Sunday, April 15, 2012

सम्मोहन के विस्तार में

रवींद्र भारती का नाटक 'अगिन तिरिया' दो हजार साल पुराने भारतीय भाववाद की एक अनुपम रचना है। भाववाद को किसी साक्ष्य, तथ्य या परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती। ऐसी जीवन दृष्टि वृहत्तर यथार्थ की सच्चाई को अलक्षित करते हुए व्यक्तिगत एकांगी उदभावना को अभिव्यक्त करती है। यहीं से अपनी लक्षणाओं में प्रसन्न रहने वाले रेटॉरिक का जन्म होता है। इसी फितरत में भारतीयों ने इतिहास और लोकजीवन की घटनाओं को अपने मनोनुकूल कहानियों में तब्दील कर लिया। अल बिरूनी ने लिखा भी है कि भारतीयों से इतिहास की किसी घटना के बारे में पूछो तो वे कोई कहानी सुनाने लगते हैं। रवींद्र भारती का पूरा नाटक ऐसी ही कहानियों का एक मनोहारी रेटॉरिक है। ये जीवन के किसी अलौकिक आभास से नत्थी बहुत सी कहानियां हैं। एक ऐसी काल्पनिक दुनिया जिसके पात्र किंवदंतियों और लोककथाओं से उठाए गए मालूम देते हैं। इस तरह रवीद्र भारती अपनी ही एक दंतकथा गढ़ते हैं। लेकिन यह काफी निपुणता से रची गई दंतकथा है। जो यहां-वहां बहुत से उपप्रसंगों में देर तक उलझी आगे बढ़ती है। कई कथालीकों, बहुत सारे पात्रों और उपकथाओं से विन्यस्त यह कोई कथानक नहीं बल्कि एक राग है। किसी सुदूर वक्त और परिवेश में बजता हुआ। यथार्थ के खटरागों से परे एक सम्मोहन की दुनिया, जो 'जंगली रास्तों', 'पहाड़ी नदी के तट', 'गुफा जैसे घर', 'मृगछाल के आसन' और 'जुगनू पकड़ने के खेल' में घटित होती है।
नाटक का कथानक एक ढीला-ढाला मायालोक है, जिससे रह-रहकर बहुत सी स्थितियां निकलती हैं। एक स्थिति संन्यासी पुरोहितों की है जो क्रूर, हिंसक, कर्मकांडी और शुद्धतावादी हैं। एक दूसरी स्थिति में कुलांगार उनसे भी दो हाथ आगे जंगली किस्म के हैं। इसी तरह कुलांगारों का धूर्त एजेंट अनंग तामू नाम के पात्र को फुसलाकर उनकी गुलामी के लिए लाता है। उसे बार-बार लोमड़ कहा गया है। फिर प्रकृति के सान्निध्य में हिंसा से दूर वन में रहने वाली वनदेवियां हैं। उनकी रागात्मकता काफी विस्तार से सामने आई है। वन में बाघमारा की पूजा के प्रसंग पर भी एक पूरा दृश्य खर्च किया गया है। बाघ को मारने वाली औरत ही अगिन तिरिया है। नाटक के ये पात्र भी कथ्य जितने ही आभासी हैं। उनके नाम शायद आदिवासी कथा परंपराओं से लिए गए हैं- मात्या, सुआ, बेली, चेची, धृत्य, साखा आदि। उनमें ऐतिहासिक होने की आभासिता और लोकजीवन की मुग्धता है। रवींद्र भारती उनके साथ किसी भी रूढ़ कलेवर से परे एक दुनिया आबाद करते हैं। इससे गुजरते हुए टैगोर के कुछ नाटक याद आते हैं। लेकिन रवींद्र भारती के यहां अर्थ की कोई व्यवस्थित दिशा नहीं है। उनके ऊबड़खाबड़ कथानक में बहुत सी लक्षणाएं एक रूमानी व्यामोह के साथ आबद्ध है। इसमें एक स्वप्नवत मोहकता है और बहुत से मनोगत उदभासों की कहानियों का संयोजन है। एक चमकदार