Monday, December 24, 2012

बचा रहने वाला काम


जीवन में कई तरह के लोग मिलते हैं. ज्यादातर अपनी निजी जरूरतों-हसरतों के प्रश्न से जूझते. लेकिन कुछ दिन पहले  दफ्तर में मिले सुमित की समस्या यह थी कि आज के इतने पतित हो गए सामाजिक हालात में जीवन कैसे जिया जाए. कि सारा माहौल इतना संवेदनहीन और विवेकशून्यता से भरा मालूम देता है कि आपका सारा जानना-समझना-पढ़ना-सोचना आपको कुंठा के अलावा कुछ और नहीं देता. मैंने ठीक-ठीक सुमित का दृष्टिकोण जानना चाहा तो उसने मुझे एक घटना सुनाई. एक दलित लड़की के साथ एक दबंग जाति के आठ लड़कों ने बलात्कार किया. मामला थाने पहुंचा, तो पुलिस ने लड़की की मेडिकल जांच कराई. जांच रिपोर्ट में कहा गया कि लड़की के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है, लिहाजा एफआईआर दर्ज नहीं की गई. लेकिन इसके कुछ ही रोज में ऐसा हुआ कि लड़की से हुए कुकर्म की खुद बलात्कारियों द्वारा बनाई गई विडियो क्लिप सार्वजनिक हो गई. उसकी सीडी और एमएमएस जब बहुतों के पास पहुंच गए तो इस प्रत्यक्ष सबूत के दबाव में पुलिस को मामला दर्ज करने के लिए बाध्य होना पड़ा. पर न्याय की गुहार के इस प्राथमिक चरण तक पहुंचने तक लड़की इतना कुछ झेल चुकी थी कि उसने आत्महत्या कर ली. सुमित ने इस घटना पर अपने आसपास के लोगों से मिली कुछ प्रतिक्रियाओं के बारे में भी बताया. एक बंदे ने उससे कहा कि 'भई लड़की माल तो बढ़िया थी'. वीडियो क्लिप देख चुके एक दूसरे शख्स ने बताया कि वारदात को देख कर वह इतना उत्तेजित हुआ कि डेढ़ महीने बाद बीवी के पास जाने की जरूरत महसूस हुई. 
सुमित के यह बताने पर मुझे भी अपनी एक नौकरी के दौरान की एक घटना याद आई. उस दफ्तर में काम करने वाली एक लड़की का वहीं काम करने वाले एक व्यक्ति से अफेय़र था. शायद उनके बीच झगड़ा हुआ या पता नहीं क्या कि उस शख्स ने अपने अंतरंग यौन क्षणों को चोरी-छिपे फिल्मा कर उसका वीडियो क्लिप सार्वजनिक कर दिया. देखने वालों ने बताया कि वह क्लिप इस कुशलता से बनाया गया था कि पुरुष का चेहरा उसमें नहीं दिख रहा था. लेकिन सबको पता था कि यह किसकी करतूत है. घटना के बाद लड़की कई दिनों तक दफ्तर में नहीं दिखी. फिर बुझे हुए चेहरे के साथ वह दफ्तर आने लगी. मैं उसकी मनःस्थिति के बारे में सोचता तो भीतर से हिल जाता. कभी विश्वास और वजूद पर ऐसा ही आघात झेलकर राजा भरथरी एक बड़े कवि हो गए थे. यह दुर्योग था कि इस त्रासदी को आकार देने वाला शख्स ठीक मेरे सामने बैठता था. मैंने पाया कि इस घटना के बाद भी वह दफ्तर का एक सामान्य नागरिक था. लोग पहले की तरह ही उसके साथ बातचीत और हंसी-ठट्ठे में शरीक होते. और मैं सोचता था कि मुझे क्या करना चाहिए. अंततः अपनी कायरता और दुनियादारी में शायद चेहरे से जाहिर होती नफरत के अलावा मैं कुछ नहीं कर पाया.
सुमित ने एक और घटना बताई. उसके गांव के एक दबंग की गांव की एक गरीब मुसलमान औरत पर कुदृष्टि अंततः उसके गर्भवती होने के निष्कर्ष तक पहुंची. लड़की की मां को कुछ नहीं सूझा तो अंततः उसने उसकी शादी कर दी, जो गर्भ की असलियत सामने आने पर जल्द ही टूट गई. अब वह स्त्री अपने जर्जर दीन-हीन जीवन और बच्चे के साथ गांव में रहती है. और सुमित के मुताबिक उसकी जिंदगी का सबसे दारुण पक्ष यह है कि वह औरत इन हालात तक क्यों पहुंची इस बारे में उसके अपने कोई अहसास नहीं हैं. उसका सवाल था कि ऐसे हालात में जहां लोग अपने प्रति होने वाले अन्याय तक को लेकर उदासीन हों- आखिर इस पढ़ाई-लिखाई, ज्ञान-संवेदना को लेकर क्या करें!
सुमित एक सरकारी स्कूल में अध्यापक है, जहां उसके मुताबिक आम जीवन स्तर को देखते हुए तन्ख्वाहें बहुत ज्यादा हैं, पर फिर भी अध्यापक लोग कुछ करना या अपने को कुछ बेहतर बनाने के कतई इच्छुक नहीं हैं. उनकी बोलचाल की भाषा का स्तर ऐसा है कि दिक्कत होने लगती है.
मैंने सुमित से कहा कि ज्ञान अपने में ही दिक्कत की चीज है. अमूमन ज्ञान को जीवन की क्षुद्रताओं से मनुष्य की आजादी का रास्ता समझा जाता है. इन क्षुद्रताओं से बरी हो चुका इंसान जब सच को देख पाता है तो उसकी असली परेशानियां खड़ी होती हैं. डॉक्टर फ्रेंकेस्टीन के मॉन्स्टर को भी शिक्षित होने के बाद ही अपनी विडंबना का अहसास हुआ था. लेकिन इस सच की समझ से बचने का कोई रास्ता नहीं है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस पर जर्मनी ने अधिकार कर लिया था, और प्रतिरोध के बहुत सीमित रास्ते बचे थे, तब वहां फ्रेंच रेजिस्टेंस मूवमेंट ने जन्म लिया था. यानी हर नागरिक जहां, जितना और जैसा भी प्रतिरोध हो सके, करता था. मैंने सुमित से कहा कि जीवन इतना विराट है कि तमाम निराशा के बावजूद कोई न कोई काम आपके लिए बचा रहता है. स्कूलों का स्तर चाहे कितना भी खराब हो, दो-चार बच्चे काम के निकल आते हैं. उनपर ठीक से मेहनत करो. उनमें अपने होने का इलहाम और अपने काम को ठीक से करने की प्रतिबद्धता अगर आ पाए तो यह चीज जरूर आपको संतोष देगी.  

