Thursday, October 15, 2009

साइकिल पर लंगूर

कल वो बंदा उस उजाड़ इमारत के बाहर एक बार फिर दिखा। उसके साथ उसकी साइकिल और लंगूर थे। लंगूर के गले में हरे रंग की काफी लंबी रस्सी थी। मौका समझते ही वो उछल कर साइकिल के कैरियर पर बैठ गया, और टुकुर टुकुर परिदृश्य को निहारने लगा। अब ये दोनों अपने रोजगार को निकलेंगे। ये दोनों इस खंडहरनुमा इमारत में ही रहते हैं। सालों से अधबनी, बिना पलस्तर की, सौ-सवा सौ फ्लैटों वाली इस इमारत के आसपास साल दर साल की बारिश से बड़ी बड़ी घास, झाड़ झंखाड़ बढ़ गए हैं। सुना है बिल्डर और प्राधिकरण में इसकी जमीन को लेकर कोई झगड़ा चल रहा है। कुछ भी हो, एक उजाड़ इमारत में लंगूर के साथ रहता आदमी- मुझे ये बिंब अपने में काफी बीहड़ मालूम देता है। ये दोनों प्राणी इस इमारत से निकलते हैं और आसपास की सोसाइटियों में बंदर भगाने का काम करते हैं। प्रकृति की कुछ ऐसी लीला है कि बंदर लंगूर से बहुत घबराते हैं और उसे देखते ही भाग खड़े होते हैं। इसी चीज को इस शख्स ने अपना रोजगार बना लिया है।
जिस इमारत में मैं रहता हूं, उसमें भी अक्सर बंदर आ जाते हैं। बंदरों के घर में घुस आने की कई कहानियां यहां अब तक बन चुकी हैं। दरवाजे बंद मिलने पर ये बंदर कॉरिडोर में ऊधम मचाया करते हैं, और घरों के बाहर रखे कचरे के पॉलीथिनों को बिखरा देते हैं। उनकी भभकियां हम मध्यवर्गीय लोगों को दहशत में डाल देती हैं। कुछ दिन पहले आई एक टोली के एक नन्हे बंदर की मासूम अठखेलियां भी काफी परेशान करने वाली थीं। शुरू में दीवाली के बचे बम पटाखों से इन्हें भगाने की कोशिश की गई। फिर इस लंगूर वाले आदमी को बुलाने पर भी विचार किया गया। सुना कि उसका रेट शायद 800 रुपए महीने का है, जिसके बदले वो हफ्ते में एक बार अपने लंगूर के साथ एक बिल्डिंग का दौरा करता है। लेकिन सोसाइटी के लोगों को ये विचार कुछ जमा नहीं। उनका कहना था कि जिन छह दिन वह नहीं आएगा, उन दिनों का क्या होगा। एक विचार यह भी सामने आया कि सोसाइटी के एक गार्ड को लंगूर का खोल पहना दिया जाए, और वो दिन भर इमारत में ऊपर नीचे आया-जाया करे। जाहिर है यह एक विचित्र विचार था, जिसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन जिस गार्ड को लक्ष्य करके यह विचार दिया गया था, उसकी कहानी यहां पर महत्त्वपूर्ण है।
यह गार्ड एक बूढ़ा आदमी था। जिन दिनों की यह बात है उन दिनों सोसाइटी कई तरह की समस्याओं से ग्रस्त थी। सोसाइटी के पास पैसे नहीं थे। गार्ड मुहैया कराने वाली एजेंसी पर दो-तीन महीने की उधारी बनी रहती थी। उन्हीं दिनों एजेंसी ने इस गार्ड को यहां नौकरी करने भेजा। वो बूढ़ा आदमी सर्द रातों में किसी प्रेतात्मा की तरह बिना चारदीवारी वाली इमारत की चौकीदारी किया करता। उसे बिना साप्ताहिक अवकाश के 12 घंटे नौकरी करनी थी। उसे पता था कि बूढ़ा आदमी गार्ड की नौकरी के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता, इसलिए वो इस नौकरी को पूरी तत्परता और मुस्तैदी से अंजाम देने की कोशिश करता। सोसाइटी के सचिव इत्यादि रात-बिरात जब भी चेक करने जाते, तो अंधेरे में उसकी हिलती-डुलती काया उन्हें दिखाई देती। लेकिन उसकी मुस्तैदी उसे वक्त पर तन्ख्वाह नहीं दिला सकी। न सोसाइटी ने एजंसी को पैसा दिया, न एजंसी ने उसे तन्ख्वाह दी। दिन बीतते गए, मौसम बीते, लेकिन इस सिलसिले में कोई सुधार नहीं हुआ, उल्टे हालात बिगड़ते ही गए। पहले एक-दो महीने का बकाया था, फिर तीन-चार महीने का बकाया हुआ। तन्ख्वाह न मिलने से दूसरी शिफ्ट वाला गार्ड, जो बूढ़ा नहीं था, उसने ड्यूटी पर आने में लापरवाही शुरू कर दी। नतीजतन इस बूढ़े गार्ड को कभी लगातार 24 घंटे, कभी 36 घंटे नौकरी करनी पड़ती। ऐसे में कभी-कभी उस बूढ़े गार्ड की पत्नी उसे खाना देने आती, तो तसल्ली होती कि उसके वजूद से इस संसार में किसी और को भी लेना-देना है। जो आधा अधूरा पैसा सोसाइटी एजंसी को देती, एजंसी उसमें से अन्य गार्डों को तो पैसा देती, उसे न देती। आखिर में एक मौका ऐसा आया जब यह बूढ़ा गार्ड अकेला बच गया, और जब वो लगातार लगभग 72 घंटे नौकरी कर चुका था, तब उसकी एजंसी के मालिक ने आकर कहा कि एजंसी सोसाइटी को अपनी सेवाएं और नहीं दे सकती। मौके की नजाकत को देखते हुए सोसाइटी के लोग कहीं से जमा करके चार पांच हजार रुपया लाए और एजंसी वाले को दिए। बूढ़ा सोसाइटी वालों से कहता रहा था कि उसे कुछ पैसा देकर एजंसी की राशि में से काट लेना। पर सोसाइटी के लोग नियमानुसार चलने में यकीन रखते थे। संक्षेप में, वह मनुष्य की लाचारी का एक अभूतपूर्व दृश्य था। मैंने सुना, 72 घंटे का थका बूढ़ा आत्मविगलित स्वर में कह रहा था, हमें कुछ नहीं चाहिए..कुछ भी नहीं...।
जब गार्ड को लंगूर की वेशभूषा पहनाने की बात सामने आई थी, तो एक क्षण को मेरे मन में 'नौकर की कमीज' के संतू बाबू का बिंब कौंधा था। क्या वो गार्ड संतू बाबू की तरह इस 'कमीज' से बचने का संघर्ष करता, या उचक कर साइकिल पर अपने मालिक के पीछे बैठ जाता, यह प्रश्न इतने अरसे बाद भी कभी कभी मन में उठता है।

