Monday, December 24, 2012

बचा रहने वाला काम


जीवन में कई तरह के लोग मिलते हैं. ज्यादातर अपनी निजी जरूरतों-हसरतों के प्रश्न से जूझते. लेकिन कुछ दिन पहले  दफ्तर में मिले सुमित की समस्या यह थी कि आज के इतने पतित हो गए सामाजिक हालात में जीवन कैसे जिया जाए. कि सारा माहौल इतना संवेदनहीन और विवेकशून्यता से भरा मालूम देता है कि आपका सारा जानना-समझना-पढ़ना-सोचना आपको कुंठा के अलावा कुछ और नहीं देता. मैंने ठीक-ठीक सुमित का दृष्टिकोण जानना चाहा तो उसने मुझे एक घटना सुनाई. एक दलित लड़की के साथ एक दबंग जाति के आठ लड़कों ने बलात्कार किया. मामला थाने पहुंचा, तो पुलिस ने लड़की की मेडिकल जांच कराई. जांच रिपोर्ट में कहा गया कि लड़की के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है, लिहाजा एफआईआर दर्ज नहीं की गई. लेकिन इसके कुछ ही रोज में ऐसा हुआ कि लड़की से हुए कुकर्म की खुद बलात्कारियों द्वारा बनाई गई विडियो क्लिप सार्वजनिक हो गई. उसकी सीडी और एमएमएस जब बहुतों के पास पहुंच गए तो इस प्रत्यक्ष सबूत के दबाव में पुलिस को मामला दर्ज करने के लिए बाध्य होना पड़ा. पर न्याय की गुहार के इस प्राथमिक चरण तक पहुंचने तक लड़की इतना कुछ झेल चुकी थी कि उसने आत्महत्या कर ली. सुमित ने इस घटना पर अपने आसपास के लोगों से मिली कुछ प्रतिक्रियाओं के बारे में भी बताया. एक बंदे ने उससे कहा कि 'भई लड़की माल तो बढ़िया थी'. वीडियो क्लिप देख चुके एक दूसरे शख्स ने बताया कि वारदात को देख कर वह इतना उत्तेजित हुआ कि डेढ़ महीने बाद बीवी के पास जाने की जरूरत महसूस हुई. 
सुमित के यह बताने पर मुझे भी अपनी एक नौकरी के दौरान की एक घटना याद आई. उस दफ्तर में काम करने वाली एक लड़की का वहीं काम करने वाले एक व्यक्ति से अफेय़र था. शायद उनके बीच झगड़ा हुआ या पता नहीं क्या कि उस शख्स ने अपने अंतरंग यौन क्षणों को चोरी-छिपे फिल्मा कर उसका वीडियो क्लिप सार्वजनिक कर दिया. देखने वालों ने बताया कि वह क्लिप इस कुशलता से बनाया गया था कि पुरुष का चेहरा उसमें नहीं दिख रहा था. लेकिन सबको पता था कि यह किसकी करतूत है. घटना के बाद लड़की कई दिनों तक दफ्तर में नहीं दिखी. फिर बुझे हुए चेहरे के साथ वह दफ्तर आने लगी. मैं उसकी मनःस्थिति के बारे में सोचता तो भीतर से हिल जाता. कभी विश्वास और वजूद पर ऐसा ही आघात झेलकर राजा भरथरी एक बड़े कवि हो गए थे. यह दुर्योग था कि इस त्रासदी को आकार देने वाला शख्स ठीक मेरे सामने बैठता था. मैंने पाया कि इस घटना के बाद भी वह दफ्तर का एक सामान्य नागरिक था. लोग पहले की तरह ही उसके साथ बातचीत और हंसी-ठट्ठे में शरीक होते. और मैं सोचता था कि मुझे क्या करना चाहिए. अंततः अपनी कायरता और दुनियादारी में शायद चेहरे से जाहिर होती नफरत के अलावा मैं कुछ नहीं कर पाया.
सुमित ने एक और घटना बताई. उसके गांव के एक दबंग की गांव की एक गरीब मुसलमान औरत पर कुदृष्टि अंततः उसके गर्भवती होने के निष्कर्ष तक पहुंची. लड़की की मां को कुछ नहीं सूझा तो अंततः उसने उसकी शादी कर दी, जो गर्भ की असलियत सामने आने पर जल्द ही टूट गई. अब वह स्त्री अपने जर्जर दीन-हीन जीवन और बच्चे के साथ गांव में रहती है. और सुमित के मुताबिक उसकी जिंदगी का सबसे दारुण पक्ष यह है कि वह औरत इन हालात तक क्यों पहुंची इस बारे में उसके अपने कोई अहसास नहीं हैं. उसका सवाल था कि ऐसे हालात में जहां लोग अपने प्रति होने वाले अन्याय तक को लेकर उदासीन हों- आखिर इस पढ़ाई-लिखाई, ज्ञान-संवेदना को लेकर क्या करें!
सुमित एक सरकारी स्कूल में अध्यापक है, जहां उसके मुताबिक आम जीवन स्तर को देखते हुए तन्ख्वाहें बहुत ज्यादा हैं, पर फिर भी अध्यापक लोग कुछ करना या अपने को कुछ बेहतर बनाने के कतई इच्छुक नहीं हैं. उनकी बोलचाल की भाषा का स्तर ऐसा है कि दिक्कत होने लगती है.
मैंने सुमित से कहा कि ज्ञान अपने में ही दिक्कत की चीज है. अमूमन ज्ञान को जीवन की क्षुद्रताओं से मनुष्य की आजादी का रास्ता समझा जाता है. इन क्षुद्रताओं से बरी हो चुका इंसान जब सच को देख पाता है तो उसकी असली परेशानियां खड़ी होती हैं. डॉक्टर फ्रेंकेस्टीन के मॉन्स्टर को भी शिक्षित होने के बाद ही अपनी विडंबना का अहसास हुआ था. लेकिन इस सच की समझ से बचने का कोई रास्ता नहीं है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस पर जर्मनी ने अधिकार कर लिया था, और प्रतिरोध के बहुत सीमित रास्ते बचे थे, तब वहां फ्रेंच रेजिस्टेंस मूवमेंट ने जन्म लिया था. यानी हर नागरिक जहां, जितना और जैसा भी प्रतिरोध हो सके, करता था. मैंने सुमित से कहा कि जीवन इतना विराट है कि तमाम निराशा के बावजूद कोई न कोई काम आपके लिए बचा रहता है. स्कूलों का स्तर चाहे कितना भी खराब हो, दो-चार बच्चे काम के निकल आते हैं. उनपर ठीक से मेहनत करो. उनमें अपने होने का इलहाम और अपने काम को ठीक से करने की प्रतिबद्धता अगर आ पाए तो यह चीज जरूर आपको संतोष देगी.  

Friday, December 21, 2012

सरोकार का रंगकर्म


बापी बोस निर्देशित प्रस्तुति सैवंटीथ जुलाई का प्रदर्शन पिछले दिनों श्रीराम सेंटर में किया गया। बापी बोस दिल्ली के उन गिने-चने रंगकर्मियों में हैं, जिनके काम में सामाजिक सरोकार,विचार और प्रतिबद्धता को बिल्कुल प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। पिछली प्रस्तुति में उन्होंने सुकरात की मार्फत सत्ता की निरंकुशता का एक रूपक पेश किया था। इस बार उन्होंने गुजरात के उत्तर-गोधरा परिदृश्य को पेश किया है। प्रस्तुति के शुरू में ही मंच पर सांप्रदायिक घृणा का अजगर लहराता हुआ दिखता है। प्रेक्षागृह के अंधेरे में चमकते हरे रंग के इस अजगर की डरावनी आकृति दर्शकों के बीच से गुजर रही है। फिर रोशनी होते ही मंच पर थाने का दृश्य दिखाई देता है, जहां कुछ पुलिसवाले बातचीत में मशगूल हैं। एक पुलिसवाले की सेकुलर राय उसके दो साथियों को पसंद नहीं आ रही। उनमें से एक की बीवी मुस्लिम दंगाइयों के हाथों मार डाली गई थी। इसी बीच कुछ लोगों की आवाजें सुनाई देती हैं। यह एक भीड़ है, जो कुछ मुस्लिम लड़कों की पिटाई पर उतारू है, कि उन्होंने एक हिंदू लड़की से दुष्कर्म किया है। पुलिसवाले भीड़ में से  लड़कों को छुड़ा लाए हैं। पता चलता है कि लड़कों ने कुछ भी नहीं किया, उन्हें हिंदूवादी मानसिकता के लोग झूठमूठ फंसाने पर उतारू हैं। दृश्य की खास बात यह है कि कुछ देर पहले मुस्लिम-विरोधी राय व्यक्त कर रहा और अपनी बीवी को सांप्रदायिक हिंसा में खो चुका पुलिसवाला इन हिंदूवादी कट्टरपंथियों से पूरे जुझारूपन से भिड़ रहा है। बहरहाल, इस वाकये के बाद दर्शक थाना-इंचार्ज से पैन-इस्लामाइजेशन के आरोप को बकवास ठहराने वाला एक छोटा-मोटा व्याख्यान सुनते हैं, कि पैन इस्लामाइजेशन जैसी चीज वास्तव में होती तो शिया-सुन्नी झगड़े न होते, ईरान-इराक युद्ध न होता, वगैरह।
इस दृश्य के बाद की पूरी प्रस्तुति युवक आसिफ मिर्जा पर चलाए जाने वाले मुकदमे को दिखाती है। प्रस्तुति के सभी किरदार बहुत जाहिर किस्म के हैं। हिंदूवादी वकीलवैसा ही जज,मौकापरस्त गवाह और प्रमाणों के आधार पर मुकदमा लड़ने वाला सेकुलर सरकारी वकील, जो प्रतिभाशाली है पर इन हालात में बेबस है। मुकदमे की इस पूरी कवायद में हिंदू कट्टरपंथ का माहौल बिल्कुल साफ-साफ दिखता है। वकील, जज, गवाह सब मिलकर युवक को गुनहगार ठहराने की पूर्वयोजना बनाए हुए मालूम देते हैं। सवाल है कि एक प्रत्यक्ष यथार्थ के उतने ही प्रत्यक्ष इस पाठ के जरिए आखिर नया क्या कहने की कोशिश की गई है। बापी बोस के मुताबिक यह प्रस्तुति सहिष्णुता, सांप्रदायिक सदभाव, सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता आदि के मंतव्य से तैयार की गई है। उसमें नरेंद्र मोदी की राजनीति आदि पर भी किरदारों की टिप्पणियां बीच-बीच में सुनाई देती हैं। बापी एक जानी-बूझी लेकिन आज की तारीख में बहुत टेढ़ी हो चुकी सच्चाई का एक सरल पाठ पेश करते हैं। वे इसमें मौकापरस्त पात्रों के समांतर भलेमानस पात्रों और किंचित अविश्वसनीय हृदय परिवर्तन को भी दिखाते हैं। बलात्कार का आरोप लगाने वाली दो औरतों में से एक अपना बयान बदल लेती है, और सारे पात्र सन्न रह जाते हैं, जब पता चलता है कि उसे इस हृदय परिवर्तन के लिए प्रेरित एक स्वामीजी महाराज ने किया है। संक्षेप यह कि बापी हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता की बेहद जटिल हो चुकी स्थिति का मुकाबला उन्हीं जंग खाए औजारों के जरिए करते हैं जिनका उपयोग गांधीवादीनुमा सेकुलरवादी अरसे से करते आ रहे हैं। लेकिन प्रस्तुति इस घोषित मंतव्य के बहाने एक ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम यह करती है कि मुकदमे की कार्रवाई में सरेआम सच्चाई और कानून की धज्जियां उड़ाई जाती दिखाकर काफी सफल तरह से हमारी व्यवस्था के केऑस को दिखाती है। बापी अपने पात्रों की पूरी एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह प्रायः चीजें जानी-बूझी होने के बावजूद इस केऑस की नाटकीयता दर्शकों को बांधे रखती है। कुछ किरदार इस क्रम में ठीकठाक नाटकीय रंग-ढंग में दिखाई देते हैं। दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली औरत के तौर तरीकों का छिछोरापन एक रंजक दृश्य बनाता है। इसी तरह से गवाही देने आया बस ड्राइवर के हावभाव में इस तरह के चरित्रों वाली एक दिलचस्प स्वाभाविकता है।
नाटक का आलेख बृत्य बसु ने तैयार किया है, जो दो नाटकों से प्रेरित है। ये नाटक हैं अमेरिकी नाटककार आर्थर वैक्स्ले का दे शैल नॉट डाई और उत्पल दत्त का मानुषेर अधिकारे। सर्किल थिएटर की यह एक भव्य प्रस्तुति थी, जो लगातार दोनों वकीलों की नोक-झोंक और मुकदमे में होने वाले खुलासों से अपने स्तर की उत्सुकता पैदा करती है। उसकी एनर्जी एक विचार के प्रति निष्ठा से पैदा होती है। विचारहीनता के दौर में बापी बोस इस निष्ठा की अलख जगाए हुए हैं, यह बड़ी बात है। 

