोशनियों के आकार विशाल वीडियो प्रोजेक्शन की मदद से फेलिनी की फिल्मों की आभासी भावयोजना बनाते हैं। थोड़ी-थोड़ी देर में अलग-अलग पात्र तरह-तरह के परिधानों में आते हैं। कभी कोई पात्र चेहरे पर रंग पोते है, कभी कोई मुखौटा लगाए हैं। परदे पर कभी इमारतें, कभी विशाल प्रेक्षागृह, कभी झूमरों वाली छत वगैरह उभरते हैं। जाहिर है मंच पर पेश हो रहे अभिनय और इन छायाओं का ताल्लुक उनकी फिल्मों रोम- ओपन सिटीकासानोवा’,  आमार कोर्द और एट एंड हाफ वगैरह से है। इस तरह से दर्शक इटली की उन सर्वाधिक शानदार जगहों, जिन्हें फेलिनी ने अपनी फिल्मों के लिए चुना- रोम, वेनिस, रेमिनी, और सर्कस और समुद्र- वगैरह की सैर करते हैं। अभिनेताओं के साथ दर्शक विभिन्न कालखंडों  से होगर गुजरते हैं, वे इतालवी नवयथार्थवाद के जादुई माहौल की तलाश करते हैं। और ऐसा करते हुए वे फर्क नहीं कर पाते कि क्या यथार्थ है और क्या अतियथार्थ, और क्या रंगमंच है और क्या सिनेमा।
प्रस्तुति इस अर्थ में पर्याप्त कल्पनाशील ढंग से दिलचस्प है कि फेलिनी के यहां की नाटकीयता यहां एक मुकम्मल रंगमंचीय मुहावरे में रूपांतरित हो पाई है। मानो उन फिल्मों को निचोड़कर उनमें से रंगमंच निकाल लिया गया हो। इटली के टिएट्रो पोटलाक ग्रुप की इस प्रस्तुति के लेखक स्टीफानो गेरासी हैं।
इससे पहले युवा रंगकर्मी भूपेश जोशी ने श्रीराम सेंटर एक्टिंग कोर्स के छात्रों के लिए सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के नाटक बकरी का निर्देशन किया। उन्होंने अपेक्षाकृत नए अभिनेताओं की ऊर्जा को अच्छे मूड्स में इस्तेमाल किया है। उन्होंने साबित किया कि एक सीधे-सरल कथानक में दृश्यात्मकता के कितने कोण हो सकते हैं। बकरी हमारे देश के प्रहसन जैसे हो गए यथार्थ का नाटक है। नेता एक गरीब औरत की बकरी को गांधी जी की बकरी की पड़पोती बताकर भेड़ जैसी जनता की आस्था से कमाई करता है। फिर उसी को हलाल करके सारे दावत उड़ाते हैं। मंच पर हट्टे-कट्टे कद के बाहुबली नेता दुर्जन सिंह की बजाहिर खलनायकी देखते ही बनती है। एक आंख को कुछ चढ़ाए हुए वह किसी कार्टून फिल्म के किरदार की मिमिक्री करता हुआ मालूम देता है। भूपेश जोशी ने अपने कलाकारों की सहज प्रतिभाओं के मुताबिक उन्हें भूमिकाएं दी हैं। जैसे कि नटी बनी दोनों लड़कियों के नाच में उनके बदन की लचक क्या खूब एक दृश्य बनती है। इस नाटक की और भी बहुत सी प्रस्तुतियां देखी हैंपर यह शायद उनमें सर्वश्रेष्ठ कही जा सकती है। स्थितियां इसमें उभर कर आती हैं। आम लोगों की वेशभूषा और चरित्रांकन पर ठीक से काम किया गया होने की वजह से उनके कुतर्क और भेड़ियाधसान का एक यथार्थवादी दृश्य बनता है। प्रस्तुति का संगीत पक्ष भी काफी बेहतर था।

