Wednesday, August 29, 2012

बैकस्टेज के ढांचे में


बीते सप्ताह हैबिटाट सेंटर के स्टीन ऑडिटोरियम में सहर थिएटर ग्रुप ने
प्रस्तुति 'जी हमें तो नाटक करना है' का मंचन किया। प्रस्तुति
हल्के-फुल्के बतकही के ढंग से थिएटर की व्यावहारिक मुश्किलों का एक कोलाज
बनाती है। एक खाली मंच पर पांच-छह अभिनेता रिहर्सल के लिए जमा हुए हैं।
निर्देशक उन्हें तरह-तरह की एक्सरसाइज करा रहा है, पर उन्हें शिकायत है
कि असली चीज यानी नाटक और किरदार वगैरह की कोई चर्चा ही नहीं हो रही। एक
पात्र उनमें से कुछ ज्यादा ही बेसब्र है। वह दिल्ली देहात के लहजे में
'सरजी, तुम उट्ठक बैठक तो घणी करवाओ हो, पर कुछ सिखा तो रहे ना हो' बोलने
वाला एक ठेठ दुनियादार किस्म का बंदा है। उसकी मंशा शाहरुख खान बनने की
है। एक स्थिति में वह मंच पर अकेला है, और अकेले में ही इस हसरत को अंजाम
देने में जुटा है। शाहरुख की तरह छाती उघाड़े है और उसी की तरह हकला-हकला
कर कोई संवाद बोल रहा है। वह दर्शकों से मुखातिब होते हुए भी उनसे
निस्संग है, क्योंकि हकीकत में वह अपने एकांत में है। उसकी जज्बाती
आत्ममुग्धता का यह 'एकांतिक' दृश्य खासा हास्यप्रद है। युवा निर्देशक
मृत्युंजय प्रभाकर ऐसे ही कई रोचक टुकड़ों को शामिल करते हुए प्रस्तुति
को एक थीम में लामबंद करते हैं।
रिहर्सल के लिए जमा हुए पात्र खुद में भी अलग-अलग किस्म के किरदार हैं।
दो पात्रों को ज्यादा अंतरंग होता देख तीसरी उनपर खींचकर चप्पल मारती है।
एक चौथा पात्र आलसी किस्म का है। उनके चलते रहने वाले झगड़े-टंटों में
कभी कोई रूठ जाता है, कभी कोई नाटक छोड़ने की धमकी देकर चला जाता है। उधर
निर्देशक की समस्या है कि वह एक ऐसा नाटक कैसे तैयार करे जो अपने सामाजिक
दायित्व का निर्वहन करता हो। साधनों से ज्यादा यह विषय की समस्या है।
विषय क्या हो, क्यों न यह दर्शकों से ही पूछ लिया जाए। एक पात्र दर्शकों
से विषय पूछती है। उनके बीच से कई आवाजें आती हैं- स्त्री, पर्यावरण,
युवाशक्ति आदि। लेकिन हीरो बनने की मंशा वाले पात्र का कहना है कि ये
दर्शक किसी काम के ना हैं, और नाटक देख के ये अपने अपने घरों में जाकर सो
जाएंगे, और अगले दिन सब कुछ भूल जाएंगे। एक पात्र उसका प्रतिवाद करती है
और किसी भी कला के प्रभाव को इतना सरलीकृत करने के खिलाफ तर्क देती है।
हीरो बनने की मंशा वाला पात्र कहता है कि क्यों न इस सारे पचड़े में पड़े
बगैर एक लिखा-लिखाया नाटक उठा लिया जाए। और आखिरकार नाटक 'आषाढ़ का एक
दिन' पर सहमति बन जाती है। इस तरह मृत्युंजय बहस की एकरसता को तोड़कर
दृश्य की जगह बनाते हैं। इस दृश्य में स्टेज की संजीदगी के दरम्यान
बैकस्टेज की उठापटक को एक दिलचस्प और कल्पनाशील युक्ति के तौर पर