Friday, December 21, 2012

सरोकार का रंगकर्म


बापी बोस निर्देशित प्रस्तुति सैवंटीथ जुलाई का प्रदर्शन पिछले दिनों श्रीराम सेंटर में किया गया। बापी बोस दिल्ली के उन गिने-चने रंगकर्मियों में हैं, जिनके काम में सामाजिक सरोकार,विचार और प्रतिबद्धता को बिल्कुल प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। पिछली प्रस्तुति में उन्होंने सुकरात की मार्फत सत्ता की निरंकुशता का एक रूपक पेश किया था। इस बार उन्होंने गुजरात के उत्तर-गोधरा परिदृश्य को पेश किया है। प्रस्तुति के शुरू में ही मंच पर सांप्रदायिक घृणा का अजगर लहराता हुआ दिखता है। प्रेक्षागृह के अंधेरे में चमकते हरे रंग के इस अजगर की डरावनी आकृति दर्शकों के बीच से गुजर रही है। फिर रोशनी होते ही मंच पर थाने का दृश्य दिखाई देता है, जहां कुछ पुलिसवाले बातचीत में मशगूल हैं। एक पुलिसवाले की सेकुलर राय उसके दो साथियों को पसंद नहीं आ रही। उनमें से एक की बीवी मुस्लिम दंगाइयों के हाथों मार डाली गई थी। इसी बीच कुछ लोगों की आवाजें सुनाई देती हैं। यह एक भीड़ है, जो कुछ मुस्लिम लड़कों की पिटाई पर उतारू है, कि उन्होंने एक हिंदू लड़की से दुष्कर्म किया है। पुलिसवाले भीड़ में से  लड़कों को छुड़ा लाए हैं। पता चलता है कि लड़कों ने कुछ भी नहीं किया, उन्हें हिंदूवादी मानसिकता के लोग झूठमूठ फंसाने पर उतारू हैं। दृश्य की खास बात यह है कि कुछ देर पहले मुस्लिम-विरोधी राय व्यक्त कर रहा और अपनी बीवी को सांप्रदायिक हिंसा में खो चुका पुलिसवाला इन हिंदूवादी कट्टरपंथियों से पूरे जुझारूपन से भिड़ रहा है। बहरहाल, इस वाकये के बाद दर्शक थाना-इंचार्ज से पैन-इस्लामाइजेशन के आरोप को बकवास ठहराने वाला एक छोटा-मोटा व्याख्यान सुनते हैं, कि पैन इस्लामाइजेशन जैसी चीज वास्तव में होती तो शिया-सुन्नी झगड़े न होते, ईरान-इराक युद्ध न होता, वगैरह।
इस दृश्य के बाद की पूरी प्रस्तुति युवक आसिफ मिर्जा पर चलाए जाने वाले मुकदमे को दिखाती है। प्रस्तुति के सभी किरदार बहुत जाहिर किस्म के हैं। हिंदूवादी वकीलवैसा ही जज,मौकापरस्त गवाह और प्रमाणों के आधार पर मुकदमा लड़ने वाला सेकुलर सरकारी वकील, जो प्रतिभाशाली है पर इन हालात में बेबस है। मुकदमे की इस पूरी कवायद में हिंदू कट्टरपंथ का माहौल बिल्कुल साफ-साफ दिखता है। वकील, जज, गवाह सब मिलकर युवक को गुनहगार ठहराने की पूर्वयोजना बनाए हुए मालूम देते हैं। सवाल है कि एक प्रत्यक्ष यथार्थ के उतने ही प्रत्यक्ष इस पाठ के जरिए आखिर नया क्या कहने की कोशिश की गई है। बापी बोस के मुताबिक यह प्रस्तुति सहिष्णुता, सांप्रदायिक सदभाव, सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता आदि के मंतव्य से तैयार की गई है। उसमें नरेंद्र मोदी की राजनीति आदि पर भी किरदारों की टिप्पणियां बीच-बीच में सुनाई देती हैं। बापी एक जानी-बूझी लेकिन आज की तारीख में बहुत टेढ़ी हो चुकी सच्चाई का एक सरल पाठ पेश करते हैं। वे इसमें मौकापरस्त पात्रों के समांतर भलेमानस पात्रों और किंचित अविश्वसनीय हृदय परिवर्तन को भी दिखाते हैं। बलात्कार का आरोप लगाने वाली दो औरतों में से एक अपना बयान बदल लेती है, और सारे पात्र सन्न रह जाते हैं, जब पता चलता है कि उसे इस हृदय परिवर्तन के लिए प्रेरित एक स्वामीजी महाराज ने किया है। संक्षेप यह कि बापी हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता की बेहद जटिल हो चुकी स्थिति का मुकाबला उन्हीं जंग खाए औजारों के जरिए करते हैं जिनका उपयोग गांधीवादीनुमा सेकुलरवादी अरसे से करते आ रहे हैं। लेकिन प्रस्तुति इस घोषित मंतव्य के बहाने एक ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम यह करती है कि मुकदमे की कार्रवाई में सरेआम सच्चाई और कानून की धज्जियां उड़ाई जाती दिखाकर काफी सफल तरह से हमारी व्यवस्था के केऑस को दिखाती है। बापी अपने पात्रों की पूरी एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह प्रायः चीजें जानी-बूझी होने के बावजूद इस केऑस की नाटकीयता दर्शकों को बांधे रखती है। कुछ किरदार इस क्रम में ठीकठाक नाटकीय रंग-ढंग में दिखाई देते हैं। दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली औरत के तौर तरीकों का छिछोरापन एक रंजक दृश्य बनाता है। इसी तरह से गवाही देने आया बस ड्राइवर के हावभाव में इस तरह के चरित्रों वाली एक दिलचस्प स्वाभाविकता है।
नाटक का आलेख बृत्य बसु ने तैयार किया है, जो दो नाटकों से प्रेरित है। ये नाटक हैं अमेरिकी नाटककार आर्थर वैक्स्ले का दे शैल नॉट डाई और उत्पल दत्त का मानुषेर अधिकारे। सर्किल थिएटर की यह एक भव्य प्रस्तुति थी, जो लगातार दोनों वकीलों की नोक-झोंक और मुकदमे में होने वाले खुलासों से अपने स्तर की उत्सुकता पैदा करती है। उसकी एनर्जी एक विचार के प्रति निष्ठा से पैदा होती है। विचारहीनता के दौर में बापी बोस इस निष्ठा की अलख जगाए हुए हैं, यह बड़ी बात है। 