भाषा में प्रस्तुत होती इन कहानियों में जीवन की भीषणता, धूर्तता, निस्सहायता, उसके सहज विश्वास, उसकी कोमलता और प्रकृति से उसके रिश्ते की भावदशाओं को संकलित किया गया है। ये एक कल्पित दुनिया की लोककथाएं हैं, जिनके जरिए पूरा पाठ मानो एक व्यंजना में आगे बढ़ता है और उसी में खत्म हो जाता है। यह लोकजीवन में पलती रहने वाली अयथार्थ आकांक्षा की व्यंजना है, जिसे किसी संकल्पना की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह अपनी भावविह्वलता में ही खुश है। इसकी पहचान के लिए यह लंबा संवाद देखा जा सकता है- 'बड़ी वनदेवियां बताती हैं कि तमसा के तट पर उनचास पवन का जन्म हुआ था। एक-एक पवन यहीं बड़े हुए। कुछ नाविक के बच्चे उनके सखा थे। उनसे ऐसी मिताई हुई कि जब अपनी मां के साथ उनचासों पवन जाने लगे तो वे भी उनके साथ हो गए। जब सांझ हुई बच्चे अपने घर नहीं पहुंचे तब नाविक अपनी पत्नी के साथ उन्हें खोजने लगे। दूर-दूर तक खोजा। जंगल, पहाड़, नदी, समुद्र सब जगह खोजा। कहीं पता नहीं चला। रोते-बिलखते रहे। एक दिन यह सोचकर सबुर कर लिया कि कहीं मर-खप गए होंगे। उन्हें क्या पता कि उनके बच्चे उनचासों पवन के साथ हैं। वनदेवियां बताती हैं कि बैसाख के महीने में उनचासों पवन तमसा तट पर अपना जन्मउत्सव मनाने आते हैं। नाविक के बच्चे भी आते हैं। वे अपने घर जाते हैं। परिवार के साथ रहते हैं परंतु परिवार उन्हें देख नहीं पाता। सुन नहीं पाता। जबकि बच्चे देखते और सुनते हैं। जानती हो नाविक क्यों नहीं अपने बच्चों को देख पाते? क्योंकि बच्चों का कोई स्वरूप नहीं है। वे श्रव्य हैं। उन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है।'
रवींद्र भारती मानो बहुत से भावोच्छवासों का एक कथ्य तैयार करते हैं। अक्सर स्थितियों में यहां कर्म-कारण संबंध का कोई ठोस सिलसिला नहीं है। कारण यहां बेहद निरीह दशा में है। जहां कारण की जटिलता में जाने का मौका आता है वहीं एक कहानी पेश है। भाववाद अ-ठोस ढंग से बातों को 'मान लेने की' जीवनदशा है। लोकजीवन इसके लिए एक आधार मुहैया कराता है। किसी भी कल्पना को सच मान लेने का आधार। यहीं से परंपरा की बहुत सी रस्में और आख्यान तैयार होते हैं। यह नाटक ऐसे ही बहुत से आख्यान अंशों और कल्पना के मेल से तैयार हुआ है। रवींद्र भारती एक अविश्वसनीय दुनिया को विश्वसनीय भाषा में पेश करते हैं। यह बनावट से सर्वथा दूर और अपने में रमी हुई भाववाद के मुहावरे की भाषा है। उसे किसी बिंब विधान की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह जिस दुनिया को व्यक्त कर रही हैं, वह अपने में ही एक बहुत बडा बिंब है। रवींद्र भारती इस भाषा के जरिए एक वातावरण बनाते हैं, और एक लोकरंगी बहुविध नाट्यविधान को विन्यस्त करते हैं। बाघमारा उत्सव के दृश्य का संकेत कुछ यों है- 'होम सज-संवर रहा है। सुआ उसे सजा रही है। उसका मुंह लाल