Monday, July 23, 2012

नाटकीयता एक हथकंडा है

मालूम पड़ता है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्राध्यापिका त्रिपुरारी
शर्मा के पास थिएटर का कोई सॉफ्टवेयर है, जिसमें वे अभिनय, संगीत,
स्थितियां, कास्ट्यूम, आलेख वगैरह डाल देती हैं और प्रस्तुति तैयार हो
जाती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में उनकी कई प्रस्तुतियां देखने के
बाद नवस्थापित मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के पहले बैच के छात्रों के लिए
निर्देशित उनकी प्रस्तुति 'तलछट' को देखते हुए कुछ ऐसा ही लगता है। भोपाल
के रवींद्र भवन में बीते सप्ताह इसका मंचन किया गया। यह ऐसी सॉफ्टवेयर
प्रस्तुति है जिसमें दुनियाभर का सबकुछ है पर असल चीज गोर्की का नाटक
'लोअर डेप्थ' कहीं नहीं है। लोअर डेप्थ 1902 के रूसी निम्नवर्ग की दुनिया
है, जिसमें छोटे-मोटे काम करने वाले कई तरह के पात्र अपनी क्षुद्रताओं,
बेमुरव्वती, और झगड़े-टंटों के साथ किसी बड़े से हाल या अहाते जैसी जगह
पर अपने-अपने कोनों में रहते हैं। गोर्की उनकी लाचारियों और घटियापन के
दरम्यान लूका नाम के एक बूढ़े पात्र के जरिए जिंदगी की उदात्तता का एक
पाठ बनाते हैं। नाटक में उसका देशकाल और यथार्थ इतनी ठोस चीज है कि उसका
कोई भी रूपांतरण उतना ही ठोसपन मांगता है। लेकिन यहां तो नजारा ही कुछ और
है। दृश्य के खुलते ही मंच पर नए-नए सिलाए गए रंग-बिरंगे कपड़ों में
पात्र 'चाक्षुष' छवियों में मौजूद दिखाई देते हैं। ऐसा होने का एक तर्क
है कि यह मालवी कार्यशाला की प्रस्तुति है कि यह छात्रों की ट्रेनिंग का
एक उपक्रम है। ये दरअसल थिएटर के डिजाइनवाद का एक तर्क है। राष्ट्रीय
नाट्य विद्यालय की कृपा से डिजाइन एक स्वायत्त वस्तु बन चुकी है, और अब
मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय भी इसकी चपेट में है। प्रस्तुति में न पात्रों
के किरदार स्थापित हो पाते हैं, न उनके संबंध और संबंधों का तनाव, न उसका
देशकाल और यथार्थ। लब्बोलुबाब यह कि दो घंटे तक मंच पर जैसे होने के लिए
कुछ-कुछ होता रहता है। डिजाइनवाद की वजह से नाटकीयता खुद में ही एक
हथकंडा बन गई है। नतीजा यह कि लूका का किरदार मंच पर जोकर की तरह मौजूद
है। वह बूढ़ा है पर जवान दिखता है। वह एक नकली दा़ढ़ी लिए है, जिसे कभी
लगा लेता है कभी उतार देता है। मेकअप की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि
दर्शको समझ जाओ कि यह सारा कुछ एक नाटक है!. पात्रों के आपसी संबंध का
कोई तंतु यहां विकसित नहीं होता। वे अभिनय नाम की एक कवायद किया करते
हैं, जिसमें पात्रों को बता दिया गया है कि तुम्हारा नाम 'अंतरा' है,
तुम्हारा नताशा, तुम्हारा मानस, तुम्हारा कैलाश। ये सारे नाम स्लम जैसी
जगह में रहने वाले गरीब लोगों के हैं। कुछ अरसा पहले त्रिपुरारी शर्मा ने
शेक्सपीयर के 'ओथेलो' की भी ऐसी ही प्रस्तुति 'नौटंकी शैली' में तैयार की
थी, जिसमें इसी किस्म के नामकरण किए गए थे।
बहरहाल इस प्रस्तुति में संजय उपाध्याय का संगीत भी उसका एक पक्ष है।
प्रस्तति में 'ओ मोरी भौजी, जाना नाहीं नैहर' जैसे बोलों पर रह-रहकर
लोकधुनें सुनाई देती हैं, लेकिन अपने तईं उनका सारा माधुर्य तब धरा रह
जाता है, जब याद आता है कि यह सारा कुछ उस नाटक का हिस्सा है जिसके
यथार्थवाद ने स्तानिस्लावस्की को पहली बार एक बड़े निर्देशक की पहचान
दिलाई थी। 'तलछट' नामक यह प्रस्तुति लोअर डेप्थ का कोई संस्करण नहीं,
बल्कि एक समीकरण मालूम देती है, जिसके पात्र दुर्द्धर्ष यथार्थ को
फेस्टिविटी में तब्दील कर देते हैं। यह कुछ उसी तरह की बात है, जैसे 'आधे
अधूरे' को कोई कॉमेडी के तौर पर करने लगे (हालांकि वैसा भी आजकल होने लगा
है)। प्रस्तुति में न यथार्थ है, न मालवा। पूरी प्रस्तुति एक ऐसी फिल्म
की तरह है, जिसमें सिंक्रोनाइजेशन की त्रुटि के कारण होंठ अलग जा रहे
होते हैं और स्वर अलग।