इस्तेमाल किया गया है। 'दृश्य में' मल्लिका और अंबिका के संवाद चल रहे
हैं और पीछे की ओर बैठे बाकी पात्रों में कोई किसी को घूंसा दिखा रहा है,
तो कभी वे 'चिड़िया उड़ तोता उड़' खेलने में मशगूल हैं। लेकिन आगंतुक के
आने पर हाथों की थपथप से उसकी पदचाप की ध्वनि बनाने में या ऐसी ही अन्य
कार्रवाइयों में वे चूक नहीं रहे हैं। पूरा दृश्य इतने सलीके से मंच पर
मौजूद है कि रह-रह कर छूट रही दर्शकों की हंसी भी उसका हिस्सा बन जाती
है। घड़े की जगह मल्लिका हेलमेट पकड़े हुए है। एक अन्य मौके पर यह हेलमेट
हरिण शावक के रूप में है। रिकॉर्डेड चिड़ियों की चहचहाहट है। लेकिन नाटक
के बाद फिर बहस होती है और यह नतीजा निकलता है कि प्रेम की पराकाष्ठा का
यह नाटक आज के वक्त के लिए अप्रासंगिक है। बहस चल रही है, कई तरह के
प्रयोग हो रहे हैं। नाटक समस्या पर क्यों हो, मनोरंजन के लिए क्यों न हो?
क्योंकि शासकवर्ग मनोरंजन का इस्तेमाल अफीम की तरह करता है, वगैरह-वगैरह।
प्रस्तुति एक ढीलेढाले ढांचे में पर्याप्त चुस्त और स्फूर्त है। शायद यह
निर्देशक द्वारा अच्छी तरह आत्मसात किए आइडिये का परिणाम है। किसी नतीजे
या जवाब की तुलना में उसमें बहुत से सवाल हैं। बहुत सी बिखरी बातों को एक
रोचक सिलसिले में आकार दिया गया है। दर्शकों की शिरकत और अभिनेताओं की
एनर्जी प्रस्तुति को लगातार दिलचस्प बनाए रखती है।


Sunday, August 19, 2012

जीवट के अरुणप्रकाश

हिंदी की प्रकाश प्रत्यय वाली कहानीकार त्रयी में से अरुण प्रकाश उस क्लासिक कथा-मुहावरे के शायद अंतिम लेखक थे जहां संवेदना की डिटेलिंग धीरे-धीरे पाठक को घेरती है। उनकी बहुत पहले पढ़ीं 'जलप्रांतर', 'भैया एक्सप्रेस' और 'बेला एक्का लौट रही है' आदि कहानियों का प्लॉट अब धुंधला ही याद है। लेकिन यह याद है कि उनकी कहानियों में सुख छोटे-छोटे थे, लेकिन दुख ज्यादा बड़ा था। स्थितियों के समांतर एक अप्रकट यथार्थ वहां पात्र के भीतर घटता हुआ महसूस होता था। उनके पात्र उस दुनिया के थे, जहां कुछ छोटी-छोटी उम्मीदें होती हैं, और कुछ है जो सालता रहता है। अरुणप्रकाश का अपना जीवन भी ऐसी ही कई सालती रहने वाली कहानियों से बना था। उस दौरान पढ़ी उनकी कई कहानियों में एक होटल के स्टीवर्ड के जीवन पर भी थी। बाद में कभी हंस के स्तंभ 'आत्मतर्पण' में उनके लिखे का यह अंश पढ़ते हुए यह अनुमान हुआ कि शायद उस कहानी के किरदार वे स्वयं ही थे : ''लोदी होटल में वुडलेंड्स रेस्त्रां में अज्ञेय इलाजी के साथ आए थे. मैंने भोजन परोसा, भोजन के बाद जब टिप के पैसे इलाजी ने छोड़े तो अज्ञेय जी ने धीमे से उनका हाथ रोक दिया. उनसे टिप लेकर मैं एक बार और मर जाता।'  उनके इस लेख का आरंभ ही कुछ इस तरह है- 'कितनी मौतों का जिक्र करूं?'...''