रंग से रंगा हुआ है। जहां-तहां सफेद रंग की बुनकियां रची हुई हैं। आंखों में काजल की मोटी रेखाएं हैं। सुआ उसके सिर पर फूलों की माला लपेटती है। होम उसे नोच देता है और घर के अंदर चला जाता है। क्षण भर बाद महुए के पत्ते का मुकुट धारण किए प्रसन्न मुद्रा में आता है।' यह नाटक असपष्ट सी भाववस्तु के विस्तार का एक समीकरण है जहां प्रयोजन किसी मरीचिका की भांति है। और यही अंततः उसकी नाटकीयता की सबसे बड़ी बाधा बनती है। प्रत्यक्षतः आलेख में मंचीय नाटकीयता की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध दिखाई देती है। इसमें घटनाओं की पर्याप्त विविधता, कई तरह के परिवेश और परिधानों का समायोजन और नाटकीय देहगतियों का विपुल समावेश है और साथ ही संवादों में एक मुग्धकारी भाषिक लय भी। लेकिन उसमें उत्सुकता और आशय का कोई निश्चित प्रयोजन नहीं है। ऐसे में इस रंग आयोजन से उत्पन्न प्रभाव थोड़ी-थोड़ी देर में मंच पर गुम होते रह सकते हैं।
रवींद्र भारती बिंबों से खेलने वाले नाटककार हैं। लेकिन इन बिंबों में 'परिलक्षित' होने वाला वास्तविक संसार बहुत धुंधला है। यह धुंधलापन उनके सुघड़ नाट्य विधान, स्फूर्त-सहज भाषा सब पर भारी पड़ता है। यह प्रवृत्ति उनके पिछले नाटक 'जनवासा' की तुलना में इस बार 'अगिन तिरिया' में कहीं ज्यादा दिखाई पड़ रही है और ऐसे में यह नाटक जीवन की विभिन्न भावदशाओं का एक आलंकारिक पाठ होकर रह जाता है।

पंच नद दा पानी

पंजाबी अकादमी के कुछ अरसा पहले हुए थिएटर फेस्टिवल में नाटककार और निर्देशक
आत्मजीत निर्देशित प्रस्तुति 'पंच नद दा पानी' का मंचन किया गया। प्रस्तुति
में मंच पर चीजें पारंपरिक ढंग से काफी चाक चौबंद नजर आती हैं। हर दृश्य का
बिस्मिल्ला दो सूत्रधार भांडों के जरिए होता है और उपसंहार एक कोरस से। इस तरह
नाटक अपनी वास्तविक लंबाई से करीब डेढ़ गुना ज्यादा समय में फैला हुआ है। मंच
पर तेरहवीं सदी के पंजाब के इतिहास के कुछ दृश्य हैं। यह वो वक्त है जब असल
सत्ता तुर्कों के पास है, और इन तुर्कों की अक्सर मंगोल हमलावरों से लड़ाइयां
हुआ करती हैं। ऐसे में राजपूत राजा राणा रांवल भट्टी की हैसियत यही रह गई है
कि वे तुर्कों के पक्ष में अपने सैनिकों को लड़ाई के लिए भेजते रहें। मनमोहन
बावा की दो कहानियों पर आधारित इस नाटक में कुछ सांस्कृतिक और जातीय सवाल
बीच-बीच में दिखते हैं। तुर्क शासक गाजी मलिक अपने भाई की शादी राणा रांवल की
बेटी से करना चाहता है, जो कि राजपुताना अहं के लिए बड़े धिक्कार की बात है।
लेकिन यह अहं यथार्थ के आगे व्यर्थ है। राणा सांवल की बेटी नीला एक बुद्धिमान
लड़की है जिसमें आत्मसम्मान की पहचान है पर हकीकत के मद्देनजर वह इस स्थिति को
कबूल करती है। दरअसल वह इस नाटक के विमर्श की असल सूत्रधार है। नाटक में एक
दलित पात्र बिरजू इस विमर्श के मकसद से ही है। आत्मजीत उसकी मार्फत हिंदू