Sunday, December 16, 2012

परिसर में बिखरी रंगभाषा


राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के चोंचलों का अंत नहीं। थिएटर के नाम पर वहां ऐसे-ऐसे प्रयोग हुआ करते हैं कि पश्चिम में आजमाए जाने वाले सर्रियल या प्रभाववादी मुहावरे भी पानी भरते नजर आएं। निदेशिका अनुराधा कपूर की हमेशा ही कुछ नया करनेऔर एक नई रंगभाषा तलाश करनेकी कोशिशों ने इधर के अरसे में विद्यालय की प्रस्तुतियों को एक अजूबा बना डाला है। उनकी अपनी रंगभाषा का सिलसिला भी कुछ इस किस्म का है जो थिएटर की हैपनिंगको इंस्टालेशन’ (संस्थापन) में तब्दील करता है। हालांकि कोई गहरा मनोयोग उनकी प्रस्तुतियों में कम ही दिखाई देता है। उसके बजाय अलग दिखनेका एक सायास उपक्रम नजर आता है। पिछले सप्ताह संपन्न हुई विद्यालय के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए निर्देशित उनकी नई प्रस्तुति डॉक्टर जैकिल एंड हाइडभी इसी क्रम में देखी जा सकती है।
आरएल स्टीवेंसन के सवा सौ साल पहले लिखे गए उपन्यास पर उनकी इस प्रस्तुति में दर्शकों के बैठने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके बजाय वे विद्यालय परिसर के अलग-अलग ठियों पर फैले प्रस्तुति के टुकड़ों को घूम-घूमकर देखा करते हैं। शुरू में बीच के लॉन में जमा हुए दर्शक स्पीकर पर एक कमेंट्री सुनते हैं, जो दरअसल प्रस्तुति से संबंधित पूर्वसूचना जैसा एक गद्य है। फिर मुंह से निकाली जा रहे कुछ अजीबोगरीब स्वर, फिर कुछ अभिनेताओं’  का दौड़कर गलियारे की छत पर चढ़ जाना, फिर कुछ देर में किनारे की रेलिंग पर मूर्तिवत हाथ उठाए हुए स्थिर लेट जाना। अगले चरण में दर्शक रंगमंडल के दफ्तर की बगल में स्थित एक कमरे में जमा होते हैं। यहां एक रसायनशालानुमा सेटिंग है- एक मेज, टेढ़ी-मेढ़ी नलियों से ऊपर जुड़ा एक पारदर्शी सिलेंडर, थोड़ी-थोड़ी देर में एक सीटी की आवाज के साथ उससे निकलता धुआं। कमरे में कोने के ताखे पर एक लड़की अजीब तरह से लेटी है, और दो वैज्ञानिक या सहायक नुमा पात्रों के संक्षिप्त और दर्शकों के लिए प्रायः संदर्भहीन संवादों के उपरांत यह दृश्य भी बर्खास्त हो जाता है। कमरे के चारों सिरों पर बिछी बेंचों पर बैठे दर्शकों को अब पुनः लॉन के एक अलग हिस्से की ओर प्रस्थान करना है। यहां एक दोमंजिला सेट लगाया हुआ है, जिसमें कुछ पात्र भी हैं, और उनमें कुछ चर्चा भी हो रही है। पर जैसा कि पिछली स्थिति में था उसी तरह यह सारी बातचीत देखने वाले के लिए एक अनजाने संदर्भ की तरह है। नीचे दो औरतें हैं, ऊपर के पात्रों में भी कुछ कशमकश है। ऊपर बर्तन से कुछ गिरता है। एक पात्र कूदकर नीचे आ जाती है, वगैरह। इस दृश्य के बाद दर्शकों की अगली मंजिल पुनः लॉन की पहले वाली जगह है, जहां शीशे की सतह वाली मालूम पड़ती एक चौकी को घेरकर चंद पात्र बैठे हैं। यहां दर्शकों को चाय परोसी जाती है। चाय पीते हुए वे इन पात्रों की कारगुजारियां देख रहे हैं। वे चौकी पर फैली राख में कुछ आकृतियां या नक्शे जैसा कुछ उकेर रहे हैं, या कुछ ऐसा बारीक काम कर रहे हैं जो दर्शकों के पल्ले नहीं पड़ रहा। बहरहाल, इससे अगले दृश्य के लिए दर्शकों को कहीं जाना नहीं है। उन्हें बस अपना रुख बदलकर पीछे की ओर बनाए गए एक लंबे प्लेटफॉर्म पर चढ़ जाना है। एक टैंपो आकर इस प्लेटफॉर्म के किनारे रुकता है, जिसके पीछे शीशे का एक कमरा बना हुआ है। कमरे में हाइड चढ़ आया है। दो लोग गुत्थमगुत्था हो रहे हैं। देखने वाले ज्यादा हैं, इसलिए उचक-उचक कर देखने के बावजूद कुछ दर्शकों को कुछ भी दिख नहीं रहा। इससे अगला दृश्य थोड़ा आगे एक कमरे का दरवाजा है। यहां भी दर्शक भीड़ लगाकर खड़े हैं।  दृश्यमें से किसी कसमसाहट और तड़पने आदि की आवाज आ रही हैं। बाद में और आगे गुजरते हुए वहां एक शख्स मरा हुआ पड़ादिखाई देता है। प्रस्तुति का अंतिम ठिकाना बहुमुख प्रेक्षागृह है, जिसमें अलग-अलग कोनों पर अलग-अलग पात्र एकल छवियों में दिखाई देते हैं। अपने बाल नोचती एक लड़की, बुरी तरह कांपता मुंह पर कोई लेप लगाए एक पात्र, वगैरह। इन छवियों को देखते हुए पिछले साल विद्यालय के ही तीसरे वर्ष के छात्रों के लिए स्विटजरलैंड के डेनिस मैल्लेफर निर्देशित प्रस्तुति ड्राइवकी याद आती है, जिसमें ऑटोरिक्शा ड्राइवर और महिला ट्रैफिक कांस्टेबल विषय को विभिन्न छवियों में दर्शाया गया था।... अंततः बाहर निकलते वक्त गलियारे में किसी प्रयोगशाला की तरह पारदर्शी पॉलिथिनों में भरे द्रव में कई तरह की चीजें एक प्रदर्शनी की तरह सजाकर रखी हुई हैं। यह प्रस्तुति का अंतिम चरण था।
स्टीवेंसन का उपन्यास स्ट्रेंज केस ऑफ डॉ. जैकिल एंड मि. हाइडएक ही शरीर में अच्छी और बुरी दो जुदा शख्सियतों के होने की सबसे पुरानी आधुनिक कहानी है। जिसे बाद में अलफ्रेड हिचकॉक की साइकोसे लेकर हाल की तमिल फिल्म अन्नियन’ (अपरिचित) और हिंदी की भूलभुलैयातक अलग-अलग तरह से दोहराया गया। उपन्यास में डॉक्टर जैकिल अपने भीतर के बुरे पक्ष को अलग रखने के लिए एक सिरम ईजाद करता है. जिसके जरिये वह अच्छे जैकिल और बुरे हाइड की दो शख्सियतों को जीता है। पर आखिर में सिरम के लिए आवश्यक अवयवों की कमी से वह जान लेता है कि उसका बुरा पक्ष यानी हाइड ही उसका एकमात्र पक्ष रह जाएगा।
अनुराधा कपूर की प्रस्तुति साधनों की प्रचुरता से तैयार किए गए एक विस्तृत इंस्टालेशन की तरह पेश होती है। एक ऐसी प्रस्तुति जिसमें अर्थ का न तो कोई प्रभाव बन पाता है, न प्रवाह। उसमें बहुत कुछ खोंस देने का प्रलोभन स्पष्ट दिखाई देता है। इससे यूं ही बिखरी प्रस्तुति कुछ और बिखर गई है। जरूर उसमें कुछेक ठीकठाक छवियां भी हैं, पर प्रस्तुति का कोई गाढ़ा समेकित प्रभाव नहीं बन पाता।  

Tuesday, December 11, 2012

पाकिस्तान की प्रस्तुति गुड़िया घर


दिल्ली इब्सन फेस्टिवल में पिछले सप्ताह पाकिस्तान के थिएटर ग्रुप तहरीक-ए-निसवां ने नाटक गुड़िया घर का मंचन किया। हेनरिक इब्सन के 1979 में लिखे प्रसिद्ध नाटक ए डॉल्स हाउस का यह एक रूपांतरित संस्करण थी। रूपांतरण में नाटक के सात पात्रों के बजाय कुल चार ही मंच पर दिखाई देते हैं। पत्नी का नाम यहां तहमीना है और पति का मुराद। मूल नाटक की कथावस्तु पूरे फैलाव में न दिखकर सरसरी तौर पर ही दिखाई देती है : पति की खुशी के लिए जी-जान से जुटी तहमीना, घर में किसी नारी निकेतन जैसी जगह से कुछ दिनों के लिए आई सकीना से उसकी बातचीत, इस बातचीत के जरिए स्पष्ट होता यथार्थ, जिसमें तहमीना की हर गतिविधि पति द्वारा नियंत्रित है, मानो वह एक गुड़िया हो जिससे वह जब चाहे जैसे चाहे, खेलता है। और अंत में तहमीना का घर छोड़कर जाने का निर्णय। नाटक के निर्देशक अनवर जाफरी के अनुसार पाकिस्तान के परिवेश में, जहां शादी को एक पवित्र और अटूट किस्म का संबंध माना जाता हो, नोरा या तहमीना के निर्णय की संगति ठहराना थोड़ा मुश्किल काम था, फिर भी उन्होंने इसे खेलने का निर्णय लिया। प्रस्तुति में एक प्रयोग यह किया गया है कि पूरा नाटक यहां एक रिहर्सल के तौर पर खेला जा रहा है। नाटक शुरू होने के पहले मंच पर एक-दो लोग लापरवाही से इधर-उधर आ-जा रहे या खड़े हैं। फिर वे जल्दी-जल्दी सोफा-कुर्सियां वगैरह लाकर रख देते हैं। कोने पर एक बोर्ड लगा है, जिसपर रिहर्सल का शेड्यूल लिखा हुआ है। दृश्यों के दौरान भी कुछ ऐसा मंजर है कि तहमीना को आईना देखना है तो एक कार्यकर्ता शीशे जैसा एक फ्रेम लेकर खड़ा हो जाता है। मुराद को अखबार चाहिए तो एक अन्य कार्यकर्ता अखबार लेकर दृश्य के बीच चला आता है, आदि। हालांकि यह तरकीब प्रस्तुति में कुछ जोड़ने के बजाय बाहरी और निष्प्रभावी तरह से दिखती है। रिहर्सल की यह तरकीब न होती तब भी प्रस्तुति का यथार्थवाद उतना ही औसत होता जितना कि वह था। एक मध्यवर्गीय गृहिणी की भूमिका में महवाश फारुकी और निचले तबके की कड़क औरत की भूमिका में सलीमा कैरमानी एक साफ-सुथरा दृश्य बनाती हैं। पोंछा लगाते हुए सकीना पति-पत्नी की बात सुनती रहती है। उसकी तुर्श भंगिमाएं प्रस्तुति को एक अतिरिक्त नाटकीयता देती हैं। धीरे-धीरे तहमीना को पता चलता है कि जिस शौहर की खुशी के लिए वह एक छोटे झूठ में शरीक हुई, वह तो उस झूठ से पैदा हुई मुश्किल को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लेना चाहता है।
प्रस्तुति कुछ ऐसी है कि वह नाटक की मंशा को बहस से ज्यादा स्थितियों में पेश करती है। हर समय पति और परिवार की चिंता करने वाली तहमीना से सकीना कहती है- क्या हमारा अपने को लेकर कोई फर्ज नहीं है, क्या हमारा अपने पर कोई इख्तियार नहीं है? इन स्थितियों में भी दृश्य का ज्यादा तामझाम नहीं है। निश्चित ही यह प्रस्तुति एक क्लासिक नाटक का एक संक्षिप्त और आसान विधान करती है, भले ही इस क्रम में विषयवस्तु का तनाव उस स्तर पर बना नहीं रह पाता।। नार्वे एंबेसी के सहयोग से आयोजित किए जाने वाले ड्रामेटिक आर्ट एंड डिजाइन एकेडमी के दिल्ली इब्सन फेस्टिवल के तहत एलटीजी प्रेक्षागृह में इसका मंचन किया गया।