Saturday, September 19, 2009

गुड़

गुड़ पिता को बहुत पसंद था। खाना खाते वक्त अंतिम रोटी वे उसके साथ चाव से खाते थे। अम्मां से कहते- `थोड़ा मिष्टान्न दो भाई..।' और अम्मां उन्हें गुड़ निकाल कर दे देतीं।
    पिता जिंदगी की गति में रमे हुए आदमी थे। वे अभावों से घबराने वाले व्यक्ति नहीं थे। अभावों में वे प्रायः कोई न कोई सार्थकता तलाश लिया करते थे। अपने बचपन और देहात की चर्चा करते हुए अक्सर वे गुड़ का जिक्र किया करते थे। तब गांव में बिजली नहीं थी और गन्नों की पेराई के लिए मशीन बैलों की ऊर्जा से चलाई जाती थी। रात-रात भर गुड़ पकाया जाता था। लोग भट्ठे की आग तापते बैठे रहते, आलू और शकरकंद भूनकर खाते और जोर-जोर से आल्हा गाते। 
    गुड़ की उपस्थिति गांव के घरों में अनिवार्य है। दादी उसे घड़े में बंद करके रखती थीं। त्योहारों में वहां गुड़ के पुए बनते हैं और आज भी वहां गर्मी की दोपहरियों में आगंतुक के आगे गुड़ का शरबत ही पेश किया जाता है। एक बार जून की भद्दर गर्मी में भरी दोपहर गांव पहुंचने पर मैंने भी इस शरबत का स्वाद चखा था। गुड़ के शरबत की मिठास थोड़ी कसैली होती है। दादी ने लोटा भर बनाया था, पर मेरे लिए एक गिलास पीना भी भारी पड़ गया था। गुड़ मुझे खास पसंद नहीं, यह बात पिता को खास अच्छी नहीं लगती थी। मुझे सुनाते हुए अक्सर वे गांव के आयुर्वेदाचार्य मुंशी जी की गुड़ पर आस्था का हवाला देते।
    एक बार घर में गरीबी बहुत ज्यादा हो गई थी। पिता जान-पहचान के एक परचूनिये से बार-बार उधार सामान लाते थे। गुड़ की मात्रा वे ज्यादा लाने लगे थे। वे बताते थे कि एक किलो चीनी के दाम में डेढ़ किलो गुड़ मिलता है। उन दिनों गुड़ की चाय के फायदे वे बार- बार गिनाते थे।...
    उन्हीं दिनों की बात है, एक दफे जब पड़ोस में रहने वाली दुबाइन (मिसेज दुबे को अम्मां दुबाइन कहती थीं) घर आई थीं तो अम्मां ने उन्हें भी गुड़ की चाय पिलाई थी। इसके कुछ दिन बाद एक शाम को पड़ोस के घर से खेलकर लौटी मेरी छोटी बहन मुन्नी ने बताया कि आंटी पूछ रही थीं, क्या तुम्हारे यहां गुड़ की चाय पी जाती है। अम्मां ने इस बात पर बड़ा कोहराम मचाया था। उनका कहना था कि वे गरीबी और गुड़ दोनों से ऊब चुकी हैं और आत्महत्या करने जा रही हैं। पिता ऐसी स्थितियों के अभ्यस्त थे। वे इनसे ऊबते नहीं थे। वे कहते थे, मरने वाला व्यक्ति ऐलान करके नहीं मरता।