Friday, January 18, 2013

संबंध का दूर और पास


इस महीने की 5 तारीख को 15वें भारत रंग महोत्सव की उदघाटन प्रस्तुति के तौर पर कमानी प्रेक्षागृह में महेश एलकुचवार के नाटक आत्मकथा का मंचन किया गया। विनय शर्मा निर्देशित यह कोलकाता के पदातिक ग्रुप की प्रस्तुति थी। इसमें एक लेखक के उलझे हुए संबंधों की मार्फत संबंधों की प्रकृति को समझने की कोशिश की गई है। एक रिश्ते में चाहत का घनत्व दोनों पक्षों में एक जैसा नहीं होता। पर एक मर्यादा या जिम्मेदारी का भाव होता है जिसमें वे निभते रहते हैं। कई बार टूटकर भी निभते रहते हैं। किसी क्षणिक परिस्थिति में बना रिश्ता कई बार विश्वास की गहरी टूट-फूट पैदा करता है जहां हर कोई बेहद असहाय हो जाता है। ऐसी असहाय परिस्थिति में मनुष्य क्या करे? लेखक अनंतराव कहता है- लोग हर पल बदल जाते हैं, इसलिए संबंध भी। हर क्षण नाता जोड़ते रहना चाहिए,क्योंकि इंसान के संबंध से अनित्य कुछ भी नहीं होता। संबंध में हमें दूसरे से एक प्रकाश मिलता है। हालांकि यह प्रकाश भी अनित्य है, लेकिन यही इस जीवन का दारुण सच है।
यह एक अलग किस्म का मंच है- भीतर की ओर संकरा होता हुआ। उसकी दीवारों पर हर फेड आउट के समय पिछले दृश्यों की नेगेटिव प्रिंट जैसी छायाएं उभरती हैं। बिल्कुल अंतिम छोर पर वहां एक दरवाजा है। यह यथार्थवादी मंच नहीं है, लेकिन प्रस्तुति का बाकी ढांचा वैसा ही है। पहले ही दृश्य में मंच के प्रकाशमान होते ही लेखक अनंतराव नपे-तुले शब्दों में गांधी के उभार और तिलक की मृत्यु के राजनीतिक दौर पर गद्यात्मक पंक्तियां बोलता दिखता है। यह उसकी लिखी जा रही आत्मकथा का एक वर्णन है, जिसे टेपरिकॉर्डर पर रिकॉर्ड किया जा रहा है। एक शोध छात्रा उसकी मदद कर रही है। अनंतराव ने एक उपन्यास लिखा है, जिसके पात्र और घटनाओं का उसके जीवन से गहरा ताल्लुक है। उपन्यास की उर्मिला और वसुधा वास्तविक जीवन की सगी बहनें उत्तरा और वासंती हैं। उत्तरा अनंतराव की प्रेमिका और संगिनी रही है। लेकिन कभी उसकी अनुपस्थिति में उसकी बीस साल छोटी, लगभग बेटी जैसी, बहन वासंती से बना अनंतराव का ताल्लुक तीनों की नैतिकता में अलग-अलग तरह से चुभा हुआ है। नाटक में ये सारी स्थितियां रह-रह कर फ्लैशबैक के रूप में घटित होती हैं। और इसी के समांतर घटित होती हैं उपन्यास की मिलती-जुलती स्थितियां। वास्तविकता से ये स्थितियां थोड़ी फर्क हैं। जाहिर है असलियत को बयान करने में लेखक कहीं कतरा गया है। आलोचकों के मुताबिक गहरे उतरकर जीवन की थाह लेने वाला लेखक अनंतराव दरअसल सच्चाई को गोलमोल करता रहा है। शोधछात्रा इसे महसूस करती है और अनंतराव इसे कबूल करता है। वह कहता है- मैंने उर्मिला और वसुधा की कहानी को कितना झूठा बना रखा है। सत्य पर असत्य का मुलम्मा...झूठ की चादर।
नाटक इतना गठे हुए तरीके से लिखा गया है कि शोध छात्रा खुद भी पल-पल बदलते मनुष्य का उदाहरण है। वह अपने हमउम्र प्रेमी को छोड़कर बुजुर्ग अनंतराव से प्रेम करने लगी है। इस प्रेम की तमाम असंगतियों को जानते हुए भी वह अपनी भावना को लेकर निरुपाय है और खुद के प्रति अनंतराव की उदासीनता को लेकर आहत। नाटक शुरू से अंत तक ऐसी ही बहुत से निरुपाय स्थितियों का सिलसिला है। अपने-अपने सच पर एक-दूसरे से जुड़ी नियतियों वाले पात्रों का नाटक।  
नाटक कुछ ऐसा है कि उसे किसी बाहरी सहायता की बहुत आवश्यकता नहीं है। ऐसे में निर्देशक विनय शर्मा की डिजाइनर-कवायद बेवजह उसकी लय में एक खलल डालती है। बेवजह के फेड इन फेड आउट उसे कम से कम बीस मिनट लंबा खींचते हैं। हर थोड़ी देर बाद एक अंधेरा है, जिसमें मंच की दीवारों पर उभरती डिजिटल छायाओं के बीच पात्रगण वहां रखी बेंचों वगैरह को न जाने क्यों इधर से उधर और उधर से इधर किया करते हैं। हालांकि इस व्यवधान से इतर अभिनय का यथार्थवाद प्रस्तुति में काफी बेहतर है। अनंतराव के किरदार की लय को कुलभूषण खरबंदा इतना सटीक आकार देते हैं कि उसमें कहीं एक खरोंच तक दिखाई नहीं देती। एक किरदार जो एक साथ उद्विग्न और आश्वस्त है और जिसका अनुभव सच्चाई की नियति को जानता है। शोध छात्रा की भूमिका में अनुभा फतेहपुरिया भी ऊंचे दर्जे की अभिनेत्री हैं, जिनका भंगिमाओं और स्पीच पर नियंत्रण सहज ही दिखाई देता है। अन्य दोनों भूमिकाओं में चेतना जालान और संचयिता भट्टाचार्जी भी संतुलित थीं।

