Wednesday, June 29, 2011

यह नाटक नहीं, श्रद्धांजलि है

एमएस सथ्यू से बातचीत

- थिएटर मे एक बार फिर आप वापस आए हैं। कैसा लग रहा है?
- नहीं, मैं नाटक करता रहा हूं। अभी टैगोर का 'ताशेर देश' हमने कन्नड़ में बंगलौर में किया। इससे पहले कन्नड़ के ही बी सुरेश के मूल आलेख पर 'गिरजा के सपने' किया था। कुछ न कुछ चलता ही रहता है।
- थिएटर और सिनेमा में काम करने में क्या फर्क है?
- अभिनय एक ऐसी चीज है जो हम किसी को सिखा नहीं सकते। फिर भी यह फर्क है कि थिएटर में हम अभिनेता को सिर्फ बता सकते हैं, लेकिन जब वो स्टेज पर होता है तो उसे सब कुछ खुद ही करना होता है, उस क्षण में उसे कुछ बताया नहीं जा सकता। जबकि सिनेमा में सब कुछ आपके नियंत्रण में होता है। जो ठीक नहीं लगा उसे एडिट किया जा सकता है, दोबारा शूट किया जा सकता है।
- आपकी इस प्रस्तुति के पात्रों के चेहरे-मोहरे और कद-काठी वास्तविक किरदारों से काफी मिलते-जुलते हैं। क्या इसके लिए आपको काफी मेहनत करनी पड़ी?
- नहीं, अभी मात्र तीन हफ्ते से ही इनसे परिचय है। ये सब पहले से ही थिएटर में एक्टिंग करते रहे हैं। वैसे चेहरे के मिलान से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता है। फिल्म गांधी के बेन किंग्स्ले कहां गांधी जैसे लगते थे। गांधी की तुलना में वे काफी ज्यादा हट्टे-कट्टे थे। गांधी में एक निर्दोष मुस्कान थी जो हासिल करना बहुत मुश्किल था, पर फिर भी किंग्स्ले ने काम तो अच्छा किया।
- नाटक के लिए इस आलेख का चुनाव कैसे हुआ?
- ये हमारे मित्र और नाटक के प्रोड्यूसर के के कोहली साहब ने लिखवाया है। मेरे लिए यह नाटक नहीं बल्कि एक श्रद्धांजलि है। अमृता प्रीतम बहुत बड़ी लेखिका थीं, इमरोज और साहिर भी। इससे पहले इस्मत चुगताई, मंटो, फैज और कैफी के लेखन और शख्सियत पर भी नाटक होते रहे हैं। मैं इसे नाटक न कहकर थिएटर में एक अलग तरह का अनुभव कहूंगा। इसके माध्यम से दर्शक इन शख्सियतों को जानेंगे।
- सुना है कि 'गरम हवा' को दोबारा रिलीज करने की योजना है? यह कब तक होगा?
- हां, उसका प्रिंट बहुत खराब हो गया था। उसे अमेरिका में डिजिटली रेस्टॉर कराया गया है। उसके मोनोट्रैक को डॉल्बी में कराया गया है। यह सब बहुत महंगा काम है। 25 हजार डॉलर तो सिर्फ साउंड रेस्टॉरेशन में ही लगे हैं। इतने में मैं चार गरम हवा बना सकता था। सितंबर में फिल्म को वैश्विक स्तर पर रिलीज किया जाएगा। साथ-साथ उसकी डीवीडी, उसपर किताब, उसकी पटकथा, उसपर डॉकुमेंटरी भी जारी की जाएंगी।
- क्या आपको नहीं लगता कि डॉल्बी तकनीक का शोर 'गरम हवा' की संवेदनशीलता पर असर डालेगा?
- नहीं, आजकल दर्शक तकनीक को जानने लगे हैं। वे अपेक्षा करते हैं।
- आपकी आगे की क्या योजनाएं हैं?
- विद्या बालन को लेकर एक म्यूजिकल बनाने की योजना है। इसमें बनारस, कलकत्ता, मैसूर वगैरह की लोकेशन होंगी। इसमें कई तरह का संगीत इस्तेमाल करने का भी इरादा है। दादरा, ठुमरी, कर्नाटक संगीत, वगैरह।
- आजकल के सिनेमा को लेकर आपकी क्या राय है?