Monday, December 10, 2012

थोड़ा कथ्य ज्यादा शिल्प

निसार अल्लाना की ड्रामेटिक आर्ट एंड डिजाइन एकेडमी के दिल्ली में हुए इब्सन फेस्टिवल में पिछले रविवार को केरल के ग्रुप थिएटर रूट्स एंड विंग्सने नाटक 'व्हेन वी डेड अवेकन' का मंचन किया। इब्सन ने यह नाटक 1899 में लिखा था। एक प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र में छुट्टियां बिता रहे मूर्तिकार आर्नल्ड रूबेक और उसकी पत्नी माइया अपनी जिंदगियों में खिन्न हैं। आर्नल्ड ने कभी माइया से वादा किया था कि वह उसे पहाड़ की चोटी पर ले जाएगा, जहां से वह दुनिया को देख सकेगी, पर उसने यह कभी नहीं किया। ऐसे में उन्हें वहां दो लोग मिलते हैं। एक शख्स जो पहाड़ पर भालुओं के शिकार के लिए जा रहा है, और सफेद कपड़ों में एक रहस्यमय स्त्री। रूबेक पहचान जाता है कि यह स्त्री कभी उसकी मॉडल रही इरेना है। इरेना खुद को मरा हुआ बताती है। इसकी वजह है कि रूबेक ने उसकी आत्मा पर कब्जा करके उसे अपनी 'पुनरुत्थान' शीर्षक मास्टरपीस मूर्ति में डाल दिया। रूबेक उसे बताता है कि उस मूर्ति के बाद से मृत होने की यह मनःस्थिति खुद उसकी भी है। इरेना के पास एक चाकू है। उसके अनुसार आत्माहीन होने के बाद से उसने इसी चाकू से अपने हर प्रेमी, और यहां तक की बच्चों को भी कोख में ही मार डाला है। अब मिलने पर वे पहाड़ पर जाते हैं, जहां रास्ते में उनकी मुलाकात माइया और उसके साथी से होती है।
मंच के दाएं छोर पर उतरता एक ढलवां मचाननुमा रास्ता बना है। आगे बजरी के ढूह से सटी एक (डाइनिंग) टेबल रखी है। मंच के अंधेरे में से माइया और रूबेक स्लो मोशन में प्रगट होते हैं। रूबेक देर तक कोट पहन रहा है, कमीज को पैंट में खोंस रहा है, अखबार पढ़ रहा है। माइया गिलासों को तरतीब से रख रही है, चाय बना रही है। स्लो मोशन में हर चीज बहुत धीमे-धीमे घटित हो रही है। फिर यह दृश्य इसी तरह दो बार और दोहराया जाता है। केरल के 33 वर्षीय रंगकर्मी शंकर वेंकटेश्वरन निर्देशित इस प्रस्तुति में शैली का एक व्यामोह दिखता है। पूरी प्रस्तुति मानो शिल्प का एक टुकड़ा है। इब्सन के महीन कथ्य के सूक्ष्म इस्तेमाल से बनता एक गाढ़ा शिल्प। स्थितियां आड़ी-टेढ़ी प्रभावात्मक तरह से इसमें मौजूद हैं। जहां मेज है वहीं ऊपर छत से एक बेलचा लटका दिखाई दे रहा है। अचानक वह धड़ाम की आवाज के साथ उस मेज पर गिरता है जहां थोड़ी देर पहले दो पात्र बैठे थे। एक पात्र टूटी मेज के टुकड़ों को जमा करके उसे बजरी से ढक रहा है। फिर इसे बंदूक से पीट रहा है। दूसरा पात्र इसी बजरी में अपना सिर घुसाए है। अपनी धूल धूसरित देह में यह रूबेक इरेना के चाकू से खुद को बचा रहा है। इस सारी कवायद के समांतर बाकी के दोनों पात्र स्लो मोशन में पहाड़ की यात्रा पर रवाना हो गए हैं, फिर ये दोनों पात्र भी उसी दिशा में बढ़ते हैं। मंच पर गूंज रहे धीमे वाद्य स्वरों की जगह तूफान के भीषण स्वरों ने ले ली है। रूबेक ऊपर की ओर जाते रास्ते के सिरे तक जा पहुंचा है। पीछे से इरेना उसे संभाले है। थोड़ी देर में मंच के पीछे मौजूद एक विशाल सफेद वस्त्र को दो पात्र पूरे मंच पर फैला देते हैं। वस्त्र के नीचे से पात्र एक आकार की तरह ऊपर उठता है।
प्रस्तुति का यह ढंग बहुत-सी पश्चिमी देशों के नाटकों की याद दिलाता है, जहां कथ्य हमेशा ही एक प्रभावात्मकता में गुम हुआ मालूम देता है, और प्रस्तुति दृश्य की अपनी ही एक स्वायत्तता बुनती है। यहां भी निर्देशक शंकर वेंकटेश्वरन कथ्य को मानो एक ऊबड़खाबड़ दृश्य में तब्दील करते है। प्रस्तुति में संवाद नाममात्र के और शैली के हिस्से की तरह हैं। इसकी वजह निर्देशक की यह धारणा भी है कि थिएटर को भाषा और साहित्य की सीमा से बाहर आना चाहिए। हालांकि वे मानते हैं कि इब्सन की अपनी भाषा के मुतल्लिक यह एक मुश्किल काम था। लिहाजा उन्होंने स्टेज-भाषा के तौर पर मानव व्यवहार के बजाय मानव स्वभाव को आधार बनाया। निश्चित ही यह प्रस्तुति अपनी प्रभावात्मकता में दृश्यों का एक मुश्किल विन्यास पेश करती है। लेकिन उसकी सीमा शायद यही है कि उसका यह मुश्किल विन्यास बहुत भारतीय नहीं लगता

Tuesday, December 4, 2012

पूंछ हिलाने के पहलुओं पर नाटक


हनु यादव दिल्ली के पुराने रंगकर्मी हैं। वे बीच-बीच में दिखते हैं, फिर गायब हो जाते हैं। करीब दो-ढाई दशक पहले उन्होंने गजानन माधव मुक्तिबोध की लंबी कहानी 'विपात्र' का श्रीराम सेंटर बेसमेंट में मंचन किया था। हिंदी अकादमी के सौजन्य से पिछले दिनों श्रीराम सेंटर में उनके निर्देशन में उनके पंचम ग्रुप की यह प्रस्तुति अरसे बाद फिर देखने को मिली। कहानीपन के निबाह के लिहाज से विपात्र एक गरिष्ठ किस्म का कथ्य है। इसके एक दफ्तर में काम करने वाले पात्र रोजमर्रा के वास्तविक सवालों पर बौद्धिक किस्म की चर्चा करते रहते हैं। इस चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा है कि 'हमने अपने स्वार्थों के लिए अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेच दी है'। इसी बात को कहानी में कई तरह से कहा गया है। जितने भी पहलू इस विषय के हो सकते हैं उन्हें खंगाला गया है। उसका एक पात्र कहता है कि हर आदमी के पूंछ हिलाने के अलग-अलग तरीके होते हैं। फर्क इतना ही होता है कि कुछ लोग अपने आत्मसम्मान के प्रदर्शन के लिए अलग तरह से पूंछ हिलाते हैं। प्रस्तुति के संवाद कुछ इस तरह के हैं- 'कोई व्यक्तिबद्ध वेदना का उदात्तीकरण भले ही कर ले, पर उसकी मूल ग्रंथि तो बनी ही रहती है'; 'नपुंसक क्रोध उनमें होता है जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बेच दी है'; 'व्यक्तिगत लाभ प्राप्ति ही प्रधान उद्देश्य है'आदि। कहानी में दरमियानी फासलोंऔर छोटे होटल में चाय पीने में संतुष्टि हासिल करने में निहित रोमांटिसिज्म की भी चर्चा की गई है। दिलचस्प ढंग से हनु यादव ने इस गद्य में से भी कई किस्म के दृश्य निकाल लिए हैं। इस क्रम में कहानी में प्रसंगवश आई एक स्त्री और चायवाला और उसकी घरवाली मंच पर दिखाई देते हैं। इनके अलावा मूल रूप से दो ही दृश्य प्रस्तुति में हैं। एक में चर्चा करते तीन दफ्तरी, और दूसरे में एक बैठकी। पुराने दिनों की बैठकबाजी के इस दृश्य में अलग-अलग हैसियतों के लोग शामिल हैं। ऊपर से लगने वाले ठहाकों के भीतर एक पूरा समाजशास्त्र काम कर रहा है। हनु यादव इसी समाजशास्त्र में से कुछ रंजक छवियां निकालते हैं। वास्तव में बैठकी में दिखने वाला एक मुखिया किस्म का इंसान सबको निर्देशित कर रहा है। उसके साथ शर्त लगाने वाला एक शख्स एक किलो रसगुल्ले खाएगा। इसके लिए मंच पर बाकायदा रसगुल्ले मंगाए गए हैं। रसगुल्ले वास्तव में हैं, पर उनकी रकम संकेत में चुकाई जाती है। कुल मिलाकर बात का सटीक ढांचा तो नहीं पर उसका मंतव्य प्रस्तुति में दिखाई देता है : खुद को बचाए रखने की फिक्र में अपने सेल्फ और अपनी मनुष्यता से समझौता करते और इस बोध से जूझते पात्र। कहानी में मुक्तिबोध बुद्धिजीवियों की स्वार्थपरता को दिखाते हैं।
विषय की संजीदगी को देखते हुए बैठकी वाला दृश्य कुछ ज्यादा चटपटा हो गया है। बाकी स्थितियां इस लिहाज से कहीं ज्यादा संतुलित हैं। एकरसता को तोड़ने में रोशनी का भी कुछ मौकों पर अच्छा इस्तेमाल किया गया है। याद आता है कि धूसर रंगों में फैली उस पुरानी लंबी प्रस्तुति की तुलना में यह कहीं ज्यादा संक्षिप्त- सारगर्भित और अभिव्यक्तिपूर्ण थी। मंच पर झोला लटकाए, बीड़ी पीते और अपनी आंतरिकता से जूझते किरदार में हनु यादव का चेहरा-मोहरा और भावभंगिमा मानो मुक्तिबोध के प्रसिद्ध पोर्टेट की छवि को धारण किए हुए था। वह छवि जिसमें जमाने भर की फिक्र करते एक बौद्धिक को अपने लिए महज कुछ बीड़ियां ही चाहिए होती थीं।


Sunday, December 2, 2012

भगवदज्जुकम

सातवीं शताब्दी के संस्कृत हास्य नाटक भगवद्ज्जुकम का प्रदर्शन पिछले दिनों मुक्तधारा प्रेक्षागृह में किया गया। वरिष्ठ रंगकर्मी हेमंत मिश्र निर्देशित इस प्रस्तुति में गणिका गोगल्स लगाए हुए दिखाई देती है। इस तरह प्राचीन परिवेश के हास्य को विशुद्ध प्रहसन में तब्दील किया गया है। शुरुआती दृश्य में परिव्राजक योगीराज और उनके शिष्य शांडिल्य में काफी देर तक आत्मा और शरीर को लेकर चर्चा चल रही है। योगीराज तो संसार से निस्संग हैं, पर शांडिल्य गुरुदेव के उपदेशों से आजिज आया हुआ एक दुखी चेला है। उसकी रुआंसी मुद्राओं और लोलुप मनोवृत्ति की अतिरंजना देखने लायक है। गुरु-चेला लताओं और तरह-तरह के रंग-बिरंगे पुष्पों से बनाए गए वन प्रांतर के दृश्य में उपदेश सुनते-सुनाते विचर रहे हैं। फिर एक जगह गुरुदेव ध्यानस्थ हो जाते हैं और शांडिल्य को इस रमणीक वन में एक रमणी अपनी सखियों सहित प्रवेश करती दिखाई देती है। गोगल्स लगाए रमणी को देखता लालसा-दग्ध चेला-- इस दृश्य योजना में गौण पात्रों के विवरण भी अच्छे मनोरंजक हैं। रमणी वसंतसेना की सखी और मां काफी प्रत्यक्ष किस्म का अभिनय कर रही हैं। उनके चौंकने, मनुहार करने, खीझने का लास्य एक नाटकीय तरकीब की तरह है। इसी दौरान एक यमदूत का दृश्य में प्रवेश होता है। इसके रंगढंग में भी अलग-अलग युगों की प्रवृत्तियों का घालमेल है। फुरसत के क्षणों में वह सिगरेट पीता दिखता है। किसी गलतफहमी में वह वसंतसेना के प्राण लेकर यमलोक चला गया है। अपनी सखी की यह दशा देख विस्फारित नेत्रों वाली परिभृतिका और टेढ़ी भौंहों वाली मां से एक दृश्य बनता है। यहां तक सब कुछ सही है। लेकिन प्रस्तुति यहां से थोड़ा गड़बड़ाना शुरू करती है, जब वैद्य का किरदार मंच पर अराजकता फैलाना शुरू करता है। पता नहीं क्यों निर्देशक ने कॉमेडी के नाम पर इस पात्र को किसी फिल्मी टपोरी की तरह खुला खेल फर्रुखाबादी करने की छूट दे दी है। मंच पर वैद्यराज हाथ में पकड़ी दारू की बोतल से गटागट घूंट भर रहा है। 
भगवदज्जुकम पर अलग-अलग निर्देशकों की कई प्रस्तुतियां अब तक देखी हैं। यह प्रस्तुति नाटक का एक संशोधित और परिवर्धित संस्करण कही जा सकती है। निर्देशक ने आधुनिक रंगमंच के तरीकों और लोकरंगमंच के भदेस को जोड़जाड़कर रोचक ढंग से प्रस्तुति तैयार की है। उन्होंने परिपाटी से अलग हटने की कोशिश की है। सातवीं शताब्दी के ही महेंद्र वर्मा कृत मत्तविलास के अलावा बोधायन का यह नाटक संस्कृत के सबसे प्रशंसित हास्य नाटकों में है, जिसका अंग्रेजी में भी रूपांतर हो चुका है।

