Monday, May 28, 2012

अफगानिस्तान की कॉमेडी ऑफ एरर्स


इसी सप्ताह आजाद भवन में आईसीसीआर के सौजन्य से अफगानिस्तान की नाट्य प्रस्तुति 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' देखने को मिली। ब्रिटिश काउंसिल की मदद से तैयार हुई इस प्रस्तुति के निर्देशक फ्रांस के कोरिन्न जाबेर हैं। जिन दिनों अफगानिस्तान में ब्रिटिश काउंसिल के दफ्तर में इसकी रिहर्सल चल रही थी, उसी दौरान वहां भोर तड़के एक आत्मघाती हमला हुआ था। हमले में पूरी इमारत तहस-नहस हो गई थी और 12 लोग मारे गए थे। यह एक संयोग ही था कि उस रोज रमजान होने के कारण ऐन हमले वाला वक्त ही निर्देशक ने कलाकारों को रिहर्सल के लिए सुझाया था, जिसे कलाकारों ने मंजूर नहीं किया, और लिहाजा वे इस हमले में बच पाए। जिस तरह ब्रिटिश काउंसिल की इमारत को उसी तरह अफगानिस्तान में थिएटर को भी नेस्तनाबूद करने में वहां के अतिवादियों ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। तालिबान-राज के खात्मे के बरसों बाद भी अपनी नाममात्र की गतिविधियों में थिएटर वहां मानो उस दौर के दुःस्वप्न से अभी तक उबर नहीं पाया है। अफगान थिएटर कंपनी की इस प्रस्तुति को इस परिदृश्य में एक नए आगाज की तरह देखा जाना चाहिए।  शेक्सपीयर के कॉमेडी ऑफ एरर्स के दारी भाषा में किए गए इस रूपांतरण की खास बात यह है कि उसमें कोई बाहरी तामझाम नहीं है और प्रस्तुति का पूरा आकर्षण एमेच्योर अभिनेताओं की ऊर्जा से बनता है। दो हमशक्ल बिछड़े भाइयों और उनके हमशक्ल नौकरों के एक ही शहर में होने से पैदा हुई गफलत की इस कहानी के कई रूपों से हिंदी फिल्मों के पुराने दर्शक काफी अच्छी तरह वाकिफ हैं। निर्देशक ने कहानी को ज्यादा चुस्त बनाने की तुलना में उसे नाटकीयता की कुछ हल्की-फुल्की तरकीबों के साथ नत्थी किया है। काबुल वाले भाई की बीवी समरकंद वाले भाई को अपना पति समझकर उससे जिस ढंग से प्रेम जता रही है, वह प्रत्यक्ष हास्य का एक दिलचस्प नमूना है। खीसें निपोरती हुई वह अपनी टांग उसकी टांग पर सटाए है, और समरकंद वाला 'क्या करूं' वाली परेशान-भौंचक्की मुद्रा में है। दरअसल वह अनभिज्ञ अपनी इस भाभी शोदाबा की बहन रोदाबा पर लट्टू है। इन दोनों बहनों की फ्रेंच कट दाढ़ी वाली नौकरानी कुकेब की अदाएं भी देखते ही बनती हैं। अभिनेता शाह मम्नून मकसूदी इस गौण भूमिका को 'जिसकी बीवी मोटी..' गाते हुए उसे एक सीटी-मार जुमले में बदलते हैं। इसी तरह एक मौके पर गफलत का शिकार हुआ एक किरदार पुलिस को पुकारता है, और मंच पर बैठे वादकों में से बांसुरीवादक पुलिसवाले की भूमिका में आ जाता है। वह सारा काम बांसुरी बजाकर ही कर रहा है। उसकी बांसुरी के सुर की हथकड़ी से काबुल वाले के हाथ बंधे हैं। हाथ ढीले होते ही बांसुरी का सुर जोर पकड़ लेता है। 
प्रस्तुति में खिलंदड़ेपन के ये अंश एक दिलचस्पी बनाए रहते हैं। अतिरंजना के कुछ टुकड़े भी बीच-बीच में इस हल्के-फुल्केपन में अपना काम करते रहते हैं। फ्रेंच कट दाढ़ी वाले मकसूदी दोनों बिछड़े भाइयों के बाप की भूमिका में भी अपने अतिअभिनय से अच्छा नजारा बनाते हैं। रोदाबा बनी फरजाना सैयद अहमद के चेहरे-मोहरे में तो कुछ ऐसा खास है कि लगता है मानो वे अपनी हंसी दबाए हुए अभिनय कर रही हों। प्रस्तुति में इन सब चीजों के अलावा अफगान संगीत और उसपर बीच-बीच में शोदाबा आदि पात्रों की नृत्यमुद्राओं की एशियाई लय भी अपने में खास है। इसी तरह बोली जा रही भाषा भले ही समझ से परे हो, पर कुछ शब्द- खूबसूरत, बख्शीश, दरवाजा, नूरेचश्म, जंजीर- आदि सुनाई देते हैं तो अच्छा लगता है। अच्छा तब भी लगता है जब लंबे अरसे से युद्ध और कई तरह के कटु राजनीतिक अतिवादों से निकलकर आए एक देश के कुछ कलाकार मंच पर जीवन के रस और उसकी सरलता का एक पाठ रचते हैं। जब वे यह पाठ रचते हैं तो उनका एमेच्योर अभिनय मानो एक मासूमियत रचता है।