- बहुत अच्छी फिल्में बन रही हैं। हिंदी में देव डी अच्छी फिल्म थी। तमिल, मलयालम और मराठी में बहुत अच्छी फिल्में बन रही हैं। मैंने सुना है धोबी घाट और पीपली लाइव भी अच्छी फिल्में हैं। मणिरत्नम बहुत अच्छी फिल्में बना रहे हैं, हिंदी में अनुराग कश्यप हैं, संजय लीला भंसाली, आशुतोष गोवारिकर हैं। आज की फिल्में नए किस्म की फिल्में हैं।

प्रेम की एक आधुनिक दंतकथा

एमएस सथ्यू अपनी नई नाट्य प्रस्तुति 'अमृता' के साथ एक बार फिर हाजिर हैं। अमृता की कहानी आधुनिक समय के एक प्रसिद्ध प्रेम त्रिकोण की कथा है। इस त्रिकोण की विशेषता यह है कि उसमें कोई बाहरी द्वंद्व नहीं है। उसके तीनों पात्रों- अमृता प्रीतम, इमरोज और साहिर लुधियानवी- में अपने वजूद की पहचान का एक आंतरिक द्वंद्व है, और यही द्वंद्व प्रस्तुति की थीम है। प्रस्तुति की नायिका अमृता हैं, पर उसके नायक उम्र में उनसे 10-12 साल छोटे इमरोज हैं, न कि साहिर। यह दरअसल अमृता और इमरोज की प्रेमकथा है जिसमें साहिर एक अहम संदर्भ की तरह मौजूद हैं। नाटक की एक अन्य विशेषता है कि उसके आलेखकार दानिश इकबाल खुद को उसका लेखक मानने को तैयार नहीं हैं। उनके मुताबिक मंच पर बोला जा रहा एक-एक शब्द अमृता प्रीतम का लिखा है, और उनकी भूमिका सिर्फ विषय के तरतीबकार या संयोजक की है।
एमएस सथ्यू की मशहूर फिल्म गरम हवा 1973 में रिलीज हुई थी। उसके मुख्य किरदार सलीम मिर्जा का असमंजस है कि वो पाकिस्तान जाए या नहीं। नया मुल्क बनने के बाद उसकी आर्थिक परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। सथ्यू का कहना था कि इस फिल्म के पीछे उनका मकसद उस खेल को सामने लाने का था जो राजनीतिज्ञों ने बंटवारे के नाम पर खेला। गरम हवा की पटकथा कैफी आजमी और शमा जैदी ने लिखी थी और उसकी मूल कहानी इस्मत चुगताई की थी। लेकिन अमृता कोई कहानी नहीं है, वो एक वास्तविक जीवन का ब्योरा है। उसकी नायिका प्रेम और संबंध तो चाहती है पर बंधन नहीं। उसे लगता है कि विवाह का बंधाव उसके प्रेम के गाढ़ेपन को कम करता है। वैयक्तिकता के बहुतेरे संदर्भ हैं जो इस संबंध-कथा में सामने आते हैं। अमृता कहती हैं- 'इमरोज, अगर मुझे साहिर मिल जाता तो तू न मिलता।' जवाब में इमरोज कहते हैं- 'मैं जानता हूं साहिर को तुम कितना चाहती थीं, पर उससे ज्यादा मैं यह जानता हूं कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं।'
आलेखकार दानिश इकबाल के मुताबिक- 'ड्रामा एक ऐसा कलात्मक वसीला है, जिसमें विषयवस्तु को परत-दर-परत इजहार के सांचे में लाना जरूरी होता है, जिस से संबंधित मूल्यों की समझ-बूझ की गुंजाइश बढ़ जाती है। इस नाटक का ताना-बाना अमृता की मूल रचनाओं से बुना गया है और सिर्फ डिजाइन के स्तर पर नाटकीय तत्वों का थोड़ा-बहुत इस्तेमाल किया गया है। अमृता की नज्मों, कहानियों, नाविलों, निबंधों और इंटरव्यूज में जा-बजा हमें ऐसे सुराग मिलते हैं जिनसे उनके जेह्नो-दिल का कोई गुमनाम दरीचा अचानक