Friday, July 20, 2012

मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसी की भंगिमाएं

बहावलपुर हाउस के सम्मुख प्रेक्षागृह में बीते सप्ताह प्रस्तुति 'हिल्डा'
का मंचन किया गया। हिल्डा मिसेज लेमर्चांद की नौकरानी है। पूरा नाटक उसी
के निमित्त से आगे बढ़ता है, पर खुद हिल्डा मंच पर कहीं नहीं है। इस तीन
पात्रीय नाटक के दो प्रमुख पात्र हिल्डा की मालकिन और उसका पति फ्रैंक
हैं। हर फेड इन फेड आउट के बाद इन्हीं में वार्तालाप होता दिखाई देता है।
यानी एक जैसा दृश्य एक जैसे पात्र, और लगभग एक जैसे ही संवाद। मंच के
बीचोबीच सफेद रंग का एक वृत्त है, जिसकी सीमारेखा पर कई एंगल खड़े कर दिए
गए हैं। नाटक में कोई एक्शन नहीं होने से पात्र एक पट्टी के जरिए इन एंगल
के बीच बुनकरी किया करते हैं। पीछे के एंगल ऊंचे हैं। फ्रैंक के घर आई
मालकिन बोल रही है, उससे कॉफी बनाने के लिए कह रही है और फ्रैंक इन एंगल
के बीच पट्टी लपेटने में व्यस्त उसे सुन रहा या अनसुना कर रहा है। आगे के
एंगल छोटे हैं। गुस्से में उबल रहा मालकिन के घर आया फ्रैंक उससे हिल्डा
को बुलाने के लिए कह रहा है, पर वह मुस्कराकर उसकी अवहेलना करती हुई इन
छोटे एंगल के बीच पट्टी से जाल बना रही है। धीरे-धीरे दिखाई पड़ता है कि
शुरुआत की तुलना में दृश्य में एक परिवर्तन आ गया है। मंच के सुथरेपन में
एक अनगढ़ आकार उभर आया है। कहानी का जैसा भी तनाव है, उसमें यह चीज
आहिस्ता, संलग्नता और किंचित अनायास तरह से घटित होती है।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक प्रशासन एस. मल्टियार निर्देशित इस
प्रस्तुति का तनाव प्रोसीनियम थिएटर की दो अहम चीजों- अभिनय और साइलेंस-
से बनता है। हिल्डा को एक तरह से बंधक बना लेने वाली मालकिन की भूमिका
में गीता गुहा एक उच्च मध्यम वर्ग की अहंकारी, आत्मतुष्ट और हिंस्र
स्त्री की दिखावटी सौजन्यता की अच्छी भंगिमाएं लिए हुए हैं। वह बताती है
कि वह कितनी दयालु और नेक है और नौकरानी को बराबर का समझती है। कि चाहे
हिल्डा मेरी नौकरानी है, पर इसका यह मतलब तो नहीं कि मैं उसकी बेइज्जती
करूं। उसके संवादों में मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसी की एक अपनी नाटकीयता है।
वह नौकरानी को अपनी ही तरह साफ-सुथरा बनाने की ज्यादतियों और उसे स्मार्ट
बनाने के नाम पर उसके बाल काट देने को 'डेमोक्रेसी इन एक्शन' बताती है,
पर उसे शिकायत है कि जब वह चाय पीते हुए हिल्डा से बात करना चाहती है, तब
वह बच्चे को दूध पिलाने में व्यस्त रहकर उसकी बेइज्जती क्यों करती है।
फ्रैंक की भूमिका में टीकम जोशी भी अपनी पत्नी को लेकर परेशान कामगार की
भूमिका में ठीकठाक हैं। एक तीसरी लेकिन गौण भूमिका में अंशुल चौहान
हिल्डा की बहन बनी हैं, जो उसकी अनुपस्थिति में घर की देखभाल के लिए आई
हुई है। लेकिन अपनी भूमिका और अभिनय में सबसे ज्यादा गीता गुहा ही मंच पर
दिखती हैं। उनके किरदार में परपीड़ा की कई रंगतें हैं। हिल्डा को कैद
करने के बाद वह फ्रैंक से फ्लर्ट करना चाहती है। आलेख के स्तर पर नाटक कई
चीजों को खुद में समेटे हुए है पर इसमें अंतर्वस्तु के स्तर पर वो जटिलता
नहीं है। बल्कि अपनी नाटकीयता में वो थोड़ा लड़खड़ाया हुआ लगता है।
फ्रैंक ने एडवांस रकम ले ली है, इसलिए हिल्डा को बंधक रहना होगा- यह किस
जमाने का कैसा तर्क है? लेकिन प्रस्तुति की अच्छी बात यह है कि वह डिजाइन
और चरित्रांकन के जरिए एक गति निर्मित करती है। और कुछेक चूकों के बावजूद
उसका सारा विधान अंततः दर्शक को बांधे रखता है।