जातीय बोध और ब्राह्मणवादी कर्मकांड के नाकारापन को एक दूसरे के बरक्स खड़ा
करते हैं। यह जातीय बोध जो अपने भीतर पैठे झूठ की मूर्खता में उत्तेजित और
बेबस होता है। राणा और उनके राजकीय पंडित जी बिरजू को उसकी जातिगत हैसियत से
ऊपर कुछ भी देना कबूल नहीं करते। ऐसे में अपने ही समाज में बार-बार ठुकराया
गया बिरजू कुरबान अली बनना मंजूर करता है। निर्देशक आत्मजीत ने भारतीय इतिहास
और समाजशास्त्र के एक पुराने प्रश्न की कुछ नए तरह से 'प्लेसिंग' की है, लेकिन
मंच की अनुपातहीन कवायदों में इसकी चमक रह-रहकर बाधित होती है। ठुल्ला भांड और
टुल्ला भांड दो दृश्यों के दरम्यान अक्सर बहुत ज्यादा जगह घेरते हैं। ठुल्ला
कहता है- 'ओए टुल्यां, तू कित्थों आया?' टुल्ला जवाब देता है- 'मां ते टिड
तों.' इस तरह उनकी मसखरी के व्यंग्य, कोरस के रूमान, कई सहप्रसंगों की
संलग्नता के साथ नाटक आगे बढ़ता है। इस दौरान बीच-बीच में महामृत्यंजय के स्वर
भी गूंजते सुनाई देते हैं। तुर्कों को पता है कि हिंद की अंदरूनी कमजोरियां ही
उनके फायदे का सबब बनी हैं। मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज होने का तर्क भी
उनके पास है। पर तुर्क मुखिया को जो समझ नहीं आता और जो वह अपने हिंदू
सिपाहियों से पूछता है, वह यह कि 'तुस्सी सानूं तुर्कां नूं म्लेच्छ क्यूं
कहंदे हो?' कथानक के कई छोर हैं जिनमें से एक नारी-विमर्श तक भी जाता है
कि 'औरत दा जीवन रेखावां दी कैद है'। यह चीज दृश्यात्मकता में भी है- ये
कई तरह की लक्षणाओं और संकेतों को समेटे हुए दृश्य हैं। पार्श्व में परदे
पर एक वृक्ष उकेरा हुआ है। आत्मजीत दृश्य की सामान्य संरचना का मंच पर
अच्छा निबाह करते हैं। लेकिन समूचे तौर पर उसमें विषय के तनाव को कुछ
अधिक सघन होना चाहिए था। अभिनय की दृष्टि से प्रस्तुति काफी ठीकठाक थी।

एक शाम दास्तानगोई की

महमूद फारुकी और दानिश हुसैन की दास्तानगोई एक बार जरूर देखनी चाहिए। करीब आठ-नौ दशक पहले पूरी तरह लुप्त हो चुकी इस लखनवी परंपरा को इधर के सालों में उन्होंने फिर से जिंदा करने की कोशिश की है। दास्तानगोई का उदगम अरब से माना जाता है। इसके असल नायक अमीर हमजा हैं, जो पैगंबर मोहम्मद के हमउम्र चाचा थे। उन्होंने इस्लाम के लक्ष्यों के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं और दुनिया-जहान की यात्राएं कीं। अमीर हमजा की बहादुरी के कारनामों की ये कहानियां कई सदियों के दौरान मध्य एशिया और उत्तर पूर्व के देशों में स्थानीय इतिहास-प्रसंगों और मान्यताओं के मुतल्लिक आकार लेकर एक वृहद दंतकथा में तब्दील होती रही। इन दास्तानों के संग्रह को हमजानामा कहा जाता है। बादशाह अकबर ने इन्हें चित्रबद्ध भी करवाया। उन्नीसवीं सदी के मध्य में इसी हमजानामा से 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' ने जन्म लिया। इसके पीछे मुख्य रूप से उस्ताद