Friday, November 25, 2011

बारह बजे सुन सइयां की बोली

दिल्ली के तालकटोरा गार्डन में हिंदी अकादमी की ओर से कानपुर शैली की नौटंकी 'सुल्ताना डाकू' का मंचन किया गया। नौटंकी जुमलेबाजी में रस लेने वाले भारतीय मानस की कला है। पाकिस्तान में 'बकरा किस्तों पर' जैसे रूप भी इसी मानस की चीज हैं। यह मूलतः एक वाचिक नाट्य है जिसमें असली कलाकार माइक है। कानपुर की प्रसिद्ध दि ग्रेट गुलाबबाई थिएट्रिकल कंपनी की इस प्रस्तुति में मंच पर चार-पांच माइक खड़े कर दिए गए हैं, जिन्हें ऐ मालिक तेरे बंदे हम की वंदना के बाद पात्रों ने संभाल लिया है। पहले ही दृश्य में तमाम डाकू शराब पी रहे हैं। वे संवाद बोलने से पहले माइक टेस्टिंग की हलो बोलते हैं। एक मशहूर धार्मिक धुन की तर्ज पर 'फटाफट जाम पिला दे' बज रहा है और वाइज के बजाय साकी से मस्जिद में बैठकर पीने देने की मिन्नत की जा रही है कि सुल्ताना आकर उनपर कोड़े बरसाना शुरू कर देता है। उसे खुंदक है कि साहब बहादुर उसे लंदन से पकड़ने आ रहे हैं, लखनऊ पार्लियामेंट में हंगामा मचा हुआ है, और 'आप यहां शराब पी रहे हैं'। आगे के दृश्यों में साहब बहादुर मिस्टर यंग पुलिस वाले से बोलता है- तुम बड़ा कुत्ती चीज है। यह पुलिस वाला प्रस्तुति का कॉमेडियन है और 'जो मिनट मिनट पर गौर करे वो गौरमिंट' जैसी लतीफेबाज लफ्फाजी से दर्शकों का मनोरंजन किया करता है। उसका नाम गुलाम हैदर है, और मुसीबत के समय जय हनुमान ज्ञान गुन सागर का जाप करता है। पकड़े जाने पर अपना नाम अब्दुल हनुमान और बाप का नाम राम मोहम्मद डिसूजा बताता है। उसे कलाकारों के साथ सुल्ताना के भेद लेने भेजा गया है, क्योंकि सुल्ताना की कमजोरी है कि वह आर्टिस्टों की सुनता है। उसके साथ गई आर्टिस्ट गाना गाती हैं- बारह बजे सुन सइयां की बोली।...
शेरे बिजनौर सुल्ताना को बचपन में उसकी मां ने मुर्गी चोरी करने पर शाबाशी न दी होती तो वह कभी डाकू न बनता। लेकिन जब बन ही गया तो अब वह अमीरों को लूटता है और अपने हिस्से की दौलत गरीबों में बांट देता है। उसने जिंदगी में सिर्फ एक बार खड़कसिंह जमींदार के घर की लड़की पर गलत निगाह डाली, पर लड़की जब अपनी आबरू की खातिर कुएं में जा कूदी तो उसने उसके सच्ची भारतीय नारी होने पर 'वाह' भी कहा। 'सुल्तानी' का 'इतना डेंजरस होने पर भी लव बनाने का कोशिश' मिस्टर यंग को भी हैरानी में डाल देता है।
प्रस्तुति में कहीं की ईंट, कहीं के रोड़े भी कम नहीं हैं। सुल्ताना से कोई औरत मिलने आई है। कॉमेडियन को यह नहीं पता कि इज्जत के साथ लाना किसे कहते हैं। वह चादर फैलाकर औरत से पहले उसकी इज्जत मांगता है। जनता ऐसे मौकों पर ताली पीटती है। ये तालियां तब भी पीटी जाती हैं जब सुल्ताना 'भारतीय नारी' की तारीफ करता है। दुनिया चाहे बहुत बदल गई हो, पर हिंदुस्तानी जनता की तबीयत इन सब मामलों में वैसी की वैसी ही है। वैसे वीर रस का संचार कर पाने में सुल्ताना बने मोहम्मद शाहिद की तुलना में पुलिस वाले नागेंद्र द्विवेदी की लफ्फाजी का हास्य रस प्रस्तुति में ज्यादा जगह घेरता है।
पारंपरिक शैलियों में भदेस का आकर्षण तो होता है, पर यह भदेस अपनी असली शक्ल में अब कम ही दिखाई देता है। वह एक 'गिमिक' की तरह हो गया है या वैसा मालूम देने लगा है। यह प्रस्तुति इस अर्थ में ठेठ पारंपरिक है। उसका मंच गांव देहात के मंच की तरह अस्तव्यस्त और बिखरा हुआ है। बहरे तबील, नक्कारे और हारमोनियम नौटंकी की एक मूल लय जरूर बनाते हैं। लेकिन लोकरुचि यहां असली प्रोत्साहक तत्व है। प्रस्तुति का पूरा ढांचा अपने बेडौलपने में मुख्यतः तालियों के हिसाब से तैयार किया गया है। डाकू इसमें हमेशा के साफा धारी काले कुर्ते वाले हैं। फिर भी मिस्टर यंग की भूमिका में मोहम्मद सत्तार प्रस्तुति में एक संजीदा अभिनेता के तौर पर दिखाई देते हैं। यह ऐसा किरदार है जो थोड़ी सी ढील देते ही कार्टून जैसा हो सकता था। संगीत में हारमोनियम पर सूरज कुमार, नक्कारे पर प्रभुदयाल, ढोलक पर हातिम और कांगो पर दीप थे। प्रस्तुति का निर्देशन नौटंकी विधा से अरसे से जुड़ीं मधु अग्रवाल का है।


चीन की अभागी खलनायिका

बीते साल भारत रंग महोत्सव में चीन की प्रस्तुति 'अमोरॉस लोटस पैन' का प्रदर्शन किया गया था। यह प्रस्तुति इस बात का अच्छा उदाहरण है कि कैसे शैलीगत प्रयोगों के साथ विषय के तनाव और प्रवाह को बरकरार रखा जा सकता है। प्रस्तुति की केंद्रीय किरदार पैन जिनलियान चीन के एक प्रसिद्ध क्लासिक उपन्यास की पात्र है। सामान्यतः उसकी एक खल-सुंदरी की छवि है, जो अपने पति को धोखा देती है। लेकिन निर्देशक चेन गांग उसकी त्रासदी को उसके व्यक्तित्व और भाग्य के टकराव के अनिवार्य परिणाम के तौर पर देखते हैं। उसकी त्रासदी से जुड़े कई सवाल हैं जिन्हें अंत में यह प्रस्तुति दर्शकों के आगे छोड़ जाती है।
मंच पर पीछे की ओर दरवाजे के आकार के फ्रेमों की एक दीवार है। प्रस्तुति के शुरू में एक फ्रेम में से एक पात्र निकलकर आता है और बताता है कि वो एक महान प्रतिभा वाला एक प्रसिद्ध लेखक है। इसी बीच उसके आसपास बहुत से लोग जमा हो जाते हैं और उससे उसके किरदार पैन जिनलियान और उसकी नियति को लेकर सवाल पूछते हैं। इसके कुछ देर बाद पैन जिनलियान खुद मंच पर दिखाई देती है जो छोटी उम्र में अनाथ हो गई थी और उसे झंग दाहू नाम के एक धनी व्यक्ति को बेच दिया गया था। लंबी दाढ़ी वाला कुटिल झंग दाहू उसे अपनी रखैल बनाने पर उतारू है, लेकिन उसके लगातार इनकार करने पर सजा के तौर पर वो उसकी शादी तीन इंच के वू दा से करा देता है। मंच पर झुककर चलने वाला वू दा तीन इंच का तो है साथ ही परले दरजे का कायर भी। तीन बदमाशों की एक टोली आकर दोनों पति-पत्नी को धमकाती और तोड़फोड़ करती है तो वो कुछ करने के बजाय उल्टे जिनलियान को भी उनका मुकाबला करने से रोकता है। इसी बीच शहर मे शेर को मार गिराने वाले जवान और खूबसूरत वू सांग की डुगडुगी पिट रही है। पता चलता है कि वू सांग तीन इंच के वू दा का भाई है। जिनलियान उसपर आसक्त है लेकिन वो उसके प्रणय निवेदन को ठुकरा कर अपनी नौकरी पर कहीं दूर निकल जाता है। इस बीच आशिकमिजाज जियान क्विंग जिनलियान पर डोरे डालता है और देखते देखते दोनों का मेलजोल शहर भर में चर्चा का विषय बन जाता है। लेकिन दोनों की शादी के दो ही रास्ते हैं। या तो वू दा जिनलियान को तलाक दे दे या जिनलियान उसे जहर दे दे। वू दा तलाक देने से इनकार कर देता है। उसके मुताबिक जो भी हो धागे को सुई के साथ-साथ ही रहना होता है। ऐसे में एक साजिश के तहत जिनलियान उसे जहर दे देती है। लेकिन उसके भाई वू सांग के लौटने पर वो अपना कृत्य कबूल करके उसके हाथों अपनी मौत भी कबूल कर लेती है। नाटक के अंत में कई पात्र आकर जिनलियान की नियति से संबंधित कई सवाल उठाते हैं कि उसे अपने पति को अपनी नियति समझते हुए उसी के साथ ही रहना चाहिए था, कि उसे आशिकमिजाज जियान क्विंग से प्रेम की पींगे नहीं बढ़ानी चाहिए थीं, कि उसे शुरू में ही पत्थरदिल झंग दाहू से ही शादी कर लेनी चाहिए थी, आदि-आदि। ये सवाल जिंदगी के बारे में सोचने के लिए निर्देशक की ओर से दर्शकों के लिए भी हैं।
प्रस्तुति अपनी सादगी, रोचकता और शिल्पगत विशिष्टता में खास है। यह चीन के पारंपरिक नाट्य की छवियों से युक्त शिल्प था। मंच पर पीछे की दीवार के अलावा सिर्फ एक ड्रम है। बीच-बीच में घर को दर्शाने के लिए एक मेज और कुर्सियां लाकर रख दी जाती हैं। पात्रों की वेशभूषा से लेकर प्रकाश योजना तक हल्के लाल और सफेद रंग का कंट्रास्ट एक स्निग्ध प्रभाव बनाता है। पात्रों की वेशभूषा और देहभाषा अपने में ही रोचकता का एक विषय है। तीन इंच का वू दा जब झंग दाहू के यहां पहुंचता है तो दाहू अपने नौकर को छोटा स्टूल लाने का निर्देश देता है, लेकिन वू दा बताता है कि स्टूल वो अपने साथ लेकर आया है। वू दा झुककर चलता है, झंग दाहू की कुटिलता उसकी दाढ़ी में से झांकती है। आशिकमिजाज क्विंग बगुले जैसी सफेद पोशाक में है। तीनों बदमाश भी अपनी मूंछ-दाढ़ी और अटपटी हरकतों में निश्चित छवियां बनाते हैं। प्रस्तुति का संगीत पक्ष और कोरियोग्राफी उसे म्यूजिकल ऑपेरा की सी रंगत देते हैं। जिनलियान के दुर्भाग्य और बाद में उसके प्रेम की स्थितियां गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से एक भावनात्मक विस्तार लेती हैं।

Sunday, November 6, 2011

मुस्कुराता हुआ विद्रूप

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अंतिम वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति 'ड्राइव' एक लाइव थिएटर एग्जीबिशन की तरह है। सजीव छवियों की प्रदर्शनी। इसके लिए अभिमंच प्रेक्षागृह के मंच के आयताकार स्पेस में कई केबिन तैयार किए गए हैं। दर्शक इनके सामने से गुजरते हैं। रुककर अभिनीत की जा रही छवि को देखते हैं और फिर अगले केबिन की ओर बढ़ जाते हैं।
प्रस्तुति के निर्देशक स्विटजरलैंड के डेनिस मैल्लेफर ने छात्र और छात्राओं के लिए दो विषय चुने-- ऑटो रिक्शा ड्राइवर और वुमेन ट्रैफिक कांस्टेबल। उन्हें वास्तविक जीवन में जाकर इन पात्रों के संपर्क में आना था। उनके निजी और पेशागत पहलुओं को जानना था और इस तरह उनकी शख्सियत की थाह लेनी थी। निर्देशक ने उनसे कहा कि इस प्रक्रिया में अर्जित की गई छवि को वे हूबहू चित्रित न करें, बल्कि जिंदगी के एक रवैये के तौर पर, एक विवरण की तरह उपयोग करें। फिर इस कच्चे माल से वे एक नए लेकिन विशिष्ट चरित्र की सर्जना करें। 'ऐसा चरित्र जिसका कोई लक्ष्य, कोई इच्छा, कोई राज, कोई कमजोरी हो, कुछ ऐसा कि उसे मंच पर साकार किया जा सके'। प्रस्तुति देखते हुए ऐसा लगता है कि अपने मंतव्य को आत्मसात करवाने में निर्देशक काफी सफल रहे हैं। छात्रों की रचनात्मकता के कई रंग और अभिनय की अंतरदृष्टियां उसमें नजर आती हैं।
एक केबिन में ट्रैफिक पुलिस की वर्दी में खड़ी लड़की के चेहरे की तुर्शी देखते ही बनती है। 'डुट्टी कर री हू...आंख्खे फाड़ के के देख्खे है, पढ़ी-लिखी हूं' दिल्ली देहात के लहजे में वो बोलती है। वर्दी का आत्मविश्वास उसके चेहरे पर हल्की स्मिति के रूप में मौजूद है। केबिन के छोटे से स्पेस में वो मूव करती है। सहारे से थो़ड़ा टेढ़ा खड़ी होती और रिवॉल्वर उठाकर निशाना साधने की मुद्रा बनाती है। एक दूसरे केबिन में एक लड़की साड़ी पहन रही है। उसकी वर्दी दीवार पर खूंटी पर टंगी है। शायद वह धाविका भी है। चार सौ मीटर में दूसरे नंबर पर रही है। कंधे पर साड़ी के पल्लू में वो देर तक पिन लगा रही है। बताती है कि 'मैडम जी ने कहा था, ब्होत आगे जाएगी छोरी'। वहीं एक अन्य केबिन में खड़ा एक पात्र दर्शकों से मुखातिब है। उसके चेहरे पर हर ओर सौजन्यता पसरी हुई है, जो शायद एक हीनतर जीवन के अकाट्य आशावाद का परिणाम है। वो एक सेल्समैन के अंदाज में लगातार बोले जा रहा है- 'मैं गलत नहीं कह रहा हूं.. आप भी अंबानी बन सकते हो। भाई साहब, इच्छाएं हर आदमी में होती हैं, आप में भी हैं, मुझमें भी हैं, आप बताइये!' उसके अलावा एक अन्य केबिन में एक ऑटो वाला काले रंग के कोट-पैंट और लाल रंग की टाई में खड़ा है। यह पोशाक उसने अपनी बेटी-दामाद के इसरार पर किसी शादी के लिए बनवाई थी। वो दर्शकों से आंखें मिलाए बगैर इसी के बारे में बात कर रहा है। 'दामाद की बात नहीं टाल सकते थे, इसलिए बनवा लिए। शादी में हमसे कोई कुछ पूछने को आया तो हमें कुछ समझ में नहीं आया। फिर मालूम हुआ वो खाने के बारे में पूछ रहा था। हम देखे वहां कोका कोला लेकर घूम रहा सब वेटर हमरे जैसा ही कोट-पैंट पहने था। लेकिन टाई अलग था।' वो टाई के रंग को नीचे बिछी दरी के रंग से मिलाने के लिए झुक जाता है। बताता है कि उसका ड्राइवर होना किसी को नहीं बोला जा सकता था। इससे दामाद जी की बेइज्जती होती। और यह कि पहले दिल्ली में ज्यादा पंजाबी लोग टैक्सी चलाते थे। अब तो यूपी-बिहार वाले ज्यादा हैं। एक अन्य केबिन में वर्दी पहने ऑटो वाले की नींद को दिखाया गया है। चारपाई पर लेटा वो नींद में तरह-तरह से कसमसा रहा है। दरअसल वो लेटा नहीं है, बल्कि एक खड़ी चारपाई के समांतर चिपका हुआ खड़ा है। उसकी चप्पलें भी दीवार पर इस तरह चिपकाकर टांगी गई हैं, मानो फर्श पर रखी हों। एक दूसरा ऑटो वाला कल-पुर्जों को साफ करते हुए दुनियादारी की एक अपनी कहानी बांच रहा है। लेकिन एक कहीं ज्यादा दिलचस्प किरदार स्ट्रीट लाइट के नीचे हवाई चप्पल और उसी अनुरूप स्वेटर और पैंट में हाथ की टेक लगाकर पसरा हुआ सा बैठा है। बीड़ी पीते हुए उसकी बेपरवाह दुनियादारी का व्याख्यान सुनने लायक है। अपनी बेमुरव्वती के किस्से भी मजे लेकर सुनाता है और अपने पर आई मुसीबतों के भी।
ऐसा नहीं है कि सभी छवियां यथार्थवादी हों। कुछ सर्रियल ढंग के बिंब भी हैं। एक लड़की मेकअप करते हुए देर तक अपने सिर पर तेल गिराए जा रही है। उसका चेहरा और कपड़े तेल और पाउडर और क्रीम में सने हुए हैं। फिर भी उसके चेहरे पर एक मुस्कान है। वह एक मुस्कुराता हुआ विद्रूप है। एक अन्य पात्र पोर्न पत्रिका खोले बिल्कुल स्थिर ढंग से उसमें ताक रहा है। उसकी नाक बहकर लटकी हुई है और घिन पैदा करती है। एक अन्य पात्र लगातार टब में नहा रहा है। कपड़े उतारता है और फिर पहन लेता है। यह दोहराव अन्य छवियों में भी इसी तरह चल रहा है।
पूरी प्रस्तुति अपनी छवियों में जैसे गोर्की के 'लोअर डेप्थ' का आधुनिक संसार है। बगैर किसी कहानी के उसमें सूक्ष्म ढंग से एक दुनिया आबाद होती है। इंसानी हसरतों, उसके तलछट, उसके इरादों और उसकी जैविकता की दुनिया। सबसे खुशी की बात है कि यह दुनिया थिएटर की बुनियादी चीज अभिनय- मात्र अभिनय- से बनती है। उसपर यह भी कि यह काफी कुछ युवा अभिनेताओं की अपनी ईजाद है।