Tuesday, July 17, 2012

गोदो जैसे गणतंत्र में



सनसप्तक थिएटर ग्रुप की प्रस्तुति 'रिटर्न ऑफ गोदो' का प्रदर्शन बीते दिनों मुक्तधारा प्रेक्षागृह में किया गया। प्रस्तुति एक प्रहसननुमा कवायद है। निर्देशक तोड़ित मित्रा ने इसमें  'वेटिंग फॉर गोदो' के ढांचे को सूत्र की तरह बरतते हुए 'पहचान के उत्तरआधुनिक संकट' के मसले को 'बेतरतीब शैली' में डिजाइन किया है। यह एक वर्कशॉप प्रोडक्शन है, जिसमें मुख्य दोनों पात्र गोगो और उसका साथी भाभा मंच पर लगातार मौजूद हैं। अपनी वेशभूषा में ये दोनों कॉलेज के छात्र दिखाई देते हैं। प्रस्तुति आगे बढ़ती है तो कई तरह के पात्र उसमें शामिल होते रहते हैं। नाटक का पोजो यहां लगातार मोबाइल पर बात कर रहा है। वह दलालनुमा एक शख्स है। उसकी गाड़ी खींचने वाली शख्स एक बुढ़िया है। उसके गले में पड़ी रस्सी को प्रस्तुति में 'सपनों का फंदा' कहा गया है, 'इसी सपने की डोर से तो हमारी डेमोक्रेसी का झंडा लटकाया गया है'। बुढ़िया लगातार चुप रहती है, या फिर अचानक चीख पड़ती है। जिस गोडो का इंतजार किया जा रहा है, वह असल में कल्कि देवता है जिसके कलियुग में नमूदार होने की बात परंपरा में सुनी जाती रही है। एक पात्र को इस बारे में कुछ भी नहीं पता। वह पूछता है- यह कल्कि क्या गुड़गांव में कहीं रहता है? परंपरा की बात उठने पर एक पात्र कहता है कि परंपरा की नुक्ताचीनी को तो लोकसभा चैनल तक ही सीमित रहने दो। प्रस्तुति ऐसे ही बहुत से असंबद्ध लेकिन चुटीले संवादों और वैसे ही पात्रों का एक कोलाज है। मंच पर रह-रह कर दिखने वाले कई तरह के पात्रों में सड़क पर छोटे-मोटे काम करने वाले दो नौजवान हैं, एक हिजड़ा है, और बाद में गोदो बहुराष्ट्रीय कंपनी के अधिकारी की पोशाक में मंच पर दिखता है। हिजड़े की भूमिका में कार्तिकेय क्षेत्रपाल के अभिनय में अच्छा आत्मविश्वास दिखता है। वो दोनों मुख्य पात्रों से कहता है कि किसी भी जगह ज्यादा देर नहीं बैठना चाहिए, इससे वहां धब्बा पड़ जाता है।...और इंसान भी तो धब्बा ही है। लंबे घाघरे में वो गणतंत्र को गोडो की तरह बताता है, जिसका इंतजार तो है पर वो दिखता नहीं है। इसी तरह ईमान की बात उठने पर एक पात्र बताता है कि उसका एबॉर्शन हो गया है। 
नाटक का गोडो 'भूमंडलीकरण और उदारीकरण की पोशाक में पतित उत्तरआधुनिक बहुराष्ट्रीय निगमों का रूपक' है। निर्देशकीय के मुताबिक नाटक में स्थितियों की अस्तव्यस्तता दरअसल हमारे समकालीन राजनैतिक और सामाजिक अनुभवों को दर्शाती है। वे अनुभव जो एक गहरे विभ्रम के वातावरण में आकार लेते हैं। इस तरह तोड़ित मित्रा सैमुएल बैकेट के नाटक के मुहावरे की एक समकालीन व्यंजना तैयार करते हैं। उनके मुताबिक 'नाटक के दोनों मुख्य पात्र इस सवाल के जवाब की तलाश में हैं कि क्यों उनकी पीढ़ी एक संज्ञाहीन दुर्गति की ओर उन्मुख है. इस क्रम में वे एब्सर्डिटी के घनचक्कर में जा गिरे हैं. नाटक वैश्विक स्थितियों में मध्यवर्ग के तेजी से बदलते अस्थिर हालात को सामने लाता है. मूल्य धुंधले हो चुके हैं, हर ओर उदासीनता है. जो भी सच्चा या खरा माना जाता है, वह मानो एक आभासी यथार्थ में हुआ करता है।'  
प्रस्तुति में बैकड्राप में एक पेड़ बना हुआ है, जहां एकाध दृश्य में एनिमेशन के कुछ प्रयोग दिखाई देते हैं। आगे की ओर बाएं कोने पर पाश्चात्य उपकरणों वाला वैसा ही संगीत पक्ष है, दृश्य परिवर्तनों के दौरान उसपर भी फोकस बनता है।  