दास्तानगो मीर अहमद अली का हाथ था। उनके नेतृत्व में लखनऊ के दास्तान कहने वालों ने अमीर हमजा की बहादुरी के साथ नत्थी जिन्नों, परियों वगैरह की अब तक चली आई कहानियों से अलग हिंदुस्तानी रंगत की एक नई दुनिया आबाद की। उन्होंने अच्छे और बुरे के समीकरण में आकार लेने वाली विलक्षण बहादुरी की जगह ऐयारी, जादूगरी, छल-कपट से भरपूर तिलिस्म का एक ऐसा देश तैयार किया, जो ऐसे ही कई और देशों से घिरा हुआ है। आठ हजार पृष्ठ में फैली तिलिस्म-ए-होशरुबा की कहानियों को लखनऊ के मुंशी नवलकिशोर ने उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों में मुहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन नाम के दो दास्तान कहने वालों से लिखवाकर अपने नवलकिशोर प्रेस से प्रकाशित करवाया। बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दो दशकों में दास्तानों के श्रोता क्रमशः कम होते गए। इस कड़ी के आखिरी दास्तानगो अली बाकर थे, जिनकी मौत सन 1929 में हुई।
महमूद फारुकी प्रस्तुति से पहले दास्तानगोई के इस तारीखी सिलसिले का एक हल्का-फुल्का परिचय देते हैं। उनके मुताबिक, समझ लीजिए कि होशरुबा तिलिस्म का एक ऑफिस है, जिसका शहंशाह है अफरासियाब और जादूगरों के खुदा हैं सामरी और जमशेद। यहां की कुछ खास चीजें हैं- गिलीम, घुंडी, जाल, आजर जादू और महताब जादू। वे सलाह देते हैं कि उर्दू-फारसी के न समझ में आने वाले अल्फाज पर अटकें नहीं, बस कहानी का सिरा पकड़े रहें। इसके बाद वे और उनके साथी दानिश हुसैनी पूरी रवानी के साथ उस कहानी का बयान शुरू करते हैं जिसमें चांदी का जंगल, चांदी की घास और चांदी का बंदा है, और दरिया-ए-खूं है, जिसपर धुएं का पुल बना हुआ है। मुर्गी के अंडे के नाप का मोती है, जो दरअसल मोती नहीं कुछ और है। एक महल है जिसमें कुछ ऐसा इंतजाम किया गया है कि किसी भी अजनबी के आने पर एक चिड़िया उसका नाम लेती है और गिर कर मर जाती है। इस मुल्क का राजा अफरासियाब जब-तब जमीन में कुछ मारकर एक पुतले को पैदा कर उसे मुहिम पर तैनात कर देता है। पर उसका दुश्मन अमर ऐयार भी कुछ कम नहीं है। उसके पास लाजवाब चतुराई, प्रत्युत्पन्नमति और कई तरह की अलौकिक ताकतें हैं। एक दफे मुसीबत में फंसने पर वो कहता है- मैं तो घसियारा हूं, वक्त का मारा हूं। वह हनुमान जी की एक कहानी भी सुनाता है, जिसमें वे रामचंद्र जी की गिर गई अंगूठी के पीछे-पीछे पाताल तक पहुंच जाते हैं। पूरी दास्तान इस तरह कही जा रही है, कि सुनाने वाले घटनाओं को लेकर पूरे यकीन में दिखते हैं। दानिश हुसैनी किरदार के मुताबिक कई बार स्वर और मुखमुद्राओं में परिवर्तन लाते हैं। सुनाने के ढंग में एक व्यवधानहीन गति है। इसी रौ में सुनने वाला बंधा रहता है। दास्तान की तमाम रोचकता वाचिक की लय के बगैर यहां अधूरी है। यह वाचिक की ही ताकत है जो सुनने वाले को एकाग्र कर उसमें रस निर्माण करती है।