Friday, November 16, 2012

लड़की जो वायलिन हो गई


इंद्रियों से संचालित होने वाले शरीर को एक वस्तु की तरह बरतो तो वह एक दिलचस्प शै बन जाता है। आप खड़े-खड़े धड़ाम से गिर रहे हैं, पर चोट लगने का कोई भय नहीं। कोई कहीं भी छू रहा है कोई मायने नहीं। गुदगुदी होती है तो एक जैविक खिलखिलाहट निकलती है। अचानक एक शख्स बेतरतीब ढंग से कांपने लगता है। यानी शरीर अपनी फितरत में कुछ क्रियाएं करता है, पर वह इंद्रियबोझिल शख्सियत से बरी होकर एक स्वयंसक्षम इकाई बन चुका है। आध्यात्म की विदेह-अवस्था के जैसी ही मानो यह व्यक्तित्व-मुक्ति की कोई दशा है, जो एशियाइयों के वश की चीज नहीं। सामाजिक वर्जनाओं का बंधापन खुद को खुद से परे रखकर बरतने की मुक्ति तक जाने नहीं देता। यह तो पश्चिमी मानस है जो जान गया है कि शरीर को इतना तूल मत दो कि इस शरीर के भीतर रहने वाला मनुष्य उसका बंधक बन जाए।    
कुछ रोज पहले दिल्ली आर्ट फेस्टिवल के तहत श्रीराम सेंटर में हुई हंगारियन प्रस्तुति 'एग शैल' शरीर की उन्मुक्त क्षमताओं का एक नायाब कोलाज थी, जिसके बारे में बताया गया कि वह 'वह हमारी दैनिक चर्याओं की प्राकृतिक भाषा में संबंध को बगैर शब्दों के परिभाषित करती है.' 
मंच पर वास्तविक बत्तख जितनी ही ऊंची ढेर सारी बत्तखें रखी हुई हैं। दाईं ओर आगे दो स्त्रियां, बाईं ओर पीछे तीन पुरुष। अचानक पुरुष लड़ते हुए गुत्थमगुत्था होने लगते हैं और स्त्रियां हल्के-हल्के थिरक रही हैं। फिर मारापीटी करते तीनों एक लड़की को उठा लेते हैं। लड़की वायलिन बन गई है। वे उससे खिलवाड़ करते हुए यहां-वहां उसके शरीर को किसी वायलिन की लय में छेड़ रहे और गुदगुदी कर रहे हैं। लड़की मछली की तरह बेहाल हो रही है। इसी बीच दूसरी लड़की उसके मुंह में एक अंडा ठूंस देती है। मुंह में अंडा ठूंसे हाथ-पांव मारती लड़की और उजड्ड भंगिमाओं में तीनों बंदे और बत्तखें। लड़की इस  लाजवाब सर्रियल दृश्य से छूटकर भाग खड़ी होती है। अंडा उसके मुंह में वैसे ही ठुंसा है। वह एक पुरुष का 'लिप किस' लेते हुए अंडा उसके मुंह में पहुंचा देती है। इस तरह बारी-बारी से अंडा सभी पात्रों के मुंह में पहुंचता है। इसी बीच नर्सरी राइम जैसे स्वर मंच पर गूंजने लगे हैं। पात्रगण गूंजती स्वर लहरियों को बेलौस आकार दे रहे हैं। थिरकते-लहराते शरीर, ब्रेक डांस की रोबोटीय लय। लड़की ने एक बत्तख को माइक की तरह उठा लिया है। एक अन्य स्थिति में अगल-बगल कुर्सियों पर बैठे स्त्री-पुरुष एक-दूसरे से सटी बाजुओं को रगड़ को आग जलाते हैं। उन्होंने कोई चीज वहां पहले से लगाई हुई है। वे सिगरेट पी रहे हैं। फिर होंठ से होंठ सटाकर वे मुंह में भरा धुआं बाकियों के मुंह में शिफ्ट कर रहे हैं। बीच-बीच में वे बत्तखों को अलग-अलग जगहों पर और अलग-अलग क्रम में रखकर दृश्य में परिवर्तन ला रहे हैं। दाएं सिरे पर एक मचान नुमा है। उसपर अधलेटी लड़की पैर की उंगलियों में जलती हुई सिगरेट दबाए है। पूरी कुशलता से वह नीचे खड़े तीनों पुरुषों के पास कश लेने के लिए पैर को ले जाती है। एक अन्य स्थिति में लड़का कुत्ता हो गया है। वह जीभ निकाले है। लड़की उसे पुचकार रही है। मंच पर एक तेज पंजाबी गीत बजने लगा है- 'नाल रहेगी जोगी के तैनू जोगन होना पै जाउगा'. सब इसपर अपने अपने ढंग से थिरक रहे हैं। एक पुरुष ने अजीबोगरीब ढंग से बहुत-सी बत्तखें उठा ली हैं। उसका चेहरा बत्तखों के बीच छिप गया है। कहीं से दो बड़े-बड़े अंडे इस बीच मंच पर चले आए हैं। दूसरी लड़की ने उन्हें अपने वक्ष की जगह पर ठूंस लिया है। पहले वाली लड़की को दो लोग बहुत ही तेज झुला रहे हैं। इस झुलाने में लाल रंग का उसका कास्ट्यूम हवा मे बुरी तरह लहरा गया है। शरीर उतनी जगह से उघड़ गया है। झुलाई जाती लड़की मानो अपनी ही बदहवासी का आनंद ले रही है। एक अन्य स्थिति में वह ऊंचे मचान से किसी लकड़ी की तरह नीचे गिरती है, जहां खड़े तीन बंदे उसे लपक लेते हैं। मंच पर एक वायलिन वादक आ गया है। उसके स्वरों के मुतल्लिक सारी गतियां धीमी होने लगी हैं। लड़की तीनों पुरुषों के कंधों और सिरों पर से होती हुई आगे बढ़ रही है। एक पुरुष जैसे ही मुक्त होता है, आगे जा लगता है। इस तरह उसका सिरों पर से गुजरने का यह सफर वायलिन के स्वरों के समांतर देर तक चलता है। अंतिम स्थितियों में वे पांचों अपनी-अपनी कुर्सियां बदलने का खेल एक ग्राफिकल लय में खेलते हैं। 
प्रस्तुति के निर्देशक का नाम जोल्टॉन है। इसकी खास बात उसमें निहित सुघड़ता, सुंदरता, जोश और आवेग को बताया गया है। अभिनेताओं की बहुस्तरीय ऊर्जा के बगैर ऐसी प्रस्तुति आकार नहीं ले सकती। वह खुद भी बहुत से स्तरों पर चलती है। उसमें हर अभिनेता मंच पर निरंतर कुछ न कुछ कर रहा है। अगर दाएं सिरे पर पुरुष नाच रहा है, तो बाईं ओर लड़की अपने बालों  को फैलाने और उलझाने में मशगूल है। दृश्य का यह ढांचा किसी प्रचलित अनुशासन से ऊपर है।

Saturday, November 10, 2012

बेगानी गलियों में दौड़ते शहर का गीत

युवा रंगकर्मी लोकेश जैन ने रंगकर्म का एक अलग ही मुहावरा विकसित किया है। इस मुहावरे में कोई कहानी नहीं होती, पर बहुत से चरित्रों के माध्यम से एक परिस्थिति को दिखाया जाता है। लोकेश धीरे-धीरे इस परिस्थिति की एक लय बनाते हैं, जो कथाहीनता के बावजूद दर्शकों को बांधे रखती है। यह लय कुछ इस किस्म की है कि इसमें यथार्थ और रूमानियत एक साथ शरीक दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए मंच पर जीवन के तलछट का कोई दृश्य चल रहा है कि पीछे से किसी पुरानी फिल्मी मेलोडी के स्वर सुनाई देते हैं। अपनी नई प्रस्तुति 'हमें नाज है' में लोकेश ने इसी शैली में पुरानी दिल्ली के गरीब-गुरबा के जीवन को विषय बनाया है। 
मंच पर बिल्कुल पीछे स्ट्रीट लाइट का एक खंबा खड़ा है, जिसपर एक गमला लटका है। वहीं नीचे प्रोपराइटर जमालू भाई का कंगला टी स्टाल है। टोपी लगाए व्यस्त जमालू के पास पड़ी बेंच पर छोटा जमालू भी बैठा रहता है। थोड़ी देर बाद केले वाली आती है, फिर गुदड़ी खाला, सुघड़ी आपा। किनारे पर दीन-हीन दशा में एक भिखारी भी बैठा है। उधार की चाय पीने वाला, झगड़ते हुए बच्चे, बोझा उठाने वाला आदि किरदार और मुनिया-पतरू की इश्किया लबझब वगैरह भी इस सतत दृश्य में विन्यस्त हैं। रात-बिरात अपने मालिक की झिड़कियां सुनता हुआ चौकीदार है, जिसे अपनी बिटिया का गौना करना है, खेती के बढ़ रहे खर्चों का हिसाब-किताब बैठाना है। एक भिखारिन है, जो गंगा में आई बाढ़ की कोई कहानी सुनाती रहती है। जमालू चाचा बंटवारे का वो वृत्तांत सुनाता है जिसके गड़बड़झाले में उसकी अपनी हवेली कस्टोडियन के कब्जे में चली गई। ऐसी कई कहानियां प्रस्तुति में दृश्य दर दृश्य पेश आती हैं। ये दृश्य अर्थव्यवस्था के विद्रूप में स्थानीयता की रंगतें लिए हुए हैं। वस्तुतः यह एक जर्जर हो रही स्थानीयता है, जिसे लोकेश अपने किसी स्मृत्याभास और रूमान के साथ नत्थी करते हुए रंगमंचीय छवियों में तब्दील करते हैं। 
दृश्य खुलते ही मंच पर कंबलों में निश्चेष्ट बहुत से लोग पड़े हुए हैं। कुछ सेकेंड की स्थिरता के बाद वे धीरे-धीरे उठते हैं और 'अनजानी बेगानी सी गलियों में' दौड़ते शहर का गीत गाते हैं। ठंड के मौसम में रात को सोने के लिए रजाई 20 रुपए और कंबल 10 रुपए किराए पर मिलता है। एक ठिठुरता उघारे बदन शख्स प्लास्टिक की पन्नी लिए दिखाई देता है। कांपती आवाज में वह अपना सपना बता रहा है- गर्म गद्दा और रजाई, जो ठंड को हड्डियों में घुसने नहीं देंगे। सूरज की किरन तो सुबह ही आएगी, और गर्मी देगी...सलीमगढ़ की दीवार के पीछे।..नहीने के पांच..खाने के लिए बीस...कम से कम सौ रुपए कमाने होंगे।...सपने ले लो सपने...। वह पछाड़ खाकर गिर पड़ता है।
लेकिन यह बीहड़-बेजार जिंदगी सुबह फिर अपने ढर्रे पर लौटती है। अपनी रागात्मकता अपनी चुहुल के उन्हीं टटपुंजिया किस्सों के साथ। लंबा-सा झोला टांगे एक बाबा आता है जो सबमें बताशे बांटता है। एक चूरन बादाम खीरा बेचने वाला आता है। बैकग्राउंड से गाना बजता है- मोहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती। सारे पात्र अपनी कंगलई पर मस्त होकर नाच रहे हैं। लोकेश जैन इस मंजर में जल्दी-जल्दी समाज-व्यवस्था की बहुत सी तस्वीरें पैबस्त करते हैं। बेघर औरतों के लिए काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन की कार्यकर्ता दृश्य में नमूदार होती है। वह मोबाइल पर अपने किसी उलझे संबंध को लेकर अंग्रेजी में तुर्श है और एक भीषण यथार्थ में एक नई खुराफात की तरह आ पहुंची है। अपने में ही हैरान-परेशान। इसी दरम्यान रह-रह कर दृश्य में दिखती एक बुरके वाली औरत अचानक अपना बुरका उठा देती है। सभी देखते हैं किसी साइको के फेंके तेजाब से झुलसा उसका वीभत्स चेहरा। जिंदगियों को इतना दुष्कर बनाता यह साइको कौन है? लोकेश जैन के मुताबिक यह बाजार है, जहां खो गई हैं खुशियां और बंद हो गई हैं सांसें। 
थिएटर ग्रुप जमघट और मंडला की इस प्रस्तुति के अभिनेता प्रायः पुरानी दिल्ली के गली-कूचों में रहने वाले युवा हैं। लोकेश जैन उन्हें ऐसे पात्रों में तब्दील करते हैं जिनके असलीपन में थोड़ा कैरिकेचर का पुट है। ये किरदार जिंदगी से ऊबे हुए भी हैं और उसमें डूबे हुए भी। उनके भीषण यथार्थ में ये कैरिकेचर देखने वाले के लिए एक रिलीफ पैदा करता है। कई दृश्यों में हिमांशु बी जोशी की प्रकाश योजना भी अलग से दिखाई देती है। लाल रोशनी में मृत्यु सरीखी उदासी मंच को घेरे है। यह एक 'कंपनी जैसे बन गए देश के लोकतंत्र' की उदासी है, जिसे श्रीराम सेंटर में पिछले सप्ताह हुई यह प्रस्तुति जीना यहां मरना यहां के नियति-भाव से संलग्न करती है।

