Saturday, February 25, 2012

पूंजी और परंपरा की छवियां

एच एस शिवप्रकाश का कन्नड़ नाटक 'मस्तकाभिषेक रिहर्सलु' परंपरा और पूंजी की दो स्थितियों को दिखाता है। एक नाट्य-मंडली बाहुबली गोम्मटेश्वर के जीवन पर नाटक तैयार कर रही है, जिसपर एक उद्योगपति का पैसा लगा हुआ है। लेकिन उद्योगपति भाइयों की मुकदमेबाजी में एक हार जाता है, और दूसरा नाटक के प्रसारण अधिकार एक अमेरिकी टीवी चैनल को बेच देता है। जिस बीच नाटक का रिहर्सल चल रहा है, उसी दौरान गोम्मटेश्वर की मूर्ति का महामस्तकाभिषेक भी हो रहा है। निर्देशक सुरेश अनगल्ली की इस प्रस्तुति में हर बारह साल में आयोजित होने वाले जैन धर्म के इस उत्सव के वास्तविक वीडियो फुटेज भरपूर मात्रा में इस्तेमाल किए गए हैं। इनमें परंपरा में शामिल बीहड़पन के दृश्य अपने में ही एक कथानक है। पूर्णतः नग्न साधु..., उनके चक्कर लगाती स्त्रियां। टीवी चैनल के पत्रकार पूरे जोशोखरोश से आयोजन को कवर कर रहे हैं। मंच के बैकड्रॉप में लगे परदे पर खुद ही अपना केश लुंचन करते साधु दिखाई देते हैं। सिर और दाढ़ी-मूंछों का एक-एक केश खींच-खींचकर उखाड़ने की दर्दनाक प्रक्रिया को अपनी आस्था से फतह करते हुए। लेकिन साधु के लिए जो आस्था है, टीवी की दर्शकीयता के लिए वह एक उत्तेजक 'विजुअल' है। टीवी कैमरे अपने तरीके से इनका दोहन कर लेने पर आमादा हैं। एक कैमरेवाला आयोजन में आए नवविवाहित दंपती से पूछता है कि वे हनीमून पर जाने के बजाय यहां क्यों आए हैं। पर नवविवाहिता को तो हनीमून का अर्थ ही नहीं पता। वह तो अपने बड़ों के कहने पर बाहुबली का आशीर्वाद लेने आई है।
उधर रिहर्सल में बाहुबली की कहानी चल रही है। बाहुबली तीन लोक विजित कर चुके बड़े भाई भरत के आगे झुकने को तैयार नहीं है। ऐसे में युद्ध होता है- दृष्टि युद्ध, जल युद्ध। हर बार बाहुबली की जीत हो रही है। अंतिम मल्ल युद्ध में उसके नामानुरूप बाहुबल के आगे भरत की मृत्यु संभावित है। पर ऐन वक्त पर उसे राज्य के लालच में भाई की हत्या में निहित अविवेक का बोध होता है। वह लालची भरत को धराशायी कर धरा का अपमान नहीं कर सकता। पर उसके पीछे हटने पर भी भरत का प्रतीक चक्र रुक गया है। शाही चक्र धर्म चक्र से हार गया है। लेकिन वहीं बाहुबली गोम्मटेश्वर के मिथ में निहित निग्रह या वैराग्य पूंजी के तंत्र से हार रहा है। चैनल का प्रोड्यूसर रिहर्सल टीम को अपनी तरह से नचा रहा है। बाहुबली बने अभिनेता ने शायद किरदार को आत्मसात कर लिया है। चरित्र की अनासक्ति उसमें प्रोड्यूसर के प्रति चिढ़ पैदा कर रहा है। वह कई बार उससे भिड़ चुका है। वह कास्ट्यूम खोल रहा है। क्या वह सारे वस्त्र खोल देगा? 'नहीं, तुम नंगे सत्य के लायक नहीं हो' वह प्रोड्यूसर से कहता है।
निर्देशक सुरेश अनगल्ली की प्रस्तुति जितना अपनी गति में उतना ही दृश्यात्मक अवयवों में दर्शकों को बांधे रखती है। वीडियो दृश्यों के अलावा उसमें दर तक चलने वाला नर्तकी नीलांजनी का नृत्य है, रिहर्सल में पात्रों की टकराहटें हैं। चाय लेकर आने वाला मुंडू कई बार पात्रों से टकराता है और उसकी सारी गिलासें गिर जाती हैं। इनके अलावा बैटरी के आधार पर रखा भरत का चक्र भी अपने में चाक्षुष असर बनाता है। प्रस्तुति स्थितियों से लबालब भरी हुई है। दर्शकों के लिए उसमें कोई मोहलत नहीं है। सुरेश अनगल्ली मानते हैं कि उनकी यह प्रस्तुति पाठ का हूबहू मंचीय अनुवाद नहीं है। बल्कि इसका खिलंदड़ापन पाठ और प्रस्तुति में एक संवाद बनाता है। शायद इसी वजह से वे इस प्रस्तुति में पाठ के साथ-साथ उस केऑस का भी पुट देते हैं जो हमारे वर्तमान की एक सच्चाई है।