Sunday, September 4, 2011

प्रयोग और प्रगतिशीलता

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों की डिप्लोमा प्रस्तुतियों में प्रयोगशीलता अक्सर सौंदर्य प्रसाधनों की तरह होती है, जिससे प्रस्तुति को सजाया-संवारा जाता है। बीते दिनों विद्यालय परिसर में हुई कर्नाटक की सहाना पी निर्देशित प्रस्तुति 'जन्नत महल' इस लिहाज से दिलचस्प थी। इसका मंचन तीन ओर कॉरिडोर से घिरे एक चौकोर लॉन में किया गया। कॉरिडोर में बैठे दर्शकों और मंच के बीच एक पारदर्शी पन्नी या मोमजामा था, जो आधी प्रस्तुति के बाद हटा दिया गया। मोमजामे के दूसरी ओर नाटक की नायिका जुलेखा की दुनिया का जिक्र कुछ यूं था कि पहले ही दृश्य में वह मंच के एक छोर पर खड़े पेड़ से कूदती है। उसका पति मरा पड़ा है, पर वह प्रफुल्लित स्वर में गमगीन लोगों से जामुन और बादाम खाने के बारे में पूछती है। लोग कहते हैं 'कैसे चहक रही है, क्या इसे जहन्नुम का भी खौफ नहीं' या यह कि 'शायद शौहर की मौत के सदमे में यह ऐसी हो गई है'। मंच के बीचोबीच कफन से ढका मरा पड़ा पति बीच-बीच में उठकर जुलेखा को सिर ढकने वगैरह की हिदायतें देता है, और फिर मंच के एक सिरे पर कतार से खड़े अलग-अलग ऊंचाई के छह-सात रेफ्रिजरेटरों में से एक में जाकर बैठ जाता है। जुलेखा को अब इज्जत के 40 दिन और 40 रातें एक सफेद कोठरी में बितानी हैं, ताकि पुष्टि हो सके कि उसकी कोख में तो कुछ नहीं है। शरीर से बिल्कुल चिपके कसे हुए कास्ट्यूम में पात्रों का एक दल छाती पीटते हुए मंच से गुजरता है- रो जुलेखा रो, तेरा शौहर नहीं रहा। जुलेखा अब लोहे की जाली से बनी कोठरी में बैठी है। अंधेरे में डूबा मंच, जहां कोठरी की सफेद रोशनी में अकेली बैठी है जुलेखा। शौहर की गुलामी से आजाद होने के बाद उसकी तकदीर का अब क्या होगा! क्या करोगी जुलेखा, मां-बाप के घर में अब तुम्हारी कोई जगह नहीं। और यहां शौहर का भाई मुनीर कितने दिन तुम्हें झेलेगा? लेकिन मुनीर, जिसकी नाक से लेकर ठुड्डी तक एक काली लकीर खिंची हुई है, एक नए खयाल का इंसान है। शौहर की गुलामी झेलती रही जुलेखा से शादी करके वह उसे एक आजाद जिंदगी देना चाहता है। बताओ 11 हजार नगद दो अशर्फी सिक्काए राजुल हक देना तय हुआ है, क्या निकाह आपको मंजूर है? स्टेज पर झालरें खींच दी जाती हैं, कव्वाली गूंजने लगती है, अगरबत्तियां जलाई जाती हैं और इस तरह शादी की रस्म मुकम्मल होती है। मुनीर किताबों का एक बंडल लाया है। वह कहता है- जुलेखा इन किताबों को पढ़ो, दुनिया के बारे में जानो। लेकिन अम्मां, जिनके होंठ से गाल तक विद्रूप फैलाती मूंछ जैसी एक काली लकीर खिंची है, कहती हैं, जुलेखा, मुनीर बाहर क्यों सोता है, मुझे पोते का मुंह देखना है। यह रहस्य जुलेखा की समझ से भी बाहर है और दर्शकों की भी कि मुनीर बीवी को छोड़ अचानक टपकी महिला उद्धार समिति की नेता से इश्क क्यों लड़ा रहा है। इसकी वजह यह है कि जुलेखा उसके लिए बासी भात है, कि उसने उससे शादी इसलिए की कि संपत्ति में बंटवारा न हो, कि भाई की आबरू इधर-उधर मुंह न मारे, वगैरह।
नाटक में मरने के बाद फ्रिज में बैठे शौहर अकबर मियां बीच-बीच में दरवाजा खोलकर बाहर भी ताक-झांक करते हैं, भाई के साथ एक गेंदनुमा चीज से कैच-कैच का खेल खेलते हैं। शुरू के दृश्यों में पात्र बोलते हुए एक चिंहुंक की स्वर युक्ति भी बनाते हैं। शुरू में लगता है मानो यह एक एब्सर्ड नाटकीयता वाली एक प्रयोगपूर्ण प्रस्तुति मात्र है। लेकिन धीरे धीरे उसमें कथानक का ताना बाना भी खुलता है। इसमें कोई शक नहीं कि निर्देशिका सहाना पी में रंग-उपक्रमों की अच्छी समझ है। उनके दृश्यों में अक्सर स्थितियों की एक वक्र भंगिमा दिखाई देती है और भावार्थपूर्ण छवियां भी। इज्जत के दिन वाले दृश्य में वे सन्नाटे से और शादी वाले दृश्य में वे रेकॉर्डेड स्वरों से स्थितियों का एक अच्छा माहौल बनाती हैं। लेकिन उनकी प्रयोगशीलता और कथानक के फ्लेवर में कहीं एक व्यवधान भी है। न यह खालिस प्रयोग है, न यथार्थवाद...यह दो नावों में सवारी जैसा कुछ है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ट्रेनिंग डिजाइन सबसे ज्यादा सिखाती है, विजन सबसे कम। कन्नड़ लेखक फकीर मुहम्मद कतपड़ी की कहानी और आसिफ अली के आलेख की स्त्री मुक्ति का प्रगतिशील विचार एक अतिआधुनिक प्रयोगवादी मुहावरे में किंचित मिसफिट लगता है। सहाना पी के मंचीय प्रयोगवाद में बहुत कुछ खपा दिया गया है। रेफ्रिजरेटर तक तो ठीक था, अंतिम दृश्य में पानी का खेल कुछ ज्यादा और महंगा मालूम देता है। मंच पर पानी होगा तो पात्रगण उसमें तैरेंगे ही। ऐसा ही होता भी है। आखिर व्यवहारजगत में रंगकर्मी ऐसा पानी की नलकियों से युक्त मंच कैसे बना पाएंगे..। बहरहाल इस सब के बावजूद प्रस्तुति में एक ऐसी रंगदृष्टि और चमक है, जो एक बिल्कुल युवा रंगकर्मी को लेकर उम्मीद पैदा करती है।

Tuesday, August 2, 2011

मौन में व्यंजना

युवा रंगकर्मी लोकेश जैन ने पिछले वर्षों के दौरान एक खास तरह के थिएटर में प्रवीणता हासिल की है। वे मंच पर सीमित संसाधनों से एक ऐसी रंगभाषा रचते हैं जो अपने लालित्य, सादगी और लय में प्रभावित करती है। वे मंच पर एक ऐसा काव्यात्मक मुहावरा रचने की कोशिश करते हैं, जिसमें छंद और अमूर्तन एक साथ शामिल है। खास बात यह है कि यह काम वे स्कूल में पढ़ने वाले किशोर उम्र के कलाकारों के साथ करते हैं। सोमवार को नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी सभागार में उन्होंने प्रस्तुति 'ख्वाबों के बुलबुले' का मंचन किया। प्रस्तुति में कोई संवाद नहीं है पर स्थितियों और घटनाओं की सांकेतिकता में एक कथ्य उसमें दिखाई देता है। लगभग सपाट पीली रोशनी में आकार लेती प्रस्तुति में मंच पर कई पात्र पुतुल शैली में उपस्थित हैं। मंजीरे और बांसुरी के स्वरों पर उनकी देहगतियां एक दृश्य रचती हैं। कभी चिड़ियों की चहचहाहट, कभी घड़े में सिक्कों के उछाले जाने का स्वर, फिर ड्रम के रौद्र स्वर, फिर अचानक शांत आलाप...। स्टेज पर आगे की ओर सफेद रंग में लीपा हुआ एक घड़ा रखा है। एक पात्र वैसे ही रंग के लोटे से सूर्य को अर्घ्य चढ़ाने की मुद्रा में है, उसके लोटे से लाल रंग का कुछ तरल घड़े पर गिरता है। फिर घड़ा उठा लिया जाता है। वाचिक के आलाप में, वाद्य के स्वरों में, रोशनी के वाल्यूम में अचानक एक तेज उतार-चढ़ाव होता है। दर्शक को घेरने वाले इस तेज दृश्य में घड़ा हाथ से छूटता है और तेज आवाज में उसका टूटना सबको अवाक कर देता है। सभी पात्र टूटे घड़े के आसपास जमा हैं। उसकी मिट्टी को मसलते, उसे कोई आकार देते और इस रचने के सुख को महसूस करते। धीन ताना तेरे नाम...धीन ताना तेरे नाम...गोल गोल नाच रही एक लड़की गिर पड़ती है, सब कुछ रुक जाता है और इस तरह एक नया भाव दृश्य में प्रवेश करता है। एक दूसरी लड़की उसकी मदद को आगे आई है। स्नेह और सहानुभूति के इजहार में वह उसके चेहरे और पांवों पर उसी तरह मिट्टी लेप रही है जैसे वधु के शरीर पर हल्दी लगाई जाती है। कुछ देर बाद सभी पात्र कुछ न कुछ मिट्टी में सने दिखाई देते हैं। उनकी बनाई मिट्टी की नन्ही नन्ही आकृतियां मंच पर आगे की ओर रखी हैं। शायद वे इन्हीं आकृतियों का प्रतिरूप हैं। फिर मंच के एक छोर से एक ऐसा शख्स प्रवेश करता है जो सिर से पैर तक इस कदर मिट्टी में सना है मानो उसे जमीन से खोदकर निकाला गया हो। वह गुड़ी मुड़ी गठरी सा आगे बढ़ता है। लड़की प्रेम में या शायद सहानुभूति में उसे सहलाती है। लड़के की गतियां चौपाए पशु की सी हैं। फिर वह होमोसेपियन की तरह खड़ा हो जाता है।... कुछ ही देर में मंच पर सिर्फ आदम और ईव जैसे दो पात्र हैं। पीछे की ओर एक स्त्री दिखाई देती है जिसके बालों में बंधी लंबी डंडी पर कुछ पत्तों के बीच एक फूल है।....
निर्देशक लोकेश जैन का मानना है कि संवाद या शब्द एक बौद्धिक सूचना होते हैं, लेकिन छवियां हमें हमारे अनुभव में प्रभावित करती हैं, और इस प्रस्तुति को इस रूप में करने की यही वजह है। उनके मुताबिक रचनात्मकता का स्त्रीत्व की ऊर्जा से गहरा ताल्लुक है जैसा कि उन्होंने इस प्रस्तुति में दिखाने की कोशिश की है। प्रस्तुति में कुछ अच्छी रंग छवियां हैं। विशेष बात यह है कि उसमें स्वरों के सभी उपक्रम लाइव घटित होते हैं, और इस तरह साक्षात का वास्तविक आस्वाद प्रस्तुति में बरकरार रहता है। लोकेश जैन बहुत सी स्थितियों का एक कोलाज बनाते हैं। किसी पेंटिंग की तरह। इस पेंटिंग में कहीं कोई चमत्कार नहीं है। सीमित संसाधनों में तैयार किए गए बहुत से सादगीपूर्ण प्रयोग हैं। एक मौके पर अस्फुट सी किलकारियों से एक दृश्य बनता है, तो किसी अन्य मौके पर पात्रों के बीच घटित हो रही मौन गतियां मानो एक मासूमियत या निष्कपटता की व्यंजना करती हैं। शायद यह बेहतर ही था कि रंगमंचीय रोशनियां प्रस्तुति में नहीं थीं।

Sunday, July 31, 2011

उकताहट और तीन औरतें

सौरभ शुक्ला निर्देशत 'रेड हॉट' प्रसिद्ध अमेरिकी नाटककार नील साइमन का नाटक है। हिंदी में स्वयं सौरभ ने इसका रूपांतरण किया है। इसके केंद्र में एक ऐसा किरदार है जिसकी शादी को 22 साल हो चुके हैं और इस उम्र में उसे लगने लगा है कि जिंदगी बडी बोरियत भरी है, कि कहीं उसकी कोई पूछ नहीं है, कि वह व्यर्थ में ही समय बिताए जा रहा है, वगैरह वगैरह। ऐसे में अपनी जिंदगी में थोड़ी उत्तेजना लाने के लिए उसके दिमाग में विवाहेतर संबंध का आइडिया आता है। यह नाटक इसी सिलसिले में तीन अलग अलग किस्म की स्त्रियों से उसकी मुलाकात याकि मुठभेड़ की कहानी है। अपनी समूची मंचीय संरचना में प्रस्तुति लगातार काफी चुस्त है। उसकी मंच सज्जा में कहीं कोई झोल नहीं, कोई विंग्स नहीं। काफी बारीकी से फ्लैट के अंदर का दृश्य बनाया गया है, जिसमें ड्राइंगरूम से जुड़ा एक टेरेस है, जहां से झांककर नीचे गार्ड को आवाज दी जा सकती है। ड्राइंगरूम में एसी लगा है। कारपेट है। रसोई में सर्विस विंडो है, जहां से भीतर और बाहर खड़े दोनों पात्रों की बातचीत और कार्रवाइयां दर्शकों को दिखाई देती हैं। रसोई के भीतर रखे फ्रिज का थोड़ा सा हिस्सा भी दिखाई देता है। यानी दृश्य के यथार्थवाद में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। हिंदी थिएटर में अक्सर दिखाई देने वाले चीजों के चलताऊपन से यह प्रस्तुति पूरी तरह बरी है। मंच के बाएं सिरे पर एक दरवाजा है जिससे पात्र दृश्य में प्रवेश करते हैं।
पहली आगंतुका एक शादीशुदा स्त्री है। मुख्य पात्र परमिंदर सिंह सेठी उससे खान मार्केट के अपने रेस्त्रां में मिला था। इस मुलाकात का प्रयोजन उनके बीच स्पष्ट है, पर पुरुष इधर उधर की तमाम बातें किए जा रहा है और स्त्री मुद्दे पर आना चाहती है। वो बताता है कि उसने बारहवीं क्लास में ही लोलिता उपन्यास पूरा पढ़ लिया था, कि उसके डैडीजी ने कहा था कि पम्मी बिजनेस में अच्छा करना है तो अच्छा सूट पहनो। फिर वो उससे पूछता है कि क्या उसकी शादी में कोई प्रॉब्लम है जो वो उससे इस तरह मिलने आई है। उसकी बातों से ऊबी और थकी स्त्री स्पष्ट करती है कि वो यहां सेक्स के लिए आई है क्योंकि इससे उसे खुशी मिलती है, और यह कि किसी भी संबंध में सच सबसे जरूरी चीज है। लेकिन पम्मी को वह भावनाविहीन और आत्माविहीन मालूम देती है। उससे मिलने आने वाली दूसरी लड़की एक चलती पुर्जी फिल्मों की छोटी-मोटी एक्ट्रेस और मॉडल है। जो बताती है कि अब तक उसके 35 बॉयफ्रेंड रहे हैं, और कहती है- 'आदमी बड़े हॉर्नी होते हैं सरजी'। इस लड़की से बात कर रहे पम्मी में प्रौढ़ उम्र की कई इच्छाएं जाग्रत होती मालूम देती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वह वैसा ही नाच रहा है जैसा लड़की उसे नचा रही है। तीसरी स्त्री उसके दोस्त की पत्नी और उसकी अपनी पत्नी की सहेली है। यहां स्थिति पूरी तरह बदली हुई है। वो उसे बताती है कि वो उससे भावनात्मक तौर पर मिलने आई है, न कि शारीरिक आकर्षण की वजह से। पम्मी उसे इस मुलाकात की संगत वजहें बता रहा है और असली सवालों में जाने से बच रहा है।