हंस में उनका वह आत्मवृत्त 1992 में यानी आज से बीस साल पहले छपा था। वे उस दौरान सरकारी नौकरी छोड़कर अखबारों की नौकरियों और टेलीविजन सीरियलों वगैरह के लिए लिखने की अस्थिर दुनिया में कई तरह की चीजों से जुड़े थे। वे इस दुनिया में क्या करने आए थे? आत्मसम्मान की आश्वस्ति देने वाली नौकरी छोड़कर छल-कपट से भरी और आत्मविश्वास छीन लेने वाले इस नई आजीविका से उनके जैसा संवेदनशील और जीवन में बहुत कुछ भुगत चुका व्यक्ति आखिर क्या उम्मीद करता था?... दरअसल हंस के उसी लेख में उन्होंने अपनी मां के बारे में भी कुछ ऐसा लिखा था, जो मुझे हमेशा याद रहा. उन्होंने लिखा था- 'होश आते ही मैं मां से घृणा करने लगा था. वह मेरे लिए ममता की छांव नहीं आतंक की स्मृति थी. तभी तो भरी नींद से मुझे जगाकर मेरे चाचा ने बताया कि मेरी मां अस्पताल में मर गई तो मैं रोया नहीं और मेरे मुंह से एकबारगी निकला- भले मर गई!' 
यह कैसी विडंबना थी कि एक सांसद के पुत्र होकर भी उन्हें बचपन से ही अभावों से जूझना पड़ा। परायों पर निर्भरता के अपमान और फिर बीमारियां। उसी आत्मवृत्त में उन्होंने लिखा- ''ग्यारह महीने की जानलेवा बीमारी के बाद उठा तो बाईं टांग छोटी हो चुकी थी. वैशाखी से चलते-चलते मेरी आत्मा भी विकलांग हो गई थी.''
लेकिन महत्त्व की बात यह है कि उनकी आत्मपीड़ा ने हमेशा एक जीवट की ओर प्रस्थान लिया। चाहे वह ट्रेड यूनियन से उनका जुड़ाव हो, या सरकारी नौकरी छोड़ने का निर्णय।... बहरहाल अरुणप्रकाश प्राइवेट नौकरियों और फ्रीलांसिग के इस तंत्र में भी शायद बहुत सफल नहीं हुए। शायद हो भी नहीं सकते थे। उन्हें देखकर लगता था कि वे महत्त्वाकांक्षा और ईमान के विपरीत ध्रुवों के बीच अपने लिए कोई सही जगह तलाश रहे थे। लेकिन हिंदी की मौजूदा दुनिया में महत्त्वाकांक्षा जैसे लीचड़ किस्म के शब्द की चालाकियां उन्हें नहीं आती थीं, याकि वह उनकी फितरत नहीं थी। इसी संदर्भ में उनकी एक कहानी 'गजपुराण' की याद आती है, जो बीच में चलन में आए पाठकों को चौंका देने वाले नकली किस्म के सर्रियल मुहावरे में लिखी गई मालूम होती थी। किसी कार्यक्रम में अरुणप्रकाश उसका पाठ कर रहे थे। कहानी लंबी थी और सुनने वालों को बोर कर रही थी। कई पन्ने पढ़ने के बाद उन्हें इसका इलहाम हुआ, ऐसे में बाकी की कहानी को संक्षेप में बताकर उसे निपटा देना पड़ा।
उनसे मेरी एक लंबी मुलाकात तब हुई थी जब वे साहित्य अकादेमी की पत्रिका के संपादक थे। ऐसी चर्चाएं हवा में थीं कि वे वहां बिहार के किसी लिंक से पहुंचे हैं। पर बातचीत के दौरान उनसे उस पूरी प्रक्रिया के बारे में सुनकर कि कैसे उन्होंने पूरा आवेदन तैयार किया, कैसे इंटरव्यू हुआ, कैसे कन्नड़ की किसी बोली के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब उन्हें क्लिक कर