Tuesday, May 22, 2012

उबू रोय की भूख और हाजमा


पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय परिसर के खुले मंच पर वहां के तीसरे वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति उबू रोय के प्रदर्शन किए गए। यह करीब सवा सौ साल पुराने फ्रेंच नाटक की एक दिलचस्प प्रस्तुति थी। उबू एक भोंडा, विद्रूप, क्रूर, बेहूदा और पाजी किरदार है। एक वैसी ही उसकी बीवी है। मंच पर ये दोनों टाटों में लिपटी एक बेडौल काया के तौर पर उपस्थित हैं। इस काया मे वे उजबक ढंग से चल तो सकते हैं, पर बैठने की कोशिश में लुढ़क पड़ते हैं। उनके अंदर एक अद्वितीय भूख है, जो विष्ठा को भी हजम कर जाती है। फिर वे एक ऐसे देशकाल में रह रहे हैं जहां इस भूख को काफी हद तक एक स्वाकार्यता प्राप्त है। 
शुरुआती दृश्य में मंच के बीचोबीच ऊंचाई पर एक सूअर टंगा है। और नीचे एक बड़े से पतीले में सूप पक रहा है। मंच पर जिबह किए जाने से आशंकित या कहीं मुंह मारते आह्लादित सूअरों के स्वर गूंज रहे हैं। उबू मा गिरे हुए सूअर के थूथन को नोच-नोच कर खा रही है। उबू दंपती अपनी बातचीत में बिगड़े हुए लौंडों से भी ज्यादा बेधड़क हैं। उनकी दावत में मंच पर किसी जानवर की खोपड़ी रखी है। दावत में आर्मी चीफ और एक ट्राली में भरकर लाए गए लोग घटिया सूप को पी कर उबकाई सी करने लगते हैं। उबू के लिए यह तौहीन नाकाबिले बर्दाश्त है। दोनों उबू मेहमानों से मारपीट शुरू कर देते हैं।
उबू अपने देश का कल्चर मिनिस्टर है। वह आर्मी चीफ के साथ प्रेसीडेंट को मारने की योजना बनाता है। प्रेसीडेंट अपनी बीवी और सड़कछाप गालीयुक्त भाषा बोलने वाले बेटे के साथ एक डबलबेड के आकार की ट्राली पर नमूदार हुआ है। एक बगैर साइलेंसर वाली मोटर साइकिल से बंधी दूसरी छोटी ट्राली पर एक बंदा टाइपराइटर लिए बैठा है। कोट-पैंट वाला प्रेसीडेंट देर तक नई कृषि नीति के मसौदा की विशुद्ध बकवास पढ़ रहा है। फिर ट्राली पर ही कपड़े बदलकर पूरा परिवार वहीं सो जाता है। सुबह प्रेसीडेंट और उसकी बीवी को लाल रंग के गीले कपड़ों से पीट-पीट कर मार दिया जाता है।  
उबू के वैज्ञानिक एक ऐसी मशीन का प्रोटोटाइप पेश करते हैं जिसमें मल से पानी और बिजली बनाई जाएगी। मशीन काम नहीं कर रही। वैज्ञानिक परेशान हैं। उबू भी परेशान है। उसे मशीन पर चिढ़ हो रही है। वह एक कोड़ा निकालकर मशीन को पीटना शुरू कर देता है। एक अन्य दृश्य में वह मनोरंजन का एक कार्यक्रम आयोजित करवाता है। कार्यक्रम में 'कलाकार' मुंह में पानी भरकर एक-दूसरे पर जोरों से फूंक मार रहे हैं। इस तरह फूंक मार-मार कर एक बाकी सबको हरा देता है। 
उबू ने जनता पर तरह-तरह के टैक्स लाद दिए हैं। उसके अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं। 32 रुपए कमाने वाले को गरीब नहीं माना जाता। वह एक औरत के दुधमुंहे बच्चे को उससे छीन कर उछाल देता है। पत्रकार, कलाकार, जज वगैरह को उबू का विरोधी पाए जाने पर खूंटी पर लटका दिया जाता है। बाद में जब रूस के कम्युनिस्ट उबू की सत्ता को उखाड़ फेंकते हैं तो बेहद घबराया हुआ वह सेंट एंटनी से जान बचाने की हास्यास्पद आध्यात्मिक गुहार करता है।
फ्रेंच नाटककार अल्फ्रेड जैरी का यह नाटक एक सर्रियल प्रहसन है। इसके मुख्य पात्र का एक रेखांकन खुद नाटककार ने तैयार किया था। प्रस्तुति के निर्देशक दीपन शिवरामन लंदन में रंगकर्म के अध्यापन से जुड़े हैं। उनकी दो घंटे लंबी इस प्रस्तुति में दृश्य के बहुतेरे अवयव हैं। ऊंचे डंडों पर चलने वाले प्रेत, प्रेसीडेंट की बीवी के सपने में मुंह खोलता-बंद करता एक विशाल पुतला, मशालें, शोर मचाती मोटरसाइकिलें वगैरह। प्रस्तुति इनसे कुछ ज्यादा ही भरी-भरी लगती है। हालांकि दृश्यों की चमक से ज्यादा अहम उसमें उबू का धूसर और बेढब किरदार है। शिवरामन उसकी निर्द्वंद्व जैविकता की एक अच्छी इमेज मंच पर उतार पाए हैं। प्रस्तुति को भारतीय समाज और राजनीति के वर्तमान दौर का एक रूपक कहा जा सकता है। वहां अत्याचारी होने के लिए बहुत चतुर होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक निर्लज्ज मूर्खता ही इसके लिए काफी है. क्योंकि बाकी लोग आपसे कम निर्लज्ज हैं। शिवरामन रानावि प्रांगण के आयताकार मंच पर विषय की ठोस स्थितियां बनाते हैं, जिनका प्रभाव किसी बुरे सपने की तरह देर तक बना रहता है। उबू एक किरदार नहीं एक प्रवृत्ति है, जो नितांत भौतिक स्तर पर जीने वाले किसी भी घटिया समाज के सभी लोगों में थोड़ी-थोड़ी बनी रहती है। 