नाटक का एक दृश्य

नाटक का एक दृश्य

छोटी-छोटी चीजें होती हैं जो थिएटर का आकर्षण बनाती हैं। कई तरह की दुविधाओं से घिरे प्रौढ़ उम्र के शख्स का चरित्र बनाने में सौरभ इनका सफल इस्तेमाल करते हैं। वो कनाट प्लेस में रिवोली के पास है- यह बात पत्नी से छिपानी है, या उसे पता भी चल जाए तो क्या फर्क पड़ता है- नुमा असमंजस पम्मी के किरदार का स्थायी भाव हैं। नए सेक्स संबंध में जाने की उसकी ऊहापोह या झट से उसे लपक लेने की उत्तेजना आदि भंगिमाएं प्रस्तुति में काफी रोचकता लाती हैं। तीन स्त्रियों के साथ वो तीन भावदशाओं में नजर आता है। आलेख इतना कसा हुआ है कि चार अलग-अलग चरित्रों की मानसिक दुनिया की उठापटक निरंतर उसमें एक दिलचस्प गति बनाए रखती है। तीनों स्त्री भूमिकाओं में निगार खान, मोना वसु और प्रीति ममगाईं का चरित्रांकन और अभिनय भी उतना ही कसा हुआ था। खास तौर से मॉडल लड़की की भूमिका में मोना वसु ने किरदार के कई शेड्स का अच्छा इस्तेमाल किया है।

Tuesday, July 19, 2011

नाटक एक उत्पाद है

रंग निर्देशक सुरेंद्र शर्मा ने उसी तरह हिंदी के कई क्लासिक उपन्यासों- 'बूंद और समुद्र', 'रंगभूमि', 'मैला आंचल', 'बाणभट्ट की आत्मकथा' आदि- को रंगमंच पर पेश किया है, जिस तरह देवेंद्र राज अंकुर ने अपने 'कहानी का रंगमंच' में कहानियों को। लेकिन अंकुर की तरह उन्होंने कभी किसी शैली में बंधने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय वे उपन्यास की संवेदना और उसकी छवियों के रूपाकार पर अधिक केंद्रित रहे हैं। इधर उन्हें क्या सूझी कि उन्होंने विष्णु प्रभाकर जन्म शताब्दी के मौके पर उनकी तीन कहानियों का लगभग अंकुर शैली में मंचन किया। बीते सप्ताह भाई वीर सिंह मार्ग स्थित मुक्तधारा प्रेक्षागृह में हुई रंगसप्तक की इस प्रस्तुति में विष्णु प्रभाकर की तीन कहानियों- 'कितने जेबकतरे', 'डायन' और 'धरती अब भी घूम रही है'- में कहानियों का नाट्य रूपांतरण नहीं किया गया है। उन्हें मंच पर सुनाया जा रहा है और इस सुनाए जाने के बीच वे मानो उदाहरण के लिए घटित भी होती हैं। घटित होने का यह ढंग निहायत अनौपचारिक है। जैसे वाचन में कहानी पूरी स्पष्ट न हो रही हो, इसलिए अभिनय के जरिए भी उसकी एक रूपरेखा बनाई जा रही हो। प्रस्तुति का यह ढंग कहानी के यथार्थ के प्रति दर्शक की तल्लीनता को खंडित करता है। यह एक टकसाली किस्म की कला है, जिसमें किसी भी कहानी का मंचीय उत्पादन बगैर दिल और दिमाग पर ज्यादा जोर डाले किया जा सकता है। अंकुर इसी पद्धति से अब तक सैकड़ों कहानियां मंच पर उतार चुके हैं, पर बेहद लगन से अपना काम करने वाले सुरेंद्र शर्मा से ऐसी उम्मीद नहीं थी, जिन्होंने 'कहां मेरा उजियारा' जैसे अस्तव्यस्त आलेख की सारी कमियों को दृश्य-श्रव्य के सटीक संयोजनों से एक भव्य और रोचक प्रस्तुति में ढंक दिया था।
प्रस्तुति में शामिल 'डायन' एक एकाकी बूढ़ी स्त्री की कहानी है। पुराने दिनों के समाज में लोगों की खुराफाती बुद्धि बैठे-ठाले उसे डायन मान लेती है। किस्से-कहानियों में जीने वाला समाज इसी तरह कुछ भी मान लेता है। और उसे इसके कुछ प्रमाण भी मिल जाते हैं। लेकिन वास्तव में इससे उसकी कई ग्रंथियां संतुष्ट होती हैं। इससे उनकी असुरक्षा को एक मोहरा मिल जाता है। इससे उनके भीतर की क्रूरता को एक विलेन मिल जाता है। संसार की सारी व्याख्याओं का उत्स 'मैं' हूं, इसलिए उस दूसरे की दुनिया की दिक्कतों से हमें क्या लेना-देना। विष्णु प्रभाकर की कहानी जीवन के उस हिस्से को भी दिखाती है, जहां बुढ़िया गफूरन अपने एकाकीपन में किसी मनुष्य के साथ को तरस रही है। वह किसी छोटे बच्चे को दुलारती है तो लोग इसमें अनिष्ट समझते हैं। गफूरन बनी नीलम ने एक हीन जीवन का अच्छा कारुणिक चित्र मंच पर खींचा है, हालांकि बाकी पात्र उस तुलना में काफी लाउट किस्म के नाटकीय थे। कहानी मेलोड्रामा में सुखी रहने वाले समाज की विडंबना का एक दुखांत टुकड़ा है। प्रस्तुति की तीनों कहानियों में यह निश्चित ही सबसे बेहतर थी।
इससे पहले मंचित की गई 'कितने जेबकतरे' में महानगरीय जीवन के उस लालच को दिखाया गया है, जहां हर आदमी अपनी चालाकियों में लगभग जेबकतरों जैसा हो चुका है। तीसरी और विष्णु प्रभाकर की सबसे प्रसिद्ध कहानी 'धरती अब भी घूम रही है' का विषय भी प्रकारांतर से यही है। पिता के जेल जाने पर मौसी के घर में रह रहे दो बच्चे मौसी मौसा द्वारा रोज सताए जाते हैं। वे रोज सुनते हैं कि लड़की और पैसे से हर काम हो जाता है। दोनों नन्हें बच्चे एक रोज जज साहब के घर जा पहुंचते हैं। अपने पास जमा किए हुए फुटकर पैसे जज को देने के बाद दूसरी चीज के तौर पर लड़की खुद को पेश करती है। कहानी तब की है जब भ्रष्ट लोग आज की तरह इम्यून नहीं हुआ करते थे। लिहाजा चल रही पार्टी में दो नादान बच्चों का यह ऑफर जज साहब और सबको अवाक कर देता है। प्रस्तुति अवाक रह जाने का सही क्लाइमेक्स नहीं बना पाती। अत्याचार और दुख दोनों ही उसमें पुराने किस्म के हैं। सुरेंद्र शर्मा ने बगैर किसी मंचीय मंजाव के उन्हें चित्रित किया है, इसलिए वे बहुत अभिव्यक्तिपूर्ण नहीं बन पाए हैं। प्रस्तुति का यह एक बेहतर पक्ष है कि उसमें कथावाचक और पात्र अलग-अलग हैं, लेकिन 'नाटकीय' किस्म के दृश्य और बीच बीच में टपक पड़ता वृत्तांत वाचन स्थितियों को सायास और बोझिल बना देता है।

Wednesday, June 29, 2011

यह नाटक नहीं, श्रद्धांजलि है

एमएस सथ्यू से बातचीत

- थिएटर मे एक बार फिर आप वापस आए हैं। कैसा लग रहा है?
- नहीं, मैं नाटक करता रहा हूं। अभी टैगोर का 'ताशेर देश' हमने कन्नड़ में बंगलौर में किया। इससे पहले कन्नड़ के ही बी सुरेश के मूल आलेख पर 'गिरजा के सपने' किया था। कुछ न कुछ चलता ही रहता है।
- थिएटर और सिनेमा में काम करने में क्या फर्क है?
- अभिनय एक ऐसी चीज है जो हम किसी को सिखा नहीं सकते। फिर भी यह फर्क है कि थिएटर में हम अभिनेता को सिर्फ बता सकते हैं, लेकिन जब वो स्टेज पर होता है तो उसे सब कुछ खुद ही करना होता है, उस क्षण में उसे कुछ बताया नहीं जा सकता। जबकि सिनेमा में सब कुछ आपके नियंत्रण में होता है। जो ठीक नहीं लगा उसे एडिट किया जा सकता है, दोबारा शूट किया जा सकता है।
- आपकी इस प्रस्तुति के पात्रों के चेहरे-मोहरे और कद-काठी वास्तविक किरदारों से काफी मिलते-जुलते हैं। क्या इसके लिए आपको काफी मेहनत करनी पड़ी?
- नहीं, अभी मात्र तीन हफ्ते से ही इनसे परिचय है। ये सब पहले से ही थिएटर में एक्टिंग करते रहे हैं। वैसे चेहरे के मिलान से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता है। फिल्म गांधी के बेन किंग्स्ले कहां गांधी जैसे लगते थे। गांधी की तुलना में वे काफी ज्यादा हट्टे-कट्टे थे। गांधी में एक निर्दोष मुस्कान थी जो हासिल करना बहुत मुश्किल था, पर फिर भी किंग्स्ले ने काम तो अच्छा किया।
- नाटक के लिए इस आलेख का चुनाव कैसे हुआ?
- ये हमारे मित्र और नाटक के प्रोड्यूसर के के कोहली साहब ने लिखवाया है। मेरे लिए यह नाटक नहीं बल्कि एक श्रद्धांजलि है। अमृता प्रीतम बहुत बड़ी लेखिका थीं, इमरोज और साहिर भी। इससे पहले इस्मत चुगताई, मंटो, फैज और कैफी के लेखन और शख्सियत पर भी नाटक होते रहे हैं। मैं इसे नाटक न कहकर थिएटर में एक अलग तरह का अनुभव कहूंगा। इसके माध्यम से दर्शक इन शख्सियतों को जानेंगे।
- सुना है कि 'गरम हवा' को दोबारा रिलीज करने की योजना है? यह कब तक होगा?
- हां, उसका प्रिंट बहुत खराब हो गया था। उसे अमेरिका में डिजिटली रेस्टॉर कराया गया है। उसके मोनोट्रैक को डॉल्बी में कराया गया है। यह सब बहुत महंगा काम है। 25 हजार डॉलर तो सिर्फ साउंड रेस्टॉरेशन में ही लगे हैं। इतने में मैं चार गरम हवा बना सकता था। सितंबर में फिल्म को वैश्विक स्तर पर रिलीज किया जाएगा। साथ-साथ उसकी डीवीडी, उसपर किताब, उसकी पटकथा, उसपर डॉकुमेंटरी भी जारी की जाएंगी।
- क्या आपको नहीं लगता कि डॉल्बी तकनीक का शोर 'गरम हवा' की संवेदनशीलता पर असर डालेगा?
- नहीं, आजकल दर्शक तकनीक को जानने लगे हैं। वे अपेक्षा करते हैं।
- आपकी आगे की क्या योजनाएं हैं?
- विद्या बालन को लेकर एक म्यूजिकल बनाने की योजना है। इसमें बनारस, कलकत्ता, मैसूर वगैरह की लोकेशन होंगी। इसमें कई तरह का संगीत इस्तेमाल करने का भी इरादा है। दादरा, ठुमरी, कर्नाटक संगीत, वगैरह।
- आजकल के सिनेमा को लेकर आपकी क्या राय है?
- बहुत अच्छी फिल्में बन रही हैं। हिंदी में देव डी अच्छी फिल्म थी। तमिल, मलयालम और मराठी में बहुत अच्छी फिल्में बन रही हैं। मैंने सुना है धोबी घाट और पीपली लाइव भी अच्छी फिल्में हैं। मणिरत्नम बहुत अच्छी फिल्में बना रहे हैं, हिंदी में अनुराग कश्यप हैं, संजय लीला भंसाली, आशुतोष गोवारिकर हैं। आज की फिल्में नए किस्म की फिल्में हैं।