गया-- मुझे यकीन हुआ कि इस डिटेलिंग में कोई बनावट नहीं हो सकती। उनकी देहभाषा और व्यवहार में एक ऐसा देशज तत्तव था जो शायद कुछ मौकों पर उनके आड़े आता रहा होगा, पर अगर कोई उससे परे होकर देख सकता, तो उसे जिंदगी की पड़ताल करता हुआ एक गहरापन उनमें सहज ही दिख जाता। उनकी बौद्धिकता में कोई हिप्पोक्रेसी नहीं थी। मुझे असगर वजाहत के उपन्यास 'कैसी आगि लगाई' के बारे में कही उनकी यह बात याद रही कि वह एक अनुभव-आक्रांत उपन्यास है। बाहर अंधेरा धीरे-धीरे गाढ़ा हो रहा था और भीतर देश-समाज के बारे में कोई बात चल रही थी। वे उन लोगों में थे जो आसपास हो रहे बदलावों में कोई उम्मीद देखते थे। मैंने उनसे प्रश्न किया कि भूमंडलीकरण के कारण अनायास चली आई बहुत सी चीजों और प्रभावों को क्या आप बदलाव मानते हैं, जबकि यह तो उसी तरह की बात है कि आपने कपड़े तो बदल लिए पर शरीर भीतर से वैसा का वैसा ही जर्जर है। उन्होंने इस प्रश्न का बहुत सटीक और आंख खोल देने वाला जवाब दिया था। उन्होंने कहा कि ''बदलाव दो तरह का होता है- रिवोल्यूशनरी और इवोल्यूशनरी; तुम रिवोल्यूशनरी बदलाव की बात कर रहे हो, पर इन इवोल्यूशनरी परिवर्तनों के महत्त्व को कभी कम नहीं समझना चाहिए। कई बार रिवोल्यूशन की जमीन इन्हीं के जरिए तैयार होती है।'' 
अरुण जी का पूरा जीवन नियति से टकराते बीता। मेरी जानकारी के मुताबिक वे एक विशुद्ध नास्तिक थे। नास्तिक को अपनी सारी लड़ाई अकेले लड़नी होती है। उसका साथ देने के लिए वहां कोई ईश्वर नहीं होता। उनके मामले में तो जैसे ईश्वर उल्टे उनके मुकाबले खड़ा था। बार-बार उनके जीवट का इम्तहान लेता। साहित्य अकादेमी की अच्छी-भली नौकरी के दौरान भी उन्हें बीमारी ने आ घेरा। पर वे अपनी लड़ाई में कभी हारे या थके नहीं। अपने अंतिम दिनों में बिस्तर पर पड़े-पड़े भी उनके पास लिखने की कई योजनाएं थीं, जिनका जिक्र वे मिलने जाने वालों से किया करते थे।

Friday, August 10, 2012

रह गईं दिशाएं इसी पार


वरिष्ठ लेखक संजीव ने अपने नए उपन्यास 'रह गईं दिशाएं इसी पार' में जैविकी को अपना विषय बनाया है। जाहिर है यह एक शोधपूर्ण उपन्यास है। इससे पहले उन्होंने भिखारी ठाकुर के जीवन पर भी एक शोधपूर्ण उपन्यास 'सूत्रधार' लिखा था। लेकिन उनका यह उपन्यास किंचित शोध-आक्रांत हो गया है। उन्होंने इसमें विषय के इतने मोर्चे खोल दिए हैं कि कथानक उनमें फंसा हुआ नजर आता है। टेलीपैथी से लेकर लिंग परिवर्तन, सरोगेट मातृत्व से लेकर जींस और हारमोंस के जरिए व्यक्तित्व परिवर्तन तक कोई मुद्दा इसमें छूटा नहीं है। इन सारे प्रसंगों से गुजरते हुए अनास्था की एक ऐसी दुनिया आबाद होती है जिसका कोई ओर-छोर या धुरी नजर नहीं आती। मनुष्य मनुष्य नहीं एक लोथ है, जिसकी आंतरिक और बाह्य संरचनाओं को बदल कर उसे कैसी भी