Monday, November 5, 2012

असभ्यता की सड़क पर


दिल्ली में एक सड़क, जिसे बीआरटी कॉरिडोर कहा जाता है, पिछले सालों में लगातार चर्चा और विवादों में रही है. कई साल पहले जब इसपर काम शुरू हुआ था तब मेरे जैसे बहुत से लोग उधर से गुजरते हुए देखते थे कि आखिर यह हो क्या रहा है. बीच की आधी सड़क को ट्रैफिक से खाली करवा कर उसे सीमेंटेड किया जा रहा था, उसपर छोटे-छोटे फुटपाथ और पटरियां वगैरह बनाए जा रहे थे. और इधर पूरी सड़क का ट्रैफिक आधी सड़क में इन कारगुजारियों को निहारता हुआ फंसा रहता. फिर पता चला कि सड़क को सीमेंटेड करने और फुटपाथ बनाने में करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं, और इस तरह सरकार ने सार्वजनिक यातायात को व्यवस्थित करने की दिशा में एक नया झंडा गाड़ दिया है. उधर लगभग नियमित रूप से अखबारों और चैनलों में बीआरटी कॉरिडोर पर ट्रैफिक जाम की खबरें भी दिखाई देने लगीं. सरकार की उपलब्धि जनता को बेहाल किए हुए थी और लोग समझने लगे कि बीआरटी खुद में ही कोई राक्षसी नीति है.
उसी दौरान एक स्वैच्छिक संस्था इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टेनिबिलिटी के सौजन्य से हुए एक स्लाइड शो में  इसकी अवधारणा के तमाम पहलू जानने को मिले. उस शो में ऑस्ट्रिया से आए एक प्रोफेसर एक स्क्रीन पर दिख रही तस्वीरों के समांतर अपनी कमेंट्री के जरिए दुनिया के कई शहरों में यातायात के परिदृश्य और उसमें बीआरटी की भूमिका को स्पष्ट कर रहे थे. बीआरटी यानी बस रैपिड ट्रांजिट अर्थात एक ऐसी व्यवधानरहित सड़क जिसपर सिर्फ बसों को ही चलने की अनुमति होती है. दुनियाभर में विकास के अमेरिकी मॉडल का अनुसरण करने के कारण कारों की तादाद तमाम शहरों को आक्रांत किए हुए है. कार की वजह से बहुत कम लोग सड़क पर बहुत ज्यादा जगह घेरे रहते हैं. इस तरह बढ़ते ट्रैफिक को प्रवहमान बनाए रखने के लिए फ्लाईओवर बनाए गए. फ्लाईओवर यानी कंक्रीट का ऐसा ढांचा, जो उस मंजर को विकराल, असहज और असुंदर बनाता है. शो में कुछ ऐसी तस्वीरें दिखाई गईं, जिनमें दक्षिण कोरिया के सियोल शहर में बीआरटी की सफलता के बाद कई फ्लाईओवरों को तोड़ दिया गया. तोड़ने के बाद वाली तस्वीरों में वहां एक बगीचा, उसमें लगे फूल और खुलापन था. शो में मेट्रो ट्रेन की भी चर्चा हुई, जिसके सबसे बड़े अरबों रुपए की लागत वाले निर्लज्ज प्रोजेक्ट चालीस फीसदी भूखी-नंगी आबादी वाले हमारे देश में इन दिनों बड़े पैमाने पर चल रहे हैं. उन्होंने दिखाया कि कैसे किसी मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए एक यात्री को या तो काफी नीचे सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं, या काफी ऊपर चढ़नी पड़ती हैं, और अगर यह सारा समय जोड़ लें तो अंततः उसके लिए वक्त की कोई ज्यादा बचत नहीं हो पाती. फिर मेट्रो की यह सीमा भी है कि एक शहर की बसावट में हर जगह तक उसकी पहुंच नहीं हो सकती. उसकी तुलना में बीआरटी सड़क के लिए सिर्फ इतना ही करना होता है कि उसपर खुलने वाली तमाम उप-सड़कों को निषिद्ध करना होता है और उसे अधिकतम सिग्नल फ्री बनाना होता है. इस पद्धति में कोई तकनीकी तामझाम नहीं. यात्री सीधे सड़क पर बने बस स्टाप पर आता है, बस पकड़ता है और निर्बाध चल रही बस उसे एक लगभग निर्धारित समय में उसके गंतव्य पर पहुंचा देती है. शो में प्रोफेसर ने एक तस्वीर दिखाई जिसमें एक कार खड़ी थी. उन्होंने देख रहे लोगों से पूछा कि क्या इस तस्वीर में उन्हें कुछ असामान्य दिखाई दे रहा है. किसी ने भी हां नहीं कहा तो वे बोले- इसका मतलब है कि आपकी निगाह खुद में ही असामान्य हो चुकी है. उस निगाह में उस खाली जगह को देखने का बोध समाप्त हो चुका है, जो इस तस्वीर में कार से भरी हुई है. उन्होंने विएना में बीआरटी की सफलता के बाद उसके आसपास के रिहायशी इलाकों में बढ़े साइकिल के चलन, कारों से मुक्त प्राकृतिक स्पेस के इजाफे और नतीजतन प्रदूषण के स्तर में आई गिरावट को भी दिखाया.
लेकिन हमारे यहां बीआरटी के अंजाम कुछ अलग ही हुए. स्वैच्छिक संस्था से जुड़े एक मित्र ने मेरे इस विचार की पुष्टि की कि दिल्ली का बीआरटी दरअसल बीआरटी है ही नहीं. वह पूर्ववत सिग्नलों से युक्त एक सामान्य सड़क है, जिसे बसों के लिए सीमित करते ही बाकी सड़क पर दबाव बहुत बढ़ गया है, और बसों को भी कोई विशेष फायदा नहीं हुआ है. यह सड़क हमारी व्यवस्था के भ्रष्टाचार, मूर्खता, निरंकुशता और केऑस को समझने का एक बहुत अच्छा उदाहरण है. जब से यह बनी है तब से इसने लोगों को परेशान करने के अलावा भले ही कुछ न किया हो, पर व्यवस्था को व्यस्त बने रहने के लिए इसने एक वजह दे दी है. कभी उसपर जनहित याचिका होती है, कभी मुख्यमंत्री एक आधुनिक प्रणाली के बतौर उसके पक्ष में दलील देती हैं, कभी कोर्ट उसके स्टेटस को बहाल रखा जाए या नहीं इसपर अपना निर्णय सुनाती है. न्यूज चैनल उसपर खबर बनाते हैं और सड़क से कोई सीधा ताल्लुक न रखने वाला दर्शक इस खबर को अदालती निर्णय के पक्ष या विपक्ष के किसी सिरे से थाम लेता है. लब्बोलुबाब यह कि इस तरह एक व्यवस्था गतिशील बनी रहती है.... अभी कुछ रोज पहले दिल्ली में 20 और बीआरटी कॉरिडोर बनाने की घोषणा की गई है. इनका क्या स्वरूप होगा ये तो भगवान जाने, पर आम लोगों के लिए दी जाने वाली सब्सिडियां घटाने से जमा हुई रकम का एक हिस्सा इनपर जरूर खर्च हो जाएगा. उधर ट्रैफिक की समस्या को बढ़ाने वाली कारें फिर भी कम नहीं होंगी, क्योंकि वे तरक्की और समृद्धि की निशानी हैं.

Wednesday, October 31, 2012

दूर से तुगलक पास से तुगलक

फिरोजशाह कोटला में नाटक के मंच के कई खंड हैं। बाएं छोर पर आम जनता से जुड़ी स्थितियों के लिए छोटे-छोटे जीनों में बना प्लेटफॉर्म, फिर बादशाह का दरबार और कक्ष, फिर एक बस्ती, एक किला और उसकी बुर्जी; उसी से सटी एक ऊबड़खाबड़ जगह। यह इतना विस्तृत मंजर है कि किसी एक दृश्य के लिए दर्शक को बहुत ज्यादा गर्दन घुमानी पड़ती है, या बुर्जी पर एक वास्तविक पेड़ के करीब अपने सिपहसालार से बात कर रहा बादशाह किसी सुदूर छवि की तरह दिखाई देता है। यह प्रोसीनियम से एक अलग तरह का अनुभव है। यहां कोई छत नहीं है जहां से पात्र को फोकस में लेने वाला रोशनी का कोई स्पष्ट वृत्त बन सके। यहां रोशनियां थोड़ी दूर से आती हैं। दृश्य दर दृश्य किसी एक मंच को उजागर करतीं। आरके धींगरा ने कई मौकों पर अपनी प्रकाश योजना से अच्छे चाक्षुष असर पैदा किए हैं।  इब्राहीम अलकाजी के शब्दों में तुगलक एक ऐसा नाटक है जो 'विशद निरूपण' की मांग करता है, जिसमें उदाहरण के लिए उन्होंने बादशाह के अध्ययन कक्ष की किताबों से ठसाठस भरी ताख का भी जिक्र किया है। पर निर्देशक भानु भारती की प्रस्तुति के इस विस्तृत मंच पर विशद निरूपण का अर्थ बदल गया है। राजधानी के दिल्ली से दौलताबाद जाने के दृश्य के लिए सामने के पूरे विस्तार में पीछे की ओर बांसों के बने रास्ते पर देर तक सुनाई देते वाद्यस्वरों के बीच लोग जाते दिखते हैं। भानु भारती इस दूरस्थ मंच पर प्रवेश-प्रस्थान, अभिनेयता और वेशभूषा की गुणवत्ता से एक प्रभाव पैदा करते हैं। प्रस्तुति में माइक्रोफोन एक महत्त्वपूर्ण औजार है। लिहाजा दृश्य भले थोड़ा दूर हो पर वाचिक के न्यूनतम झोल नाटक के उस मूल तर्क को अक्षुण्ण रखते हैं जहां से नाटक तुगलक का तनाव बनता और एक ट्रैजेडी की ओर जाता दिखता है।
नाटक तुगलक अपने प्रोटागोनिस्ट के माध्यम से एक समाज का भी विहंगम दृश्य उपस्थित करता है। उसके छल-कपट, उसकी आत्मदीनता और मक्कारियों का। जहां लाशों का भी कारोबार कर लिया जाता है और जहां मौत के खेल हमेशा चला ही करते हैं। एक मुल्क जहां कुछ भी सही नहीं है, उसे एक बादशाह अपने स्वयंभू फैसलों से दुरुस्त करने में लगा है। वो अपने आसपास की साजिशों से बाखबर है, अपने फैसलों के तमाम पक्षों और नतीजों के बारे में जानता है, उसके पास मुल्क को लेकर एक नजरिया है- पर फिर भी कोई चीज है जो उसे नाकामी की तरफ धकेलती है। वह क्या है? गिरीश कर्नाड इसका भी हल्का सा पता देते हैं। नाटक में दुनियादारी छोड़कर मोक्ष की फिक्र करने वाली हिंदू दार्शनिकता के कारण हकीकी तरक्की के इल्म इस्लाम को कबूल करने वाला वजीरे आजम नजीब अंततः इस नतीजे पर पहुंचता है कि 'सुनहरा दौर इस दुनिया में कभी कायम नहीं हो सकता। यहां है सिर्फ चंद लम्हे जो हम जी रहे हैं। बस, इन पर से हमारी गिरफ्त ढीली न पड़े।' कर्नाड शायद इसी बौद्धिक निष्कर्ष को उसमें निहित विरोधाभास और विडंबना के साथ कई तरह के पात्रों के माध्यम से एक तनावपूर्ण नाटकीयता में बांधते हैं। इस नाटकीयता में लगातार घटनाएं और साजिशें होती रहती हैं। अविश्वास का वैसा ही माहौल है जैसा समकालीन हिंदुस्तान में देखा जा सकता है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने आत्मविश्वास से लबरेज एक बादशाह के निराशा के गर्त तक पहुंचने की तमाम रंगतों का मंच पर अच्छा चित्रण किया है। एक दूसरा पात्र जो मंच पर अलग से नजर आता है, वह है धूर्त अजीज का। हत्या, चोरी, लूटमारी जैसे काम करने वाले इस पात्र को टीकम जोशी ने अपनी नियमित ऊर्जा से मंच पर पेश किया है। इसके अलावा सौतेली मां की भूमिका में हिमानी शिवपुरी, नजीब की भूमिका में रवि खानविल्कर एवं अन्य अभिनेताओं का अभिनय भी काफी अच्छा है। प्रस्तुति में आलेख के माहौल को बनाने में अम्बा सान्याल की वेशभूषा की भी खास भूमिका दिखाई देती है।
प्रस्तुति में दृश्य संरचना का भारीभरकम तामझाम होने के बावजूद निर्देशक भानु भारती ने चीजों को बिखरने नहीं दिया है। वे मंच के यथार्थवाद को उसके पूरे अनुशासन के साथ व्यवहार में लाए हैं। ज्यादा बारीकियों में उलझने के बजाय ऐसी ग्रैंड प्रस्तुति के लिए विशद निरूपण की यही नीति शायद उचित भी थी। उसके कई दृश्य अपने संयोजन में काफी भव्यता लिए हैं।