प्रेम की एक आधुनिक दंतकथा

एमएस सथ्यू अपनी नई नाट्य प्रस्तुति 'अमृता' के साथ एक बार फिर हाजिर हैं। अमृता की कहानी आधुनिक समय के एक प्रसिद्ध प्रेम त्रिकोण की कथा है। इस त्रिकोण की विशेषता यह है कि उसमें कोई बाहरी द्वंद्व नहीं है। उसके तीनों पात्रों- अमृता प्रीतम, इमरोज और साहिर लुधियानवी- में अपने वजूद की पहचान का एक आंतरिक द्वंद्व है, और यही द्वंद्व प्रस्तुति की थीम है। प्रस्तुति की नायिका अमृता हैं, पर उसके नायक उम्र में उनसे 10-12 साल छोटे इमरोज हैं, न कि साहिर। यह दरअसल अमृता और इमरोज की प्रेमकथा है जिसमें साहिर एक अहम संदर्भ की तरह मौजूद हैं। नाटक की एक अन्य विशेषता है कि उसके आलेखकार दानिश इकबाल खुद को उसका लेखक मानने को तैयार नहीं हैं। उनके मुताबिक मंच पर बोला जा रहा एक-एक शब्द अमृता प्रीतम का लिखा है, और उनकी भूमिका सिर्फ विषय के तरतीबकार या संयोजक की है।
एमएस सथ्यू की मशहूर फिल्म गरम हवा 1973 में रिलीज हुई थी। उसके मुख्य किरदार सलीम मिर्जा का असमंजस है कि वो पाकिस्तान जाए या नहीं। नया मुल्क बनने के बाद उसकी आर्थिक परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। सथ्यू का कहना था कि इस फिल्म के पीछे उनका मकसद उस खेल को सामने लाने का था जो राजनीतिज्ञों ने बंटवारे के नाम पर खेला। गरम हवा की पटकथा कैफी आजमी और शमा जैदी ने लिखी थी और उसकी मूल कहानी इस्मत चुगताई की थी। लेकिन अमृता कोई कहानी नहीं है, वो एक वास्तविक जीवन का ब्योरा है। उसकी नायिका प्रेम और संबंध तो चाहती है पर बंधन नहीं। उसे लगता है कि विवाह का बंधाव उसके प्रेम के गाढ़ेपन को कम करता है। वैयक्तिकता के बहुतेरे संदर्भ हैं जो इस संबंध-कथा में सामने आते हैं। अमृता कहती हैं- 'इमरोज, अगर मुझे साहिर मिल जाता तो तू न मिलता।' जवाब में इमरोज कहते हैं- 'मैं जानता हूं साहिर को तुम कितना चाहती थीं, पर उससे ज्यादा मैं यह जानता हूं कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं।'
आलेखकार दानिश इकबाल के मुताबिक- 'ड्रामा एक ऐसा कलात्मक वसीला है, जिसमें विषयवस्तु को परत-दर-परत इजहार के सांचे में लाना जरूरी होता है, जिस से संबंधित मूल्यों की समझ-बूझ की गुंजाइश बढ़ जाती है। इस नाटक का ताना-बाना अमृता की मूल रचनाओं से बुना गया है और सिर्फ डिजाइन के स्तर पर नाटकीय तत्वों का थोड़ा-बहुत इस्तेमाल किया गया है। अमृता की नज्मों, कहानियों, नाविलों, निबंधों और इंटरव्यूज में जा-बजा हमें ऐसे सुराग मिलते हैं जिनसे उनके जेह्नो-दिल का कोई गुमनाम दरीचा अचानक खुल जाता है।' दानिश के अनुसार यह नाटक पात्रों के अंतरजगत की कथा है, समाज इसमें नहीं है। वे बताते हैं- 'अमृता प्रीतम की तहरीरें हमें मुसलसल जेहनी सफर की एक ऐसी कायनात में ले जाती हैं, जहां खयाल और जज्बे की सच्चाई, मोहब्बत की भीनी खुशबू और पंजाब के सदियों पुराने सूफियाना विरसे की बाजगश्त हमारी रहनुमा होती है, जहां हम और आप, राह से भटके मुसाफिरों की तरह गुमशुदा मंजिल के आसार देखते बेताब आगे बढ़ते जाते हैं। अमृता ने अपनी जिंदगी की हर कसक, हर तड़प, हर खुशी को नज्मों के फूल बना कर जुदाइयों, मोहब्बतों, उदासियों और मसर्रतों की लाफानी कहानियां रकम की हैं, जिनमें अहदे-माजी का पंजाब अपनी तमामतर रानाइयों के साथ रहता-बसता है।'
दक्षिण दिल्ली के एक बडे बेसमेंट में नाटक की रिहर्सल चल रही है। एक छोर पर सथ्यू चुपचाप देख रहे हैं। कई बार उन्हें लगता है कि कुछ है जो लय को तोड़ रहा है तो वे टोकते हैं। नाटक में एक चरित्र समय का भी है। आलेखकार दानिश इकबाल के मुताबिक यह भी उनका अपना डाला हुआ चरित्र नहीं है, बल्कि अमृता ने एक बार एक सपना देखा था, जिसमें एक बू़ढ़े आदमी ने उनसे आत्मकथा लिखने के लिए कहा। सथ्यू कहते हैं- 'मुझे बूढ़ा, लाठी लेकर चलता हिलता-डुलता ऐसा वक्त नहीं चाहिए...। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद सब कुछ खत्म हो गया था, तब द्वापर आकर कलयुग को आगे का सिलसिला सौंपता है। ..यह अगला युग...टाइमलेसनेस...समयहीनता का अहसास...ऐसा कुछ चाहिए।'
देश का बंटवारा गरम हवा में भी था, अमृता प्रीतम के जीवन में भी था, और उन साहिर को भी उसे भोगना पड़ा, जिन्होंने बाद में कभी लिखा था- 'वो वक्त गया वो दौर गया जब दो कौमों का नारा था/ वो लोग गए इस धरती से जिनका मकसद बंटवारा था।' लाहौर से दिल्ली के बीच इसी बंटवारे को भोगते कभी अमृता प्रीतम ने अपनी प्रसिद्ध रचना 'आक्खां वारिस शाह नू' में हीर रांझा के लेखक वारिस शाह को याद किया था- 'उट्ठ दर्दमंदां दिया दर्दिया, उट्ठ तक अपना पंजाब, अज बेले लाशां बिछियां ते लहू दी भरी चिनाब'। 16 साल की उम्र में व्यवसायी प्रीतम सिंह से उनकी शादी हुई जो 41 साल की उम्र तक चली, फिर साहिर से घनिष्ठता हुई, जिसका जिक्र उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में किया है। लेकिन उनका सबसे लंबा साथ चित्रकार इमरोज के साथ रहा। अमृता अपने जज्बे में आजादी की तलाश करती एक बेचैन रूह थीं। अपनी बेबाकी में कभी उन्होंने मदर टेरेसा जैसी शख्सियत की आलोचना की थी, कि दीन-दुखियों की सेवा के लिए उनके यहां ईसाइयत अपनाना क्यों जरूरी है। दानिश कहते हैं- 'नए दौर की ये हीर हिजरत के बे-आब रेगिस्तान में तमाम उम्र रूहानियत के नखलिस्तान ढूंढ़ती रही, जो अक्सरो-बेशतर सराब साबित हुए। लेकिन राहे-हक की तलाश ने उनकी जात को एक कायनात की वुसअत अता की जिसने इंसान की तामीर-कर्दा हदों-सरहदों को हमेशा फरामोश रखा।' अपने बाद के दिनों में रूहानियत का नखलिस्तान उन्हें ओशो के दर्शन में मिला। ओशो की कई किताबों के आमुख उन्होंने लिखे।
प्रस्तुति के निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू इसे नाटक न कहकर श्रद्धांजलि कहते हैं। एक बेचैन रूह 81 साल के होने जा रहे सथ्यू में भी रही है। 1952 में विज्ञान विषय की अपनी नियमित पढ़ाई छोड़कर वे खुद को आजमाने सिनेमा की दुनिया में चले आए, जहां उन्हें पहला बड़ा काम सन 1964 में फिल्म 'हकीकत' में मिला। चेतन आनंद निर्देशित इस फिल्म में वे सहायक निर्देशक थे। फिर उसके करीब एक दशक बाद आई फिल्म 'गरम हवा' ने उन्हें देश के शीर्ष फिल्म निर्देशकों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। यथार्थवादी अभिनय सथ्यू की पसंद है। उनका मानना है कि किसी फिल्म या नाटक में चरित्र महत्त्वपूर्ण होते हैं और टेक्नालॉजी को फिल्म पर हावी नहीं होने देना चाहिए। एक इंटरव्यू में उनका कहना था- 'मैं असल चरित्र चाहता हूं, जो सहज दिखते हों। यही वो बारीक रेखा है जहां से वास्तविक और अवास्तविक का फर्क दिखने लगता है।' कुछ साल पहले उनकी नाट्य प्रस्तुति 'दाराशिकोह' काफी चर्चित रही थी।....
लेकिन इस पूरी प्रस्तुति को आकार देने वाले सबसे अहम शख्स हैं इसके प्रोड्यूसर के के कोहली। के के कोहली न सिर्फ 'अमृता' के प्रोड्यूसर हैं, बल्कि यह मूलतः उन्हीं का आइडिया भी है। उन्हीं के आग्रह पर दानिश इकबाल ने आलेख तैयार किया। उन्होंने ही निर्देशक सथ्यू से संपर्क किया, और इस तरह प्रस्तुति शक्ल लेने लगी। कोहली दाराशिकोह के प्रोड्यूसर भी थे। उनकी संस्था इंप्रेसेरियो एशिया पिछले बीस साल से थिएटर की दुनिया में सक्रिय है। लेकिन उनके इस मामले में कुछ सिद्धांत हैं। उनका मानना है कि मोलियर, इब्सन करना बहुत आसान होता, पर ज्यादा अच्छा तब लगता है जब अपने मन का कुछ सार्थक हो। कोहली के मुताबिक उन्होंने दाराशिकोह के किरदार पर नाटक करना इसलिए चुना कि वह कंपोजिट कल्चर का एक बहुत बड़ा प्रतीक है। उनके मुताबिक- अमृता-इमरोज की प्रेमकथा में एक सूफियाना रंगत है। उन दोनों ने मानो स्वयं को एक-दूसरे में समाहित कर लिया था। जिसे आध्यात्मक तौर पर आत्मा में परमात्मा का मिलन कहा जाता है वैसा कुछ था। कोहली बताते हैं- अमृता के न रहने पर भी इमरोज कभी उनके प्रेम से बरी नहीं हुए। वे एक बार कहा इमरोज का यह कथन याद करते हैं- तुमने औरत के साथ सो कर तो देख लिया, कभी उसे जाग कर भी देखो।
कोहली कहते हैं, साहिर कवि चाहे कितने बड़े थे, पर इंसान के तौर पर बहुत कमजोर थे। वे अमृता की प्यार की ऊंचाई के सही पार्टनर नहीं थे। वे अमृता के प्यार को न समझ पाए न कबूल कर पाए।
प्रस्तुति में अमृता बनीं लवलीन थंडानी अमृता प्रीतम से उनके जीवन में असंख्य बार मिली हैं। बहुत कम उम्र से वे उन्हें देखती रही हैं। उनके व्यक्तित्व की छवियां, उसकी गरिमा वे आज भी महसूस कर सकती हैं। जैसा कि नाटक का एक संवाद कहता है, अमृता पांच दरियाओं की बेटी थीं। मंच पर ऐसा शख्सियत को पेश करना वाकई एक बड़ी चुनौती है।

Saturday, June 11, 2011

मृत्यु के रूमान का नाटक

चेतन दातार हिंदी और मराठी के प्रखर रंगकर्मी थे। सन 2008 में मात्र 44 साल की उम्र में उनका आकस्मिक निधन हो गया। निधन से पूर्व 'राम नाम सत्य है' शीर्षक यह प्रस्तुति उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के लिए निर्देशित की थी। प्रस्तुति के सभी प्रमुख पात्र किसी अस्पताल या आश्रमनुमा जगह में रह रहे एचआईवी एड्स से ग्रसित मरीज हैं। आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा में वे बचे-खुचे जीवन के लिए खुशियों के जुगाड़ ढूंढ़ रहे हैं। दो पात्र दिल को बहलाने वाली नितांत हवाई किस्म की बातें किया करते हैं। मैंने वह फार्म हाउस खरीद लिया, सीधी फ्लाइट से उतरते हैं, वगैरह। आश्रम का सबसे 'जीवंत' पात्र गोपीनाथ अपनी जीवनगाथा सुनाता रहता है, जिसमें वो बहुत ऊंचे इरादे रखने वाला अतिआत्मविश्वास से परिपूर्ण एक नौजवान हुआ करता था। अपने आत्मविश्वास में उसने एक उद्योगपति की बेटी से प्रणय निवेदन किया, घर-बार छोड़कर सड़कछाप मवाली की सी जिंदगी चुनी, और आखिरकार एक हसीना के धोखे में एड्स का तोहफा मिला। मरीजों की जिंदगी का यथार्थ और गोपीनाथ की बीती जिंदगी की हास्यपूर्ण स्थितियां प्रस्तुति को ब्लैक कॉमेडी का दर्जा देती हैं। उसमें कुछ-कुछ अंतराल के बाद कोई-कोई मरीज गिरकर मौत का शिकार होता है। उनके चेहरे शरीर में पसरती मौत की वजह से काले हो गए हैं। शरीर में यहां-वहां घुसी टेप से चिपकी नलियों हैं। मंच सज्जा की कोई कवायद नहीं है, पर एक स्ट्रेचर है जिसपर बैठकर गोपीनाथ अपनी कहानी सुनाता है। इसके अलावा पीछे लगी स्क्रीन पर अस्पताल, ऑपरेशन वगैरह के दृश्य लगातार दिखाई देते रहते हैं। जब गोपीनाथ कहानी सुनाता है तो रोशनी का फोकस बदल जाता है दर्शकों को एक ज्यादा चुस्त-स्मार्ट युवा गोपीनाथ दिखाई देता है।
निर्देशक चेतन दातार ने इसे मौत नहीं जीवन का नाटक बताया है। पर ऐसा कहने की कोई स्पष्ट वजह नजर नहीं आती। हो सकता है उनके पात्र अपनी मौत को भुलाए रख पाने की वजह से जीवंत हों, पर दर्शक के लिए ऐसा नहीं है। प्रस्तुति इतने कोण से मौत को दिखाती है कि ऊब होने लगती है। यहां तक कि मर-मर कर गिरते पात्रों के अलावा ऑपरेशन थिएटर के भीतर की चीरफाड़ के क्लोज वीडियो दिखाए जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये सब दृश्य पात्र के प्रति करुणा पैदा करते हों। इसके लिए पात्र और दर्शक का जरूरी हार्दिक तदात्म प्रस्तुति कभी भी नहीं बना पाती। गोपीनाथ के बीते जीवन के दृश्य दर्शक से उसका जुड़ाव बना पाने के बजाय कॉमिक रिलीफ ज्यादा लगते हैं। प्रस्तुति देखते हुए लगता है जैसे उसका पूरा विधान इस अवधारणा के तहत हो कि मृत्यु अपने में ही करुणा का विषय है और उसे भुलाए रखना जीवंतता की सबसे बड़ी वजह। वैसे भी भारतीय परंपरा में गंगा स्नान के बाद मृत्यु ही ऐसी चीज है जो मनुष्य को पवित्र बना देती है। इस अर्थ में हृषिकेश मुखर्जी की आनंद के स्यापे की रूमानियत को यह प्रस्तुति एक दारुण दृश्यात्मक फैलाव तक ले जाती है। बाकी मृत्यु के विषाद का वितंडा वैसा ही है। प्रस्तुति की एक अन्य सीमा यह है कि वह नाटकीय दृश्य बनाने के बजाय साहित्यिक किस्म की लच्छेदारी में ज्यादा उलझी हुई है। दरअसल यह प्रस्तुति से ज्यादा आलेख की समस्या है। गोपीनाथ बताता है- 'धूम्रपान हमारे यहां खानदानी जुनून रहा है' या घर छोड़ते वक्त उसका बयान 'आपकी जेब से 250 रुपए और जयललिता की फोटो ले जा रहा हूं', 'आपका पथभ्रष्ट पुत्र' आदि। यानी ऐसी भाषा जिसमें जुमले की चमक तो है, पर दृश्य के लिहाज से कोई पेंच नहीं है। वैसे इनके अलावा प्रस्तुति के मिजाज का थोड़ा अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि उसमें कजरारे कजरारे, ईचक दाना बीचक दाना से लेकर बीड़ी जलइले आदि स्वर भी बीच-बीच में सुनाई देते हैं। कुछ लोकधुनें और उसी माहौल के दृश्य भी हैं। और आखिर में -'इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें, शिवजी का नाम ले लूं'। यानी रंगमंचीयता के नाम पर कई तरह की चीजें प्रस्तुति में शामिल है। गोपीनाथ एक मौके पर एक सैद्धांतिक पंक्ति भी बोलता है कि हमारे जीवन में 99 प्रतिशत के जिम्मेदार हम खुद होते हैं। काश यह प्रस्तुति इसी वाक्य पर तैयार किसी कथानक पर आधारित होती!