शक्ल दी जा सकती है। उपन्यास का एक किरदार बिस्नू बिजारिया मांस और मछली का कारोबार करता है और बुढ़ापे में अपनी सेक्स की लस्ट को पूरा करने के लिए कायांतरण चाहता है। संजीव ऐसी बहुत सी स्थितियों की मदद से सृष्टि और जिजीविषा के दुर्द्धर्ष रूपों को पेश करते हैं। सुंदरबन के बंदर मछली खाते हैं, क्योंकि खारे पानी की वजह से खाद्य वनस्पति वहां पनप नहीं पाती, जैसे तथ्यों से लेकर प्रयोगशालाओं और बूचड़खाने के भीतर के दुर्दांत दृश्य उपन्यास में निरंतर प्रस्तुत होते रहते हैं। इसीके समांतर और इसी से जुड़ी एक छोटी कथा मछुआरिन बेला की है। बेला की मार्फत थोड़ा रोमांस, थोड़ा यथार्थ, थोड़ा संघर्ष उपन्यास में जगह बनाते हैं। मछली के व्यापार में कोल्ड स्टोरेज में काम की अमानवीय स्थितियां और मछुआरों की रोजी छीनते बड़ी पूंजी के ट्रालरों की यह कथा जाहिर है अपने यथार्थवाद के कारण ज्यादा जीवंत है।
संजीव प्लॉट के लेखक हैं। प्लॉट में स्थितियों के समायोजन से जो नैरेटिव बनता है, उसके वे पुराने सिद्धहस्त हैं। इस तरह एक कहानी बनती है जो लेखक की उंगलियों पर नाचती है। लेकिन यह उपन्यास सिर्फ कहानी नहीं है, उसमें विचार की एक भंगिमा भी है। इस अर्थ में सिर्फ विषय ही नहीं बल्कि विन्यास के स्तर पर भी यह परंपरा से अलग तरह का उपन्यास है। उसके वैज्ञानिक पात्र अक्सर साहित्य और  समाजशास्त्र आदि की भी चर्चा करते हुए दिखते हैं। इस तरह कई कथासूत्रों, कई विषय बिंदुओं से गुजरते हुए संजीव कहानी ही नहीं पाठक को भी इधर-उधर कुछ ज्यादा नचाते हैं। वे जब चाहे सार्त्र और फूको से लेकर ठाकुर प्रसाद सिंह और देवेंद्र मेवाड़ी तक के जिक्र उसमें खोंस देते हैं। उनके पात्र एक पंक्ति में लंदन और दूसरी में कोलकाता या आर्कटिक या राजस्थान पहुंचे हुए होते हैं। कुछ मौकों पर तो उनकी लेखकीय स्वेच्छाचारिता किसी चुटकुले नुमा स्थिति को अध्याय की लंबाई में बरतती दिखाई देती है। 'शुद्धता के प्रबल समर्थक डॉक्टर बलविंदर समलैंगिकता के समर्थक क्योंकर बने' नामक प्रसंग में डॉक्टर ने किसी बाहुबली के लिए ग्यारह साल की बच्ची को सोलह साल की बनाने का उपक्रम किया। लेकिन हारमोन ट्रीटमेंट से उसके मूंछ-दाढ़ी उग आए और वह फातिमा से फत्ते खां बन गई, और डॉक्टर सिंह को जा पकड़ा। इसी तरह समुद्र से डरने वाले घरघुसरा में डर के जींस को निष्क्रिय करने के नतीजे में वह समुद्र में चलता चला गया और मर गया। इस तरह संजीव अपने नैरेटिव में बहुत कुछ यहां-वहां फिट करते हुए उसे एक वंडरलैंड की-सी शक्ल देते हैं। सच्चाई यह है कि इस तरह का नैरेटिव किसी भी सत्य से ज्यादा कहानी की परवाह करता है। कभी कोई लोमहर्षक वृत्तांत डालकर, कभी रोमांस का कोई टुकड़ा डालकर वह पाठक को ललचाए रखता है। इस क्रम में कोई यथार्थपूर्ण वर्णन भी उसके लिए एक युक्ति भर होता है। संजीव अपने शोध को 'प्रामाणिक' बनाने के लिए बीच-बीच में कुछ सूक्त वाक्य डाल देते हैं। जैसे कि उनका एक वैज्ञानिक पात्र कहता है- 'फूको ने ठीक ही कहा है- सेक्स भी एक सत्ता है'। या एक्स और वाई क्रोमोजोम्स के मिलकर भ्रूण बनाने की भांति पति-पत्नी का मिलकर एक हो जाना 'सार्त्र का दर्शन' है। 