Saturday, October 27, 2012

इतिहास के खंडहर में तुगलक


फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में पिछले साल किए 'अंधा युग' के मंचन के बाद निर्देशक भानु भारती एक बार फिर वहीं एक बड़ी प्रस्तुति 'तुगलक' लेकर आ रहे हैं। गिरीश कारनाड का यह नाटक सत्तर के दशक में इब्राहीम अलकाजी ने पुराना किला में खेला था। लेकिन फिरोजशाह कोटला का इतिहास तो खुद तुगलक वंश से जुड़ा है। इसे नाटक के नायक मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई और उत्तराधिकारी बने फिरोजशाह तुगलक ने चौदहवीं शताब्दी के मध्य में बनवाया था। लेकिन इस ऐतिहासिक संयोग याकि संगति के अलावा निर्देशक भानु भारती के मुताबिक 'यह नाटक आधुनिक युग के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। सत्तासीन लोगों के इर्द-गिर्द रहने वाले विवेकशून्य लोग शासकों को भी आम जनता के कल्याणकारी काम करने से रोकते हैं। वे दूरदृष्टि वाले शासक के नेक विचारों को भी अपने स्वार्थ के लिए तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं।' 
गिरीश कारनाड ने अपने नाटक में भारतीय इतिहास के सबसे विवादास्पद चरित्रों में से एक रहे तुगलक को एक नए तरह से देखा था। एक स्वप्नदर्शी शासक, जिसमें बड़े फैसले लेने का साहस था। लेकिन जो अपनी सुगठित राज्य की आकांक्षाओं का वस्तुस्थिति से तालमेल नहीं बैठा पाया। पुराना किला वाली प्रस्तुति के वक्त अपने निर्देशकीय में इब्राहीम अलकाजी ने मुहम्मद बिन तुगलक को एक ऐसे 'प्रतिभाशाली चरित्र' के तौर पर चित्रित करना चाहा था, 'जिसका आधुनिक मन इस विशाल देश को एक राष्ट्र का रूप देने में लगा था'. उस निर्देशकीय में उन्होंने लिखा था- 'तुगलक की सारी विडंबना यही है कि वह एक ऐसा द्रष्टा था जिसके दृष्टिकोण की व्यापकता उसके समकालीनों के लिए अबूझ पहेली थी।' बव कारंत द्वारा किए नाटक के हिंदी अनुवाद की भूमिका में अलकाजी में लिखा- 'कुछ ही वर्षों में तुगलक की गगनचुंबी योजनाएं और स्वप्न धूल में मिल गए। अपनी इच्छाओं की पूर्ति में बाधा बनने वाले सभी व्यक्तियों को उसने मौत के घाट उतार दिया, और अंत में उसने यही पाया कि अपने ही उलझन-भरे अस्तित्व की छायाओं में वह जिंदगी-भर लड़ता रहा। निपट अकेला, शवों के झुंडों से और अपने ही हाथों किए सर्वनाश से घिरा हुआ वह उन्माद के छोर तक पहुंच गया।' 
अलकाजी की प्रस्तुति में तुगलक की भूमिका मनोहर सिंह ने की थी, भानु भारती की प्रस्तुति में यह भूमिका राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक और हिंदी सिनेमा में पहचान बना चुके यशपाल शर्मा के सुपुर्द है, जिन्हें लगता है कि ऐसी बड़ी प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों को रंगमंच की ओर आकर्षित किया जा सकता है। भानु भारती याद करते हैं कि सत्तर के शुरुआती दौर में हर युवा अभिनेता तुगलक का किरदार करने का इच्छुक हुआ करता था। उसे लगता था कि 'तुगलक की प्रामाणिकता एक अभिनेता के रूप में साबित करने के लिए यह भूमिका निभानी चाहिए.' उनके मुताबिक इस प्रस्तुति में उन्होंने तुगलक के जीवन के समांतर उसके जीवन दर्शन पर केंद्रित रहने का प्रयास किया है। एक ऐसा शासक और स्वप्नद्रष्टा जो किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना चाहता था।
तुगलक की छवि इतिहास में एक सनकी शासक की भी रही है, जो अपने फैसले लेने में वस्तुस्थिति की बहुत परवाह नहीं करता था, जिसने हिंदुओं पर से जजिया हटाने का फैसला लिया और अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद ले गया।  
यशपाल शर्मा के अलावा अन्य मुख्य भूमिकाओं में हिमानी शिवपुरी, सीताराम पांचाल, रवि खानविल्कर, रवि झंकाल भी प्रस्तुति में हैं। दिल्ली की साहित्य कला परिषद द्वारा आयोजित इस नाट्य प्रस्तुति के प्रदर्शन 28 अक्तूबर से 4 नवंबर तक किए जाएंगे।

Friday, October 19, 2012

फिर फिर मंटो


दिल्ली की उर्दू अकादमी ने सआदत हसन मंटो की जन्म शताब्दी के मौके पर अपना इस साल का नाट्य समारोह उन्हीं को समर्पित किया। पिछले साल अकादमी ने यह फेस्टिवल  फैज अहमद फैज की जन्म शताब्दी के मौके पर इसी तरह फैज को समर्पित किया था। नाटककार न फैज थे, न मंटो। हिंदी-उर्दू के रंगकर्मी ऐसी सूरत में कोलाजनुमा एक फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। थोड़ी-बहुत लेखक की जिंदगी और थोड़ा-बहुत उसका साहित्य लेकर प्रस्तुति तैयार की जाती हैं। हिंदी-उर्दू की बौद्धिकता की इस इतिवृत्तात्मकता से आगे कोई गति नहीं है। उसपर उर्दू वालों की विशेषता यह है कि वे अपने लेखकों पर जरूरत से कुछ ज्यादा ही मुग्ध रहते हैं। पिछले एक-डेढ़ दशक में मंटो को लेकर बनी इस तरह की 
इतनी प्रस्तुतियां देख ली हैं कि सारे दोहराव की तस्वीर पहले से ही आंखों के आगे खिंची रहती है। संयोग ऐसा रहा कि इस फेस्टिवल में देखी दो प्रस्तुतियों में यह दोहराव डबल होकर सामने आया। सलीमा रजा निर्देशित 'एक कुत्ते की कहानी' और रामजी बाली निर्देशित 'मंटो की कलम से' की मार्फत मंटो की कहानियां 'टिटवाल का कुत्ता' और 'काली सलवार' दो-दो बार देखने को मिलीं। 
'एक कुत्ते की कहानी' का आलेख नाटककार दानिश इकबाल ने तैयार किया था। दानिश की पिछले साल फैज वाली प्रस्तुति भी देखी थी। वे इस तरह के आलेख के लिए एक अच्छे संपादक हैं। उन्होंने दोनों कहानियों के उतने ही हिस्से को लिया है जहां उनकी विडंबना ज्यादा चुस्त होकर दिखती है। कहानी 'टिटवाल का कुत्ता' सरहद पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान के मोर्चों के दरम्यान कहीं से चले आए एक कुत्ते के जरिए एक खांचाबद्ध मानसिकता की विडंबना को दिखाती है. निरीह कुत्ते को दोनों तरफ के देशभक्त सैनिक अपने-अपने संदेहों में आखिर मार डालते हैं। सलीमा रजा के यहां मंच पर एक बंदा नकली कुत्ते को पकड़े है और उसकी आवाज निकाल रहा है। जबकि रामजी बाली ने एक कलाकार से कुत्ते की एक्टिंग कराई है। ऐसी बजाहिर तरकीब से अलग कोई अन्य कल्पनाशीलता ऐसे मामले में शायद संभव नहीं थी। उसपर रामजी बाली इस तरकीब में थोड़ा और 'खुला खेल' करते हैं। उनका 'कुत्ता' बीच-बीच में डायलाग भी बोलता है। बहरहाल पहले बात सलीमा रजा और दानिश इकबाल वाली प्रस्तुति की। दानिश कहानियों की फोकस की गई विडंबना को मंटो की अपनी एक व्याख्या के साथ पेश करते हैं। इसके लिए वे साहित्यिक किस्म की नाटकीयता का एक ढांचा बनाते हैं। इसमें मंटो एक मनोचिकित्सक के पास पहुंचे हुए हैं, क्योंकि उनपर चले मुकदमे के फैसले में उनसे पागलपन का इलाज कराने के लिए कहा गया है। मनोचिकित्सक के आगे वे अपने और समाज के पागलपन का विश्लेषण करते नजर आते हैं। वे कहते हैं- 'मैं राइटर हूं। मुझे जिंदगी को उसी शक्ल में पेश करना चाहिए जैसी कि वह है, न कि जैसी वह थी या जैसा उसे होना चाहिए।' लेकिन उनका यह यथार्थवाद ऐसा है कि 'कहानियां खुद बखुद लिखवा लेती हैं अपने आपको।'
लगभग खाली स्टेज के दाएं छोर पर मनोचिकित्सक के साथ बैठे मंटो बीच-बीच में 'मदर टिंचर' का सेवन करते कुर्ता-पाजामा पहने बैठे हैं। बाकी स्टेज पर कुछ-कुछ अंतराल पर कहानियां दिखाई देती हैं। लेकिन दृश्यात्मकता के लिहाज से 'टिटवाल का कुत्ता' को छोड़कर बाकी कहानियां पैबंदनुमा हैं, जिनका कोई भी असर उनके खत्म होते ही खत्म हो जाता है। दरअसल प्रस्तुति दृश्य से ज्यादा व्याख्याओं में उलझी है। इसी क्रम में तीसरी कहानी 'ठंडा गोश्त' के नायक ईशर सिंह को ऐसा किरदार बताया गया है 'जो हैवान होकर भी इंसानियत न खो सका.' ऐसी ही एक व्याख्या में मंटो कहते हैं- 'साहित्य और कल्चर में पोर्नोग्राफी तलाश करना है तो पहले उसकी मंशा तलाश करिए।'
लेकिन इस सारे कुछ के बावजूद प्रस्तुति कुछ ऐसी है कि उसमें एक गढ़ाव जैसा दिखाई देता है। मंटो के मुरीदों ने उनके किरदार की सुसंगतियां ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उनका एक नपा-तुला व्यक्तित्व निर्मित कर लिया है। यह मंटो अपने बारे में हर कुछ जानता है, वह बेलौस है, बुद्धिजीवी है, फक्कड़ है और जैसा कि इस प्रस्तुति का एक संवाद बताता है परेशान नहीं, उदास नहीं, बेजार है। मंटो हर नाट्य प्रस्तुति में अपने साहित्य की पूरी सैद्धांतिकी को निरूपित किया करते हैं। नाटक जो जाना-बूझा है उसी को दोहराता है। मंटो की भूमिका में तारिक हमीद कुछ स्मार्ट ड़ायलाग जरूर बोलते हैं, पर इसके अलावा किरदार में कोई रोचकता नहीं है। 
प्रस्तुति 'मंटो की कलम से' में हाल कुछ दूसरे ही हैं। यहां सीधे 'कहानी का रंगमंच' ही मंच पर मौजूद है। यह बोगस पद्धति कभी देवेंद्र राज अंकुर ने ईजाद की थी, जहां वाचिक देखते देखते एक बकबक में तब्दील हो जाता है। रामजी बाली न कहानी को संशोधित करते हैं न संपादित। न कोई दृश्य संरचना, न अभिनय जैसा अभिनय। न यथार्थ न माहौल। 'काली सलवार' का एक-एक विवरण बताया जा रहा है। चुनांचे सुल्ताना की आखिरी कंगनी भी घर से चली गई। चुनांचे खुदाबख्श के साथ उसे अंबाला से दिल्ली आना पड़ा। चुनांचे उसने बालकनी में जाना भी छोड़ दिया। हर दूसरे वाक्य में एक चुनांचे है, और कहानी बगैर कोई भावबोध बनाए इन्हीं वाक्यों में धीरे-धीरे और जल्दी-जल्दी निबट रही है। निबटते समय में एक्टिंग के नाम पर कुछ निबट रहा है। अब शंकर बालियां ले जाएगा, फिर सलवार लाएगा। दर्शक उड़ते चमगादड़ों के बीच ये कार्रवाइयां देख रहे हैं। चमगादड़ों का छोटा परिवार जो कभी श्रीराम सेंटर में रहता था, अब काफी बड़ा हो गया है। निर्द्वंद्व उड़ते चमगादड़ों की फड़फड़ाहटें दर्शक के लिए विघ्नकारी हो सकती थीं, पर इस विघ्न के लायक कुछ हो भी तो।  