सख्त रंगों का स्थापत्य

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की मौजूदा प्रस्तुतियों में लिटिल बिग ट्रैजेडीज का डिजाइन बिल्कुल अलग तरह का है। इसके लेखक और निर्देशक दोनों रूस के हैं। अलेक्सांद्र पुश्किन के 180 साल पुराने इस आलेख में कुल तीन
कहानियां हैं। तीनों कहानियां मंच पर बने एक विशाल आकार में घटित होती हैं। तंबू या चोगेनुमा इस आकार के शीर्ष पर एक जालीदार मुखाकृति है, जिसपर अलग-अलग मौकों पर कुछ खास कोणों से पड़ती रोशनियां एक विचित्र रहस्यात्मक प्रभाव पैदा करती हैं। हवा में लटके हाथों सहित यह दानवाकार अपने में ही एक दृश्य है। हर कहानी में एक निश्चित रंग के लपेटे या ओढ़े हुए प्रायः एक वस्त्रीय कास्ट्यूम में पात्रगण इस जड़वत दृश्य में गति पैदा करते हैं। धोखे, कपट और हिंसा की स्थितियों में मंच पर फैला लाल, नीला, या सलेटी प्रकाश उसे एक संपूर्ण रंग-दृश्य बनाते हैं। पौने दो घंटे की प्रस्तुति में यह दृश्य किंचित एकरस भी हो सकता है। निर्देशक ओब्ल्याकुली खोद्जाकुली इस एकरसता को तोड़ने की कई युक्तियां अपने विन्यास में शामिल करते हैं। एक मौके पर एक कमंडल से अनवरत धुआं निकलता दिखता है। एक अन्य दृश्य में आकार के सिरे से लटकी जलती मोमबत्तियों से भरी तश्तरी टेढ़ी हो जाती है और उससे कपटी डॉन जुआन पर छोटे-छोटे नीले-गुलाबी कंकड़ गिरने लगते हैं। प्रस्तुति की तीनों कहानियां- 'मोजार्ट और सैलिएरी', 'द स्टोन गेस्ट' और 'द फीस्ट ड्यूरिंग द प्लेग' यूरोप की प्रसिद्ध दंतकथाओं पर आधारित हैं। पुश्किन उनके द्वंद्व को 'नाटकीय कार्य-व्यापार के जरिए एक मुकम्मल ट्रैजेडी' की शक्ल देते हैं। पहली कहानी संगीतकार सैलिएरी द्वारा मोजार्ट की प्रसिद्धि और प्रतिभा से ईर्ष्या के फलस्वरूप उसे जहर देने की घटना पर आधारित है। घटना को अंजाम देने के बाद सैलिएरी अपनी वहशत में मानो खुद से सवाल करता है कि 'कौन कहता है कि प्रतिभा और अपराध का कोई मेल नहीं? वेटिकन का नक्शा तैयार करने वाला हत्यारा था।' दूसरी कहानी का मुख्य पात्र डॉन जुआन एक औरतबाज है। पुश्किन से पहले सामान्य तौर पर उसे कॉमेडी या प्रहसनात्मक तौर पर चित्रित किया जाता रहा, लेकिन पुश्किन के यहां अपनी आत्मलिप्तता में वह खलनायक के तौर पर पेश होता है। वह एक रईस का बेटा है जो सेनापति की हत्या के बाद मिले देशनिकाले के
दौरान छिपकर अपनी पुरानी प्रेमिका लारा से मिलने आया है। लारा के यहां वह डॉन कार्लोस की हत्या करता है। हत्या के इस दृश्य में चार पात्र बड़े-बड़े परातों को डंडी से एक लय में पीटते हैं। पीटने की रौद्र ध्वनि और गति के बीच पीछे की ओर लड़ाई और हत्या का दृश्य कुछ और भीषण होकर घटित होता है। डॉन जुआन की मुलाकात सेनापति की अनिंद्य सुंदरी विधवा डोन्यना से भी हो चुकी है, जिसे उसने अपना नाम डिएगो बताया है। वह उसपर आसक्त है, और उसकी निर्लज्जता बिल्कुल साफ दिखाई देती है। वह अपने मिलन के दौरान फादर की पत्थर की मूर्ति को आमंत्रित करता है। दर्शक देखते हैं उसकी बेशर्मी के इस क्षण में अचानक मंच के विशालकाय आकार में कोई जुंबिश होती है। विशाल आकार का हाथ अकस्मात कुछ नीचे खिसक आया है। नाटक की गति में यह खिसकना असाधारण है। यह रंगभाषा पूरी स्थिति में एक स्तब्धता भर देती है। तीसरी कहानी अपनी
प्रतीकात्मकता में किंचित उलझी हुई है। प्लेग के समय में मौत को चुनौती देने के लिए एक पार्टी हो रही है। जिसमें मौत का शिकार बने एक व्यक्ति को याद किया जा रहा है। एक पात्र मेरी को उसमें गीत गाना है। जश्न के मौके पर वह दुख का गीत गाती है। एक अन्य पात्र को किसी मृतक को ले जाती गाड़ी की आवाज सुनाई देती है। अपनी बेहोशी के बाद वह जानना चाहती है कि वह स्वर सच था या सपना। एक अन्य पात्र प्लेग के सम्मान में गाने का आग्रह करता है। प्रस्तुति में एक दृश्य है जिसमें पात्र गिलासें लिए हैं। वे उन्हें हिलाते हैं और उनमें से सिक्कों के खनकने की आवाज आती है। खास बात यह है कि गिलासों में मोमबत्तियां जल रही हैं। प्रस्तुति की रंगभाषा में इस तरह की युक्तियों का मिश्रण किंचित चमत्कार पैदा करता है। निर्देशक ओब्ल्याकुली खोद्जाकुली प्रोसीनियम के रंग-वैभव को एक मिजाज में बरतते हैं। वे एक पुरानी ट्रैजेडी को सख्त रंगों के स्थापत्य में पेश करते हैं। ये सख्त रंग उन तीखी भावनाओं को व्यंजित करते हैं, जो किसी ट्रैजिडी का आधार होते हैं। चीजें इसमें ठूंसी हुई न होकर एक सिलसिले में पाठ की संवेदना का विकास और विस्तार करती हैं।

Saturday, May 14, 2011

कोर्ट मार्शल और सबसे बड़ा सवाल

कोर्ट मार्शल पिछले दो दशकों में हिंदी थिएटर में सबसे ज्यादा खेला गया नाटक है। वह यों तो स्वदेश दीपक की रचना है, पर उसका रंगमंचीय संस्कार रंजीत कपूर ने किया था। उनके निर्देशन में पीयूष मिश्रा और गजराज राव जैसे अभिनेताओं के साथ वह पहली बार 1991 में खेला गया था। तब से विभिन्न थिएटर ग्रुप लगातार उसे खेल रहे हैं। इधर रंजीत कपूर ने इसकी एक नई प्रस्तुति तैयार की है। लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादेमी के छात्रों के लिए निर्देशित इस प्रस्तुति का श्रीराम सेंटर में मंचन किया गया। 'कोर्ट मार्शल' की विशेषता है कि वह दर्शक को मोहलत नहीं देता। वह हमारी दलिद्दर सामाजिकता का एक युक्तिपूर्ण और डि-रोमांटिसाइज्ड पाठ है। उसकी यह विशेषता है कि दलित विमर्श की अत्युक्तियों के बगैर वह ऐसी सही जगह चोट करता है कि बिलबिलाते वर्णवाद को खुद ही अपना चोगा फेंककर नंगा हो जाना पड़ता है। यह नाटक कला में विचार की तार्किक एप्रोच का भी एक अच्छा उदाहरण है। सच को छुपाना एक बात है, उसके प्रति उदासीन रहना दूसरी। रामचंदर का वकील विकाश राय जब पर्त दर पर्त इस उदासीनता को उघाड़ता है, तो वहां एक बड़ा भारी अन्याय छिपा नजर आता है। पूरा नाटक एक ही दृश्य संरचना में संपन्न होता है। अपनी नाटकीय गति, विषय की सामयिकता, न्यूनतम मंचीय तामझाम और अभिनय की प्रचुर संभावनाओं की वजह से किसी भी रंगकर्मी के लिए यह एक आदर्श नाटक कहा जाएगा।
रामचंदर ने अपने अफसर की हत्या की- यह एक साबित तथ्य है। लेकिन विकाश राय के लिए महत्त्वपूर्ण है कि हत्या क्यों की गई। इस 'क्यों' को सुलझाने में खुद रामचंदर तक की कोई दिलचस्पी नहीं। लेकिन विकाश राय की है, क्योंकि उसके पिता जज हैं और एक भाई नक्सलवादी था। नाटक में सच के उदघाटन के ढांचे की प्रामाणिकता उसकी एक बड़ी सफलता है। अतीत में विजय तेंदुलकर ने 'खामोश अदालत जारी है' में सच के क्रमिक उदघाटन के एक ऐसे ही कथानक के लिए एक बनावटी स्थिति का उपयोग किया गया था, जबकि जे बी प्रीस्ले के 'एन इंस्पेक्टर काल्स' का सच अपनी सायास नैतिकता की वजह से प्रामाणिक मालूम नहीं देता। लेकिन यहां सच तक पहुंचने के इच्छुक विकाश राय के बरक्स सुनवाई का मुखिया कर्नल सूरत सिंह एक अनुशासन प्रिय अफसर है। अपने अनुशासन में वह चीजों को सुसंगत तरह से बरतने का आदी है। सुनवाई के सही दिशा में जाने का यह एक तार्किक आधार है। इसके अलावा रंजीत कपूर का मंच कौशल इस प्रस्तुति में एक बार फिर अपनी सटीक चुस्ती के साथ दिखता है। उनके गठन में कुछ ऐसा है कि दर्शक के पास दृश्य से परे जाने की कोई मोहलत नहीं होती। शायद यह पाठ के तनाव में है, या पात्रों के अभिनय में, या दृश्यों की गति में, संगीत में या इन सबके समुच्चय में। मेकअप की कमी अलबत्ता जरूर दिखाई देती है। जैसे कि कर्नल सूरत सिंह बने प्रदीप भारती अपनी शक्लो सूरत में किरदार से कहीं ज्यादा युवा लगते हैं। कई जगह अंडरप्ले आदि चूकें भी दिखती हैं, पर पूरी प्रस्तुति के स्तर पर वे खुद ब खुद नजरअंदाज होकर रह जाती हैं। विकाश राय की भूमिका में आलोक पांडे में अच्छी एनर्जी थी, जबकि बीडी कपूर बने मनोज शर्मा अपनी देहभाषा में प्रभावित करते हैं।
इससे पहले रंजीत कपूर के ही निर्देशन में एक लघु प्रस्तुति 'सबसे बड़ा सवाल' का भी मंचन किया गया। मोहन राकेश लिखित यह एक हास्य नाटक था। लो ग्रेड वर्कर्स सोसाइटी की मीटिंग हो रही है। लेकिन समूची मीटिंग कई विषयांतरित नुक्तों और आपत्तियों में ही अटक कर रह जाती है। जैसे कि 'भाइयो और बहनो' नहीं 'बहनो और भाइयो' होना चाहिए, कि संस्था का नाम विदेशी भाषा अंग्रेजी में न होकर हिंदी में होना चाहिए, कि असल में संस्था का नाम निम्न स्तर कर्मचारी समाज निम्न शब्द की वजह से मंजूर नहीं किया जा सकता, वगैरह। कर्मचारियों के हितों की मांग अचानक निम्न शब्द की व्याख्या में आकर अटक जाती है। एक सदस्य बताती है कि निम्न शब्द के दो अर्थ हैं- हीन और न्यून। इनमें से कौन सा मंजूर किया जाए। कई लाउड किरदार प्रस्तुति में लगातार एक चुहुल की वजह बने रहते हैं। मीटिंगों का समाजशास्त्र प्रस्तुति में बहुत अच्छी तरह व्यक्त हुआ है। सफाई करने वाले रामभरोसे और श्यामभरोसे राजेश और अभिषेक का अभिनय चरित्रों की दिलचस्प रंगत लिए था। कोर

अभिनय में एक दृश्य था

रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'क्षुधित पाषाण' याकि भूखे पत्थर की प्रस्तुति बुधवार को संगीत नाटक अकादेमी के मेघदूत प्रेक्षागृह में की गई। आलोक चटर्जी के एकल अभिनय वाली इस प्रस्तुति का आयोजन अकादेमी की कार्यक्रम श्रृंखला रवींद्र प्रणति के अंतर्गत किया गया। क्षुधित पाषाण में कहानी के भीतर एक कहानी है। कहानी सुना रहा नायक रूई का महसूल वसूलने वाला एक इंस्पेक्टर है। उसे बरीच नाम की एक सुरम्य जगह पर तैनाती मिली है। यह कहानी यहीं के एक जनशून्य प्रासाद की है, जहां उसे रहना है। प्रासाद के कर्मचारी दिन में तो उसकी सेवा को तत्पर हैं लेकिन शाम के बाद वे वहां नहीं रुकना चाहते। अकेले नायक को यहां कुछ ऐसा अदभुत देखने को मिलता है कि 'दिन की शाला पर एक दीर्घ कृष्ण यवनिका' के घिरते ही वह इसमें घिरने लगता है। रुकने के पहले रोज ही उसे कुछ रमणियां नजदीक से गुजरती दिखती हैं और फिर पानी में छपाक-छपाक के स्वर। और दिखती है अभिसार की प्रतीक्षा में एक अरब देश की तरुणी। नायक को लगा मानो यह अवास्तविक व्यापार ही जगत का एक मात्र सत्य हो। कि यथार्थ में साढ़े चार सौ रुपए पाने वाला रूई का महसूल इंस्पेक्टर श्रीमान का पुत्र मैं श्रीयुत...वगैरह एक भ्रम हो। अगले रोज प्रासाद के रहस्य में बंधा नायक खुद को रोक नहीं पाया। सीढ़ियां उसे एक कक्ष में ले गईं। अहर्निश ध्वनित होते उस विशाल जनशून्य कक्ष के बाद एक और कक्ष उसे दिखा, जहां अरब वेश की तरुणी उसे फिर दिखाई दी, और दिखाई दिया नंगी तलवार लिए खड़ा एक हब्शी। फिर उसने अपनी शैया के नीचे उसी रमणी का स्पष्ट अनुभव किया। यह सब क्या है! 'तफात जाओ....सब झूठ है'- हैरान नायक को महल के बाहर पागल मेहर अली के स्वर सुनाई देते हैं। पूछने पर वह कुछ नहीं बता पाता। लेकिन दफ्तर के बूढ़े क्लर्क करीम खां ने उसे बताया कि मेहर अली एकमात्र शख्स है जो महल में तीन दिन से ज्यादा रहने के बावजूद बच गया। ढाई सौ साल पहले महमूदशाह द्वितीय के बनवाए इस महल को लेकर नायक की बेचैन बढ़ती जा रही है। उसे पता चला कि महमूदशाह ने यह महल अपने भोगविलास के लिए बनवाया था। हर रोज यहां भोगविलास की महफिलें जुटतीं। वक्त बीता। महमूदशाह नहीं रहा, न महफिलें, पर उसके भोग की क्षुधा यहां के पत्थरों में बची रह गई। उसी भोगलिप्सा के कारण यह प्रासाद क्षुधित है, यह यहां हर रहने वाले को फाड़ खाना चाहता है।
कहानी यहां खत्म नहीं हुई। नायक उसके अहम सिरे को बताने को तत्पर है। सुना रहा नायक और सुन रहा लेखक दोनों रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं, कि तभी नायक की ट्रेन आ जाती है। उत्सुक लेखक को मन मसोस कर रह जाना पड़ता है। नायक जा चुका है। कहानी में फिर क्या हुआ, क्या हुआ होगा महल में- यह अब कैसे पता चले। कि तभी लेखक को समझ आता है कि अरे यह तो एक कपोलकल्पना थी। समय काटने का एक बहाना। एक किस्सा।
आलोक चटर्जी हिंदी रंगमंच के सबसे अच्छे अभिनेताओं में से एक हैं। स्पीच का वैभव देखना हो तो उनकी यह प्रस्तुति जरूर देखनी चाहिए। वे तत्सम भाषा को एक रंगमंचीय औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं और स्वर के उतार-चढ़ावों से दृश्य बनाते हैं। क्लर्क करीम खां पान खाए हुए बोलता है। कुछ स्थितियों में लगभग फुसफुसाहट से रहस्य का एक दृश्य बनता है। इस तरह भाषा जो दृश्य बनाती है आलोक चटर्जी उस भाषा के वाचिक रूप को ज्यादा दृश्य-सक्षम बनाते हैं। तरह-तरह की स्थितियों से गुजर रहा नायक पसीना-पसीना है, या मोहाविष्ट है या आसक्त या डरा हुआ और उत्तेजित। मंच पर एक गुलदान, एक मेज और एक शैया। आलोक इस स्पेस के बीच टहलते हुए अपने किरदार को अंजाम देते हैं। कहीं कोई अतिरिक्त नाटकीयता नहीं। हालांकि रोशनी के कुछ कल्पनाशील वृत्त प्रस्तुति को अधिक आकर्षक बना सकते थे। लेकिन उनके बगैर भी पूर्णतः अभिनय आधारित यह एक बेहतर प्रस्तुति थी। प्रस्तुति का लाइट डिजाइन शोभा चटर्जी का था।