खुल जाता है।' दानिश के अनुसार यह नाटक पात्रों के अंतरजगत की कथा है, समाज इसमें नहीं है। वे बताते हैं- 'अमृता प्रीतम की तहरीरें हमें मुसलसल जेहनी सफर की एक ऐसी कायनात में ले जाती हैं, जहां खयाल और जज्बे की सच्चाई, मोहब्बत की भीनी खुशबू और पंजाब के सदियों पुराने सूफियाना विरसे की बाजगश्त हमारी रहनुमा होती है, जहां हम और आप, राह से भटके मुसाफिरों की तरह गुमशुदा मंजिल के आसार देखते बेताब आगे बढ़ते जाते हैं। अमृता ने अपनी जिंदगी की हर कसक, हर तड़प, हर खुशी को नज्मों के फूल बना कर जुदाइयों, मोहब्बतों, उदासियों और मसर्रतों की लाफानी कहानियां रकम की हैं, जिनमें अहदे-माजी का पंजाब अपनी तमामतर रानाइयों के साथ रहता-बसता है।'
दक्षिण दिल्ली के एक बडे बेसमेंट में नाटक की रिहर्सल चल रही है। एक छोर पर सथ्यू चुपचाप देख रहे हैं। कई बार उन्हें लगता है कि कुछ है जो लय को तोड़ रहा है तो वे टोकते हैं। नाटक में एक चरित्र समय का भी है। आलेखकार दानिश इकबाल के मुताबिक यह भी उनका अपना डाला हुआ चरित्र नहीं है, बल्कि अमृता ने एक बार एक सपना देखा था, जिसमें एक बू़ढ़े आदमी ने उनसे आत्मकथा लिखने के लिए कहा। सथ्यू कहते हैं- 'मुझे बूढ़ा, लाठी लेकर चलता हिलता-डुलता ऐसा वक्त नहीं चाहिए...। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद सब कुछ खत्म हो गया था, तब द्वापर आकर कलयुग को आगे का सिलसिला सौंपता है। ..यह अगला युग...टाइमलेसनेस...समयहीनता का अहसास...ऐसा कुछ चाहिए।'
देश का बंटवारा गरम हवा में भी था, अमृता प्रीतम के जीवन में भी था, और उन साहिर को भी उसे भोगना पड़ा, जिन्होंने बाद में कभी लिखा था- 'वो वक्त गया वो दौर गया जब दो कौमों का नारा था/ वो लोग गए इस धरती से जिनका मकसद बंटवारा था।' लाहौर से दिल्ली के बीच इसी बंटवारे को भोगते कभी अमृता प्रीतम ने अपनी प्रसिद्ध रचना 'आक्खां वारिस शाह नू' में हीर रांझा के लेखक वारिस शाह को याद किया था- 'उट्ठ दर्दमंदां दिया दर्दिया, उट्ठ तक अपना पंजाब, अज बेले लाशां बिछियां ते लहू दी भरी चिनाब'। 16 साल की उम्र में व्यवसायी प्रीतम सिंह से उनकी शादी हुई जो 41 साल की उम्र तक चली, फिर साहिर से घनिष्ठता हुई, जिसका जिक्र उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में किया है। लेकिन उनका सबसे लंबा साथ चित्रकार इमरोज के साथ रहा। अमृता अपने जज्बे में आजादी की तलाश करती एक बेचैन रूह थीं। अपनी बेबाकी में कभी उन्होंने मदर टेरेसा जैसी शख्सियत की आलोचना की थी, कि दीन-दुखियों की सेवा के लिए उनके यहां ईसाइयत अपनाना क्यों जरूरी है। दानिश कहते हैं- 'नए दौर की ये हीर हिजरत के बे-आब रेगिस्तान में तमाम उम्र रूहानियत के नखलिस्तान ढूंढ़ती रही, जो अक्सरो-बेशतर सराब साबित हुए। लेकिन राहे-हक की तलाश ने उनकी जात को एक कायनात की वुसअत अता की जिसने इंसान की तामीर-कर्दा हदों-सरहदों को हमेशा फरामोश रखा।' अपने बाद के दिनों में रूहानियत का नखलिस्तान उन्हें ओशो के दर्शन में मिला। ओशो की कई किताबों के आमुख उन्होंने लिखे।