Sunday, December 16, 2012

परिसर में बिखरी रंगभाषा


राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के चोंचलों का अंत नहीं। थिएटर के नाम पर वहां ऐसे-ऐसे प्रयोग हुआ करते हैं कि पश्चिम में आजमाए जाने वाले सर्रियल या प्रभाववादी मुहावरे भी पानी भरते नजर आएं। निदेशिका अनुराधा कपूर की हमेशा ही कुछ नया करनेऔर एक नई रंगभाषा तलाश करनेकी कोशिशों ने इधर के अरसे में विद्यालय की प्रस्तुतियों को एक अजूबा बना डाला है। उनकी अपनी रंगभाषा का सिलसिला भी कुछ इस किस्म का है जो थिएटर की हैपनिंगको इंस्टालेशन’ (संस्थापन) में तब्दील करता है। हालांकि कोई गहरा मनोयोग उनकी प्रस्तुतियों में कम ही दिखाई देता है। उसके बजाय अलग दिखनेका एक सायास उपक्रम नजर आता है। पिछले सप्ताह संपन्न हुई विद्यालय के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए निर्देशित उनकी नई प्रस्तुति डॉक्टर जैकिल एंड हाइडभी इसी क्रम में देखी जा सकती है।
आरएल स्टीवेंसन के सवा सौ साल पहले लिखे गए उपन्यास पर उनकी इस प्रस्तुति में दर्शकों के बैठने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके बजाय वे विद्यालय परिसर के अलग-अलग ठियों पर फैले प्रस्तुति के टुकड़ों को घूम-घूमकर देखा करते हैं। शुरू में बीच के लॉन में जमा हुए दर्शक स्पीकर पर एक कमेंट्री सुनते हैं, जो दरअसल प्रस्तुति से संबंधित पूर्वसूचना जैसा एक गद्य है। फिर मुंह से निकाली जा रहे कुछ अजीबोगरीब स्वर, फिर कुछ अभिनेताओं’  का दौड़कर गलियारे की छत पर चढ़ जाना, फिर कुछ देर में किनारे की रेलिंग पर मूर्तिवत हाथ उठाए हुए स्थिर लेट जाना। अगले चरण में दर्शक रंगमंडल के दफ्तर की बगल में स्थित एक कमरे में जमा होते हैं। यहां एक रसायनशालानुमा सेटिंग है- एक मेज, टेढ़ी-मेढ़ी नलियों से ऊपर जुड़ा एक पारदर्शी सिलेंडर, थोड़ी-थोड़ी देर में एक सीटी की आवाज के साथ उससे निकलता धुआं। कमरे में कोने के ताखे पर एक लड़की अजीब तरह से लेटी है, और दो वैज्ञानिक या सहायक नुमा पात्रों के संक्षिप्त और दर्शकों के लिए प्रायः संदर्भहीन संवादों के उपरांत यह दृश्य भी बर्खास्त हो जाता है। कमरे के चारों सिरों पर बिछी बेंचों पर बैठे दर्शकों को अब पुनः लॉन के एक अलग हिस्से की ओर प्रस्थान करना है। यहां एक दोमंजिला सेट लगाया हुआ है, जिसमें कुछ पात्र भी हैं, और उनमें कुछ चर्चा भी हो रही है। पर जैसा कि पिछली स्थिति में था उसी तरह यह सारी बातचीत देखने वाले के लिए एक अनजाने संदर्भ की तरह है। नीचे दो औरतें हैं, ऊपर के पात्रों में भी कुछ कशमकश है। ऊपर बर्तन से कुछ गिरता है। एक पात्र कूदकर नीचे आ जाती है, वगैरह। इस दृश्य के बाद दर्शकों की अगली मंजिल पुनः लॉन की पहले वाली जगह है, जहां शीशे की सतह वाली मालूम पड़ती एक चौकी को घेरकर चंद पात्र बैठे हैं। यहां