कलावाद की कवायद

हिंदी थिएटर में हर कोई प्रभावात्मक किस्म के प्रयोग करने पर उतारू है। युवा रंगकर्मी राजकुमार रजक निर्देशित इलाहाबाद के थिएटर ग्रुप एक्स-ट्रा की प्रस्तुति 'सूरज का सातवां घोड़ा' कुछ इस तरह की है कि उसमें इस उपन्यास की जगह कोई भी कविता, कहानी, उपन्यास, आख्यान फिट किया जा सकता है। प्रस्तुति नैरेटिव का कोई प्रकार पेश नहीं करती, क्योंकि नैरेटिव का यहां कोई मूल्य ही नहीं है। वह एक दृश्यात्मक कलावाद में नौकर की तरह मौजूद है। एक जैसी पोशाक में छह अभिनेता मंच पर किसी शास्त्रीय ऑपेरा जैसे दृश्य निर्मित करते हैं। ये देहगतियों की लय से बनने वाले दृश्य हैं। इनमें कास्ट्यूम और प्रकाश योजना के रंग हैं। बुल्ले शाह के बोलों की सूफियाना रंगत से लेकर केसरिया बालमा आवो मोरे देस तक के आलाप हैं। दो लाठियों को पालकी में बदल देने जैसी दृश्य युक्तियां हैं। तरह-तरह की बुदबुदाहटें हैं। लेकिन कुछ नहीं है तो पाठ का संप्रेषण। प्रस्तुति के डिजाइन में संप्रेषण किसी प्रयोजन की तरह नजर ही नहीं आता। पूरी प्रस्तुति एक वायवीयता की शिकार मालूम देती है। उसके प्रभावात्मक प्रयोग में उपन्यास का एक सहयोगी इस्तेमाल भर हो ऐसा भी नहीं है, क्योंकि पूरा उपन्यास पात्रों द्वारा मंच पर नैरेट किया जाता है। प्रस्तुति में निर्देशक की रंग-प्रतिभा, कलाकारों का परिश्रम और काफी ऊंचे दर्जे का संगीत पक्ष स्पष्ट दिखाई देते हैं। लेकिन एक नकलची किस्म का प्रस्तुति आइडिया उनको उनकी वास्तविक ऊंचाई तक पहुंचने नहीं देता।
एक अन्य प्रस्तुति मनीष मित्रा निर्देशित 'बिफोर द जर्मिनेशन' में एक अन्य प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह है स्थितियों के मर्म तक पहुंचता दिखने के लिए उन्हें ज्यादा ऐंद्रिक बनाना। प्रस्तुति ओरियाना फैलासी के अ लेटर टु अ चाइल्ड नेवर बॉर्न से प्रेरित है, जिसमें एक मां अपने गर्भस्थ शिशु से बात करती है और मां का बयान सुनने के बाद शिशु जन्म लेने से इनकार कर देता है। प्रस्तुति के शुरू में ही पीछे लगी स्क्रीन पर खजुराहो की इरोटिक मूर्तियों की छवियां दिखती हैं, फिर संभोग की स्थिति को दर्शाने वाला एक 'कलात्मक' दृश्य और फिर बलात्कार की हिंसा और और फिर नायिका का विलाप की ऊंचाई तक पहुंचता रुदन। मंच के एक छोर पर लाल कपड़े के घेरे में एक घड़ा, बीच के छोर पर आग और नरमुंड, अस्थि आदि। तंत्र साधना जैसे इस दृश्य के समांतर पीछे की स्क्रीन पर स्वस्तिक का निशान उभरता है और 'वैष्णव जन तो तेने कहिए..' के स्वर। मंच पर अक्सर दिखते गहरे रंग एक उत्तेजक भाव की व्यंजना करते मालूम देते हैं। निर्देशक मनीष मित्रा के मुताबिक 'यह प्रस्तुति महज एक नाटक नहीं है। यह सामाजिक विक्षोभ को दिखाने वाला एक आंदोलन है। और हमारे उद्देश्य और विरोध के स्वर को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम भी।'
सुमन मुखोपाध्याय निर्देशित रवींद्रनाथ टैगोर के नाटक 'बिसर्जन' की प्रस्तुति की सेट सज्जा में भी हिंसा और रौद्र भावों की अच्छी व्यंजना थी। मंच पर एक विशाल उठा हुआ पैर बना हुआ है जिसके लाल तलवे अलग से ध्यान खींचते हैं। एक ढलवां प्लेटफॉर्म प्रस्तुति की कई स्थितियों का केंद्र है। कई मौकों पर इसके नीचे गहरी लाल रोशनी उपर्युक्त भाव को और प्रबल बनाती है। विषय को देखते हुए यह निश्चित ही एक उपयुक्त मंच संरचना है। नाटक का विषय भी एक हिंसा पर ही केंद्रित है। राजा ने देवी को पशुबलि पर प्रतिबंध लगा दिया है। पुजारी रघुपति लोगों को राजा की इस आज्ञा के खिलाफ करने में लगा है। इस सिलसिले में कई तरह के एक्शन भी मंच पर देखने को मिलते हैं। रघुपति की भूमिका में गौतम हाल्दार प्रस्तुति में दमदार थे।

Sunday, May 8, 2011

हाथरस शैली का रस

भोपाल के रवींद्र भवन में बीते सप्ताह नौटंकी-उत्सव का आयोजन किया। राज्य के संस्कृति संचालनालय के इस आयोजन में हाथरस शैली की नौटंकियां पेश की गईं। कानपुर शैली की तुलना में हाथरस शैली को गायकी प्रधान माना जाता है। बगैर स्वर को तोड़े लंबे-लंबे आलापों की गलेबाजी का इसमें काफी महत्त्व है। कई दृश्यों में अभिनेतागण इस हुनर का मुकाबला जैसा करते नजर आते हैं। कोई तय नहीं कि इस मुकाबले में गौण किरदार मुख्य किरदार से बाजी मार ले जाए। उत्सव के पहले दो दिन मथुरा के स्वस्तिक ग्रुप ने 'अमरसिंह राठौर' और 'हरिश्चंद्र तारामती' प्रस्तुतियां कीं। अमरसिंह राठौर बादशाह शाहजहां का बहादुर सिपहसालार है, जिससे 'राजपूतों का दुश्मन' वजीरेआला सलावत खां रंजिश पाले हुए है। अमर सिंह अपनी दुल्हन का गौना कराने दरबार से छुट्टी पर गया है। रास्ते में उसे प्यास से बेहाल एक पठान मिलता है। पानी पिलाने से वह अमर सिंह का मुरीद और दोस्त बन जाता है। उधर लौटने में देरी पर अमर सिंह पर साढ़े सात लाख रुपए जुर्माना लगा दिया गया है। लेकिन सवाल है कि जुर्माना वसूल कौन करे। गंवई अतिशोयक्ति की हद यह है कि नायक की नंगी तलवार से बादशाह भी डरता फिर रहा है। नायक एक ओर इतना जांबाज दूसरी ओर इतना भावुक भी है कि पत्नी हाड़ी रानी के इसरार ने उसे लाचार कर दिया है। 'इधर प्यारी का प्यार है उधर रजपूती शान, आह भला मैं क्या करूं हे मेरे भगवान'। प्यारी जुर्माना भरने के लिए अपना नौ करोड़ का हार देने को तैयार है, पर अमर सिंह के गुरूर को यह मंजूर नहीं। ऐसा वीर सैनिक आखिर मारा जाता है अपनों की ही दगाबाजी से। दोस्ती और बदले की कुछ और तफसीलों में पठान दोस्त और सलावत खां भी मारे जाते हैं और आखिर में बादशाह सलामत इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि 'न हिंदू बुरा है न मुसलमान बुरा है, आ जाए बुराई पे तो ये इंसान बुरा है'। प्रस्तुति के निर्देशक संदीपन नागर आधुनिक थिएटर से भी जुड़े हुए हैं, इसलिए उनकी प्रस्तुति में एक परिष्कार देखा जा सकता था। वे हाड़ी रानी के विलाप को रंगमंचीय दृश्य की ऊंचाई पर ले जाते हैं। हाड़ी रानी ने चूड़ियां तोड़ दी हैं, उसके बाल खुले हैं। पति की मौत पर उसका हृदयविदारक क्रंदन एक गंभीर दृश्य बन गया है। संदीपन नागर नौटंकी के अनगढ़पन को कम करके उसे थीम पर ज्यादा फोकस करते हैं और साथ ही अभिनय की हर संभावना का पूरा उपयोग करते हैं। वे संवादों को नक्कारे और हारमोनियम के स्वरों में खो जाने से बचाते हैं। इससे विषयवस्तु की स्पष्टता बनी रहती है। वस्त्र विन्यास में चटकपन और प्रकाश योजना के जरिए भी वे दृश्य का प्रभाव बढ़ाने में सफल रहे हैं। पारंपरिक नौटंकी में संवादों की लंतरानियों को जिस बीच नक्कारा और हारमोनियम कुछ और ऊंचाई पर ले जा रहे होते हैं उस बीच इशारों में घटित होने वाला अभिनय एक दिलचस्प शै है। तकरार या मान मनौव्वल के घटित हो चुके दृश्य का यह 'एक्सटेंशन' मानो एक छाया-दृश्य होता है। संदीपन नागर ने इसका अच्छा इस्तेमाल किया है।
अगले दिन की प्रस्तुति हरिश्चंद्र तारामती में पारंपरिक नौटंकी के लटके -झटके अपने पूरे विस्तार के साथ मौजूद थे। हरिश्चंद्र परिवार की व्यथा-कथा को अंजाम देने में लगे मुनिवर से अचानक एक पात्र आकर कहता है कि कुछ लोक कलाकार उनका मनोरंजन करने की अनुमति चाहते हैं। और फिर दो लोक कलाकार स्त्रियां ठुमके लगाकर गाती हुई दिखाई देती हैं- 'मेरे बालम छोटे से नन्हें से, पान खिला दे मेरी जान'। मुनिवर हरिश्चंद्र से संकल्प में कुंजी और लगाम लेकर उनका सब कुछ ले चुके हैं, अब दक्षिणा में देने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा है। ऐसे में उन्हें काशी ले जाकर बेच दिया जाता है। हरिश्चंद्र तारामती भारतीय शुद्धतावादी मानस का एक विलक्षण आख्यान है। मुनिवर की कुटिलता से निस्संग हरिश्चंद्र अपने सत्य की रक्षा में सन्नद्ध है। नगर छोड़ने की मार्मिक स्थिति निकल चुकी, पैरों में छाले पड़े हैं, कंठ सूख चुके हैं पर तीनों प्राणियों की दृढ़ता में कोई कमी नहीं। तारामती कहती है- 'चाहे भूखे रहें चाहे प्यासे रहें, कैसे भी हों दुखों को उठाएंगे हम/ इनके कहने में जो तुम आओ पिया, सत्य न रहेगा खुदा की कसम'। नौटंकी में इस भीषण स्थिति के बरक्स कॉमिक रिलीफ का भी प्रबंध है। काशी में तीनों प्राणियों को खरीदने के लिए तरह तरह के खरीदार दिखते हैं। मारवाड़ का एक शख्स जो उन्हें खरीदने आया है उसे मुनिवर की भाषा समझ नहीं आ रही। वो तीन प्राणी को तीन पाव पानी समझता है और तीन मनुष्य को तीन मन भुस। तब मुनिवर उसी की भाषा में बताते हैं- एक बींदनी, एक मोठ्यार, एक तापड़। और फिर कहते हैं 'अब आया लैन पर'। इसी तरह एक खरीदार कहती है- 'हमें लेडीज चाहिए'। किसी दौर में रात भर चलने वाली नौटंकी को उपकथाओं से एक विस्तार मिलता था। पहली नौटंकी में पठान दोस्त की तरह यहां माली-मालन की उपकथा है।
कानपुरी शैली में जो रस बहरे तबील और नक्कारे की जुगलबंदी से बनता है हाथरस शैली में वह गलेबाजी की रागदारी से बनता है। बादशाह और मुनिवर बने मुन्ना मास्टर और रामसिंह बने अमरनाथ वर्मा इसके पारंगतों में शुमार किए जाते हैं। इनके अलावा हाड़ीरानी और तारामती बनीं सितारा देवी में भी गायकी और अभिनय की बड़ी प्रतिभा सहज दिखाई देती है। प्रस्तुति के निर्देशक मोहन स्वरूप भाटिया हैं। उनका कहना है कि नौटंकी को राष्ट्रीय ऑपेरा का दर्जा दिया जाना चाहिए।

Monday, May 2, 2011

राजस्थानी गोग स्वांग

कुछ अरसा पहले त्रिवेणी सभागार में हिंदी अकादमी की ओर से राजस्थानी गोग स्वांग का मंचन कराया गया। सांबर के राजा की इस कथा को मंच पर महबूब खिलाड़ी एंड पार्टी ने पेश किया। प्रस्तुति के लिए मंच पर सिर्फ तीन माइक खड़े कर दिए गए थे। पात्रगण इन्हीं के सामने खड़े होकर अपनी गायकी और अभिनय का मुजाहिरा करते हैं। स्त्री पात्रों में भी पुरुष ही हैं। राजस्थानी चटकीले रंग हर किसी की वेशभूषा में दिखाई देते हैं। स्वांग की विधा नाटक के ढांचे के साथ कैसे खेल करती है, यह प्रस्तुति उसका एक नायाब उदाहरण थी। एक कहानीनुमा कुछ है जिसके बीच लंबे-लंबे आलापों वाली गायकी और पारंपरिक नाच वगैरह भी चलते रहते हैं। स्वांग का नायक पगड़ी, मूछों, काजल, कटार वाला राजा गोप चवाण है। एक दिन उसके पास उसकी मौसीमां ने आकर कहा कि 'बेटे गोप चवाण मैं तेरी जगह पे अपने बेटों अर्जन और सर्जन को राज कराना चाहूं हूं।' लेकिन भांजे के बात न मानने पर उसने कहा 'आज से जैसे राम के लिए कैकेयी वैसे ही तेरे लिए मैं'। मौसी के बाद मां आई पर गोप चवाण नहीं माना। इस वाकये के बाद मौसीमां का बेटा सर्जन सिंह जाकर बादशाह सलामत से मिल लेता है। वो बताता है कि मायके जा रही गोप चवाण की बीवी बाई सा के पास दस लाख रुपए हैं। वो रुपए लूटकर बादशाह को दे देगा ताकि वो उसे राजा बनाने के लिए गोप चवाण से युद्ध करे। अपने इस इरादे पर अमल के लिए वो मायके जा रही बाई सा के पास जा पहुंचा और बोला- 'बाई सा मैं आपको लूटने को आया हूं। आप रकम दे दो, वरना मैं आपकी बेस्ती करूंगा।' क्षत्राणी बाई सा ने उसे रकम तो दे दी लेकिन साथ ही कह दिया- 'तू ले जा, पर याद रखियो, तीसरे से चौथे दिन का सूरज तू नहीं देख पाएगा।' यह किस्सा जाकर उसने गोप चवाण को सुनाया और बदला लेने के लिए भड़काया। पगड़ी पहने हुए गोप ने जब टोपी पहने बादशाह सलामत से इस बारे में दरयाफ्त की तो उसने कहा- 'चोर हमारे पेट में है'। लब्बोलुबाब यह कि कहीं पर युद्ध हुआ जिसका अंतिम दृश्य ही स्वांग में घटित होता है। गोप चवाण मोटा सा बेंत लिए खड़ा है जिससे वो बादशाह सलामत की ओर से लड़ने आए अपने ही भांजे को एक ही चोट में मार गिराकर युद्ध जीत लेता है। लेकिन जब गोप चवाण की मां को पता चला तो उसने कहा- 'तूने पालू भानजो को मार दियो पापी। चले जा मेरी आंख के सामने से।' इसके बाद गोप चवाण 12 साल तक जंगल में भटकता रहा।
स्वांग को देखते हुए लगता है कि जैसे अभिनय कोई मसला नहीं है। पात्रों को कहानी की एक लीक और मोटे तौर पर अपना किरदार मालूम है जिसके आधार पर वे अभिनय करने का स्वांग करते हैं। असली चीज है कहानी के छोटे-मोटे मसलों पर देर तक चलती गलेबाजी और उसे कुछ और जोरदार बनाते दो छोटे नक्कारे और हारमोनियम। ये मुद्दे बेहद मामूली हैं, जैसे कि बाई सा मायके जाए या नहीं, पर हाथरस शैली की नौटंकी से मिलती-जुलती गलेबाजी में देर तक उनपर बहस चलती है। हरियाणवी स्वांग की तुलना में राजस्थानी स्वांग ज्यादा उन्मुक्त मालूम देता है, क्योंकि सामाजिक नैतिकता के किसी संदेश का कोई बंधापन यहां नहीं है। अभिनय के लिहाज से अहम किरदार उसमें एक है- जो कभी हरकारा गोपाल बना हुआ है, कभी बादशाह का कारिंदा शकूर। दरअसल वो स्वांग का विदूषक है। उसके शरीर की लय देखते ही बनती है। बाद में वो शहर भटिंडा का एक मौलवी भी बना हुआ है। वह गोप चवाण को 'मोहम्मडन' बनाने के लिए उससे 'ला इल्लाह लिल्लिलाह रसूल लिल्लाह' बुलवाता है, और इस काम में बार-बार उसके नाकाम रहने पर आखिर उसे दी टोपी के जरिए उसे मोहम्मडन घोषित कर देता है। मंच पर सब कुछ इतना अनौपचारिक है कि नेपथ्य की ज्यादा जरूरत मालूम नहीं देती। जो पात्र माइक पर खड़ा है दृश्य में असल में वही पात्र है। बाकी पात्र उनके पीछे की जगह में टहलते या बैठे नजर आते हैं। बीच बीच में जरूरत के मुताबिक हारमोनियम साज भी मायके जा रही बाई सा के अंगरक्षक की भूमिका निभा कर वापस अपनी जगह पहुंच जाता है। लोक शैलियों की एक सहज तल्लीनता आम तौर पर प्रायोजित शहरी मंचों पर उस तरह बनी नहीं रह पाती। लेकिन स्वांग की इस प्रस्तुति के साथ ऐसा नहीं था। प्रस्तुति के आखिर में एक पात्र ने माइक पर यह भी बताया कि 'हमारा प्रोग्राम अब खतम हो गया है'।