Monday, October 15, 2012

असली लड़ाई अतर्कवाद से है


किसी भी विषय को लेकर सही तरह से सोच पाना हिंदुस्तानियों को कभी नहीं आया. विचार के किसी एक सिरे को पकड़ कर खींचते चले जाना हमने खूब सीखा. इस तरह हमारी सभ्यता में तरह-तरह के शास्त्र तैयार हुए- तर्कशास्त्र, वैशेषिक, सांख्य, न्यायसूत्र...और जाने क्या-क्या. लेकिन इन शास्त्रों से समाज सुखी क्यों नहीं हो रहा, इसके समेकित नतीजे तक पहुंचने की चेष्टा कभी नहीं की गई. इसकी वजह है कि समाज कभी फिक्र में रहा ही नहीं. यह हमारी  व्यक्तिकेंद्रित सभ्यता में ही संभव था कि कई करोड़ व्यक्तियों की एक जैसी समस्याओं को वह व्यक्ति दर व्यक्ति के शुद्धतावादी अनुरोध में उलझा देती. गांधी ने यह काम सबसे बड़े पैमाने पर किया. उन्होंने एक व्यापक जनांदोलन में निहित सामाजिक आकांक्षाओं को आत्मशुद्धि के अहिंसावाद में नष्ट कर दिया. करोड़ों लोगों की ख्वाहिशों से जुड़े ऐसे सवाल जिनके जवाब हमेशा कठिन और अक्सर कटु होते हैं, का उन्होंने एक कृत्रिम समाधान पेश किया- भावुक आत्मोत्सर्ग का. ठोस ढंग के स्वार्थों पर टिकी व्यवस्था को उन्होंने अनशन कर-कर के पिघलाने की बचकानी चेष्टा की. हकीकत में उनकी यह चेष्टा सैकड़ों साल की व्यक्तिनिष्ठ जीवन परंपरा को बदलने की कोशिशों के मूल तर्क पर एक प्रहार थी.
वर्णव्यवस्था को भारतीय समाज की दुर्गति का मूलभूत कारण मानने वालों को एक सुविधा है कि इस तरह उन्हें कोसने के लिए ब्राह्मण नाम का एक बना-बनाया विलेन मिल जाता है. पर सच्चाई यह है कि वर्णव्यवस्था को बनाया भले ही ब्राह्मणों ने हो, पर उसके टिके रहने की अकेली वजह वे नहीं हो सकते थे। किसी भी गतिशील समाज में सामाजिक टकरावों के साथ ऐसी व्यवस्था वक्त के साथ समाप्त हो जानी चाहिए थी. ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि दक्षिण एशिया की प्रवृत्ति हमेशा ही अतर्कवाद के साथ जीने की रही. अनादि और अनंत के दरम्यान किसी शून्य समय में जीते इस समाज को किसी गति की आवश्यकता नहीं थी. उसकी गति दाएं से बाएं और बाएं से दाएं घूमते रहने में थी, न कि आगे बढ़ने में. इस गतिहीनता में ज्ञान ज्ञान के लिए था और कला कला के लिए. कालांतर में व्यक्ति और समाज के द्वंद्व को न सुलझाने वाला यह अतर्कवाद संस्कृत साहित्य के श्रृंगारवाद या मध्यकालीन भक्ति साहित्य के परिणाम देता रहा. एक विभाजित और पराजित सभ्यता अपनी कुंठाओं को निजी श्रेष्ठताओं और कान पर जनेऊ चढ़ाने की पवित्रताओं में तुष्ट करती रही. उसका यह तुष्टीकरण उसे एक इकहरी जीवनदृष्टि और खामखयालियों में खुश रहने की मूर्खता की ओर धकेलता रहा. 
निश्चित ही इस अतर्कवाद का सूत्रपात कभी साधनों की प्रचुरता के वक्त में भारतीय धरती पर हुआ था, पर बढ़ती आबादी, साधनों की कमी और सही तरह से न सोच पाने ने उसे अब एक सार्वजनिक विवशता के मुकाम पर ला ख़ड़ा किया है. अन्याय को कहीं भी हाथ बढ़ाकर छुआ जा सकता है, पर इसका निराकरण कैसे हो, इसका जवाब किसी के पास नहीं है. मौजूदा विश्व में शायद सबसे निर्लज्ज स्वार्थ समूहों द्वारा हांकी जा रही हमारी व्यवस्था में चींटी और हाथी के जैसे विस्फोटक हो चुके पूंजीवादी वर्ग विभाजन को यह अतर्कवाद देखने नहीं दे रहा. लेकिन इस सभ्यता के बाशिंदे भले ही इसे न देख पा रहे हों, कई विदेशी विद्वानों का ध्यान इस ओर गया है. सन 1973 में जापानी विद्वान दाइसाकु इकेदा ने ब्रिटिश चिंतक आर्नल्ड टायनबी से इस बारे में एक सवाल किया था. उनका सवाल था कि ''क्या अतर्कवादी हिंदू परंपरा वाले भारतीय समाज में साम्यवाद अपने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत से क्रांति ला पाएगा?" 
टायनबी का जवाब भी इसपर उतना ही पते का था. उनका कहना था कि "हिंदू समाज जैसे किसी पूर्णतः अतर्कवादी समाज में, अथवा ऐसे किसी समाज में, जो पश्चिम की बराबरी की स्पर्धा में नहीं पड़ना चाहता, साम्यवाद की दाल गलने की संभावना अत्यंत क्षीण है." 
समझा जा सकता है कि क्यों इन दिनों सिर से पैर तक भूमंडलीकृत हो चुके लोग 'पश्चिमी वैचारिक हमले' के खिलाफ भारतीयता का नारा बुलंद करने में लगे हैं, और क्यों रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार पिछले साठ सालों के हिंदुस्तानी इतिहास पर लिखे अपने दो मोटे पोथों के निष्कर्ष में 'हिंदुस्तान की हस्ती' पर गदगद हैं..... बहरहाल, अतर्कवाद के लिए एक दूसरा शब्द भाववाद भी है. भारतीय दार्शनिक परंपरा की इस प्रवृत्ति के बारे में और ज्यादा सोचे जाने की जरूरत है।

Tuesday, October 9, 2012

गफलत के माहौल में


सोहैला कपूर हाल तक अंग्रेजी थिएटर करती रही हैं। इधर कुछ अरसे से वे हिंदी में दाखिल हुई हैं। कॉमेडी उनका प्रिय क्षेत्र है। बीते सप्ताहांत रमेश मेहता की स्मृति में श्रीराम सेंटर में हुए समारोह में उन्होंने उनका नाटक 'उलझन' पेश किया। ड्राइंगरूम की सेंटिंग में एक युवा नायक और उसका दोस्तनुमा नौकर। कई तरह की उधारियों के जरिए सुख से जीने वाले नायक से उगाही के लिए दर्जी और दुकानदार आते हैं। दक्षिण भारतीय मकान मालकिन, जिसका किराया कई महीने से नहीं चुकाया गया है, भी रह-रह कर कुछ खरीखोटी सुनाकर जाती है। यानी कई तरह के किरदार रह-रह कर दृश्य में दिखाई देते रहते हैं। नायक को शाम तक घर खाली न करने पर सामान फेंक देने की धमकी मिल चुकी है। लेकिन इन तमाम परेशानियों से जूझ रहा वह सहसा गदगद हो उठता है जब एक खूबसूरत लड़की दृश्य में नमूदार होती है। प्रस्तुति  सार्वकालिक सिटकॉम का एक अच्छा उदाहरण है। ऐसी प्रस्तुतियों में टाइमिंग की चुस्ती काफी महत्त्वपूर्ण होती है, जो कि इस प्रस्तुति में ठीक से है। सोहैला कपूर अपने पात्रों को एक अच्छी कॉमिक रंगत देती हैं। कभी यह चीज किरदार की बदहवासी से बनती है, कभी मेकअप से, कभी अभिनय याकि खास भंगिमा या अदा से। उगाही करने आए पात्रों में एक ऊंचे डीलडौल वाला पठान है। वह हिंदी के पॉपुलर कल्चर के पठान की छवि की एक दिलचस्प पैरोडी मालूम देता है। लेकिन प्रस्तुति का सबसे नायाब किरदार दक्षिण भारतीय मकान मालकिन का है। इस भूमिका में वाणी व्यास बोलने के लहजे से लेकर स्थिति की कुछ बारीक रंगतों को भी बखूबी संभाले रहती हैं। ऐसा ही एक दूसरा दिलचस्प किरदार बाप का है। वह हरियाणवी है और बेटे की शादी पक्की करने आया है। उसके हाथ में बुजुर्गों वाली लाठी है, जिसे वह रह-रह कर हास्यजनक ढंग से बेटे और उसके दोस्तनुमा नौकर पर आजमाता रहता है। हिंदी थिएटर में ऐसे कॉमिक किरदार अक्सर बहुत जल्द आपे से बाहर लाउड नजर आने लगते हैं। लेकिन सोहैला कपूर के यहां ऐसा नहीं है। वे प्रचलित छवियों में से नई छवियां निकालती हैं। हरियाणवी बाप की बोली, लहजा और वेशभूषा बिल्कुल दुरुस्त है, पर उसकी देहभाषा उतनी खांटी नहीं है। वह काफी शराफत से अपनी बात रख रहा है। इस तरह सोहैला हरियाणवी किरदार के स्टीरियोटाइप को तोड़कर उसकी एक ज्यादा रंजक छवि पेश करती हैं। खास बात यह है कि चरित्रांकन में कहीं कोई झोल नहीं हैं। ऐसे में शर्म से निहाल हो रही दक्षिण भारतीय मकान मालकिन पर हरियाणवी बाप का लट्टू हो जाना अपने में ही एक दिलचस्प दृश्य बन जाता है। 
सोहैला कपूर के यहां हड़बड़ी की भी एक निश्चित व्यवस्था है। मंच पर गफलतों के माहौल में हास्य के असल ठिकानों को वे जानती हैं। जैसे कि दोस्तनुमा नौकर यूं तो मंच पर अपने काम पूरी संजीदगी से निबटाया करता है, पर अपनी हैसियत को लेकर उसे हमेशा शंका बनी रहती है। वह हर आगंतुक को बताना नहीं भूलता कि 'इस घर में नौकर कोई नहीं है शाब जी'। किराएदार नायक से अपनी बेटी को ब्याहने की फिराक में रहने वाली मकान मालकिन को घर में एक स्त्री के होने के सुराग मिलना एक कोहराम बरपा कर देता है। उसका किरदार दक्षिण भारतीय लहजे की प्रचलित पैरोडी न होकर काफी नई रंगतें लिए है। वह एक चुस्त-चौकन्नी औरत है। स्टेज पर उसकी हर एंट्री अपने साथ एक रोचकता लिए आती है।
कथ्य में कोई विशेष नवीनता न होने के बावजूद कई तरह के किरदार और कथानक की गति निर्देशक को पूरा मौका देते हैं। अभिनय के लिहाज से निधिकांत और अरुण प्रकाश भी प्रस्तुति में प्रभावित करते हैं।  

Tuesday, October 2, 2012

थ्री आर्ट्स क्लब के वो दिन


लेखक, निर्देशक और अभिनेता रमेश मेहता 1950 और साठ के दशक में दिल्ली में रंगमंच की दुनिया का एक बड़ा नाम थे। वे 1948 में शिमला से दिल्ली स्थानांतरित हुए थिएटर ग्रुप थ्री आर्ट्स क्लब से जुड़े थे। थ्री आर्ट्स क्लब को तीन लोगों- ओम शर्मा, देवीचंद कायस्थ और आरएम कौल- ने 1943 में बनाया था, लेकिन दिल्ली आने के बाद आरएम कौल, रमेश मेहता और तीन दशक तक बाराखंबा रोड स्थित मॉडर्न स्कूल के प्रिंसिपल रहे एमएन कपूर इसके स्तंभ बने। तब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना नहीं हुई थी और 'थ्री आर्ट्स क्लब' रमेश मेहता के निर्देशन में सप्रू हाउस में निरंतर नए-नए नाटकों का प्रदर्शन करता था। उनके नाटक एक शहरी व्याकरण में सामाजिक प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करने वाले और लोकरुचि के अनुरूप होते थे। इस तरह उन्होंने दिल्ली में थिएटर को एक चेहरा दिया, लेकिन बाद के अरसे में उन्हें भुला दिया गया। सन 2008 में, अपने पिता आरएम कौल की मृत्यु के 25 वर्षों बाद, उनकी पुत्री अनुराधा दर ने थ्री आर्ट्स क्लब को पुनर्जीवित करते हुए दिल्ली में एक समारोह का आयोजन किया, जिसमें रमेश मेहता भी शामिल थे (उसी साल उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार भी दिया गया)। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अनुराधा दर ने इसी सप्ताहांत में श्रीराम सेंटर में रमेश मेहता के लिखे तीन नाटकों की सोहैला कपूर निर्देशित प्रस्तुतियों का एक समारोह एक बार फिर से आयोजित किया। रमेश मेहता इस बार नहीं थे. इसी साल 11 मई को 89 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
शुक्रवार को हुई प्रस्तुति 'पैसा बोलता है' शंभू मित्रा के नाटक 'कंचनरंगा' का रमेश मेहता द्वारा किया रूपांतरण है। नौकर पंचू अपने गांव के रिश्ते के मौसा-मौसी और उनकी संतानों के जुल्मों को कुछ अपने निरीह स्वभाव और कुछ भविष्य सुधर जाने के प्रलोभन में झेल रहा है। सिचुएशनल कॉमेडी की हड़बड़ी और अतिरंजना में स्थितियां आगे बढ़ती हैं। घर का छोटा लड़का जरा सी बात पर पंचू को इस बुरी तरह पीटने पर उतारू है मानो अपनी खलनायकी को जगजाहिर कर देना चाहता है। कई तरह के किरदार प्रस्तुति में हैं- पड़ोसी बल्ली सिंह और उसकी बीवी, नौकरानी तारा, मौसी-मौसा, उनके बेटा और बेटी। इतने सारे किरदार और कई तरह की गफलतें। लड़की का प्रेमपत्र प्रेमी को पहुंचाने के बजाय पंचू उसे कहीं रखकर भूल गया है। इसी बीच लड़की का रिश्ता लेकर एक बुजुर्ग आए हैं। पत्र उनके हाथ में पड़ जाता है। उधर पंचू को बल्ली सिंह ने लाटरी का टिकट खरीदकर दिया हुआ है। पता चलता है कि उसकी एक करोड़ की लाटरी निकल आई है। इस तरह सबसे उपेक्षित प्राणी अचानक सबसे महत्त्वपूर्ण बन जाता है। जिस लड़की को पहले पंचू से घिन आती थी वही अब उसे प्यार से भैया कह रही है। सोहैला कपूर कई एमेच्योर अभिनेताओं के साथ भी कथ्य की स्फूर्तता बनाए रखती हैं। सींकिया बल्ली सिंह की बड़ी-ब़डी मूंछें हैं। भले ही वो कितना दबंग हो, पर गोगल्स लगाए बीवी के सामने उसकी एक नहीं चलती। घाघरा पहने नौकरानी, कर्कशा घर की मालकिन आदि कई तरह के किरदार मंच पर रह-रह कर दिखाई देते हैं। यह सत्तर के दशक का मेलोड्रामा है, जिसमें रुपये को कुछ न समझने वाले गरीब और दूसरों का खयाल रखने वाले पात्र हैं। अपने ईमान को रोजगार से ऊपर रखने वाले पात्र। प्रस्तुति में चुटीलेपन की एक चमक दिखाई देती है। मां को कॉलबेल बजना पसंद नहीं, क्योंकि इसमें बिजली खर्च होती है। इसी तरह लाटरी की रकम से भोजपुरी फिल्म बनाने का ख्वाब देखने वाले बड़े लड़के ने जिस फिल्म डायरेक्टर को बुलाया है, वह हरियाणवी में बात कर रहा है, और एक दिलचस्प किरदार है। अभिनय में कच्चापन तो कई बार तो दिखता है, पर उसमें एक ऐसी स्फूर्तता भी है जो दर्शक को अपने साथ जोड़े रखती है। जीवन के आठ दशक पार कर चुके बुजुर्ग अभिनेता बीएल टंडन की ऊर्जा भी प्रस्तुति में देखने लायक थी। प्रस्तुति से पहले प्रेक्षागृह  में मौजूद फिल्म निर्देशक-अभिनेता शेखर कपूर ने अपने छोटे से वक्तव्य में उन दिनों को याद किया, जब वे थ्री आर्ट्स क्लब की प्रस्तुतियां देखने सप्रू हाउस जाया करते थे। 