Thursday, January 10, 2013

मैकबेथ का मुहावरा


पारंपरिक शैलियां कलाकारों से कहती हैं हमें आत्मसात करो। लेकिन बहुत से निर्देशकगण उन्हें ढांचा-मात्र मानने की गलती करते हैं। आधुनिक थिएटर में ऐसी ही एक पारंपरिक शैली के परिष्कार का अच्छा उदाहरण राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति मैकबेथ में देखने को मिला।  रघुवीर सहाय के अनुवाद को निर्देशक केएस राजेंद्रन ने तमिलनाडु की थेरुक्कुटु नाट्य शैली में अस्थायी बनाई गई दर्शकदीर्घा से युक्त अभिमंच प्रेक्षागृह में प्रस्तुत किया। थेरुक्कुटु महज एक नाट्य शैली नहीं है। यह लोगों की भावनाओं,मूल्योंजीवनगत रवैयों से बंधी हैजो इस कला में संगत करने वाली बहुतेरी रस्मों में प्रतिबिंबित होते हैं। कुटु में आए रस्मोरिवाज समुदाय को कला से इस तरह से जोड़ते हैं कि यह शैली लोगों द्वारा महसूस और अनुभूत किए गए यथार्थ की अभिव्यक्ति बन जाती है। थेरुक्कुटु में कथानक पुराकथाओं- विशेषकर महाभारत- से लिए जाते हैं और इसके प्रदर्शन द्रौपदीयम्मन मंदिर में प्रायः मार्च से जुलाई के दरम्यान रात भर होते हैं।’  
लेकिन केएस राजेंद्रन की प्रस्तुति किसी पुराकथा या लोकआख्यान पर आधारित नहीं, बल्किमैकबेथ है। ऐसे में वे आधुनिक शहरी मंच के टाइम और स्पेस के अनुरूप पारंपरिकता के भदेस की छंटाई करते हैं। भदेस सामंजस्य की ज्यादा परवाह नहीं करताऔर उसका रस उसकी स्फूर्त स्वाभाविकता से पैदा होता है। पर राजेंद्रन अपनी प्रस्तुति को ध्वनियों और गतियों के एक चुस्त-तीखे सामंजस्य में निबद्ध करते हैं। पात्रों के कास्ट्यूमरंगभूषा और अतींद्रिय भावभंगिमाएं अपने में एक ही दृश्य बनाते हैं। सिर पर बेंत के रेशों से बना  ताज, आंखों के आसपास की जगह रंगी हुई, चोगे जैसे वस्त्र, एक साथ पड़ती पैरों की थापें और पीछे बैठा संगीत पक्ष। युद्ध के दृश्य में एक पक्ष घोड़े के चेहरे के बड़े से मुखौटे को हाथ में पहने है, दूसरा पक्ष ढाल लिए है। उनकी कोरियोग्राफी देखने लायक है। इसी तरह तीनोंचुड़ैलें दृश्य में नीला दुपट्टा कलाई पर बांधे हुए हैं। दो पात्रों द्वारा पकड़े परदे के पीछे वे दूसरी ओर मुंह किए खड़ी हैं। परदे के आगे उनके खुले बाल अजीब सी वस्तु की तरह दिख हुए हैं। इन दृश्यों में संगीत और गति के समवेत से आकर्षण बनता है। राजेंद्रन दृश्य दर दृश्य इसमें वैविध्य पैदा करते हैं। राजा मैं हूं राजा/ महाबली डंकन गाते हुए तीन कलाकार अपनी एकरूप गतियों से एक दिलचस्प स्थिति बनाते हैं। तुरही या शहनाई जैसा वाद्य, ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा इन गतियों के आरोह-अवरोह में अपने तईं एक इजाफा करते हैं। शेक्सपीयर का नाटक इस आयोजन में एक निमित्त की तरह है। कहानी की लीक यहां उतनी स्पष्टता से नहीं खुलती लेकिन उसका तनाव पात्रों के चेहरों और पूरी संरचना में बिल्कुल साफ हैं। दर्शक देख रहे हैं कि पात्र किसी गहरे द्वंद्व से गुजर रहे हैं। मैकबेथ की मानसिक उठापटक बिल्कुल जाहिर है। स्थिति का छल उसकी विडंबना यहां अभिव्यक्ति के एक बिल्कुल नए मुहावरे में सामने हैं। मानो यह कथावस्तु नहीं उसकी अंतर्वस्तु का विन्यास है। ऐसे में कुछ संवाद अनायास कुछ ज्यादा आशयपूर्ण मालूम देते हैं। राजपुत्र, तेरा चेहरा एक कागज की तरह है, जिसपर लिखे समय के रहस्य पढ़े जा सकते हैं। या मैकबेथ, निर्दयी बन, निर्भय बन, अविचल रह!’ बैंको मारा जा चुका है, पर उसका प्रेत नहीं मारा जा सकता। पीली रोशनी में परदे के पीछे से उसका झक्क सफेद चेहरा धीरे से उभरता है और फिर छिप जाता है। और मैकबेथ की दहशत थोड़ी सी बहकर मानो दर्शकों के भीतर तक चली आई है। एक अन्य दृश्य में चादर पर रोशनी इस तरह पड़ रही है कि उसके पीछे मौजूद लोग अजीब से रहस्यात्मक आकारों में तब्दील हो गए हैं। 
प्रस्तुति में चीजें एक सही अनुपात में नजर आती हैं। दृश्यों का सौंदर्य इसी संयोजन से बनता है। राजेंद्रन रोशनियों, संगीत, भंगिमाओं, नृत्यगतियों आदि के वैविध्य और उनकी सूक्ष्मता को दृश्य और श्रव्य के एक संजीदा संयोजन में पेश करते हैं। एक निर्देशक के बतौर अभिनय-पक्ष पर उनका नियंत्रण हमेशा ही रहा है। उनकी यह प्रस्तुति आधुनिक थिएटर की चुस्ती और पारंपरिकता के लास्य को एक साथ पेश करती है, और इस तरह नाटक मैकबेथ का एक नया संस्कार करती है।  