Tuesday, April 5, 2011

कूड़ा एक शाप है

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति 'सोचो जब सब उल्टा हो' बच्चों का नाटक है। निर्देशक प्रसन्ना ने इसमें बढ़ते कचरे के सवाल को उठाया है। स्वीडिश लेखिका ऑस्ट्रिड लिंडग्रन की प्रसिद्ध बाल चरित्र पिप्पी लांगस्टॉकिंग्स इसकी केंद्रीय पात्र है। पिप्पी की मरहूम मां एक फरिश्ता बन चुकी है और पिता चंबल का बागी गब्बर सिंह था। अब पिप्पी शहर के ठाकुर विला में अपने तीन साथियों- एक भूत, एक बंदर और एक गधे के साथ रहती है। फिर पड़ोस में रहने वाले दो बच्चे भी उसके साथी बन जाते हैं। पिप्पी कचरा बीनने का काम करती है। नाटक में वेदव्यास और गणेश जी भी हैं। असल में गणेश जी ही पिप्पी के रूप में आकर मंच पर पूरा किस्सा बनाते हैं। एक दिन अपने ऊपर कूड़ा डाल दिए जाने से नाराज व्यास जी पिप्पी को शाप दे देते हैं कि वो जिंदगी भर कूड़ा ही बीनती रहेगी। शापमुक्ति का तरीका है कि सब लोग कूड़ा फेंकना बंद कर दें। नाटक में बहुत सारे पात्र और स्थितियां हैं। पिप्पी का सामना स्कूल मास्टर और उसे सुधार गृह भेजने पर उतारू पुलिस वालों से होता है। पर उसके और उसके साथियों के आगे किसी की एक नहीं चलती।
प्रस्तुति कचरे के अर्थशास्त्र की कोई कहानी नहीं बनाती, लेकिन उसका एक पात्र एक मौके पर सिर्फ जैविक कूड़े को मंजूरी की बात कहता है। ऐसा लगता है जैसे खेल खेल में तैयार प्रस्तुति में एक विषय को खोंस दिया गया है। इस खेल खेल में कभी भूत कमेंट्री करने लगता है, कभी पिप्पी आमलेट बनाती है। इसी तरह कभी भोंपू लिए सब्जपरी तो कभी पंजाबी बोलने वाली मैना मंच पर नमूदार होती है। पिप्पी के गधे और बंदर दोस्तों के नामों- घोड़ेश्वरप्रसाद छलांग और हनुमंत पिल्लै- में भी एक खेल है। प्रस्तुति के शुरू में सुतलियों वाली लंबी दाढ़ी लगाए वेदव्यास पिप्पी की कहानी बोलना शुरू करते हैं, जिसे गणेश जी लैपटॉप पर लिख रहे हैं। फिर मुखौटा उतारकर गणेश जी पिप्पी बन जाते हैं। प्रस्तुति में भले ही बात का सिलसिला बहुत चुस्त न हो, लेकिन कुछ स्थितियां अपनी छवि में काफी दिलचस्प हैं। पिप्पी स्कूल पढ़ने गई है, जहां बच्चे घेरा लगाकर बैठे हैं और मास्टर किसी अजीब भाषा में घूमघूम कर उन्हें पढ़ा रहा है। उसके हाथ में बेंत है जिससे वो थोड़े थोड़े समय बाद बच्चों की हथेली पर मारता है। स्कूल के दृश्य का यह एक अच्छा रेखांकन है। ऐसे ही पिप्पी को ले जाने आए पुलिसवाले भी काफी दिलचस्प किरदार हैं। कार्टून चरित्रों की तरह उनमें अपनी ही एक खींचतान चलती रहती है। वे अपने पुलिसिया किरदार को कवित्त में बयान करते हैं। इसी तरह पिप्पी के दोस्त बंदर के सिर पर जूड़ी की तरह एक सेबनुमा कुछ लगा हुआ है। वो वक्त जरूरत गिटार भी बजाता है। पिप्पी के पड़ोसी दोस्तों के अफसर बाप की छाती पर एक तख्ती डेस्क की तरह बंधी हुई है जिसपर वो जल्दी जल्दी कागजों पर साइन कर रहा है। कागज बढ़ाने वाले उसके असिस्टेंट की व्यस्त मुद्रा देखने लायक है। प्रसन्ना इस तरह स्थितियों के कैरिकेचर बनाते हैं। ऐसा ही एक कैरिकेचर स्कूल मास्टर का भी है। बच्चों के गायब हो जाने को लेकर उसके संदेह और आत्मग्लानि का इजहार अपनी अति में हास्य पैदा करता है। बच्चों की मां का भी कुछ ऐसा ही हाल है। प्रसन्ना इस तरह मानो स्थितियों के एक अपने अंतर्भूत हास्य को सामने लाते हैं।
प्रस्तुति में कथानक का कुछ और चुस्त होना बेहतर होता। मध्यांतर के बाद का हिस्सा इस लिहाज से कहीं अच्छा है। पूर्वार्ध में स्थितियां ज्यादा बिखरी हुई हैं और उनका कोई समेकित प्रभाव नहीं बन पाता। 'इंसान क्या जाने जूं का स्वाद' नुमा चुटकुलेबाजी को संपादित करने से इसमें थोड़ा कसापन आ सकता था। अभिनय की दृष्टि से मुख्य भूमिका में कल्याणी अपनी ऊर्जा से प्रभावित करती हैं, जबकि मास्टर बने वी उतो चिशी अपने हाव भाव से।

Monday, March 21, 2011

कस्तूरबा गांधी का जीवन

मुंबई के आविष्कार और कलाश्रय ग्रुप की प्रस्तुति 'जगदंबा' यूं तो कस्तूरबा गांधी के जीवन पर केंद्रित है, लेकिन अंततः उसके केंद्र में महात्मा गांधी ही दिखाई देते हैं। प्रस्तुति में तीन पात्र हैं लेकिन उसकी शक्ल एकालाप की है। मुख्य एकालाप में कस्तूरबा महात्मा गांधी के साथ अपने जीवन को बयान करती हैं और उनके बयान की संवेदना को ज्यादा प्रामाणिक बनाते दो सहयोगी एकालाप उनके पुत्रों- मणि और हरि- के हैं। यह एक पारंपरिक भारतीय स्त्री के संस्कार और उसकी उम्मीदों के बरक्स उसके आत्मोत्सर्ग की कथा है। प्रस्तुति इस उत्सर्ग का महिमामंडन करने के बजाय इसे यथार्थ की जमीन पर देखती है और ऐसे में कस्तूरबा के मन पर लगने वाली चोटें, खुद के साथ उनका समझौता और हालात के आगे झुकना बार-बार दिखाई देता है। प्रस्तुति की कस्तूरबा पति की शुद्धतावादी जिदों के आगे लाचार दिखाई देती हैं। सिद्धांत के धरातल पर सोचते पति के आगे उनकी व्यावहारिक बुद्धि की एक नहीं चलती। वे युवा हो रहे पुत्र और पड़ोस की लड़की में दूरी रखने की हिमायती हैं, लेकिन गांधी दूरी के बजाय संयम के कायल हैं। पुत्र मणि के संयम न रख पाने की सजा वे उपवास रखकर खुद को देते हैं। और पुत्र और पति दोनों को हुए कष्ट को कस्तूरबा झेलती हैं। अछूतों के लिए निषिद्ध जगन्नाथ पुरी के दर्शन पर उन्हें पति से लताड़ मिलती है। गांधी के लिए आश्रम के बच्चे ही अपने बच्चे हैं, लेकिन कस्तूरबा लाख चाहकर भी अपने बेटों के भविष्य की 'अतिरिक्त' चिंता से खुद को रोक नहीं पातीं। पति के कहने पर वे घर आए लोगों का पाखाना साफ करने को तैयार होती हैं लेकिन ईसाई हो चुके दलित की गंदगी साफ करना उनके संस्कार गवारा नहीं करते, पर पति के रौद्र रूप को देखकर उन्हें यह करना पड़ता है। पति के आंदोलन के लिए सारे गहने दे देने वाली बा उपहार में मिले एक महंगे हार को बहुओं के लिए सुरक्षित रखना चाहती हैं, लेकिन गांधी उसे बेचकर रकम को ट्रस्ट के काम में लगाना चाहते हैं। इतना ही नहीं, पति की ब्रह्मचर्य व्रत के दौरान होने वाली 'गलतियों' को सार्वजनिक करने की बात को भी कस्तूरबा समझ नहीं पातीं। किंचित उदासी में वे कहती हैं- 'मैंने न कभी हां कहा न ना। पर इन बातों को सार्वजनिक क्यों कहना!'
प्रस्तुति के दो अन्य बयान इस पहले बयान की तर्कभावना को कुछ और गाढ़ा करते हैं। कस्तूरबा को मलाल है कि हरिलाल अपने शुरुआती दिनों में गांधी के रास्ते पर चलकर कितनी बार जेल गया, पर जेल जाने से हर कोई गांधी नहीं बन जाता। वे कहती हैं- 'इन्हें' विलायत जाकर पढ़ने-लिखने-जानने का मौका मिला, तो ऐसा मौका हरिलाल को क्यों न मिले! प्रस्तुति में शराब की लत के शिकार, पत्नी-बच्चों के प्रति लापरवाह और धर्म परिवर्तन कर मुसलमान और फिर हिंदू बन जाने वाले हरिलाल के मन में मां को दिए दुख को लेकर गहरी कचोट है। लेकिन वहीं पिता के प्रति उनके शिकायती लहजे में एक असमंजस दिखाई देता है। इससे पहले ऐसी कुछ शिकायतें मणि के एकालाप में भी झलकती हैं। प्रस्तुति के अंत में कस्तूरबा उस मोहन को याद करती हैं जो अंधेरे से डरता था, और तब उनके डर को भगाने के लिए वे 'राम राम' का जाप करती थीं। अगले जन्म में वे पति के रूप में विराट छवि और सैद्धांतिक आग्रहों वाले महात्मा गांधी की तुलना में उसी मोहन को चाहती हैं।
मंच के बीचोबीच छोटा सा प्लेटफॉर्म है जिसपर चरखा, दीवार, कुर्सी आदि हैं। एक ही मंच सज्जा में करीब सवा दो घंटे लंबी प्रस्तुति में बगैर किन्हीं नाटकीय भाव भंगिमाओं और युक्तियों के यह कथ्य ही है जो दर्शक को बांधे रखता है। फिर भी पूरे प्रस्तुति डिजाइन में एक ऐसी सादगी है जो कथ्य के अनुरूप है। कस्तूरबा की भूमिका में रोहिणी हट्टंगड़ी मंच पर थीं। उनका अभिनय कस्तूरबा की छवि बनाता है जो प्रत्यक्षतः शांत है, पर जिसके अपने दुख और अनुराग हैं। अन्य दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत किरदारों में असीम हड्डंगड़ी भी गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।

Thursday, March 17, 2011

डार से बिछुड़ी

आख्यानमूलक साहित्यिक कृतियों पर नाट्य प्रस्तुति करने का प्रचलित तरीका यही है कि उन्हें संक्षिप्त करके उनके साहित्यिक कलेवर में ही प्रस्तुत किया जाए। लेकिन ऐसी प्रस्तुतियां रंगमंचीय तत्त्वों से रिक्त होने से अक्सर मंच के लिए सपाट भी साबित होती रही हैं। लेकिन उपन्यास 'डार से बिछुड़ी' के मंचन में ऐसा नहीं था। निर्देशकद्वय अंजना राजन और केएस राजेंद्रन ने कृष्णा सोबती के उपन्यास का मंच पर एक सांगीतिक रूपांतरण किया है, जिसमें उपन्यास के पात्र मुकम्मल चरित्रों के तौर पर नहीं बल्कि संकेतों के रूप में दिखते हैं। उन्होंने उपन्यास का संक्षेपण नहीं किया है, लेकिन कथावस्तु के विस्तार के लिहाज से स्थितियों को एक सांकेतिक दृश्य के तौर पर बरतने की विधि अपनाई है। हर स्थिति यहां समूचे विन्यास का एक विवरण मात्र है। उसकी कोई दृश्यात्मक स्वायत्तता नहीं है। वह मंच पर घटित नहीं होती, बल्कि प्रस्तुत की जाती है। इस प्रस्तुतीकरण में जो अभिनेता एक स्थिति में नायिका का हमदर्द शेख बना है, वही बाद में उसका सबकुछ छीन लेने वाला क्रूर बरकत। इस तरह निर्देशकगण एक साहित्यिक पाठ को दर्शक के लिए एक रंगमंचीय अनुभव में तब्दील करते हैं। प्रस्तुति का शैलीगत अभिनय यथार्थ की गहराई को मानो एक काव्यात्मक विस्तार में दिखाने की छूट लेता है। एक पात्र का जीवन यहां एक परिघटना की तरह प्रस्तुत होता है। बहुत सारे सांकेतिक दृश्यों के बीच एक मनुष्य का थोड़ा-बहुत बनता और बहुत कुछ टूटता दिखाई देता है।
उपन्यास 19वीं शताब्दी के स्त्री-जीवन की पुरुष-निर्भरता का एक पाठ है। उपन्यास की केंद्रीय पात्र पाशो के जीवन में निरंतर कुछ न कुछ त्रासद घटता रहता है। अपनी हर खुशी के लिए पाशो किसी पुरुष की मोहताज है। यहां तक कि पति की मौत के बाद उसका देवर उसकी हीं संपत्ति और घर-द्वार पर कब्जा करके उसे अपने किसी उधार को चुकाने के लिए बेच देता है। मुख्य भूमिका में खुद अंजना राजन और दक्षिणा शर्मा मंच पर थीं। वे दोनों स्थितियों को नैरेट भी करती हैं और कभी-कभी किसी अन्य किरदार को भी अंजाम देती हैं। मंच पर जितनी तेजी से स्थितियां बदलती हैं उतनी ही गति से दृश्य आकार ले लेते हैं। दृश्यों में से दृश्य निकलने का यह सिलसिला सतत चलता रहता है। इस क्रम में प्रकाश योजना, वाद्य-संगीत, आलाप, कोरस, शास्त्रीय नृत्य या नृत्य-भंगिमाओं आदि का भरपूर और कल्पनाशील ढंग से इस्तेमाल किया गया है। एक तरह की रंगमंचीय आलंकारिकता में उपन्यास मंच पर आकार पाता है, जिसमें दृश्य अपनी रंग-सज्जा में एक चाक्षुष प्रभाव बनाते हैं। हर दृश्य में बहुत से रंग हैं। लेकिन स्थितियां इसमें बहुत जल्दी से बीत जाती हैं और उनका वातावरण बहुत ठोस ढंग से मौजूद नहीं है। फिर भी वेशभूषा और दृश्य-युक्तियों से कथानक का प्रवाह और स्पष्टता निरंतर बने रहते हैं। पात्रों की वेशभूषा और मेकअप यथार्थवादी प्रस्तुतियों की तरह ही है। लेकिन प्रस्तुति के ढांचे में चरित्रों का स्पेस बहुत ज्यादा नहीं है। उधर मुख्य चरित्र का गठन ऐसा है कि उसे बार-बार नैरेट करने के लिए भूमिका से बाहर आना होता है। इस तरह अभिनय की यह लाक्षणिकता उपन्य़ास की कथात्मकता के समांतर अपनी रंगमंचीय लय से दर्शक को जोड़ती है। उसमें कई दृश्य नृत्य नाटिका की तरह के हैं। परदे की दीवार अचानक दरवाजे की शक्ल ले लेती है जिसमें से भौंचक्की नायिका एक नई स्थिति को सामने देखती है। घुड़सवार के आने का दृश्य, डोली में बैठने का दृश्य आदि भी इसी तरह के हैं। तबले के स्वर और युक्तिपूर्ण देहभाषा के जरिए ये दृश्य मंच पर आकार लेते हैं। प्रस्तुति की निर्देशिका और अभिनेत्री अंजना राजन भरतनाट्यम की दक्ष हैं। उनकी इस दक्षता का सहयोग भी प्रस्तुति को रहा है। वहीं सुधा रघुरामन के स्वर भी उसकी सांगीतिकता को ज्यादा प्रखर बनाते हैं। हालांकि दूसरी पाशो और मुख्य नैरेटर दक्षिणा शर्मा का किरदार के जीवन के अनुरूप मंच पर कुछ ज्यादा संजीदा दिखना बेहतर होता।
निर्देशकीय के मुताबिक निर्देशिका अंजना राजन को लगता है कि उनकी प्रस्तुति उपन्यास की कलात्मकता के साथ न्याय नहीं कर सकती। क्या इसलिए कि उनकी कलात्मकता उपन्यास से जुदा है? प्रस्तुति की मंचीय परिकल्पना में सह निर्देशक केएस राजेंद्रन की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। उनके दृश्य-विन्यास में वह बारीक संतुलन और प्रवाह दिखता है जिसके लिए उन्हें जाना जाता है।