उपन्यास का केंद्रीय पात्र जिम अपनी नानी के गर्भ से जन्मा एक सरोगेट चाइल्ड है। 18 साल की उम्र में बॉटनी से एमएससी है। वह मानवीय संवेगों को जानते हुए भी उनसे परे है। वह भीषणतम स्थितियों में सहजता से टहलता है। अक्सर उसे जैविकी और दुनियावी कार्यव्यापार के बीच रिश्ता खोजते हुए दिखाया गया है। उसकी तटस्थता और निस्संगता एकबारगी को एक लेखकीय ज्यादती लगती है। लेकिन जिम ही नहीं उपन्यास के बहुधा पात्र इस किस्म के हैं कि वे किन्हीं जीवंत पात्रों के तौर पर नहीं बल्कि भूमिकाकार राजेंद्र यादव से शब्द उधार लें तो एक 'बहस' के सबब से उपन्यास में उपस्थित हैं। राजेंद्र यादव इसे जीव वैज्ञानिक और दार्शनिक बहसों का उपन्यास कहते हैं। लेकिन वास्तव में यह उपन्यास कोई बहस नहीं बल्कि एक आख्यान है। प्राणि-शरीर के वैज्ञानिक और पूंजीगत 'गिनी पिग' रूपों की जानकारी का आख्यान, जिसे जैविकी के लोमहर्षक ब्योरों, सृष्टि और जीवन की बाबत स्फुट विचारों और अछोर प्रकृति को लेकर  काव्यात्मक उदभावनाओं से विन्यस्त किया गया है। इसका प्रयोजन विज्ञान की उन्मुक्त निरंकुशता की ओर ध्यान खींचना नहीं है, बल्कि इस उन्मुक्तता के ब्योरों की कहानी कहना है। संजीव जीवविज्ञान के भीषण ब्योरों से रोमांच का रस पैदा करते हैं और मिथ, काव्य व विज्ञान की मदद से बहुत सी आत्मगत व्याख्याएं बनाते हैं। वे जैविकी से जुड़े प्रयोगों में कोई नैतिक चिंता तलाशने के बजाय शोध-आक्रांत खुर्दबीनी से एक 'तिलिस्मे होशरुबा' बना डालते हैं। उनके नायक को ट्रेडीशनल और सिंथेटिक इंसानों में संघर्ष का भय होने लगता है। उपन्यास की संदर्भ बहुलता में स्टालिन से लेकर चाणक्य और कालिदास तक पूरी सहजता से मौजूद हैं। 
उपन्यास जिस प्रविधि में लिखा गया है वह पूर्वार्ध में किंचित ज्यादा रोचक और आश्वस्तकारी है। इसकी वजह है कि विषय का सिलसिला यहां ज्यादा सुसंगत है। उत्तरार्ध में संजीव विषय को समेटने में थोड़ा अचकचा गए हैं। वे अमृतलाल नागर की परंपरा के लेखक हैं, जहां स्थितियां चित्रों की तरह दर्ज होती हैं। वे एक ग्लोबल कथानक में एक नाचीज यथार्थ की कहानी कहते हैं। मछुआरिन बेला की इस कहानी में मनुष्य की बेबसी और उसके आवेगों के चित्र खींचते हुए उनकी कलम की रंगत देखते ही बनती है। किंतु उत्तरार्ध में चीजें कुछ ज्यादा जादुई याकि बेपर की हो गई हैं। संजीव स्थितियों को चित्रात्मक ढंग से कहने के अपने कौशल को खुद ही धूमिल हो जाने देते हैं। इस लिहाज से बिस्नू बिजारिया के रहस्यमय लोक की तुलना में भारतीय यथार्थ का एक ज्यादा प्रतिनिधि पात्र किस्नू बिजारिया उपन्यास में थोड़ा कमतर रह गया है।