Monday, January 7, 2013

आओ मिलकर झूठ बोलें


दिल्ली में हुई रेप की घटना पर एक बड़े फिल्म स्टार ने, जिसने कभी पूरी दबंगई से कबूल किया था कि हां मैं शादियों में नाचकर पैसा कमाता हूं, भी शोक प्रकट किया। एक मशहूर हो गए शायर-कवि ने, जिसे एक आप्रवासी पूंजीपति की बेटी की शादी का विवाह-गीत लिखकर पैसा कमाने में गुरेज न हुआ, ने भी अपनी सुघड़ राय प्रकट की। देश के गृहमंत्री ने भी बताया कि मैं तीन बेटियों का बाप हूं और बहुत चिंतित हूं। इस तरह इस घटना के बहाने बहुत से लोगों के मानवीय या नागरिक पक्ष सामने आए। मैं उस प्रसिद्ध खिलाड़ी का बयान भी इस बारे में ढूढ़ता रहा, जिसके रिटायर न होने के अद्वितीय लालच में भी एक महानता निहित बताई जा रही है। पर उसका बयान दिखा नहीं। दुख प्रकट करना एक ऐसा काम है जिसमें किसी का कुछ भी घिसता नहीं है। दुख प्रकट करो और इसके बाद आराम से जैसा चाहो वैसा जीवन जियो। सब जानते हैं कि बलात्कार की न यह पहली खबर है न आखिरी। सब जानते हैं कि मंत्रियों और धनी लोगों की बहू-बेटियों से बलात्कार नहीं हुआ करता। इसलिए उनकी दुख की भंगिमा या तो शालीनता हो सकती है या छद्म। किसी चैनल ने गृहमंत्री या प्रधानमंत्री से यह नहीं पूछा कि भाईसाहब बलात्कार की घटनाएं तो रोज ही बहुत सारी हो रही हैं, आप इस घटना पर ही मात्र बयान क्यों दे रहे हैं; कि आपके गृहमंत्रित्व में ऐसी क्या खोट है कि समाज में दुर्दांत बलात्कारियों की तादाद बढ़ती ही जा रही है; कि जरा यह भी बताएं कि इस देश की जनता से हासिल राजस्व में से जितना पैसा आपकी सुरक्षा, वेतन और सुख-सुविधा के लिए खर्च किया जाता है उसके बदले में आप इस देश को क्या दे रहे हैं। लेकिन तीस हजार करोड़ के विज्ञापन राजस्व से चल रही मीडिया इंडस्ट्री का कोई नुमाइंदा इस सवाल को पूछने में वक्त जाया नहीं करता। वजह है कि इससे पूरी घटना का इमोशन संजीदगी की दिशा में चला जाता है। जबकि उसका काम जल्दी-जल्दी इमोशन को बेचना है।  
कहते हैं दूसरों से झूठ बोलने से ज्यादा बुरा है खुद से झूठ बोलना। इससे इंसान का जमीर मर जाता है। मुझसे एक बार विष्णु खरे ने कहा था कि इस देश का जमीर मर चुका है। इस बात को तेरह-चौदह साल हुए। लगता है कि तब से यह देश बगैर जमीर के ही चल रहा है। कल्याण सिंह ने कहा था कि वे राम मंदिर के लिए अपनी जान भी दे देंगे। फिर उनका अपने धुरविरोधी मुलायम सिंह से ही एका और फिर खटपट हो गई। इससे बहुत लोगों को असमंजस हुआ कि राममंदिर सेकुलरिज्म बनाम सांप्रदायिकता का मुद्दा है या जमीर का। 