Thursday, September 27, 2012

खो चुके रास्ते का एक सफर


टेनिसी विलियम्स ने नाटक 'कैमिनो रियल' 1953 में लिखा था. अमेरिका के जैफरी सीशेल के निर्देशन में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तीसरे वर्ष के छात्रों ने इसकी एक प्रस्तुति तैयार की, जिसके प्रदर्शन अभिमंच प्रेक्षागृह में इसी सप्ताह किए गए। नाटक में घटनाओं का कोई सिलसिला नहीं है, यथार्थवाद का कोई ढांचा नहीं है, पात्रों से कोई निश्चित तादात्म्य भी नहीं बन पाता। फिर यह नाटक क्या है? सीशेल के मुताबिक 'यह नाटक किसी अनिश्चित समय में बहुत सी अवास्तविक घटनाओं की एक महाकाव्यात्मक यात्रा है.' खुद टेनिसी विलियम्स ने इसके बारे में लिखा कि 'यह नाटक मेरे लिए किसी अन्य दुनिया, किसी भिन्न अस्तित्व की रचना जैसा प्रतीत होता है'. कैसी दुनिया? इसके लिए उन्होंने महाकाव्य 'डिवाइन कॉमेडी' लिखने वाले चौदहवीं सदी के इतालवी कवि दांते को उद्धृत किया। दांते के मुताबिक 'हमारे जीवन की यात्रा के बीचोबीच मैंने खुद को एक अंधेरे जंगल में पाया जहां सीधा रास्ता खो गया था.' निर्देशक जैफरी सीशेल के अनुसार, यदि यह नाटक डिवाइन कॉमेडी के प्रथम भाग 'इनफर्नो' (नरक) का प्रतिरूप है, तो इसमें दिखने वाला आम आदमी का किरदार उस शुरुआती अमेरिकी या रेड इंडियन जैसा है जो जिंदगी के असल रास्ते (कैमिनो रियल) पर जटिल सामाजिक बंजर (वेस्टलैंड) से मुठभेड़ करता है। प्रसंगवश यहां यह उल्लेख कर देना उचित होगा कि टीएस इलियट की रचना 'वेस्टलैंड', जिसमें खुद दांते से लेकर शेक्सपीयर, मिल्टन और प्राचीन संस्कृत मंत्रों की पंक्तियों तक को शामिल किया गया है, भी इस नाटक के जैसी ही ऊबड़खाबड़ संरचना वाली है। 
प्रस्तुति में सबसे महत्त्वपूर्ण उसका मंच ही है। यह आगे की ओर ढलवां लकड़ी का एक विशाल प्लेटफॉर्म है. ढलवां होने की वजह से काफी पीछे खड़ा पात्र भी इसपर स्पष्ट दिखाई देता है। इस ऊंचे प्लेटफॉर्म के किनारों पर कोई विंग्स नहीं हैं, लिहाजा दृश्य का विस्तार दोनों सिरों की नीचाई में भी पसरा हुआ है। दृश्य के कुछ आनुषंगिक विवरण यहां दिखाई देते हैं- नृत्यमुद्रा में कोई स्त्री, कोई गुजरता हुआ पात्र, आदि। नाटक का मंच किसी स्पेनिश शहर का ऐसा छोर है, जिसके चारों ओर निर्जन है और जहां छिटपुट कुछ आवागमन होता है। टेनिसी विलियम्स के मुताबिक यह मंच 'उस संसार और समय, जिसमें मैं रहता हूं, की मेरी धारणा से न रत्ती भर कम है न ज्यादा'
जो भी हो, इस सारे वृत्तांत के बावजूद प्रस्तुति दर्शकों के लिए अबूझ ही बनी रहती है। रह-रहकर स्थितियों के कुछ 'ब्लॉक्स' घटित हो रहे हैं, पर सब कुछ इतना यांत्रिक है कि घट रहे का कोई प्रभाव नहीं बन पाता।  हालांकि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की परंपरा के अनुसार स्टेज का बीच में खुलकर एक बड़ा सा गड्ढा बन जाना, ऊपर से एक मचान का लटकना जैसी कवायदें इस प्रस्तुति में भी भरपूर हैं। प्रस्तुति में कुछ स्थितियां दिखाई देती हैं- एक पात्र दूसरे पात्र को गोली मार देता है। दो अन्य पात्र कूड़ा ढोने वाली गाड़ी में मरे हुए पात्र को डालकर मंच से नीचे की ओर उड़ेल आते हैं। मचान नीचे आती है, उससे एक सीढ़ी जुड़ जाती है। वगैरह। उसमें एक पात्र दोन किहोते है, उसका नौकरनुमा सहयात्री सैंचो (जिसे हम हिंदी वाले सांको पांजा पढ़ते आए) है, बायरन है; लेकिन हिंदी के संसार के लिए ये पात्र अपनी छवियों में प्रायः अनजान ही हैं। ये बगैर भूमिका के अनुवाद कर दिए गए पात्र हैं। हालांकि इसके लिए रंगकर्मी विवेक मिश्र के अनुवाद को दोष देना गलत होगा। यह मूलतः प्रस्तुति की अवधारणा का दोष है, जो भाववस्तु के बजाय स्थितियों के चित्रण में उलझी है। इस तरह के अपरिचित परिवेश और परंपरा लेकिन इससे किंचित कम अमूर्त कथानक पर एक सफल प्रस्तुति की याद आती है- वीके निर्देशित इब्सन का 'पीयर जाइंट', जिसमें पूरी प्रस्तुति के दौरान एक अक्षुण्ण लय दर्शक को बांधे रखती है। नाटक देखते हुए यह तो समझ आता है कि यह यथार्थवाद की सीध का नाटक नहीं है। कि यह जीवन के बहुत से इंप्रेशंस की एक उतनी ही 'एब्सर्ड' व्यंजना है। लेकिन सिर्फ इतना समझ आना ही क्या पर्याप्त है! देखने वाला उसके साथ कुछ तादात्म्य बना पाए, इसका भी बंदोबस्त होना अच्छा रहता। 

Sunday, September 23, 2012

मंटो- एक कोलाज


हिंदी थिएटर मंटो की प्रगतिशील बोहेमियन छवि से बार-बार विमोहित होता है। अपनी बौद्धिक सीमा में वह इस छवि के रूमान पर मुग्ध हुआ रहता है। मोहन राकेश ने मंटो की कहानियों में जिस जुमलेबाजी को एक खास कमजोरी के तौर पर लक्ष्य किया था, हिंदी थिएटर उसे एक नाटकीय तत्त्व के तौर पर गदगद होकर इस्तेमाल करता है। लेकिन बीते सप्ताह सम्मुख प्रेक्षागृह में हुई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की प्रस्तुति 'दफा- 292' की विशेषता यह है कि मंटो की एक परिहासपूर्ण कहानी के जरिए उसमें इस रूमान से परे सरकने की कोशिश की गई है। युवा रंगकर्मी अनूप त्रिवेदी निर्देशित इस प्रस्तुति में कथ्य के तीन चरण हैं। पहला, मंटो और उनकी बीवी का संवाद; दूसरा, कहानी 'तीन खामोश औरतें'; तीसरा, मंटो पर मुकदमा और उपसंहार। इस सारे सिलसिले में मंटो अपने खयालात और हालात को अक्सर एकालाप में भी बयान करते नजर आते हैं। वे बताते हैं कि 'कम्युनिस्ट मुझपर फाहशनिगारी का इल्जाम लगाते हैं', कि 'कोई तकियाई हुई रंडी मेरे अफसाने का मौजूं बन सकती है', कि 'जैसे में खाना खाता हूं, गुसल करता हूं, सिगरेट पीता हूं, वैसे ही अफसाना लिखता हूं'. अनूप त्रिवेदी ने रोशनी के दो अलग-अलग वृत्तों में मंच पर दो मंटो पेश किए हैं. दो मंटो और दो ही उनकी बीवियां. यह चीज देर तक चलने वाले पति-पत्नी के चुहुलनुमा झगड़े की एकरसता को थोड़ा कम करती है। बगैर किसी शोर-शराबे के साफ-सुथरे दृश्यों में रोशनी के फोकस और छायाएं धीमे से एक प्रभाव बनाते हैं। इन दृश्यों में कुछ भी अनावश्यक नहीं है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर बैठी तीन औरतों के बातूनीपन की कहानी 'तीन खामोश औरतें' में एक तख्त मंच पर है और उसके किनारे पर एक लैंपपोस्ट खड़ा है। बाकी दृश्य ट्रेन के गुजरने के स्वर, गार्ड की सीटी वगैरह से बनता है। लेकिन असली चीज है चरित्र की छवि. अनूप त्रिवेदी में इसकी अच्छी सूझ है। पहली बातूनी औरत धाराप्रवाह बोले जा रही है, दूसरी उसे औचक सुन रही है। यह दूसरी वाली बीच-बीच में खों-खों करके थोड़ा विचित्र तरह से हंसती है। बाद में यह दूसरी वाली बोलना शुरू करती है तो अब तक अलग-थलग बैठी तीसरी वाली का भौंचक्का-सा उत्सुक चेहरा देखते ही बनता है। कुछ ही देर में तीसरी वाली शुरू हो जाती है, और इस बीच वहीं प्लेटफॉर्म पर सोने का उपक्रम कर रहा बंदा पहलू बदलता हुआ निरीह मुद्रा में रह-रह कर उन्हें देख रहा है। एक मौके पर वह पहली बातूनी औरत की बात सुनता हुआ अपनी बंडी उतार देता है। लेकिन औरत बोलने में इस कदर मशगूल है कि उसपर उघारे बदन की अशालीनता का असर भी कुछ देर बाद होता है। तब उसका हल्की सकपकाहट में नजरें फेर लेना जल्दी से घरेलू स्त्री की अच्छी छवि बनाता है। 
प्रस्तुति एक कोलाज की तरह है, जिसमें बाद में कुछ फुटपाथिये दुकानदार मंटो के मुकदमे की चर्चा करते हैं कि पता नहीं गिरे इंसानों को उठाने में उसे क्या मजा आता है! कि वो ऐसे अफसाने लिखता है जैसी बातों के मुतल्लिक सोचना भी अपने में संगीन जुर्म है। अनूप मंच पर वो स्पेस बनाते हैं जहां छोटे-मोटे किरदार भी गौर से दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में इधर के दिनों में जिस तरह चीजों से ठुंसे हुए ऊटपटांग किस्म के नाटक होते रहे हैं, उनमें यह बिल्कुल अलग तरह की प्रस्तुति थी। पूरे दृश्य विधान में त्रुटियां या चूकें इसमें नहीं दिखाई देतीं। अनूप त्रिवेदी की पहचान अब तक मुख्यतः अभिनेता के तौर पर रही है, पर यह प्रस्तुति उनकी सुलझी हुई रंग-दृष्टि को सामने लाती है। विशेषत: दृश्य के कैनवास और उसमें चरित्रांकन से बनती छवियों को लेकर।
प्रस्तुति का एक दृश्य