दर्शकों को चाय परोसी जाती है। चाय पीते हुए वे इन पात्रों की कारगुजारियां देख रहे हैं। वे चौकी पर फैली राख में कुछ आकृतियां या नक्शे जैसा कुछ उकेर रहे हैं, या कुछ ऐसा बारीक काम कर रहे हैं जो दर्शकों के पल्ले नहीं पड़ रहा। बहरहाल, इससे अगले दृश्य के लिए दर्शकों को कहीं जाना नहीं है। उन्हें बस अपना रुख बदलकर पीछे की ओर बनाए गए एक लंबे प्लेटफॉर्म पर चढ़ जाना है। एक टैंपो आकर इस प्लेटफॉर्म के किनारे रुकता है, जिसके पीछे शीशे का एक कमरा बना हुआ है। कमरे में हाइड चढ़ आया है। दो लोग गुत्थमगुत्था हो रहे हैं। देखने वाले ज्यादा हैं, इसलिए उचक-उचक कर देखने के बावजूद कुछ दर्शकों को कुछ भी दिख नहीं रहा। इससे अगला दृश्य थोड़ा आगे एक कमरे का दरवाजा है। यहां भी दर्शक भीड़ लगाकर खड़े हैं।  दृश्यमें से किसी कसमसाहट और तड़पने आदि की आवाज आ रही हैं। बाद में और आगे गुजरते हुए वहां एक शख्स मरा हुआ पड़ादिखाई देता है। प्रस्तुति का अंतिम ठिकाना बहुमुख प्रेक्षागृह है, जिसमें अलग-अलग कोनों पर अलग-अलग पात्र एकल छवियों में दिखाई देते हैं। अपने बाल नोचती एक लड़की, बुरी तरह कांपता मुंह पर कोई लेप लगाए एक पात्र, वगैरह। इन छवियों को देखते हुए पिछले साल विद्यालय के ही तीसरे वर्ष के छात्रों के लिए स्विटजरलैंड के डेनिस मैल्लेफर निर्देशित प्रस्तुति ड्राइवकी याद आती है, जिसमें ऑटोरिक्शा ड्राइवर और महिला ट्रैफिक कांस्टेबल विषय को विभिन्न छवियों में दर्शाया गया था।... अंततः बाहर निकलते वक्त गलियारे में किसी प्रयोगशाला की तरह पारदर्शी पॉलिथिनों में भरे द्रव में कई तरह की चीजें एक प्रदर्शनी की तरह सजाकर रखी हुई हैं। यह प्रस्तुति का अंतिम चरण था।
स्टीवेंसन का उपन्यास स्ट्रेंज केस ऑफ डॉ. जैकिल एंड मि. हाइडएक ही शरीर में अच्छी और बुरी दो जुदा शख्सियतों के होने की सबसे पुरानी आधुनिक कहानी है। जिसे बाद में अलफ्रेड हिचकॉक की साइकोसे लेकर हाल की तमिल फिल्म अन्नियन’ (अपरिचित) और हिंदी की भूलभुलैयातक अलग-अलग तरह से दोहराया गया। उपन्यास में डॉक्टर जैकिल अपने भीतर के बुरे पक्ष को अलग रखने के लिए एक सिरम ईजाद करता है. जिसके जरिये वह अच्छे जैकिल और बुरे हाइड की दो शख्सियतों को जीता है। पर आखिर में सिरम के लिए आवश्यक अवयवों की कमी से वह जान लेता है कि उसका बुरा पक्ष यानी हाइड ही उसका एकमात्र पक्ष रह जाएगा।
अनुराधा कपूर की प्रस्तुति साधनों की प्रचुरता से तैयार किए गए एक विस्तृत इंस्टालेशन की तरह पेश होती है। एक ऐसी प्रस्तुति जिसमें अर्थ का न तो कोई प्रभाव बन पाता है, न प्रवाह। उसमें बहुत कुछ खोंस देने का प्रलोभन स्पष्ट दिखाई देता है। इससे यूं ही बिखरी प्रस्तुति कुछ और बिखर गई है। जरूर उसमें कुछेक ठीकठाक छवियां भी हैं, पर प्रस्तुति का कोई गाढ़ा समेकित प्रभाव नहीं बन पाता।  