32 रुपए की गरीबी रेखा वाले देश में प्रधानमंत्री साढ़े सात हजार रुपए की थाली वाला भोज देते हैं, फिर भी लोकतंत्र का जमीर सेकुलरिज्म की वजह से सुरक्षित रहता है। याद आता है कि प्राचीन समय के किसी हिस्से में ऐसा माना जाता था कि स्त्रियों के आत्मा नहीं होती। सोचता हूं, जर्जर आत्माओं के साथ जीने की तुलना में बगैर आत्मा के जीना उस शख्स के लिए शायद ज्यादा बेहतर होता होगा। एक ऑटो वाले ने एक बार मुझे उसी प्राचीन समय से आई एक स्त्री की वास्तविक घटना सुनाई थी।  वह लड़की उसके आटो में नेताजी नगर के लिए बैठी थी। अपने गंतव्य पर पहुंचकर उसने आटो वाले से ठहरने को कहा और वह एक घर पर गई। घर पर ताला बंद था। लौटकर उसने आटो वाले से कहा कि उसके पास बिल्कुल पैसे नहीं हैं और आटो के भाड़े के बदले में वह जो चाहे उसके साथ कर सकता है। आटो वाले का कहना था- भाई साहब मैंने उससे कहा कि देख भई, मेरी बीवी सुबह चार रोटी बांध देती है, दोपहर में कहीं छोले कुल्चे के ठेले पर पांच रुपए के छोले लेकर उनसे ही पेट भरता हूं। इस सब गोरखधंधे की मेरी औकात नहीं है, मुझे तो पैसे चाहिए। तब वह लड़की उसे सरोजिनीनगर ले गई, जहां के एक पनवाड़ी से लेकर उसने उसे पैसे दिये।
कुछ मीडिया संस्थानों में बलात्कार शब्द के इस्तेमाल पर पाबंदी रही है। उसकी जगह दुष्कर्म शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन इधर इस घटना के बाद से छोटी-छोटी बच्चियांवी वांट टु बी सेफ, नॉट बी रेप्ड जैसे नारों की तख्तियां उठाए कैंडिल मार्च में शामिल दिख रही हैं। ऐसी दुर्दांत घटनाओं के बाद यह कौन कहे कि उनकी मासूमियत और जीवन की गरिमा का यह थोड़ा सा और क्षय है।  
लड़कियोयाद रखोगरीब लोग तेजी से साइको बनते जा रहे हैं और अमीर लोग निरंकुश। और समझो कि कानून एक भ्रामक चीज है। ऐसे में किसी पर भरोसा मत करो। हमेशा इतनी चौकन्नी और मुस्तैद रहो कि कवि लोग तुममें कोई मासूमियत ढूंढ़ने को तरस जाएं। सरकार से कोई उम्मीद मत रखोकिसी भी रिश्ते को पवित्र न समझो। संदेह को जीवन का सूत्र बनाओ। इस तरह तुम खुद को बचाओगीपर अपने भीतर क्या बचाओगीलगता है कि एक टूटी-फूटी गरिमा और अविश्वास की पोटली ही तुम्हारा प्राप्य है। आओ इसी पोटली के साथ इस असुरक्षा से भरे  मुल्क में हम खुद के बचे रहने के सुख को महसूस करें। इस खुशी का अहसास करें कि मनुष्यों के इस विशाल जंगल में हम किसी के कष्ट की वजह नहीं बने।