सिद्धांत भी एक नाटक है

भारत रंग महोत्सव में पोलैंड के थिएटर ग्रुप कोरेया की प्रस्तुति 'ग्रोटोव्स्की- एन एटेंप्ट टु रिट्रीट' का प्रदर्शन सोमवार को कमानी प्रेक्षागृह में किया गया। जर्जी ग्रोटोव्स्की पिछली सदी के उत्तरार्ध में सक्रिय रहे पोलैंड के रंगकर्मी और रंग-सिद्धांतकार थे। उनकी पूअर थिएटर की अवधारणा रंगमंच को सिनेमा के प्रभावों से बरी रखने के अर्थ में थी। उनका राय में थिएटर को वह नहीं होना चाहिए, जो वह नहीं हो सकता। उनका कहना था कि रंगमंच अगर सिनेमा से ज्यादा वैभवशाली नहीं हो सकता, तो इसे गरीब ही रहने देना चाहिए। हमारे यहां मोहन राकेश भी अभिनेयता की तुलना में लाइट्स, मंच-सज्जा आदि के जरिए अतिरिक्त प्रभाव निर्मित किए जाने के खिलाफ थे, पर ग्रोटोव्स्की ने इस विचार को ज्यादा मुकम्मल शक्ल में पेश किया। उन्होंने अभिनेता और दर्शक के रिश्ते में अन्यमनस्कता पैदा करने वाली हर चीज को खारिज किया। उनके लिए मंच पर किया जा रहा अभिनय ही बुनियादी चीज थी। लेकिन वे 'मैथड एक्टिंग' के नपेतुलेपन के पक्षधर भी नहीं थे। अभिनय उनके लिए स्तानिस्लाव्स्की और स्ट्रासबर्ग पद्धतियों का हुनर मात्र न होकर अभिनेता की मानसिक और शारीरिक प्रतिक्रियाओं का एकीकरण था। इसके लिए वे अभिनेता में गंभीरता, एकाग्रता और प्रतिबद्धता को आवश्यक मानते थे। स्वयं में से उदभूत स्वर और देह की स्वाभाविकता उनके लिए ज्यादा अहम थी। और इसके लिए किसी तकनीक की तुलना में आत्मचेतस होने की प्रक्रिया को वे ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानते थे।
निर्देशक टॉमस्ज रोडोविक्ज निर्देशित इस प्रस्तुति में इस प्रक्रिया का जिक्र अभिनेता बार-बार करते हैं। दरअसल यह पूरी प्रस्तुति ऐसी कई प्रक्रियाओं के जिक्र का ही एक विस्तार है। प्रस्तुति का मंच बगैर विंग्स के एक चौकोर हॉल की शक्ल में है। इसके एक कोने पर एक मेज रखी है, जिसके अंदर की गहराई में शीशों से रोशनी दिख रही है। शुरुआत में छह अभिनेता इसके इर्द-गिर्द खड़े हैं, जिनमें एक कुछ हकलाता है। निर्देशक के वक्तव्य के दौरान वह थोड़ा बेसब्र है। कहीं कुछ ऐसा नहीं है जो योजनाबद्ध लग रहा हो, पर योजनाहीनता की कोई चेष्टा भी नहीं है। निर्देशक के बाद अभिनेतागण अपने अनुभव और राय बता रहे हैं। इनमें कुछ सवाल भी हैं कि 'अपने अकेलेपन के साथ इंसान क्या कर सकता है' कि 'एक अ-अनुकूलित (deconditioned) शरीर जानवर की तरह है' कि 'एक पापी ही संत हो सकता है', कि 'कुछ नहीं हो रहा- यह सिर्फ भावनाओं का खेल है' कि 'लेकिन कुछ भी कैसे रचें, जबकि आप दूसरों से नियंत्रित हैं' कि 'जीने और रचने के क्रम में आपको खुद को स्वीकार करना होगा'। इसी क्रम में तरह-तरह की देहगतियों का मुजाहिरा भी अभिनेतागण करते हैं। यह एक सिद्धांत के आत्मसातीकरण की प्रक्रिया है, जिसमें प्रदर्शनप्रियता जैसी खराबियों से बचने का मशविरा निहित है।