Saturday, August 4, 2012

पैरागुए में जीवन और राजनीति


पैरागुए के लेखक ख्वान मान्वेल मार्कोस के उपन्यास 'एल इन्विएर्नो दे गुंतेर' का अनुवाद हाल में 'गुंतेर की सर्दियां' नाम से प्रकाशित हुआ है। लेखक-अनुवादक प्रभाती नौटियाल ने इसे सीधे स्पानी भाषा से अनूदित किया है। एक जमाने में हुए रूसी उपन्यासों के अनुवाद के अलावा अंग्रेजी को बिचौलिया बनाए बगैर ऐसे सीधे अनुवादों के उदाहरण हिंदी में विरल हैं। इस उपन्यास के मामले में यह इस लिहाज से भी अहम है कि यह एक जटिल पाठ है। उसका मुहावरा अपनी तहों में धीरे-धीरे पाठक के आगे खुलता है। उपन्यास के प्रचलित अनुशासन से पूरी तरह जुदा इस मुहावरे में चल रही बात के बीच में अचानक कुछ ऐसे विवरण 'टपक' पड़ते हैं, जो प्रत्यक्षतः अपनी संदर्भहीनता में थोड़ा उलझाते और कई बार खीझ भी पैदा करते हैं, पर वस्तुतः वे कई बार एक बैकड्रॉप और कई बार एक आभासी मंतव्य होते हैं। पूरा उपन्यास बेतरतीब छोटी-छोटी स्थितियों से लेकर इतिहास और पैरागुए में अस्सी के दशक की राजनीति के संदर्भों तक फैला हुआ है। स्कूल या कॉलेज की किसी कक्षा के दृश्य से लेकर किसी वेश्यालय तक का मंजर उसमें बेतकल्लुफ चले आते हैं। शिक्षक अपने छात्रों को पैराग्वे के ग्वारानी और काराई कबीलाई समाजों के बारे में पढ़ा रहा है, लेकिन लेक्चर देते-देते रह-रहकर उसे एक संभोग के दौरान अपनी पार्टनर की उत्तप्त सक्रियता याद आ रही है। पूरा उपन्यास शिल्पगत उन्मुक्तता का एक नायाब उदाहरण है। इस उन्मुक्तता में एक कहानी बनती है, जिसमें कई स्तरों पर चलती जिंदगी की रंगतें हैं। इसमें कमतर सामाजिक हैसियत की मालिश करने वाली लड़की से शादी का इरादा बनाए हुए अल्बेर्तो है, उसकी बहन वेरोनिका और उसकी सहेली सोलेदाद हैं। इनके अपनी छोटी-छोटी ख्वाहिशें हैं, लेकिन सैनिक सत्ता एक रोज उन्हें गिरफ्तार कर लेती है। मार्कोस बहुत से फुटकर ब्योरों से शहर का परिदृश्य बनाते हैं। उनका हर पात्र एक बिल्कुल अलग किरदार है। कई मौकों पर घटनाएं काफी शांत भाषा में स्थिति के एक छिपे हुए उत्तेजक पहलू को सामने लाती हैं। महादूत गाब्रिएल के भक्त निस्वार्थ फादर मार्सेलिन की मृत्यु की औपचारिकताओं के कुछ अध्याय के बाद पता चलता है कि दरअसल उनकी मौत में आल्बेर्तो का हाथ था। अपनी एक विकृति अल्बेर्तो पर आजमाने की उनकी कोशिश के जवाब में अल्बेर्तो ने उनके कमरे में जहरीला सांप डाल दिया था। फादर के मरने की बात पता चलने से छात्र खुश थे, पर पादरियों ने उन्हें भ्रम देने के लिए उनके जुड़वां भाई को उनकी जगह बुला लिया था। 