प्रस्तुति के निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू इसे नाटक न कहकर श्रद्धांजलि कहते हैं। एक बेचैन रूह 81 साल के होने जा रहे सथ्यू में भी रही है। 1952 में विज्ञान विषय की अपनी नियमित पढ़ाई छोड़कर वे खुद को आजमाने सिनेमा की दुनिया में चले आए, जहां उन्हें पहला बड़ा काम सन 1964 में फिल्म 'हकीकत' में मिला। चेतन आनंद निर्देशित इस फिल्म में वे सहायक निर्देशक थे। फिर उसके करीब एक दशक बाद आई फिल्म 'गरम हवा' ने उन्हें देश के शीर्ष फिल्म निर्देशकों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। यथार्थवादी अभिनय सथ्यू की पसंद है। उनका मानना है कि किसी फिल्म या नाटक में चरित्र महत्त्वपूर्ण होते हैं और टेक्नालॉजी को फिल्म पर हावी नहीं होने देना चाहिए। एक इंटरव्यू में उनका कहना था- 'मैं असल चरित्र चाहता हूं, जो सहज दिखते हों। यही वो बारीक रेखा है जहां से वास्तविक और अवास्तविक का फर्क दिखने लगता है।' कुछ साल पहले उनकी नाट्य प्रस्तुति 'दाराशिकोह' काफी चर्चित रही थी।....
लेकिन इस पूरी प्रस्तुति को आकार देने वाले सबसे अहम शख्स हैं इसके प्रोड्यूसर के के कोहली। के के कोहली न सिर्फ 'अमृता' के प्रोड्यूसर हैं, बल्कि यह मूलतः उन्हीं का आइडिया भी है। उन्हीं के आग्रह पर दानिश इकबाल ने आलेख तैयार किया। उन्होंने ही निर्देशक सथ्यू से संपर्क किया, और इस तरह प्रस्तुति शक्ल लेने लगी। कोहली दाराशिकोह के प्रोड्यूसर भी थे। उनकी संस्था इंप्रेसेरियो एशिया पिछले बीस साल से थिएटर की दुनिया में सक्रिय है। लेकिन उनके इस मामले में कुछ सिद्धांत हैं। उनका मानना है कि मोलियर, इब्सन करना बहुत आसान होता, पर ज्यादा अच्छा तब लगता है जब अपने मन का कुछ सार्थक हो। कोहली के मुताबिक उन्होंने दाराशिकोह के किरदार पर नाटक करना इसलिए चुना कि वह कंपोजिट कल्चर का एक बहुत बड़ा प्रतीक है। उनके मुताबिक- अमृता-इमरोज की प्रेमकथा में एक सूफियाना रंगत है। उन दोनों ने मानो स्वयं को एक-दूसरे में समाहित कर लिया था। जिसे आध्यात्मक तौर पर आत्मा में परमात्मा का मिलन कहा जाता है वैसा कुछ था। कोहली बताते हैं- अमृता के न रहने पर भी इमरोज कभी उनके प्रेम से बरी नहीं हुए। वे एक बार कहा इमरोज का यह कथन याद करते हैं- तुमने औरत के साथ सो कर तो देख लिया, कभी उसे जाग कर भी देखो।
कोहली कहते हैं, साहिर कवि चाहे कितने बड़े थे, पर इंसान के तौर पर बहुत कमजोर थे। वे अमृता की प्यार की ऊंचाई के सही पार्टनर नहीं थे। वे अमृता के प्यार को न समझ पाए न कबूल कर पाए।
प्रस्तुति में अमृता बनीं लवलीन थंडानी अमृता प्रीतम से उनके जीवन में असंख्य बार मिली हैं। बहुत कम उम्र से वे उन्हें देखती रही हैं। उनके व्यक्तित्व की छवियां, उसकी गरिमा वे आज भी महसूस कर सकती हैं। जैसा कि नाटक का एक संवाद कहता है, अमृता पांच दरियाओं की बेटी थीं। मंच पर ऐसा शख्सियत को पेश करना वाकई एक बड़ी चुनौती है।