Tuesday, December 11, 2012

पाकिस्तान की प्रस्तुति गुड़िया घर


दिल्ली इब्सन फेस्टिवल में पिछले सप्ताह पाकिस्तान के थिएटर ग्रुप तहरीक-ए-निसवां ने नाटक गुड़िया घर का मंचन किया। हेनरिक इब्सन के 1979 में लिखे प्रसिद्ध नाटक ए डॉल्स हाउस का यह एक रूपांतरित संस्करण थी। रूपांतरण में नाटक के सात पात्रों के बजाय कुल चार ही मंच पर दिखाई देते हैं। पत्नी का नाम यहां तहमीना है और पति का मुराद। मूल नाटक की कथावस्तु पूरे फैलाव में न दिखकर सरसरी तौर पर ही दिखाई देती है : पति की खुशी के लिए जी-जान से जुटी तहमीना, घर में किसी नारी निकेतन जैसी जगह से कुछ दिनों के लिए आई सकीना से उसकी बातचीत, इस बातचीत के जरिए स्पष्ट होता यथार्थ, जिसमें तहमीना की हर गतिविधि पति द्वारा नियंत्रित है, मानो वह एक गुड़िया हो जिससे वह जब चाहे जैसे चाहे, खेलता है। और अंत में तहमीना का घर छोड़कर जाने का निर्णय। नाटक के निर्देशक अनवर जाफरी के अनुसार पाकिस्तान के परिवेश में, जहां शादी को एक पवित्र और अटूट किस्म का संबंध माना जाता हो, नोरा या तहमीना के निर्णय की संगति ठहराना थोड़ा मुश्किल काम था, फिर भी उन्होंने इसे खेलने का निर्णय लिया। प्रस्तुति में एक प्रयोग यह किया गया है कि पूरा नाटक यहां एक रिहर्सल के तौर पर खेला जा रहा है। नाटक शुरू होने के पहले मंच पर एक-दो लोग लापरवाही से इधर-उधर आ-जा रहे या खड़े हैं। फिर वे जल्दी-जल्दी सोफा-कुर्सियां वगैरह लाकर रख देते हैं। कोने पर एक बोर्ड लगा है, जिसपर रिहर्सल का शेड्यूल लिखा हुआ है। दृश्यों के दौरान भी कुछ ऐसा मंजर है कि तहमीना को आईना देखना है तो एक कार्यकर्ता शीशे जैसा एक फ्रेम लेकर खड़ा हो जाता है। मुराद को अखबार चाहिए तो एक अन्य कार्यकर्ता अखबार लेकर दृश्य के बीच चला आता है, आदि। हालांकि यह तरकीब प्रस्तुति में कुछ जोड़ने के बजाय बाहरी और निष्प्रभावी तरह से दिखती है। रिहर्सल की यह तरकीब न होती तब भी प्रस्तुति का यथार्थवाद उतना ही औसत होता जितना कि वह था। एक मध्यवर्गीय गृहिणी की भूमिका में महवाश फारुकी और निचले तबके की कड़क औरत की भूमिका में सलीमा कैरमानी एक साफ-सुथरा दृश्य बनाती हैं। पोंछा लगाते हुए सकीना पति-पत्नी की बात सुनती रहती है। उसकी तुर्श भंगिमाएं प्रस्तुति को एक अतिरिक्त नाटकीयता देती हैं। धीरे-धीरे तहमीना को पता चलता है कि जिस शौहर की खुशी के लिए वह एक छोटे झूठ में शरीक हुई, वह तो उस झूठ से पैदा हुई मुश्किल को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लेना चाहता है।
प्रस्तुति कुछ ऐसी है कि वह नाटक की मंशा को बहस से ज्यादा स्थितियों में पेश करती है। हर समय पति और परिवार की चिंता करने वाली तहमीना से सकीना कहती है- क्या हमारा अपने को लेकर कोई फर्ज नहीं है, क्या हमारा अपने पर कोई इख्तियार नहीं है? इन स्थितियों में भी दृश्य का ज्यादा तामझाम नहीं है। निश्चित ही यह प्रस्तुति एक क्लासिक नाटक का एक संक्षिप्त और आसान विधान करती है, भले ही इस क्रम में विषयवस्तु का तनाव उस स्तर पर बना नहीं रह पाता।। नार्वे एंबेसी के सहयोग से आयोजित किए जाने वाले ड्रामेटिक आर्ट एंड डिजाइन एकेडमी के दिल्ली इब्सन फेस्टिवल के तहत एलटीजी प्रेक्षागृह में इसका मंचन किया गया।