Wednesday, March 16, 2011

ममताजभाई पतंगवाले

पिछले कुछ वर्षों के दौरान युवा आलेखकार और निर्देशक मानव कौल ने हिंदी रंगमंच में एक महत्त्वपूर्ण जगह बनाई है। हर साल दिए जाने वाले महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड (मेटा) के लिए इस साल उनके दो नाटक नामित किए गए। इनमें से एक 'ममताज भाई पतंगवाले' दो अलग-अलग वक्तों की कहानी है। करीब बीस-पच्चीस साल पहले गुजर चुके और हमारे आज के वक्त की। इस बीच समय की गति में कोई ऐसा पेंच रहा है कि व्यक्ति वो नहीं रहा जो वह था। यह बदला हुआ व्यक्ति पूरी तरह अन्यमनस्क है। वह चीजों में रस लेता हुआ दिखता है, लेकिन तत्क्षण ही हर रसास्वाद को भूल जाता है। वह फुर्तीला और स्मार्ट हो गया है, लेकिन उसमें अपने वक्त की कोई तल्लीनता नहीं है। वह फोन पर नया जोक सुनकर ठहाका लगाता है और लगभग भूल चुका है कि उसके बचपन में घर के पड़ोस में एक सच्चे पतंगबाज ममताज भाई थे। नाटक फ्लैशबैक में जाकर उस पूरे जीवन को याद करता है जिसमें ममताजभाई के अलावा अवस्थी मास्टर साहब, मां, बहन, दोस्त आनंद और इनके केंद्र में पतंगबाजी का दीवाना विकी हुआ करता था, जो मानता है कि ममताजभाई के बीवी-बच्चे नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो पतंगबाज हैं न! उधर परीक्षा की वजह से जब उसके बाहर निकलने पर रोक लगा दी जाती है तो ममताजभाई को भी पता है कि 'विकी पतंगबाज है, जरूर वापस आएगा'। यहां तक कि वो उसे ढूंढ़ते हुए उसके घर पहुंच जाते हैं। उस पुराने वक्त में गली में पतंग लूटने की होड़ लगी है। कंधे पर अपनी बहनों को बिठाए लड़के ऊंचे से ऊंचे जाकर पतंग लूट लेना चाहते हैं। विकी को मालूम है कि पतंग को काटने के लिए ममजातभाई ने जरूर कत्थई वाला मांजा लगाया होगा, जबकि उसके दोस्त आनंद को सद्दी और मांजे का फर्क भी ठीक से नहीं पता।
अब वर्षों के अंतराल के बाद विकी के पास उसी दोस्त आनंद का फोन आया है कि ममताजभाई बीमार हैं और उससे मिलना चाहते हैं। एक लंबी भूमिका के बाद दो वक्तों के मिलन का यह एक संवेदनशील दृश्य है। स्टेशन पर लेने आए दोस्त की साइकिल के कैरियर पर बैठा विकी देख रहा है कि बचपन की जगह में सब कुछ बदल चुका है। दृश्य में साइकिल अपने स्टैंड पर स्थिर है लेकिन पीछे परदे पर बहुत सी आकृतियां उभरती हुई दिखती हैं। एक बैल, एक पेड़, एक बटोही, एक साइकिल। अपने घर पर इस बीच बूढ़े और जर्जर हो चुके ममताजभाई में अब भी अपनी जल चुकी दुकान को फिर से खोलने की हसरत है। विकी उनसे मिलकर काफी बेचैन हो गया है। उसे कहीं कोई बदबू महसूस होती है, कहीं कुछ जलता हुआ। वह यहां नहीं रुक सकता। उसे खुद को रिलैक्स करने के लिए एक अदद लतीफे की दरकार है। स्टेशन पहुंचते ही वह अपने मुंबई के दोस्त को इसके लिए फोन करता है।
प्रस्तुति पूर्वार्ध में काफी बिखरी हुई है। इसकी वजह है कि मानव कौल स्थितियों को किसी यथार्थपरक तरतीब में बरतने के बजाय अतिनाटकीय मुहावरे की तरकीब में बरतते हैं। उसमें 'काइट इज फ्लाइंग' जैसे वाक्यों में अपना अंग्रेजी ज्ञान बघारते जोकर नुमा अवस्थी मास्टर साहब हैं, 'कैन आई गो फॉर सूसू' की इजाजत मांगते छात्र हैं और अपने किरदार के आपे से बाहर नजर आती मां है। इस दौरान मंच पर काफी अस्तव्यस्तता है, और इससे विषय की संवेदना पर एक निश्चित प्रभाव पड़ता है। इन दिनों इस तरह की किंचित एब्सर्ड दृश्य प्रणाली का ठीक से अनुशीलन न कर पाने के बावजूद उसे शैली की तरह इस्तेमाल करने का चलन काफी बढ़ गया है। हालांकि दृश्यों की अस्तव्यस्तता में एक ही किरदार में दो पात्रों के इस्तेमाल की एक अच्छी युक्ति ठीक से उभर नहीं पाई है। इस युक्ति में छोटे विकी के साथ एक बड़ा विकी भी दिखाई देता है। बड़ा विकी इसमें वो संवाद बोलता है जो छोटा विकी बोलना चाहता है। जैसे कि मां जब ममताजभाई को घर से चले जाने को कहती है तो बड़ा विकी कहता है- 'आपको बोलने की क्या जरूरत है, ये मेरे और ममताजभाई के बीच की बात है'। लेकिन पूर्वार्ध के बिखरेपन में आलेख की ये बारीकियां निष्प्रभावी ढंग से घटित होकर रह जाती हैं। प्रस्तुति को इस साल मेटा की नौ श्रेणियों में नामित किया गया, लेकिन उसे सिर्फ एक श्रेणी (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री) में ही पुरस्कार हासिल हो सका। जिन श्रेणियों में उसे नामित किया गया उनमें से एक कोरियोग्राफी की भी थी। मानव कौल पदचापों की धमक से एक दृश्य बनाते हैं। इस तरह वे अपनी शैली को कुछ चमकदार बनाने की कोशिश करते हैं। अभिनय की दृष्टि से आसिफ बसरा प्रस्तुति में काफी बेहतर थे।

Monday, March 7, 2011

नौटंकी शैली में ओथेलो


बीते दिनों अभिमंच प्रेक्षागृह में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति 'मौन एक मासूम सा' का मंचन किया गया। त्रिपुरारी शर्मा के निर्देशन में शेक्सपीयर के ओथेलो पर आधारित यह कथित रूप से नौटंकी शैली की प्रस्तुति थी। शैलीकरण के लिए त्रिपुरारी शर्मा ने अपने रूपांतरण में- वालिदा, खाबिंद, अब्बा हुजूर, शमशीर आदि- काफी उर्दू शब्दों का इस्तेमाल किया है। प्रस्तुति में बहरे तबील की लय को पकड़ने की कोशिश जरूर है लेकिन अक्सर उसमें तल्लीनता और मीटर की कमी दिखती है, और आधी अधूरी गलेबाजी रस-निर्माण के बजाय रसभंग ज्यादा करती है। पूरी प्रस्तुति में गढ़न बहुत स्पष्ट दिखाई देती है। डेस्डिमोना का नाम यहां दिव्या है, रोडरिगो का रुद्रो, इयागो का योग्या और कैसियो का मधुकर कश्यप। लेकिन नाम में कुछ नहीं रखा, शायद इसीलिए ओथेलो का नाम ओथेलो ही रहने दिया गया है। छंद की गढ़न के लिए उसे बार-बार जंगी कहा जाता है- 'नजर रखना जंगी अगर तेरी आंख देख सकती, धोखा दिया वालिद को तुझे भी दे सकती' या 'इधर आ जंगी मेरे, मौका है ये खास/ तहेदिल से देता तुझे, जो है पहले से तेरे पास'। इस तरह त्रिपुरारी शर्मा अपने आलेख में नौटंकी शैली के भदेस और लयकारी तक पहुंचने की चेष्टा करती हैं। लेकिन गढ़न की वजह से प्रस्तुति आखिरकार एक 'कंस्ट्रक्ट' होकर रह जाती है। आधुनिक थिएटर की सुविधाओं में भी वे शैली का कोई परिष्कार नहीं कर पातीं और अंततः दर्शकों के हाथ एक अधकचरा सा ढांचा ही लगता है। यहां तक कि कुछ दृश्यों में निर्देशिका अपने आधुनिकतावादी व्यामोह को भी नहीं छोड़ पाई हैं। एक दृश्य में ओथेलो और इयागो आपस में गुत्थमगुत्था हैं। इयागो ओथेलो के ऊपर लदा उसकी बांह मरोड़ता दिखता है। आधुनिक नाटक के हिसाब से वे प्रत्यक्षतः गुत्थमगुत्था नहीं हैं बल्कि ये उनके भीतरी चरित्र हैं। लेकिन नौटंकी के भदेस में आधुनिकता का यह फ्यूजन एक अटपटा प्रयोग ही कहा जाएगा।

पूरी प्रस्तुति मानो शैली का एक ढांचा बनाने की कोशिश में ही व्यतीत होती है। अगर शैली की कसरत को हटा दें तो अभिनय का स्तर प्रस्तुति में ठीकठाक है। खासकर दोनों मुख्य भूमिकाओं में प्रतीक श्रीवास्तव और कल्याणी मुले काफी बेहतर थे। लेकिन दिक्कत तब आती है जब वे बेतरतीब तुकबंदी वाले संवादों में देर तक उलझे पाए जाते हैं। संवाद का निबटना ही अपने में एक मसला बन जाता है और इस कवायद में शब्द और आशय भी धूमिल हो जाते हैं। नौटंकी की पारंपरिक प्रस्तुतियों में संगीत संवादों की क्षतिपूर्ति करता है। यहां ऐसा नहीं था। यह संगीत और आलेख का मिला-जुला व्यतिक्रम था। हालांकि शैली के मुहावरे पर आलेख में निश्चित ही काफी मेहनत की गई है, पर फिर भी उसका रस छूट गया है। कुछ बेहतर उदाहरण देखे जा सकते हैं- 'मुकद्दस सितारे तुम्हीं से, मैं क्या कहूं/ फिर भी बहाऊंगा नहीं मैं उसका लहू' या 'हर जुबान पर रहता मेरी नेकी का नाम/ वही छिन गया मुझसे आई कैसे ये शाम'। हालांकि पारंपरिक लय के इस एक पुराने उदाहरण से यह काफी भिन्न है- 'मांग ले इस घड़ी बीच दरबार में, मुझसे जिस चीज की तुमको दरकार हो/ सदके दिल से तुझे कौल हूं दे रहा, उसके देने में न मुझको इनकार हो'। प्रस्तुति में आंतरिक लय के बजाय शैलीकरण की कोशिश अलग से दिखाई देती है। उसमें थोड़ा ओथेलो है, थोड़ी बहुत नौटंकी शैली- लेकिन दोनों ही अधूरे-अधूरे हैं। यह दरअसल मिजाज का अधूरापन है, या शायद यही प्रस्तुति का मुहावरा है। मंच पर झरोखे, छज्जे और मुख्य द्वार वाला सेट काफी अच्छा था, जिसमें दाईं ओर से नीचे उतरती सीढ़ियां दिखती हैं। पेड़ों की बड़ी-बड़ी जटाएं भी अच्छा प्रभाव बनाती हैं। अंतिम दृश्य में डेस्डिमोना के कत्ल की दृश्य संरचना काफी प्रभावशाली थी। प्रस्तुति में संगीत नौटंकी शैली से जुड़ी रहीं कृष्णा कुमारी माथुर का है।

Saturday, March 5, 2011

शरीर में अभिनय की पहचान

रंग-अभिनय के क्षेत्र में शरीर का कई तरह से संधान किया गया है। भारंगम में प्रदर्शित अर्जेंटीना की दो युवा अभिनेत्रियों- मरीना क्वेसादा और नतालिया लोपेज- की 'मुआरे' नामक प्रस्तुति इसका एक उदाहरण है। यह प्रस्तुति एक उपन्यास से प्रेरित है जिसमें लेखिका ने गहरे मृत्युबोध में हर स्मृति और वस्तु को मानो बड़े आकार में और बहुत पास जाकर देखा है। यथार्थ को देखने के इस ढंग ने इन अभिनेत्रियों को मंच पर एक 'गति आधारित भाषा' रचने का विचार दिया। दरार पड़े शरीर और उसमें स्वायत्त हो चुके अंगों की भाषा। अपने एकांगीपन में हर अंग क्या कर सकता है- इसकी देहाभिव्यक्ति। मंच में बने एक दरवाजे में शीशा लगा है, जिसमें सबसे पहले उंगलियां, फिर हथेली, पूरा हाथ और फिर एक लहराती हुई काया दिखती है। थोड़े से खुले दरवाजे से एक-एक अंग करके बहुत कोशिशों के साथ यह दुबली-पतली काया भीतर आती है। एक जर्जर, कांपती हुई-सी स्त्री-देह। बहुत कोशिश करके खड़ी होती और चलती, गिरती-पड़ती, वहीं पड़ी मेज पर खुद को मरोड़ती-तोड़ती और फर्श पर आड़े-तिरछे, किसी निर्जीव की तरह ऊटपटांग ढंग से फैल जाती। थोड़ी देर में वैसी ही एक दूसरी देह वहीं पड़े सोफे पर फैले बहुत से कपड़ों में से प्रकट होती है। मेज के पास कांपती हुई मुंह में पानी भरकर इस देह पर उगल देती है और फिर उसे अपने कंधे पर लाद लेती है। फिर दोनों एक प्लास्टिक की पन्नी में उलझ जाती हैं। तेज संगीत पर गिरती-पड़ती नाचती हैं। अर्थहीन ढंग के कुछ संवाद बुदबुदाती हैं।

'मुआरे' से अलग लेकिन अपनी प्रकृति में वैसी ही प्रभाववादी निर्देशक मडोका ओकाडा की जापानी प्रस्तुति 'उगेत्सु मोनोगतारी' भी थी। फर्क यह है कि इसमें एक कहानी और उसके निहितार्थों को प्रभावात्मक तरह से पेश किया गया है। एक आदमी के मादा सांप के प्रति आकर्षण की इस कहानी में प्रत्यक्षतः मंच पर एक शैली ही ज्यादा नजर आती है। इस शैली में 'जापानी प्रदर्शन कला के परंपरागत शारीरिक अभिनय के आयामों को जोड़ा गया है'। कमानी प्रेक्षागृह के मंच की पूरी गहराई और चौड़ाई में लगातार कई रंगों की प्रकाश योजना है। शुरू के दृश्यों में पात्र इसमें लगभग सुनिश्चित ग्राफिकल ढंग से खड़े हैं। स्वरों और मुखौटों का प्रयोग भी किया गया है।

इन विदेशी प्रस्तुतियों के बीच तमिल प्रस्तुति 'अट्टरामाई' अपनी सादगी में बिल्कुल अलग आस्वाद देती है। अट्टरामाई का अर्थ है ईर्ष्या। वरिष्ठ रंग निर्देशक एन. मुत्थुस्वामी निर्देशित इस प्रस्तुति में बारी-बारी से चार कहानियां बिल्कुल सीधे-सादे ढंग से पेश की गई हैं। शीर्षक कहानी में एक स्त्री का सैनिक पति नौकरी की वजह से दो साल से उससे दूर है। अपनी हमउम्र पड़ोसन को पति के साथ खुश देखकर उसमें तरह-तरह की भावनाएं उमड़ती रहती हैं। प्रस्तुति में मंचीय तामझाम नगण्य है। कहानी के विवरण ही उसका मंचीय यथार्थ है। फूलवाला आता है, झाड़ूवाला आता है लेकिन उदास सावित्री के लिए ये सब बेमतलब है। वह दरवाजे से देखती है पड़ोसन के घर में कोई आया और पति के दरवाजा खोलने पर वो अस्तव्यस्त लेटी थी। पति की लापरवाही से पड़ोसन खुद शर्मिंदा है पर सावित्री इसे उसकी बेशर्मी समझती है। एक कहानी कथासरित्सागर से ली गई है। एक गरीब आदमी अपनी बेबसी से थका हुआ गेरुआवस्त्रधारी चमत्कारी बन जाता है और राजा तक को उसका कायल होना पड़ता है। यथार्थपूर्ण चरित्रांकन और नैरेटिव की सादगी ही प्रस्तुति की विशेषता है। इसके निर्देशक एन. मुथुस्वामी तमिल में आधुनिक रंगमंच की नींव डालने वालों में शुमार किए जाते हैं।