Saturday, June 11, 2011

मृत्यु के रूमान का नाटक

चेतन दातार हिंदी और मराठी के प्रखर रंगकर्मी थे। सन 2008 में मात्र 44 साल की उम्र में उनका आकस्मिक निधन हो गया। निधन से पूर्व 'राम नाम सत्य है' शीर्षक यह प्रस्तुति उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के लिए निर्देशित की थी। प्रस्तुति के सभी प्रमुख पात्र किसी अस्पताल या आश्रमनुमा जगह में रह रहे एचआईवी एड्स से ग्रसित मरीज हैं। आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा में वे बचे-खुचे जीवन के लिए खुशियों के जुगाड़ ढूंढ़ रहे हैं। दो पात्र दिल को बहलाने वाली नितांत हवाई किस्म की बातें किया करते हैं। मैंने वह फार्म हाउस खरीद लिया, सीधी फ्लाइट से उतरते हैं, वगैरह। आश्रम का सबसे 'जीवंत' पात्र गोपीनाथ अपनी जीवनगाथा सुनाता रहता है, जिसमें वो बहुत ऊंचे इरादे रखने वाला अतिआत्मविश्वास से परिपूर्ण एक नौजवान हुआ करता था। अपने आत्मविश्वास में उसने एक उद्योगपति की बेटी से प्रणय निवेदन किया, घर-बार छोड़कर सड़कछाप मवाली की सी जिंदगी चुनी, और आखिरकार एक हसीना के धोखे में एड्स का तोहफा मिला। मरीजों की जिंदगी का यथार्थ और गोपीनाथ की बीती जिंदगी की हास्यपूर्ण स्थितियां प्रस्तुति को ब्लैक कॉमेडी का दर्जा देती हैं। उसमें कुछ-कुछ अंतराल के बाद कोई-कोई मरीज गिरकर मौत का शिकार होता है। उनके चेहरे शरीर में पसरती मौत की वजह से काले हो गए हैं। शरीर में यहां-वहां घुसी टेप से चिपकी नलियों हैं। मंच सज्जा की कोई कवायद नहीं है, पर एक स्ट्रेचर है जिसपर बैठकर गोपीनाथ अपनी कहानी सुनाता है। इसके अलावा पीछे लगी स्क्रीन पर अस्पताल, ऑपरेशन वगैरह के दृश्य लगातार दिखाई देते रहते हैं। जब गोपीनाथ कहानी सुनाता है तो रोशनी का फोकस बदल जाता है दर्शकों को एक ज्यादा चुस्त-स्मार्ट युवा गोपीनाथ दिखाई देता है।
निर्देशक चेतन दातार ने इसे मौत नहीं जीवन का नाटक बताया है। पर ऐसा कहने की कोई स्पष्ट वजह नजर नहीं आती। हो सकता है उनके पात्र अपनी मौत को भुलाए रख पाने की वजह से जीवंत हों, पर दर्शक के लिए ऐसा नहीं है। प्रस्तुति इतने कोण से मौत को दिखाती है कि ऊब होने लगती है। यहां तक कि मर-मर कर गिरते पात्रों के अलावा ऑपरेशन थिएटर के भीतर की चीरफाड़ के क्लोज वीडियो दिखाए जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये सब दृश्य पात्र के प्रति करुणा पैदा करते हों। इसके लिए पात्र और दर्शक का जरूरी हार्दिक तदात्म प्रस्तुति कभी भी नहीं बना पाती। गोपीनाथ के बीते जीवन के दृश्य दर्शक से उसका जुड़ाव बना पाने के बजाय कॉमिक रिलीफ ज्यादा लगते हैं। प्रस्तुति देखते हुए लगता है जैसे उसका पूरा विधान इस अवधारणा के तहत हो कि मृत्यु अपने में ही करुणा का विषय है और उसे भुलाए रखना जीवंतता की सबसे बड़ी वजह। वैसे भी भारतीय परंपरा में गंगा स्नान के बाद मृत्यु ही ऐसी