Tuesday, May 1, 2012

उबाऊ अकादमिक


राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्रस्तुतियां अब एक खास 'जानर' की शक्ल लेती जा रही हैं। उनके पीछे आइडिया तो बहुत ऊंचा होता है, पर अंततः वे एक 'कंस्ट्रक्ट' होकर रह जाती हैं। पिछले दिनों केएस राजेंद्रन निर्देशित विद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति 'गर्भ नाटक' भी इसी तरह की थी। यह प्रस्तुति रंगकर्मी वी.के. द्वारा किए गए प्रसिद्ध जर्मन नाटक 'मरात/साद' के अनुवाद पर आधारित थी। सवा दो घंटे लंबी इस प्रस्तुति में होने को बहुत कुछ था, पर कुछ नहीं था तो परिप्रेक्ष्य और संप्रेषणीयता। यानी मंच पर बहुत कुछ होता हुआ तो दिख रहा है, पर न उसमें कोई स्पष्टता है, न रोचकता। एक बिल्कुल अनजाना संदर्भ दर्शकों के आगे अपनी स्फुट चमक के साथ आ गिरा है, और दर्शक किंकर्तव्यविमूढ़ सा उसमें कोई रस तलाशने की चेष्टा करता है।
'मरात/साद' 1963 में लिखे गए जर्मन नाटक का संक्षिप्त शीर्षक है। इसका पूरा अर्थ है: 'ज्यां पाल मरात का उत्पीड़न और हत्या, जिसे मार्क्वेज दे साद के निर्देशन में पेश किया चेरेंतन पागलखाने के मरीजों ने'। नाटक में अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में हुई फ्रांसीसी क्रांति की घटनाओं के प्रसंग से बहुत सी चर्चाएं की गई है। ये घटनाएं सन 1793 में घटी हैं, और उन्हें  सन 1808 में उक्त पागलखाने में खेला जा रहा है। नाटक के तीन प्रमुख पात्रों में से एक ज्यां पाल मरात फ्रेंच रिवोल्यूशन के दौरान का क्रांतिकारी पत्रकार है; दूसरा कूल्मियर, मनोरोग अस्पताल या पागलखाने का प्रमुख; और तीसरा यौन स्वच्छंदतावादी मार्क्वेज दे साद, जिसके नाम से 'सैडिज्म' (परपीड़न) शब्द ईजाद हुआ।
लेखक पीटर वेस ने इतिहास में वास्तव में हुई इस तरह की एक प्रस्तुति को आधार बनाकर यह नाटक लिखा था। यह एक सांगीतिक नाटक है जिसमें विचारों और स्थितियों का एक बौद्धिक द्वंद्व मंतव्यों की उलटबांसी में नाटकीय आकार लेता है। पागलखाने के इंचार्ज कूल्मियर के लिए यह प्रस्तुति देशभक्ति के मंतव्य से है, पर मरीजों को आदत पड़ी हुई है अपने संवाद दोहराते रहने की। वहीं मरात और साद के क्रांतिकारी और व्यक्तिवादी विचारों में भी एक बहस चल रही हुई है। मरात नाटक में मूलतः एक काल्पनिक पात्र है, क्योंकि नाटक खेले जाने के समय संदर्भ से 15 साल पहले ही उसकी मृत्यु हो चुकी थी। नाटक में बीच-बीच में ऐसे संवाद सुनाई देते हैं, जिनमें आम जनता के हित और सुचारू शासनतंत्र के समकालीन मुद्दों की चर्चा है।