Saturday, January 5, 2013

कव्वाली के इतिहास पर नाटक


पिछले सप्ताह दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में नाट्य प्रस्तुतित लश्कर-ए-कव्वाली देखने को मिली। युवा रंगकर्मी दानिश इकबाल के निर्देशन में यह कव्वाली के इतिहास पर एक डाकुड्रामा थी। मंच पर कव्वाली स्वयं एक नायिका के रूप में बीच-बीच में आकर अपने बारे में बताती है। इसके अलावा और बहुत कुछ बताने के लिए एक बुजुर्ग फकीर है। कुछ कव्वालों और कव्वाली की तारीख के सादिया देहलवी जैसे जानकारों के इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग के टुकड़े भी हैं। और इस सबको एक नाटकीय रोचकता से जोड़े रखने के लिए मंच पर एक जमाल और कमाल हैं। प्रस्तुति के आलेखकार विजय सिंह ने इस पूरे सिलसिले का एक अच्छी तरतीब में संयोजन किया है।
कव्वाली कहती है- मेरा जन्म हुआ उस अस्ल सच्चाई को जानने के लिए। सबसे बड़ी सच्चाई अनहद का दीदार करना है। इसके लिए तालिबे इल्म होने से पहले तालिबे इश्क हो जाओ। बुजुर्ग फकीर कहता है- कव्वाली की तारीख में जाते हुए बहस में मत पड़ना बेटेपर बहसबाज जमाल और कमाल अपनी खुर्दबीनी से कहां बाज आने वाले। दाढ़ी सहलाते हुए कमाल सवाल करता है- ये सूफी को सूफी क्यों कहते हैं।
इस तरह तारीख की बाकायदगी के बीच इस छोटी-मोटी चुहुल से होते हुए बात आगे बढ़ती है। बताया जाता है कि पैगंबर साहब के भी आने के पहले कव्वाली अस्तित्व में आ चुकी थी। शुरू में सूफियों ने अम्न और सच्चाई का पैगाम पहुंचाने के लिए मौसिकी और समा का सहारा लिया। कि दुनिया में पौने दो सौ से भी ज्यादा सूफी संप्रदाय हैं। छह सूफी सिलसिलों में से चिश्तिया और कादरी सिलसिलों में कव्वाली की रवायत रही है, पर नक्शबंदी सिलसिले ने कव्वाली को नाजायज, यहां तक कि हराम माना। शुरू में फारसी कव्वाली गाने वालों ने बाद में यहां की भाषा को अपनाना शुरू किया। अमीर खुसरो बाबा फरीद आदि का अहम योगदान रहा। यह अमीर खुसरो ही थे जिन्होंने यहां की ढोलक को दो हिस्सों में कर तबले की ईजाद की। और महबूबे इलाही हजरत निजामुद्दीन औलिया को कव्वाली से बहुत मोहब्बत थी। उन सूफियों ने कहा- तुम सच और झूठ के चक्कर में मत पड़ो. उस एक के  सिवाय बाकी सब झूठ है, इसलिए सारे सवालों को तर्क कर दो। लेकिन वक्त के साथ कव्वाली की सूरत भी बदली। अब इबादत की जगह मर्द और औरत पर छींटाकशी की जाने लगी। कुछ मशहूर सिनेमाई कव्वालियों के अंश पीछे के परदे उभर आए हैं। ये इश्क इश्क है इश्क इश्क...। नायिका कव्वाली कहती है- मैं अपना अक्स देखती हूं तो खुद को पहचान ही नहीं पाती।
प्रस्तुति सिर्फ कव्वाली की तारीख को ही नहीं बताती, बल्कि उसके प्रसंग से देश के इतिहास की कई बातों को भी उठाया गया है। यह इस्लाम का सूफी स्वर ही था जिसने निचली जातियों को उसकी ओर उन्मुख किया। ऐसा ही एक पात्र अपने पुराने धर्म की याद दिलाए जाने पर कहता है- आज जब इन सूफियन ने हमें अपनाया है, तब हमें याद दिला रहे हो कि हमारा धर्म क्या है। इस इतिहास के जिक्र से जुड़े बहुत से पात्र छोटे-छोटे दृश्यों में रह-रह कर प्रस्तुति में दिखाई देते हैं और इस तरह एक दृश्यात्मक वैविध्य प्रस्तुति में बना रहता है।
पीछे के प्लेटफॉर्म पर राजेश कुमार पाठक के साथ प्रस्तुति का संगीत पक्ष बैठा है। दानिश इकबाल की दाद देनी होगी कि उन्होंने एमेच्योर थिएटर के साधनों से यह रुचिकर प्रस्तुति तैयार की है। उदाहरण के लिए विपिन चौधरी जैसी शौकिया अभिनेत्री भी एक शाही घर की स्त्री की भूमिका में पर्याप्त संयत ढंग से प्रस्तुति में शामिल दिखती हैं। गायकों और संगीतकारों ने भी अपने स्वरों में कव्वाली और उससे इतर सूफियानों तानों को बखूबी अंजाम दिया है। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि दिल्ली के रंगमंच में दानिश इकबाल नाम की दो शख्सियतें इन दिनों सक्रिय हैं। एक नाटककार दानिश और दूसरे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक, जिनकी मुख्य पहचान अभिनेता की रही है। इस प्रस्तुति के निर्देशक वही अभिनेता दानिश इकबाल हैं। उनकी प्रस्तुति विषय को बहुत नपेतुले ढंग से नहीं उठाती, बल्कि उसमें बात को सरल तरह से कह देने का भोलापन है, और यही उसकी विशेषता बन गई है। विषय की लय और उसकी तथ्यात्मकता दोनों एक रौ में बंधे हुए पेश होते हैं।     