चीज है जो मनुष्य को पवित्र बना देती है। इस अर्थ में हृषिकेश मुखर्जी की आनंद के स्यापे की रूमानियत को यह प्रस्तुति एक दारुण दृश्यात्मक फैलाव तक ले जाती है। बाकी मृत्यु के विषाद का वितंडा वैसा ही है। प्रस्तुति की एक अन्य सीमा यह है कि वह नाटकीय दृश्य बनाने के बजाय साहित्यिक किस्म की लच्छेदारी में ज्यादा उलझी हुई है। दरअसल यह प्रस्तुति से ज्यादा आलेख की समस्या है। गोपीनाथ बताता है- 'धूम्रपान हमारे यहां खानदानी जुनून रहा है' या घर छोड़ते वक्त उसका बयान 'आपकी जेब से 250 रुपए और जयललिता की फोटो ले जा रहा हूं', 'आपका पथभ्रष्ट पुत्र' आदि। यानी ऐसी भाषा जिसमें जुमले की चमक तो है, पर दृश्य के लिहाज से कोई पेंच नहीं है। वैसे इनके अलावा प्रस्तुति के मिजाज का थोड़ा अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि उसमें कजरारे कजरारे, ईचक दाना बीचक दाना से लेकर बीड़ी जलइले आदि स्वर भी बीच-बीच में सुनाई देते हैं। कुछ लोकधुनें और उसी माहौल के दृश्य भी हैं। और आखिर में -'इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें, शिवजी का नाम ले लूं'। यानी रंगमंचीयता के नाम पर कई तरह की चीजें प्रस्तुति में शामिल है। गोपीनाथ एक मौके पर एक सैद्धांतिक पंक्ति भी बोलता है कि हमारे जीवन में 99 प्रतिशत के जिम्मेदार हम खुद होते हैं। काश यह प्रस्तुति इसी वाक्य पर तैयार किसी कथानक पर आधारित होती!

सख्त रंगों का स्थापत्य

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की मौजूदा प्रस्तुतियों में लिटिल बिग ट्रैजेडीज का डिजाइन बिल्कुल अलग तरह का है। इसके लेखक और निर्देशक दोनों रूस के हैं। अलेक्सांद्र पुश्किन के 180 साल पुराने इस आलेख में कुल तीन
कहानियां हैं। तीनों कहानियां मंच पर बने एक विशाल आकार में घटित होती हैं। तंबू या चोगेनुमा इस आकार के शीर्ष पर एक जालीदार मुखाकृति है, जिसपर अलग-अलग मौकों पर कुछ खास कोणों से पड़ती रोशनियां एक विचित्र रहस्यात्मक प्रभाव पैदा करती हैं। हवा में लटके हाथों सहित यह दानवाकार अपने में ही एक दृश्य है। हर कहानी में एक निश्चित रंग के लपेटे या ओढ़े हुए प्रायः एक वस्त्रीय कास्ट्यूम में पात्रगण इस जड़वत दृश्य में गति पैदा करते हैं। धोखे, कपट और हिंसा की स्थितियों में मंच पर फैला लाल, नीला, या सलेटी प्रकाश उसे एक संपूर्ण रंग-दृश्य बनाते हैं। पौने दो घंटे की प्रस्तुति में यह दृश्य किंचित एकरस भी हो सकता है। निर्देशक ओब्ल्याकुली खोद्जाकुली इस एकरसता को तोड़ने की कई युक्तियां अपने विन्यास में शामिल करते हैं। एक मौके पर एक कमंडल से अनवरत धुआं निकलता दिखता है। एक अन्य दृश्य में आकार के सिरे से लटकी जलती मोमबत्तियों से भरी तश्तरी टेढ़ी हो जाती है और उससे कपटी डॉन जुआन पर छोटे-छोटे नीले-गुलाबी कंकड़ गिरने लगते हैं। प्रस्तुति की तीनों कहानियां- 'मोजार्ट और सैलिएरी', 'द स्टोन गेस्ट' और 'द फीस्ट ड्यूरिंग द प्लेग' यूरोप की प्रसिद्ध