Friday, February 24, 2012

टॉलस्टॉय के ईश्वर

ईश्वर की खोज में मनुष्य सदियों से लगा है। ऋग्वेद के जमाने से लेकर तरह तरह के सवाल उसे लेकर उठते रहे हैं। कि आखिर उसका स्वरूप कैसा है? अगर वो स्रष्टा और नियंता है तो इस समूची सृष्टि को लेकर उसका प्रयोजन क्या है? हमारे दैनंदिन जीवन में उस पर आस्था की भूमिका क्या है? क्या वो हमारी प्रोग्राम्ड जिंदगियों के सॉफ्टवेयर का एक ऑपरेटर है, जो अपने कंप्यूटर का एक बटन दबाता है और हमारे जीवन में भारी हलचल शुरू हो जाती है। वगैरह वगैरह। खास बात यह है कि सदियों की खोजबीन के बावजूद आज भी ईश्वर एक अस्पष्ट और अराजक अवधारणा है।
हमारे शुरुआती पूर्वजों ने ईश्वर के साकार या निराकार स्वरूप की एक कल्पना की। उनके बाद के पूर्वजों ने उस स्वरूप की आराधना की पाबंदियां निर्धारित कीं। ये पाबंदियां धीरे धीरे धर्म का रूप लेती गईं। आज की तारीख में दुनिया भर के आस्तिक अपने अपने धर्मों की रक्षा में जमीन आसमान एक किए हुए हैं। वे अपने ईश्वर को लेकर बेहद असुरक्षित दिखाई देते हैं। नासदीय सूक्त की 'स्वर्ग रचयिता सृष्टिकर्ता ईश्वर रक्षा कर' अब एक पुरानी प्रार्थना हो चुकी है, आज का आस्तिक तो खुद अपने ईश्वर की हिफाजत में जुटा हुआ है। इन तरह तरह के आस्तिकों ने संसार भर में कोलाहल मचा रखा है। एक आस्तिक वो है जो अपने ईश्वर के लिए बम धमाके करता है, दूसरों की जान ले लेता है, दूसरा वो है जो अपने धर्मस्थल में लाउड स्पीकर लगाकर अपनी ईश्वर स्तुति से दूसरों की नींद हराम करता है, तीसरा वो है जो अपनी धार्मिक छवि का लाभ उठाकर दुराचार में संलिप्त पाया जाता है। ऐसे में जब सीधे साधे दुनियादार लोग धार्मिकों का ये सारा प्रपंच देखते हैं तो उनके मन में स्वाभाविक ही यह भाव उठता है- ऐसे आस्तिकों से भगवान बचाए, इनसे तो नास्तिक ही भले।
ठीक ऐसे मौके पर हमें टॉलस्टॉय के ईश्वर की याद आती है।
काउंट लियो निकोलेयेविच टॉलस्टॉय की मृत्यु को इस 24 नवंबर को पूरे सौ साल हो जाएंगे। युद्ध और शांति, आन्ना कारेनिना जैसे उपन्यासों के लेखक टॉलस्टॉय के ईश्वर की विशेषता है कि वो मनुष्य की रैशनलिटी (तर्कप्रवणता) को बाधित नहीं करता। प्रकटतः वो एक रहस्यमय उपस्थिति है, लेकिन सच्चाई यह है कि टॉलस्टॉय के साहित्य में ईश्वर वैसा ही है जैसा उसे होना चाहिए। उनकी किताबें पढ़ते हुए प्रारंभिक पाठक को किंचित यह आश्चर्य हो सकता है कि वहां ईश्वर का बार बार जिक्र आता है। लेकिन न तो इस ईश्वर से कुछ मांगा जाता है, न उनके पात्र उसकी पूजा पाठ करते दिखाई देते हैं, न ही उनके यहां उसके वजूद की कोई खास चर्चा दिखाई देती है। फिर यह 'निष्क्रिय' ईश्वर वहां क्यों है? इस सवाल के जवाब के लिए हमें उनके साहित्य में बहुधा प्रयुक्त होने वाले एक और शब्द पर गौर करना होगा। यह शब्द है- आत्मा। वे कहते हैं- 'मैं जानता हूं कि मैं टॉलस्टॉय हूं, मेरी पत्नी है, बच्चे हैं, सफेद बाल हैं, असुंदर चेहरा है, दाढ़ी है- यह सब तो पासपोर्टों में लिखा रहता है। लेकिन आत्मा के बारे में पासपोर्टों में कुछ नहीं लिखा जाता और आत्मा के बारे में मैं केवल इतना ही जानता हूं कि वो भगवान के निकट होना चाहती है। और भगवान क्या है? भगवान वो है जिसका मेरी आत्मा एक अंश है।'