Monday, December 10, 2012

थोड़ा कथ्य ज्यादा शिल्प

निसार अल्लाना की ड्रामेटिक आर्ट एंड डिजाइन एकेडमी के दिल्ली में हुए इब्सन फेस्टिवल में पिछले रविवार को केरल के ग्रुप थिएटर रूट्स एंड विंग्सने नाटक 'व्हेन वी डेड अवेकन' का मंचन किया। इब्सन ने यह नाटक 1899 में लिखा था। एक प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र में छुट्टियां बिता रहे मूर्तिकार आर्नल्ड रूबेक और उसकी पत्नी माइया अपनी जिंदगियों में खिन्न हैं। आर्नल्ड ने कभी माइया से वादा किया था कि वह उसे पहाड़ की चोटी पर ले जाएगा, जहां से वह दुनिया को देख सकेगी, पर उसने यह कभी नहीं किया। ऐसे में उन्हें वहां दो लोग मिलते हैं। एक शख्स जो पहाड़ पर भालुओं के शिकार के लिए जा रहा है, और सफेद कपड़ों में एक रहस्यमय स्त्री। रूबेक पहचान जाता है कि यह स्त्री कभी उसकी मॉडल रही इरेना है। इरेना खुद को मरा हुआ बताती है। इसकी वजह है कि रूबेक ने उसकी आत्मा पर कब्जा करके उसे अपनी 'पुनरुत्थान' शीर्षक मास्टरपीस मूर्ति में डाल दिया। रूबेक उसे बताता है कि उस मूर्ति के बाद से मृत होने की यह मनःस्थिति खुद उसकी भी है। इरेना के पास एक चाकू है। उसके अनुसार आत्माहीन होने के बाद से उसने इसी चाकू से अपने हर प्रेमी, और यहां तक की बच्चों को भी कोख में ही मार डाला है। अब मिलने पर वे पहाड़ पर जाते हैं, जहां रास्ते में उनकी मुलाकात माइया और उसके साथी से होती है।
मंच के दाएं छोर पर उतरता एक ढलवां मचाननुमा रास्ता बना है। आगे बजरी के ढूह से सटी एक (डाइनिंग) टेबल रखी है। मंच के अंधेरे में से माइया और रूबेक स्लो मोशन में प्रगट होते हैं। रूबेक देर तक कोट पहन रहा है, कमीज को पैंट में खोंस रहा है, अखबार पढ़ रहा है। माइया गिलासों को तरतीब से रख रही है, चाय बना रही है। स्लो मोशन में हर चीज बहुत धीमे-धीमे घटित हो रही है। फिर यह दृश्य इसी तरह दो बार और दोहराया जाता है। केरल के 33 वर्षीय रंगकर्मी शंकर वेंकटेश्वरन निर्देशित इस प्रस्तुति में शैली का एक व्यामोह दिखता है। पूरी प्रस्तुति मानो शिल्प का एक टुकड़ा है। इब्सन के महीन कथ्य के सूक्ष्म इस्तेमाल से बनता एक गाढ़ा शिल्प। स्थितियां आड़ी-टेढ़ी प्रभावात्मक तरह से इसमें मौजूद हैं। जहां मेज है वहीं ऊपर छत से एक बेलचा लटका दिखाई दे रहा है। अचानक वह धड़ाम की आवाज के साथ उस मेज पर गिरता है जहां थोड़ी देर पहले दो पात्र बैठे थे। एक पात्र टूटी मेज के टुकड़ों को जमा करके उसे बजरी से ढक रहा है। फिर इसे बंदूक से पीट रहा है। दूसरा पात्र इसी बजरी में अपना सिर घुसाए है। अपनी धूल धूसरित देह में यह रूबेक इरेना के चाकू से खुद को बचा रहा है। इस सारी कवायद के समांतर बाकी के दोनों पात्र स्लो मोशन में पहाड़ की यात्रा पर रवाना हो गए हैं, फिर ये दोनों पात्र भी उसी दिशा में बढ़ते हैं। मंच पर गूंज रहे धीमे वाद्य स्वरों की जगह तूफान के भीषण स्वरों ने ले ली है। रूबेक ऊपर की ओर जाते रास्ते के सिरे तक जा पहुंचा है। पीछे से इरेना उसे संभाले है। थोड़ी देर में मंच के पीछे मौजूद एक विशाल सफेद वस्त्र को दो पात्र पूरे मंच पर फैला देते हैं। वस्त्र के नीचे से पात्र एक आकार की तरह ऊपर उठता है।
प्रस्तुति का यह ढंग बहुत-सी पश्चिमी देशों के नाटकों की याद दिलाता है, जहां कथ्य हमेशा ही एक प्रभावात्मकता में गुम हुआ मालूम देता है, और प्रस्तुति दृश्य की अपनी ही एक स्वायत्तता बुनती है। यहां भी निर्देशक शंकर वेंकटेश्वरन कथ्य को मानो एक ऊबड़खाबड़ दृश्य में तब्दील करते है। प्रस्तुति में संवाद नाममात्र के और शैली के हिस्से की तरह हैं। इसकी वजह निर्देशक की यह धारणा भी है कि थिएटर को भाषा और साहित्य की सीमा से बाहर आना चाहिए। हालांकि वे मानते हैं कि इब्सन की अपनी भाषा के मुतल्लिक यह एक मुश्किल काम था। लिहाजा उन्होंने स्टेज-भाषा के तौर पर मानव व्यवहार के बजाय मानव स्वभाव को आधार बनाया। निश्चित ही यह प्रस्तुति अपनी प्रभावात्मकता में दृश्यों का एक मुश्किल विन्यास पेश करती है। लेकिन उसकी सीमा शायद यही है कि उसका यह मुश्किल विन्यास बहुत भारतीय नहीं लगता