Wednesday, July 11, 2012

भूलने का रास्ता, बोलने का रास्ता


अरविंद गौड़ निर्देशित नई प्रस्तुति 'थर्टी डेज इन सेप्टेंबर' की कहानी 'चाइल्ड एब्यूज' के विषय पर केंद्रित है। इसके लेखक महेश दात्तानी हैं और अंग्रेजी से इसका हिंदी अनुवाद स्मिता नरूला ने किया है। बीते सप्ताह श्रीराम सेंटर में थिएटर ग्रुप अस्मिता ने इसका मंचन किया। अरविंद गौड़ की प्रस्तुतियों में अक्सर मंच पर काफी भीड़भाड़ होती है, जो इस प्रस्तुति में नहीं है। रंगमंच की अपनी खामोशी में अगर बात खुले तो ज्यादा कारगर होती है जैसा कि इस प्रस्तुति में है। मंच के दाहिने छोर पर स्पॉटलाइट में नाटक की मुख्य पात्र बेबाक-बेचैन माला दिखाई देती है। उसके मामा ने सात साल की उम्र में उसके साथ जो किया, उससे पुरुष नाम का तत्त्व उसके किरदार की एक ग्रंथि बन गया है। दो-तीन नपे-तुले दृश्य उसके इसी साइको किरदार का एक चित्र बनाते हैं। वह खुद से प्रेम करने वाले दीपक का घर में प्रवेश तक बर्दाश्त नहीं कर सकती, और ऐसा होने पर बुरी तरह बौखला जाती है। वह अपने एक परिचित को जानबूझकर उसकी प्रेमिका के सामने बेवफा साबित करवा देती है, वह एक शख्स पर झूठमूठ तोहमत लगा देती है कि वह उसकी ओर घूर रहा है। उसका यह जटिल किरदार बार-बार अपनी मां से जानना चाहता है कि जब 'वह सब' हो रहा था तो सबकुछ जानकर भी वह खामोश क्यों बनी रही। हर समय पूजा-पाठ में लगी रहने वाली मां उसके ऐसे सवालों को टालने की कोशिश करती है। वह चाहती है कि माला शादी कर ले। 
महेश दात्तानी उन जटिल परिस्थितियों की कहानी कहते हैं जिनमें ऐसी घटनाएं लंबे समय तक घटा करती हैं। वे अपने पात्रों के मनोविज्ञान को खोलने की और उन परिस्थितिगत कारणों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, जिनमें इस तरह के मामले आकार लेते हैं। उनके नाटक का कथानक इस अर्थ में कम नाटकीय और ज्यादा आधुनिक है। महेश दात्तानी यथार्थ में रस लेने की प्रचलित प्रवृत्ति की तुलना में उसकी तफ्तीश में ज्यादा रुचि दिखाते हैं, और इस नतीजे तक पहुंचते हैं कि चीजों के बारे में न बोलना अपने में एक बड़ी समस्या है। फिर भी उन्होंने इस सच को नाटक के अंत के लिए बचाकर रखा है, कि मां भी अपने बेटी की तरह उसी की उम्र में अपने उसी भाई की पशुता का शिकार हुई। इस मां के लिए जीवन जीने का सबसे बेहतर रास्ता है- उस कटुता को भुलाकर भगवान में खुद को लीन कर लेना। लेकिन बेटी एक दूसरे तरह की प्राणी है। उसे न सिर्फ अपने साथ घटी उन घटनाओं का गहरा हीनताबोध है, बल्कि उस दौरान अपने शरीर के लुत्फ पर गहरी शर्म भी। मां उससे कहती है-- लुत्फ को भूल जाओ, क्योंकि यही एकमात्र रास्ता है।  
मंच के बाएं छोर पर शिल्पी मारवाह प्रोटागोनिस्ट माला के बचपन के प्रतिरूप के तौर पर पैरों में सिर घुसाए उसकी व्यथा को ज्यादा प्रत्यक्ष बनाती हुई बैठी हैं। हालांकि बीच में जब-जब रोशनी का फोकस उसपर होता है तो उसकी अनवरत सिसकियां बात के तनाव में एक खलल ही ज्यादा पैदा करती हैं। एक आधुनिक आलेख विषय के दुख और करुणा में चक्कर काटने के बजाय उसके वैयक्तिक-सामाजिक पहलुओं की जटिलता में जाता है। अरविंद गौड़ ऐसी एक जटिलता का एक मौके पर अच्छा दृश्य खींचते हैं। मंच के एक छोर पर माला और उसका प्रेमी है, जहां अपनी मनोगत ग्रंथियों में उलझी माला के लिए प्रणय की हर चेष्टा असह्य हो रही है। इसी बीच मध्य स्टेज से आकर मामा बना पात्र उनके पीछे की जगह में 
आकर खड़ा हो गया है। वह एक पात्र नहीं माला के मन की एक मनोवैज्ञानिक कुंठा है। दृश्य में उसके प्रेमी द्वारा उसे छुए जाने पर उसकी तड़प और पीछे रोशनी में एक विद्रूप से होते जा रहे चेहरे वाले शख्स की मौजूदगी, रोशनी और संगीत के जरिए दृश्य एक मुकाम पर पहुंचता है।  
प्रस्तुति में स्टेज पर अतिरिक्त कुछ नहीं है। हालांकि घर के दृश्य में तीन काले स्टूलों की थोड़ी बहुत ड्राइंगरूमनुमा सजावट शायद उपयोगी होती। अभिनय का स्तर भी प्रस्तुति में ठीक था। माला की भूमिका में अमिता वालिया और मामा की भूमिका में बजरंग बली सिंह और मां की भूमिका में समीना शेख प्रभावशाली थे।