ये है टॉलस्टॉय के ईश्वर की परिभाषा। वे कहते हैं- 'भगवान तो केवल आस्था की ही बात है।' उनका कहना था- 'जब तक मनुष्य के अंदर ईश्वर की ज्योति प्रकाशित नहीं होती तब तक वह केवल एक दुर्बल और दयनीय प्राणी होता है। और जब यह ज्योति जगमगाने लगती है, तब मनुष्य संसार में सबसे शक्तिशाली प्राणी बन जाता है।'
कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े रहे प्रसिद्ध लेखक मक्सिम गोर्की से एक बार टॉल्सटॉय ने पूछा- 'आप भगवान को क्यों नहीं मानते?'
'क्योंकि उसमें मेरी आस्था नहीं है।' गोर्की ने जवाब दिया।
'यह झूठ है'- टॉलस्टॉय बोले- 'आप स्वभाव से आस्थावान हैं और भगवान के बिना आपका काम नहीं चलेगा। बहुत जल्द ही आप यह अनुभव कर लेंगे। ...आप बहुत सी चीजों को प्यार करते हैं और प्यार का ही उग्र रूप है विश्वास। और अधिक प्यार करना चाहिए, तब प्यार विश्वास में बदल जाएगा। अविश्वासी प्यार नहीं कर सकता। ऐसे लोगों की आत्मा आवारा होती है, फलहीन होती है। आप जन्म से आस्थावान हैं और अपने स्वभाव के विरुद्ध जाने में कोई तुक नहीं। आप सुंदरता की रट लगाए रहते हैं न? सुंदरता क्या है? भगवान ही उच्चतम और पूर्णतम सुंदरता है।'
टॉलस्टॉय के मुताबिक 'धर्म मनुष्य और ईश्वर के बीच के पारस्परिक संबंध की व्याख्या करता है अर्थात यह बतलाता है कि मनुष्य संपूर्ण तत्त्व का एक अंश है। इस विधि से वह मनुष्य-जीवन का उद्देश्य निश्चित करता है और यह उद्देश्य सिवाय इसके और कुछ नहीं होता कि मनुष्य अपने अंदर के ईश्वरीय अंश की वृद्धि करे।'
टॉलस्टॉय का ईश्वर आस्था का विषय है, इसलिए उन्हें धर्म का बाहरी वितंडा एक पाखंड लगता था। अपने उपन्यास पुनरुत्थान में उन्होंने एक चर्च के दृश्य के प्रसंग से कर्मकांड और पाखंड का मखौल उड़ाया था, जिसके लिए उन्हें तत्कालीन रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च की नाराजगी का सामना भी करना पड़ा। उन्हें चर्च की सदस्यता से बेदखल कर दिया गया। लेकिन इससे उनके विचारों और लेखन की गति पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
अगर हम टॉलस्टॉय की रचनाओं और जीवन को देखें तो वहां सर्वत्र एक बेचैनी दिखाई देती है। वे जीवन की सादगी, उसकी सहजता और कर्मठता, उसके भोलेपन, उसके प्राकृतिक सौंदर्य के बरक्स चारों ओर फैले झूठ और नकलीपन को लेकर बेचैन दिखाई देते हैं। वे इसका समाधान खोजते हैं और युद्ध और हिंसा के विरोध में आवाज उठाते हैं। वे किसानों के शोषण को समाप्त करने के रास्तों की तलाश करते हैं। और उनकी यह तलाश कभी खत्म नहीं होती, जैसे उनकी बेचैनी। देश, दुनिया, जीवन के प्रश्नों से जुड़ी उनकी अनंत बेचैनी किसी ईश्वरीय अध्यात्म में जाकर शांति का रास्ता नहीं चुन पाती। उनकी ईश्वरीय आस्था उन्हें कोई शॉर्टकट मुहैया नहीं करा पाती, क्योंकि उनके प्रश्नों के लिए वैसा शॉर्टकट कभी था ही नहीं, क्योंकि टॉलस्टॉय निजी शांति नहीं संसार की शांति के प्रश्न से जूझ रहे थे, क्योंकि इस ऊबड़खाबड़ संसार की गुत्थी को सुलझाने में ईश्वर उनका आलंब जरूर था, लेकिन वह उनके जैसे रैशनलिस्ट की कोई प्रत्यक्ष मदद नहीं कर सकता था। माना जाता है कि टॉलस्टॉय अपनी तर्कप्रवणता में जीवन भर जीवन की अंतर्भूत तर्कहीनता से ही जूझते रहे। वह अंतर्भूत तर्कहीनता जो इस संसार की संरचना का अपरिहार्य नियम और अवयव है और उनकी मृत्यु के बाद के दशकों में कम्युनिस्टों ने भी जिससे अपनी तरह से जूझने की एक कोशिश की। इस जद्दोजहद ने टॉलस्टॉय को तो निरंतर बेचैन रखा, लेकिन संसार को उनके विचारों और साहित्य के रूप में बहुत कुछ दिया।