Tuesday, December 4, 2012

पूंछ हिलाने के पहलुओं पर नाटक


हनु यादव दिल्ली के पुराने रंगकर्मी हैं। वे बीच-बीच में दिखते हैं, फिर गायब हो जाते हैं। करीब दो-ढाई दशक पहले उन्होंने गजानन माधव मुक्तिबोध की लंबी कहानी 'विपात्र' का श्रीराम सेंटर बेसमेंट में मंचन किया था। हिंदी अकादमी के सौजन्य से पिछले दिनों श्रीराम सेंटर में उनके निर्देशन में उनके पंचम ग्रुप की यह प्रस्तुति अरसे बाद फिर देखने को मिली। कहानीपन के निबाह के लिहाज से विपात्र एक गरिष्ठ किस्म का कथ्य है। इसके एक दफ्तर में काम करने वाले पात्र रोजमर्रा के वास्तविक सवालों पर बौद्धिक किस्म की चर्चा करते रहते हैं। इस चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा है कि 'हमने अपने स्वार्थों के लिए अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेच दी है'। इसी बात को कहानी में कई तरह से कहा गया है। जितने भी पहलू इस विषय के हो सकते हैं उन्हें खंगाला गया है। उसका एक पात्र कहता है कि हर आदमी के पूंछ हिलाने के अलग-अलग तरीके होते हैं। फर्क इतना ही होता है कि कुछ लोग अपने आत्मसम्मान के प्रदर्शन के लिए अलग तरह से पूंछ हिलाते हैं। प्रस्तुति के संवाद कुछ इस तरह के हैं- 'कोई व्यक्तिबद्ध वेदना का उदात्तीकरण भले ही कर ले, पर उसकी मूल ग्रंथि तो बनी ही रहती है'; 'नपुंसक क्रोध उनमें होता है जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेच दी है'; 'व्यक्तिगत लाभ प्राप्ति ही प्रधान उद्देश्य है'आदि। कहानी में दरमियानी फासलोंऔर छोटे होटल में चाय पीने में संतुष्टि हासिल करने में निहित रोमांटिसिज्म की भी चर्चा की गई है। दिलचस्प ढंग से हनु यादव ने इस गद्य में से भी कई किस्म के दृश्य निकाल लिए हैं। इस क्रम में कहानी में प्रसंगवश आई एक स्त्री और चायवाला और उसकी घरवाली मंच पर दिखाई देते हैं। इनके अलावा मूल रूप से दो ही दृश्य प्रस्तुति में हैं। एक में चर्चा करते तीन दफ्तरी, और दूसरे में एक बैठकी। पुराने दिनों की बैठकबाजी के इस दृश्य में अलग-अलग हैसियतों के लोग शामिल हैं। ऊपर से लगने वाले ठहाकों के भीतर एक पूरा समाजशास्त्र काम कर रहा है। हनु यादव इसी समाजशास्त्र में से कुछ रंजक छवियां निकालते हैं। वास्तव में बैठकी में दिखने वाला एक मुखिया किस्म का इंसान सबको निर्देशित कर रहा है। उसके साथ शर्त लगाने वाला एक शख्स एक किलो रसगुल्ले खाएगा। इसके लिए मंच पर बाकायदा रसगुल्ले मंगाए गए हैं। रसगुल्ले वास्तव में हैं, पर उनकी रकम संकेत में चुकाई जाती है। कुल मिलाकर बात का सटीक ढांचा तो नहीं पर उसका मंतव्य प्रस्तुति में दिखाई देता है : खुद को बचाए रखने की फिक्र में अपने सेल्फ और अपनी मनुष्यता से समझौता करते और इस बोध से जूझते पात्र। कहानी में मुक्तिबोध बुद्धिजीवियों की स्वार्थपरता को दिखाते हैं।
विषय की संजीदगी को देखते हुए बैठकी वाला दृश्य कुछ ज्यादा चटपटा हो गया है। बाकी स्थितियां इस लिहाज से कहीं ज्यादा संतुलित हैं। एकरसता को तोड़ने में रोशनी का भी कुछ मौकों पर अच्छा इस्तेमाल किया गया है। याद आता है कि धूसर रंगों में फैली उस पुरानी लंबी प्रस्तुति की तुलना में यह कहीं ज्यादा संक्षिप्त- सारगर्भित और अभिव्यक्तिपूर्ण थी। मंच पर झोला लटकाए, बीड़ी पीते और अपनी आंतरिकता से जूझते किरदार में हनु यादव का चेहरा-मोहरा और भावभंगिमा मानो मुक्तिबोध के प्रसिद्ध पोर्टेट की छवि को धारण किए हुए था। वह छवि जिसमें जमाने भर की फिक्र करते एक बौद्धिक को अपने लिए महज कुछ बीड़ियां ही चाहिए होती थीं।