लेकिन इस सारे विवरण से परे केएस राजेंद्रन की प्रस्तुति हर अर्थ में एक विशुद्ध अकादमिक अनुवाद की तरह पेश होती है। बगैर किसी भूमिका के एक दुनिया दर्शकों के आगे पटक दी जाती है। यह नाटक के भीतर नाटक ही नहीं प्रेक्षागृह के भीतर प्रेक्षागृह भी था। अभिमंच में दर्शकों के लिए बैठने का ऐसा इंतजाम किया गया है, कि सीटें स्टेज के बिल्कुल सिरे तक पहुंची हुई है। यहां सींखचे लगे हुए हैं, और उसके पीछे मंच की पूरी गहराई में एक विस्तारित दृश्य पसरा हुआ है। पात्रों ने पुराने यूरोपीय किस्म के कास्ट्यूम पहने हुए हैं। मंच पर लगातार एक भीड़भाड़ का दृश्य है। इस भीड़ में पात्रों को कोशिश करके पहचाना जा सकता है, पर कोई तादात्म्य उनसे नहीं बन पाता। प्रस्तुति का नायक मरात एक बाथटब में बैठा है, जहां उसपर छुरा घोंप दिया गया था। इसके अलावा एक ऊंचा मचाननुमा सिंहासन है। पागलों की एक भीड़ है। पीछे की ओर तीन हौज हैं जिनका ढक्कन उठाए जाने पर ही उनके होने का पता चलता है। फिर धुआं है, पियानो है, संगीत और कोरियग्राफी है, सूत्रधार है। लेकिन इतना सब कुछ समेटे हुए भी यह प्रस्तुति अंतत एक यांत्रिक उपक्रम ही है। मानो यह पूर्वपरिचित विषयवस्तु पर आधारित कोई छाया-रचना हो। विषयवस्तु को समझने के लिए यहां प्रस्तुति का ब्रोशर पढ़ना आवश्यक है, जिसमें अपने निर्देशकीय में केएस राजेंद्रन का कहना है कि 'यह एक असाधारण नाट्यालेख है। लगता है, जैसे इसमें न कहानी है, न कोई सुराग, न दिशा।' उन्होंने इसका नाम गर्भनाटक इसलिए दिया है, कि संस्कृत में नाटक के भीतर नाटक को यही विशेषण दिया गया है। मंच पर पीछे की दीवार पर बहुत से आकार उकेरे हुए हैं, जिनपर रोशनी पड़ने से एक विचित्र प्रभाव निर्मित होता है। पूरी प्रस्तुति इसी तरह अर्थ के बजाय मानो प्रभावों में खेलती है। मानो प्रस्तुति रचनात्मक काम न होकर एक कवायद हो। विद्यालय की प्रस्तुतियां इन दिनों थ्योरी के बोझ से दबी और अंततः डिजाइन में उलझी दिखाई देती हैं। यह डिजाइन विषयवस्तु के मकसद से न होकर अपने में एक स्वायत्त कसरत जैसा है। इसीलिए इस प्रस्तुति में सूत्रधार लड़की सरपट अंग्रेजी में बीच-बीच में बहुत से विवरण बताया करती है। भले ही दर्शकों के लिए इसका कोई अर्थ न बन पाए, पर कुल डिजाइन में तो यह खप ही जाता है।