Monday, July 9, 2012

मन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा

आवाज पर उनका काबू कमाल का है। अभिनेता-गायक शेखर सेन अपनी एकल प्रस्तुति 'कबीर' में इसी आवाज से कबीर के जीवन का एक वृत्त पेश करते हैं। उनकी गायकी में एक ऊंचे स्तर की शास्त्रीयता है और वाचिक अभिनय में असंख्य छवियों का खजाना। वे कबीर के जीवन के प्रसंगों को उनकी रमैनियों, साखियों और दोहों से जोड़ते हैं। और कई तरह के किरदार इस बीच उनके आसपास उठते-बैठते 'दिखाई' देते हैं। कभी पिता नीरू, कभी दोस्त जगन, कभी अम्मां, जिसे लगता है कि बेटा 'अघोरिन के चंगुल में फंस गया है', ललुआ मिसिर, कबीर को काफिर कहने वाली रंगरेजिन चाची। अवधी और भोजपुरी के मिश्रण से बनी अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कबीर कहते हैं- 'बकरा बना दिया हमें दुनिया।...' 
होंगे बहुत ऊंचे संत कबीर, पर शेखर सेन के यहां तो उनके जात बाहर कर दिए गए बाप ही उनसे तंग आए हुए हैं कि काहे काफिर को घर ले आए, जो अजान को मुल्ला की बांग कहता है। अपने को काफिर और दलिद्दर कहे जाने से सशंकित कबीर जोगियों से दूर खड़ा है। तब चिलम पीते जोगी हंस पड़ते हैं- अरे तू काफिर नहीं... तू तो अल्लाह मियां के घर की गाय है गाय। धीरे धीरे जीवन के पाठ सीख रहे कबीर कहते हैं- कर्म करो, कर्मकांड मत करो। अरे जिसके आंचल में यह नीला आसमान भी छोटा दीखे, उसे मूरत बनाकर छोटा मत करो।  
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सौजन्य से और वहीं के आजाद भवन में  हुई इस प्रस्तुति के दौरान प्रेक्षागृह पूरी तरह खचाखच भरा था। बार-बार मना करने के बावजूद इन चले आए दर्शकों के कैमरे की रोशनियां, मोबाइल की रिंगटोन और फुसफुसाहटें खत्म होने को नहीं आ रही थीं। शेखर सेन को कई बार प्रस्तुति रोकनी पड़ी। उन्होंने दर्शकों को मृत्युशैया पर पड़े रावण की 'इंप्रोवाइज्ड' कथा सुनाई। रावण के दरबारियों ने उनसे कहा कि आपके बाद हमारा और हमारे आसुरी आनंद का क्या होगा। रावण ने कहा फिक्र मत करो दो युगों के बाद आने वाले कलियुग नामक युग में मोबाइल नाम के एक यंत्र का आविष्कार होगा, जिसके जरिए वह आसुरी आनंद आपको हासिल हो सकेगा। शेखर सेन की यह प्रस्तुति, जैसा कि उन्होंने इन व्यवधानों के दौरान बार-बार दर्शकों को याद दिलाया, छह सौ साल पहले के कालखंड में जाने की कोशिश थी। 