उपन्यास में स्थितियों के वर्णन में कई तरह के प्रयोग देखने को मिलते हैं। कहीं एक स्थिति सिर्फ बातचीत के जरिए खुलती है तो कहीं विवरण के जरिए। अंग्रेजी पढ़ाने आई प्रसिद्ध प्रोफेसर एलीसा और निचली हैसियत वाली मालेना की बातचीत में दो चरित्र सामने आते हैं। कहीं कहीं तो कई-कई पैरों के आकार की किंचित अमूर्त 'उदभावनाएं' एक समांतर पाठ की तरह शामिल हैं। इस तरह यह उपन्यास अपने में ही कई शैलियों का सम्मिश्रण है। अभिव्यक्ति के कई तरह के प्रयोग इसमें एक साथ हैं। शायद यह जीवन की बहुस्तरीयता को समेटने का एक उपक्रम हैं। जीवन अपने ऊबड़खाबड़पन में इतनी तरह से निरंतर घटित होता है कि उसे सिर्फ पाठ के भरोसे नहीं समेटा जा सकता। यह उपन्यास उसकी एब्सर्डिटी, उसके अंतरालों और उसके आभासों के साथ संप्रेषण के कई प्रयोग करता है। उसमें 'दहलीज पर लंगर डाले कुत्ते की एक जोड़ी बूढ़ी आंखें गोया दोस्तोवस्की को पढ़ते-पढ़ते थक गई हों' जैसी चमकदार पंक्तियां रह-रह कर दिखाई देती हैं। इस उपन्यास में मार्कोस इतने ज्यादा प्रयोगशील हैं कि बीच-बीच में जब उन्हें रूढ़ किस्म के नैरेटिव पर लौटना पड़ता है, तो उसका सीधा-सपाटपन खटकता भी है : 'ऐसा बिल्कुल नहीं लगता था कि पुलिस को उस घटना की गुत्थियों को सुलझाने में किसी तरह की कोई रुचि थी। इसके विपरीत, ऐसा लगता था कि उस घटना को एक बहाने के रूप में इस्तेमाल कर जून में हुए छात्र-प्रदर्शनों के नेताओं के साथ वह अपना हिसाब चुकता करना चाहती है'। 
बावजूद इसके कि वृहद तौर पर एक निरंकुश राजनीतिक सत्ता उपन्यास की पृष्ठभूमि में निरंतर दिखाई देती है, यह उपन्यास रह-रहकर उस 'माइक्रो रियलिटी' के ब्योरों में जाता है जहां किसी गड्डम़ड्ड इतिहास  से निकलकर आए तरह-तरह के चरित्र अपने स्फुलिंग और जीवन जीने के अपने अभ्यास में एक दुनिया बनाते हैं। मार्कोस के समकालीन तुर्की के ओरहान पामुक के यहां मिलने वाला सर्रियल गठीलापन इसमें नहीं है, बल्कि एक ऐसी तन्मय स्फूर्तता है जिसमें स्थिति की उत्तेजना, उसका सस्पेंस, उसकी वक्रोक्तियां भी साधारण ढंग से बता दिए जाते हैं। विशेष बात यह है कि अपनी गढ़ाव-हीनता में भी उपन्यास की भाषा में एक चित्रात्मकता है, जहां से उसमें पठनीयता की चमक आती है। उपन्यास में उच्च वर्ग से ताल्लुक रखने वाले प्रोटागोनिस्ट गुंतेर दंपति अंत में अपनी ऊंची नौकरियां छोड़कर अपने देश लौटने का निर्णय करते हैं। गुंतेर कहता है- 'किसी लातिीनी अमेरिकी देश का राष्ट्रपति बनने के बजाय यहां के चालीस करोड़ निवासियों में से एक अनाम नागरिक के रूप में संतुष्टि महसूस करना जीवन का ज्यादा बड़ा उद्देश्य है।' यह वो नोट है जहां उपन्यास का सारा बोहेमियन ढांचा एक आकार ग्रहण करता है। ऐसे कई नोट उपन्यास में बीच-बीच में भी दिखाई देते हैं।