दंतकथाओं पर आधारित हैं। पुश्किन उनके द्वंद्व को 'नाटकीय कार्य-व्यापार के जरिए एक मुकम्मल ट्रैजेडी' की शक्ल देते हैं। पहली कहानी संगीतकार सैलिएरी द्वारा मोजार्ट की प्रसिद्धि और प्रतिभा से ईर्ष्या के फलस्वरूप उसे जहर देने की घटना पर आधारित है। घटना को अंजाम देने के बाद सैलिएरी अपनी वहशत में मानो खुद से सवाल करता है कि 'कौन कहता है कि प्रतिभा और अपराध का कोई मेल नहीं? वेटिकन का नक्शा तैयार करने वाला हत्यारा था।' दूसरी कहानी का मुख्य पात्र डॉन जुआन एक औरतबाज है। पुश्किन से पहले सामान्य तौर पर उसे कॉमेडी या प्रहसनात्मक तौर पर चित्रित किया जाता रहा, लेकिन पुश्किन के यहां अपनी आत्मलिप्तता में वह खलनायक के तौर पर पेश होता है। वह एक रईस का बेटा है जो सेनापति की हत्या के बाद मिले देशनिकाले के
दौरान छिपकर अपनी पुरानी प्रेमिका लारा से मिलने आया है। लारा के यहां वह डॉन कार्लोस की हत्या करता है। हत्या के इस दृश्य में चार पात्र बड़े-बड़े परातों को डंडी से एक लय में पीटते हैं। पीटने की रौद्र ध्वनि और गति के बीच पीछे की ओर लड़ाई और हत्या का दृश्य कुछ और भीषण होकर घटित होता है। डॉन जुआन की मुलाकात सेनापति की अनिंद्य सुंदरी विधवा डोन्यना से भी हो चुकी है, जिसे उसने अपना नाम डिएगो बताया है। वह उसपर आसक्त है, और उसकी निर्लज्जता बिल्कुल साफ दिखाई देती है। वह अपने मिलन के दौरान फादर की पत्थर की मूर्ति को आमंत्रित करता है। दर्शक देखते हैं उसकी बेशर्मी के इस क्षण में अचानक मंच के विशालकाय आकार में कोई जुंबिश होती है। विशाल आकार का हाथ अकस्मात कुछ नीचे खिसक आया है। नाटक की गति में यह खिसकना असाधारण है। यह रंगभाषा पूरी स्थिति में एक स्तब्धता भर देती है। तीसरी कहानी अपनी
प्रतीकात्मकता में किंचित उलझी हुई है। प्लेग के समय में मौत को चुनौती देने के लिए एक पार्टी हो रही है। जिसमें मौत का शिकार बने एक व्यक्ति को याद किया जा रहा है। एक पात्र मेरी को उसमें गीत गाना है। जश्न के मौके पर वह दुख का गीत गाती है। एक अन्य पात्र को किसी मृतक को ले जाती गाड़ी की आवाज सुनाई देती है। अपनी बेहोशी के बाद वह जानना चाहती है कि वह स्वर सच था या सपना। एक अन्य पात्र प्लेग के सम्मान में गाने का आग्रह करता है। प्रस्तुति में एक दृश्य है जिसमें पात्र गिलासें लिए हैं। वे उन्हें हिलाते हैं और उनमें से सिक्कों के खनकने की आवाज आती है। खास बात यह है कि गिलासों में मोमबत्तियां जल रही हैं। प्रस्तुति की रंगभाषा में इस तरह की युक्तियों का मिश्रण किंचित चमत्कार पैदा करता है। निर्देशक ओब्ल्याकुली खोद्जाकुली प्रोसीनियम के रंग-वैभव को एक मिजाज में बरतते हैं। वे एक पुरानी ट्रैजेडी को सख्त रंगों के स्थापत्य में पेश करते हैं। ये सख्त रंग उन तीखी भावनाओं को व्यंजित करते हैं, जो किसी ट्रैजिडी का आधार होते हैं। चीजें इसमें ठूंसी हुई न होकर एक सिलसिले में पाठ की संवेदना का विकास और विस्तार करती हैं।