यह शेखर सेन के ही वश में था कि लगातार व्यवधान के बावजूद वे अपनी एकाग्रता को बनाए रखते हैं। उनके कबीर घर-बाहर के खटरागों और पचड़ों में उलझे जीवन की समझ हासिल करते हैं। नाराज अम्मा से नाराज होते- 'ऐ रज्जो, बोल दे अम्मां से जा रहे हैं घर छोड़ के।' फिर दर्शकों को बताते हैं, कि जवानी का साहस था और ऊपर वो साहेब था, इसलिए निकल पड़े। बाद में अम्मां की जिद पर कबीर ने शादी तो कर ली। पर पहले ही रोज लोई ने जब उन्हें बताया कि 'हमरे गांव के साहूकार के छोरा से हमारा नेह रहल' तो वे उसे उसके प्रेमी से मिलाने ले चलते हैं। पर लोई का मन इस बीच बदल गया है। उनके कंधे पर बैठी वह रो रही है। 
न सिर्फ स्वर और गायन, बल्कि यह एक ऊंचे दर्जे का नाट्यालेख भी है। यह आलेख बहुत सी स्थितियों को ही नहीं बोलीबानी के एक पूरे मिजाज को भी समेटे हुए है। इस आलेख में रैदास हैं, जो 'काम करैं चमड़ा का और बात करैं आत्मा का', सिकंदर शाह लोदी है, जो बादशाही रौब में कबीर से पूछता है- 'ऐ जुलाहा, तू इस्लाम मानत है या नाहीं?' तो कबीर कहते हैं- 'हम तो इस्लाम को मानत हैं, पर तू इस्लाम को जानत है या नाहीं?' बाबा शेख फरीद हैं, जिनसे सारी बात आंखों ही आंखों में हुई, नाववाला डाकू अजीत सिंह है। शेखर सेन निर्गुण ईश्वर में यकीन रखने वाले कबीर की एक यथार्थवादी छवि बनाते हैं। जीवन की बहुतेरी रंगतें इस छवि को अधिक स्वीकार्य बनाती हैं। प्रस्तुति कबीर की कविता में निहित जीवनबोध का एक पाठ बनाती है। मंच पर इसका लालित्य देखते ही बनता है। बूढ़ी होती मां की आवाज कुछ और जर्जर हो गई है। मंच से ऐसे स्वरों को सुनते हुए पूरे चेहरे आंखों के आगे बनते हैं। 
शेखर सेन की प्रतिभा के आप कितने भी कायल हों, पर प्रस्तुति के बाद उनका यह कहना थोड़ा हैरानी में डालता है कि प्रभु की कृपा और गुरु के आशीर्वाद के बगैर दो घंटे तक यह प्रस्तुति करना नामुमकिन है। कई साल पहले उनकी एक इसी तरह की और इतने ही पाये की प्रस्तुति- शायद सूरदास पर- देखी थी। वे विवेकानंद और तुलसीदास पर भी अपनी एकल प्रस्तुतियां पेश करते रहे हैं। उनके यहां कोई अनगढ़पन नहीं है। मंच पर मौजूद स्क्रीनों पर कुछ स्थितियों के दौरान आग और तालाब की छवियां उभरती हैं और पानी के स्वर भी। रोशनी का एक सुघड़ इस्तेमाल तो था ही। खास बात यह कि इतने सुघड़ और प्रोफेशनल होते हुए भी स्पष्ट ही वे एक नेचुरल आर्टिस्ट हैं। वे अब तक बारह सौ से ज्यादा ऐसी एकल प्रस्तुतियां कर चुके हैं।  वे एक पीछे छूट रही भारतीय परंपरा के समर्थ और सफल प्रस्तुतकर्ता हैं।