Thursday, January 3, 2013

टोबा टेकसिंह का पूरा सच


रंगकर्मी राजेश बब्बर के पिता का जन्म बंटवारे से पहले लायलपुर जिले के टोबा टोकसिंह में हुआ था। वही टोबा टेकसिंह जो मंटो की कहानी के सरदार बिशनसिंह का घर था। राजेश बब्बर ने इसी शीर्षक अपनी प्रस्तुति में मंटो की कहानी में अपना एक पूर्वार्ध जोड़ा है, जिसमें बिशनसिंह देश के बंटवारे से पहले घर और खेत का बंटवारा भोगता है, और दरअसल इसी बंटवारे के क्रम में वह पागल हुआ। बंटवारा अपनी जिंदगी में खोए बिशनसिंह के लिए एक व्यवधान की तरह पेश आता है। उसने इसके बारे में कभी सोचा नहीं था। इस तरह यह पूर्वार्ध मूल कहानी को ज्यादा आसान और युक्तिपूर्ण बनाता है। मंटो की कहानी प्रकटतः जितनी नाटकीय जान पड़ती है, मंच पर वह उतनी नाटकीय बन नहीं पाती है। ज्यादातर प्रस्तुतियों में देखा है कि बंटवारे की विडंबना बिशनसिंह के किरदार में एक अतिनाटकीय उपक्रम बनकर रह जाती है। स्टेज के दृश्यात्मक नैरेटिव में बिशनसिंह का पागलपन उस वृहत्तर ट्रैजडी को सामने नहीं ला पाता, जिसका वह खुद एक रूपक है। इस लिहाज से राजेश बब्बर का पूर्वार्ध किरदार की एक लय बनाता है। मंच पर बिशन सिंह पुरानी रौ के एक खांटी चरित्र के तौर पर नजर आता है, जिसे अभिनेता शरण मक्कड़ ने सही मिजाज में समझा है। पागलखाने में बाकी पागलों की चुहुलबाजी के बीच उसका सिर्फ एक ही सवाल होता है- टोबा टेकसिंह कित्थे यां?’.
बिशनसिंह की बेटी प्रस्तुति में सूत्रधार की भूमिका में है। वह मंच के एक छोर पर स्पॉटलाइट में बीच-बीच में कहानी के पूरे सिलसिले को बयान करती है, जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी, स्थितियां खुद में ही स्पष्ट हैं। इसके अलावा प्रस्तुति में इतने ज्यादा फेडआउट और फेडइन हैं कि बार-बार लय को तोड़ते हैं। जाहिर कि प्रस्तुति को कुछ अनावश्यक दृश्यों को हटाकर थोड़ा संपादित किए जाने की जरूरत है। मंच पर प्रॉपर्टी का ज्यादा तामझाम नहीं है। पात्रों की वेशभूषा ही दृश्य का असली तत्त्व है। गांव के दृश्य में पगड़ी कुर्ता-पाजामा या मुसलमानी टोपी वाले किरदार दिखते हैं। पागलखाने का दृश्य अपेक्षाकृत ज्यादा बहुरंगी है। कई तरह के पागलों की हरकतों के जरिए एक रोचकता बुनी गई है। हालांकि ये चालू किस्म के चरित्रांकन में इतने सारे किरदार हैं कि उनकी ठीक से पहचान नहीं बन पाती। जबकि इनपर ठीक से काम किया जाता, तो स्थिति की विडंबना का यह ज्यादा बेहतर विवरण बन सकते थे। दृश्यों को थोड़ा और चुस्त होना चाहिए था। एक दृश्य में पुलिसवाला कुछ इस अंदाज में मौजूद दिखता है मानो लापरवाही में उसकी गलत एंट्री हो गई हो और इंप्रोवाइजेशन के जरिए वह इसे दुरुस्त कर रहा हो। बाद के दृश्य में वही पुलिसवाला एक बड़े पुलिस अधिकारी के रूप में दिखता है। प्रस्तुति इन कुछ चूकों के बावजूद अपने देसीपन में बांधे रखती है। असली बात यह है कि उसका केंद्रीय किरदार बिशनसिंह उसमें वाजिब तरह से मौजूद है।
प्रतिबिंब कला दर्पण की यह प्रस्तुति उसके सालाना नाट्य उत्सव में एलटीजी प्रेक्षागृह में खेली गई। प्रतिबिंब कला दर्पण दिल्ली के उन इक्का-दुक्का थिएटर ग्रुपों में है जो अपने सीमित निजी साधनों के बावजूद इस फेस्टिवल का आयोजन पिछले दो साल से कर रहा है। इसी क्रम में संस्था की ओर से दिए जाने लाइफटाइम एचीवमेंट और युवा रंगकर्मी पुरस्कार क्रमशः वरिष्ठ नाट्य निर्देशक राजिंदरनाथ और रंगमंच के अभिनेता श्रीकांत को दिए गए। प्रस्तुति के दौरान 12 साल की उम्र में टोबा टेकसिंह का अपना घरबार छोड़ने को मजबूर हुए निर्देशक राजेश बब्बर के पिता भी प्रेक्षागृह में मौजूद थे, जिनकी अपनी जन्मभूमि से जुड़ी बहुत सी यादें इस प्रस्तुति के आकार लेने की वजह बनीं।