Sunday, December 2, 2012

भगवदज्जुकम

सातवीं शताब्दी के संस्कृत हास्य नाटक भगवद्ज्जुकम का प्रदर्शन पिछले दिनों मुक्तधारा प्रेक्षागृह में किया गया। वरिष्ठ रंगकर्मी हेमंत मिश्र निर्देशित इस प्रस्तुति में गणिका गोगल्स लगाए हुए दिखाई देती है। इस तरह प्राचीन परिवेश के हास्य को विशुद्ध प्रहसन में तब्दील किया गया है। शुरुआती दृश्य में परिव्राजक योगीराज और उनके शिष्य शांडिल्य में काफी देर तक आत्मा और शरीर को लेकर चर्चा चल रही है। योगीराज तो संसार से निस्संग हैं, पर शांडिल्य गुरुदेव के उपदेशों से आजिज आया हुआ एक दुखी चेला है। उसकी रुआंसी मुद्राओं और लोलुप मनोवृत्ति की अतिरंजना देखने लायक है। गुरु-चेला लताओं और तरह-तरह के रंग-बिरंगे पुष्पों से बनाए गए वन प्रांतर के दृश्य में उपदेश सुनते-सुनाते विचर रहे हैं। फिर एक जगह गुरुदेव ध्यानस्थ हो जाते हैं और शांडिल्य को इस रमणीक वन में एक रमणी अपनी सखियों सहित प्रवेश करती दिखाई देती है। गोगल्स लगाए रमणी को देखता लालसा-दग्ध चेला-- इस दृश्य योजना में गौण पात्रों के विवरण भी अच्छे मनोरंजक हैं। रमणी वसंतसेना की सखी और मां काफी प्रत्यक्ष किस्म का अभिनय कर रही हैं। उनके चौंकने, मनुहार करने, खीझने का लास्य एक नाटकीय तरकीब की तरह है। इसी दौरान एक यमदूत का दृश्य में प्रवेश होता है। इसके रंगढंग में भी अलग-अलग युगों की प्रवृत्तियों का घालमेल है। फुरसत के क्षणों में वह सिगरेट पीता दिखता है। किसी गलतफहमी में वह वसंतसेना के प्राण लेकर यमलोक चला गया है। अपनी सखी की यह दशा देख विस्फारित नेत्रों वाली परिभृतिका और टेढ़ी भौंहों वाली मां से एक दृश्य बनता है। यहां तक सब कुछ सही है। लेकिन प्रस्तुति यहां से थोड़ा गड़बड़ाना शुरू करती है, जब वैद्य का किरदार मंच पर अराजकता फैलाना शुरू करता है। पता नहीं क्यों निर्देशक ने कॉमेडी के नाम पर इस पात्र को किसी फिल्मी टपोरी की तरह खुला खेल फर्रुखाबादी करने की छूट दे दी है। मंच पर वैद्यराज हाथ में पकड़ी दारू की बोतल से गटागट घूंट भर रहा है। 
भगवदज्जुकम पर अलग-अलग निर्देशकों की कई प्रस्तुतियां अब तक देखी हैं। यह प्रस्तुति नाटक का एक संशोधित और परिवर्धित संस्करण कही जा सकती है। निर्देशक ने आधुनिक रंगमंच के तरीकों और लोकरंगमंच के भदेस को जोड़जाड़कर रोचक ढंग से प्रस्तुति तैयार की है। उन्होंने परिपाटी से अलग हटने की कोशिश की है। सातवीं शताब्दी के ही महेंद्र वर्मा कृत मत्तविलास के अलावा बोधायन का यह नाटक संस्कृत के सबसे प्रशंसित हास्य नाटकों में है, जिसका अंग्रेजी में भी रूपांतर हो चुका है।