Sunday, July 8, 2012

अपलक निद्राहीन सारी रात


थिएटर ग्रुप आकार कला संगम ने पिछले सप्ताह युवा रंगकर्मी दक्षिणा शर्मा के निर्देशन में बादल सरकार के नाटक 'सारी रात' का मंचन किया। बारिश से बचने के लिए एक युवा पति-पत्नी कहीं वीराने में बने एक मकान में जा पहुंचे हैं। रात की स्याही में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। फिर हालात धीरे-धीरे स्पष्ट होते हैं। यह एक अस्तव्यस्त कमरा है जहां कोई स्टूल कोई मुखौटा आदि इधर-उधर लुढ़के पड़े हैं। पत्नी डर रही है, पति बाहर बारिश का जायजा लेने गया है। उन्हें सुनाई देता है कि उनकी कुछ आवाजें रह-रहकर एक प्रतिध्वनि में तब्दील हो रही हैं। कुछ ही देर में पीछे के कमरे से एक उम्रदराज शख्स वहां प्रकट होता है। वह वहां अकेला रहता है और अनिद्रा का मरीज होने से सारी रात जागता रहता है। वह सब जानता है और पति-पत्नी की मनःस्थिति का गुणा-भाग करके दोनों की सही-सही उम्र बता देता है। हालांकि उसका कहना है कि जानना सांत्वना और कल्पना दोनों को नष्ट कर देता है। पत्नी को लगता है कि 'आप हर बात का एक कवित्तपूर्ण अर्थ कर देते हैं..कुछ ऐसा है जिसे आप खींचकर बाहर निकाल देना चाहते हैं।' पत्नी और इस शख्स की बातचीत के जरिए एक चौथा अनुपस्थित पात्र रंजन नाटक में दाखिल होता है। यह रंजन कभी स्त्री का प्रेमी था। और अब स्त्री को लगता है कि यहां वीराने में अनायास मिला यह शख्स दरअसल रंजन ही है। लेकिन वह ऐसा मानने को तैयार नहीं है। उसका कहना है कि मेरा उत्तरपुरुष रंजन था। स्त्री कहती है- मैं जिस रंजन को जानती हूं वह आकाश है, वायु है। इस तरह नाटक अंतर्वस्तु से एक छायावाद की ओर उन्मुख होता है। और जाहिर है ऐसे में पति के हिस्से में विलेन बनना ही आता है। पत्नी उससे कहती है- मेरा सब कुछ क्या था- क्या तुमने जानना चाहा? मैं तुम्हारी सुख-सुविधा का उपकरण मात्र थी। 
बादल सरकार नाटक में जीवन की जड़ता के बरक्स उसकी आत्मिक संभावनाओं का पाठ बनाते हैं। स्त्री के लिए निर्बोध और कारणहीन-युक्तिहीन प्यार एक ऐसी ही संभावना है। नाटक के अंतिम हिस्से में रंजन उसका सपना या सपने का इलहाम बन चुका है, और निद्राहीन पुरुष ने जाना है असंभव के संभव होने को। 
नाटक कुछ इस तरह का है कि बात छोटी है पर उसका वितंडा ज्यादा है। कथ्य को बाहरी अवयवों से परिपुष्ट बनाने की चेष्टा की गई है। उदाहरण के लिए शुरुआत के दृश्यों में पात्र कई बार अनावश्यक रूप से उत्तेजित नजर आते हैं। बारिश, खिचड़ी, ताश और साड़ी प्रसंग इस क्रम में एक साहित्यिक नैरेटिव के उपकरण मालूम देते हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि निर्देशिका ने मुख्य किरदार को जादूगरनुमा बना दिया है। बूढ़े की भूमिका में सुमन वैद एक काला चोगा पहने हुए हैं। इस चोगे को लहराते हुए वे रहस्यमय अंदाज में फुर्ती से मंच पर इधर से उधर जाते हैं। पीछे एक मकड़ी का जाला भी बना है। यह 'उक्ति वैचित्र्य' नुमा नाटकीयता इन दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े रंगकर्मियों में आम हो गई है। जबकि यह किरदार स्पष्ट रूप से यथार्थवादी नाटकीयता की मांग करता है। इस अर्थ में बाकी दोनों पात्र अपने अभिनय और निर्मिति में ठीकठाक हैं। अंशु पवार और नीलेश कुमार दीपक पति-पत्नी की भूमिकाओं में ठीक लगते हैं। अंशु पवार के अभिनय में एक गहराई दिखती है।