Tuesday, January 1, 2013

एकालापों से बनता संवाद

वरिष्ठ रंग निर्देशक सुरेश भारद्वाज की प्रस्तुतियां प्रायः एक सादगी लिए होती हैं। उनमें कम पात्र होते हैंलिहाजा अभिनय का स्पेस ज्यादा बन पाता है। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में लाइट डिजाइन के प्रोफेसर हैंऐसे में जाहिर ही प्रकाश योजना दूसरा ऐसा तत्त्व है जिसका गहरा असर उनकी प्रस्तुतियों में महसूस किया जा सकता है। प्रायः वे अपने दृश्य शांत रोशनियों से ही तैयार करते हैं। कहीं कोई शोर शराबा नहीं। मंच पर बोला जा रहा एक-एक शब्द अपनी गहराई और विस्तार में दर्शकों तक संप्रेषित है। अपने ग्रुप आकार कला संगम के जरिए वे अरसे से इसी शैली में काम करते आए हैं। लेकिन इधर के अरसे में उनकी इस शैली में कुछ क्लीशे काफी साफ दिखने लगे हैं। साहित्य कला परिषद के मॉडर्न थिएटर फेस्टिवल में उनकी प्रस्तुति मठ के रास्ते में एक दिन में भी ये दिखते हैं। एक बड़ा क्लीशे यह है कि उनके यहां दृश्य जैसे एक दोहराव में आगे बढ़ता है। वही वही पात्र मानो प्रस्तुति जितने लंबे दृश्य का हिस्सा हों। हो सकता है यह आलेख का दोष हो, पर आखिर उसका चुनाव तो निर्देशक ने ही किया है।
सतीश आलेकर का यह तीन पात्रीय नाटक है। एक कम उम्र युवक किसी मठ की ओर जा रहा है। वह रास्ते में टोपी लगाए मिले एक उम्रदराज शख्स से मठ का रास्ता पूछता है। इस तरह उनमें परिचय होता है। उनकी बातचीत में कोई अनिवार्य सिलसिला नहीं है, बल्कि एक रहस्यात्मकता, थोड़ी असंगति और थोड़ी यथार्थसम्मतता है। एक-दूसरे से वाकिफ होने के क्रम में वे एक दूसरे में अपनी जिंदगी की छवियां ढूंढ़ते हैं। लड़का बताता है कि उसका बाप गाइड था। इसी दौरान पीछे लगी स्क्रीन पर देवानंद सहित पुराने फिल्मी नायकों की तस्वीरें उभरती हैं। बहुत से असंबद्ध ब्योरे उनकी बातचीत में पेश आते हैं। लड़का व्यक्ति में पिता की छवि देख रहा है। वह अपने मोबाइल पर उसे अपनी मां की तस्वीर दिखाता है, जो कि पीछे स्क्रीन पर उभर आई है। व्यक्ति उस तस्वीर में अपनी बीवी को पाकर हतप्रभ है। नाटक की तीसरी पात्र लड़के की दोस्त मिठाईवाले की बेटी है। उसके दृश्य में आने के थोड़ी देर बाद लड़का वहां से चला जाता है, और बचे दो पात्रों का संवाद देर तक चलता रहता है। धीरे-धीरे स्पष्ट होता है कि यह संवाद तीन एकालापों का परिणाम है। पुरुष कहता है- हम कब अपने दायरों में सिमटते रहते हैं, पता ही नहीं चलता। लड़की कहती है- मैंने जिंदा रहते हुए भी मौत को महसूस किया है।
प्रस्तुति का पूरा ढांचा एक छायावादी गुत्थी की तरह है। उसका कोई स्पष्ट अर्थ विन्यास करना अनुपयुक्त होगा। सुरेश भारद्वाज इसे कुछ इतर उपायों के जरिए रोचक बनाने की चेष्टा करते हैं। हेमंत कुमार का गाया गीत ऐ दिल कहां तेरी मंजिल प्रस्तति के थीम सांग की तरह मंच से सुनाई देता है। पुरानी फिल्मों की तस्वीरें और दृश्य और गीत आदि भी प्रस्तुति में निरंतर शामिल हैं। मुख्य भूमिका में सुमन वैद मंच पर हैं, पर जाने क्यों इधर के दिनों में वे लगातार एक टाइप्ड किस्म की अभिनय शैली में फंसे हुए से नजर आने लगे हैं। उनके किरदार का संतुलन उनके अभिनय से ज्यादा उनकी मेकअप और वेशभूषा में निहित दिखता है। दिलचस्प यह भी है कि जिस वजह से नाटक अमूर्त या आभासी नजर आता है, सुरेश भारद्वाज उसी वजह से इसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं। तीन एकालापों का एक यथार्थ में जुड़ना मंचन की दृष्टि से उन्हें विशेष लगता है। लेकिन क्या उसी स्तर पर दर्शक के भी इससे तादात्म्य का कोई तरीका है? ऐसा लगता है जैसे प्रस्तुति स्थितियों के आभासीपन को पुरानी फिल्मों के दृश्यों की मार्फत एक नॉस्टैल्जिया के जरिए रोचक बनाने की कोशिश करती है। कम से कम इस रूप में इसे सफल कहा जा सकता है।