Wednesday, July 4, 2012

बीएम शाह का त्रिशंकु

बीएम शाह ने सातवें दशक में त्रिशंकु नाम से एक नाटक तैयार किया था,
जिसकी प्रस्तुतियां बाद में अधिक नहीं हुईं। दिल्ली के रंगकर्मी राजेश
दुआ ने बीते दिनों दिल्ली के पूर्वा सांस्कृतिक केंद्र में इसका मंचन किया। यह नाटक
के भीतर नाटक की आभासी संरचना को एक अति की युक्ति में इस्तेमाल करती
प्रस्तुति है। निर्देशक ने दर्शकों के बीच कुछ अपने दर्शक भी बैठाए हैं।
नाटक एक प्रहसननुमा स्थिति से शुरू होता है, जिसमें राजा महंगाई से
त्रस्त जनता पर लाठीचार्ज करने का आदेश दे रहा है। पर तभी ये 'दर्शक'
अभिनेताओं पर टमाटर फेंकने शुरू कर देते हैं। वे घिसा-पिटा नाटक नहीं
देखना चाहते। नतीजतन निर्देशक को मंच पर आना पड़ता है। सवाल है कि बढ़िया
नाटक क्या है। जवाब है कि जिसमें सिनेमा जैसा कुछ हो। लेकिन नहीं,
निर्देशक के मुताबिक अच्छा नाटक समस्या से बनता है। ऐसे में उसे अब अच्छे
नाटक के लिए अपने अंतर्द्वंद्व से जूझता एक किरदार चाहिए। इस तरह कई
किरदार मंच पर एक-एक कर दर्शकों के बीच से आते हैं। ये सत्तर के दशक की
छवियां हैं, जिनमें जोकरनुमा एक नेता है, एब्सर्डिटी बनाम अस्तित्ववाद के
रटंतू समीकरण में उलझा बुद्धिजीवी है, एक नौकरशाह है, जिसने बड़े-बड़े
महकमे चलाए हैं। निर्देशक को लगता है कि बुद्धिजीवी बहुत कड़वी बातें
करता है, पर बुद्धिजीवी का तर्क है कि ज्ञान हमेशा कड़वा ही होता है, और
जिंदगी के इस उलझे सफर में सब अकेले हैं। उधर नौकरशाह निर्देशक से अपने
अंतर्द्वंद्व पर नाटक बनाने का आग्रह कर रहा है, पर निर्देशक के लिए ये
सब आम पात्र हैं, जबकि उसे खास पात्र की तलाश है। यह खास पात्र एमएससी
पास नौकरी की तलाश करता एक युवा है। वह क्रांति लाकर बड़ा आदमी बनना
चाहता है, लेकिन क्रांति कैसे आएगी यह उसे नहीं मालूम। अंततः इसी युवा का
कन्फ्यूज्ड किरदार नाटक के केंद्र में दिखाई देता है। वह कहता है, मेरा
हाल मॉडर्न लिटरेचर की तरह है- समझ में ही नहीं आता। नाटक के एक दिलचस्प
दृश्य में एक लड़की का सामान पटकता हुआ कुली उससे अपने मेहनताने के लिए
झगड़ रहा है। ऐसे में नाटक का नायक 'युवा' लड़की की मदद को आगे आता है।
पर कुली के अपने तेवर हैं। वह कहता है- इन बाबूजी की तरह मां-बाप का नहीं
अपनी मेहनत का खाता हूं। और ये बाबूजी हैं कि छोकड़िया देखे और फिसल गए।
बहरहाल कुली अपने पैसे लेकर जा चुका है। अब लड़की, उसका सामान और
बेरोजगार युवा वहां रह गए हैं है। बेरोजगार युवा को श्रम की गरिमा का
खयाल आता है, और वह स्वयं कुली का काम करने को उद्यत है, पर भारी सामान
उससे उठ ही नहीं पा रहा। दिलचस्प ढंग से मंच पर घट रहा यह सारा कुछ
निर्देशक के निर्देशन में हो रहा है। वह अभिनेताओं को किरदार में कुछ और
जान डालने की सलाह दे रहा है। नेता बने पात्र से वह कहता है कि उसमें
पिछले नाटक के कवि वाले किरदार की झलक आ रही है, जबकि हकीकत में नेता का
खोखलापन आना चाहिए। कि आत्महत्या के विचार में मेलोड्रामा का पुट आ रहा
है, वगैरह। बुद्धिजीवी इस बीच 'समथिंग इस रांग समवेयर' जैसे कुछ अपने
जुमले हैं।
प्रस्तुति में आंतरिक नाटकीयता का एक ऐसा ढांचा है, जिससे संदर्भों के
पुराना पड़ने के बावजूद एक रोचकता बनी रहती है। थिएटर ग्रुप नाट्य कला
मंच के अभिनेता प्रस्तुति में कई बार अंडरटोन तो दिखते हैं, पर इस कमी के
बावजूद चरित्र बहुत बिखरने नहीं पाए हैं। इसकी वजह है अभिनेताओं की
सहजता। वे अपने चरित्र के लिए एक कोशिश करते दिखते हैं। अक्सर एमेच्योर
थिएटर में ऐसी कोशिशें लाउड हो जाती रही हैं, जैसा कि इस प्रस्तुति में
नहीं था। बगैर अतिरंजना में गए नाटक में कई दिलचस्प छवियां मौजूद हैं।
लड़की 'वेटिंग फॉर गोदो' किताब इसलिए पास रखती है कि वरना पढ़े-लिखे लोग
क्या कहेंगे। विषय की दृष्टि से नाटक बहुत सुगठित न होने के बावजूद अपने
समय को व्यक्त करता है। और वह भी नाटकीयता के अपने ही तंतुओं के साथ।