    यह बात कई साल पहले की है, जब देश में विदेशी मुद्रा का संकट पैदा हो गया था। किसी सरकारी मंत्री ने चीनी की आपूर्ति बढ़ाने के लिए देहातों में बनने वाले गुड़ पर पाबंदी की बात कही थी। पिता उन दिनों डायबिटीज के मरीज हो चुके थे और खुद कई सारी पाबंदियों के शिकार थे। प्रायः वे झुंझलाए हुए रहते थे। यह खबर उन्होंने अखबार में पढ़ी। खबर पढ़ने के बाद उन्होंने अखबार को मोड़कर एक ओर रख दिया और कमरे से बाहर चले गए। बाहर काफी देर तक धूप में वे बिल्कुल चुपचाप बैठे रहे। अचानक वे उठे और भीतर आकर अम्मां से बोले- `मुझे गुड़ दो!'
   अम्मां डर गईं, बोलीं- `आत्महत्या करने चले हो क्या?'
   पर पिता जैसे किसी जुनून में थे, उनसे कुछ भी कहना बेकार था। अम्मां को उन्होंने एक ओर धकेल दिया, और जाकर गुड़ का पीपा निकाल लाए। पीपे से गुड़ निकाल कर खाते पिता की आंखों में एक दैन्य था। पिछले करीब दो साल से उन्होंने गुड़ नहीं खाया था। मैं हतप्रभ था। दो साल के अतृप्त पिता ने देखते-देखते काफी सारा गुड़ खा डाला। खाते-खाते वे निढाल होने लगे। सब घबरा उठे। डॉक्टर को बुलाया गया। उनका रक्तचाप आसमान छू रहा था।....
    कुछ दिनों बाद पिता जब बिस्तर पर थे, मैंने उनसे पूछा था कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। पिता ने रुक-रुक कर जवाब दिया था, कि बेटे अतृप्त रहकर जीते रहने से अच्छा है, तृप्त होकर मर जाना।
    इसके कुछ दिनों बाद पिता चल बसे थे।
    अब हमारे घर में पिता की मृत्यु एक पुरानी बात हो चुकी है। ओस खा गए शीशे की तरह पिता धुंधले होते जा रहे हैं। अम्मां जरूर कभी-कभार जिक्र उठने पर कह देती हैं- `तुम्हारे पिता गुड़हा थे।'...पर पिता सिर्फ गुड़हा नहीं थे, वे और भी कुछ थे। यह रहस्य सिर्फ मुझे पता है कि वे क्या थे।
    

Monday, May 25, 2009

उस घर में अब वो नहीं रहते

  देबूदा पुरानी दिल्ली की बस्ती हिम्मतगढ़ में रहते थे। अजमेरी गेट की तरफ से जाने वाली बहुत सी गलियों में से एक गली थी। गली के एक नुक्कड़ पर वो पुराने वक्त की एक हवेली थी, जिसके खड़े और किंचित अंधेरे में डूबे जीने से होकर देबूदा के यहां पहुंचा जा सकता था। हवेली में देबूदा का घर दरअसल एक आयताकार कमरा था, जिसमें दीवारों और लकड़ी के पार्टीशनों आदि के जरिये रसोई, स्टोर, दो कमरे, बरोठा, बाथरूम निकाल लिए गए थे। बरोठे में छत की जगह लोहे का जाल पड़ा था, जहां से ऊपर वाले घर की आवाजें आया करतीं। अक्सर उनके यहां जाने पर देबूदा बीच वाले कमरे में तख्त पर लगे बिस्तर पर बैठे या लेटे मिलते। कई बार रसोई के काम निबटाते या दरवाजे के बाहर गलियारे में धूप सेंकते भी मिल जाते। साथ वाला दूसरा कमरा उनकी बहन मिष्टु दी का होता, जो कई बार कलकत्ता से वहां आई हुई होतीं। नाटे कद की थोड़ी स्थूल मिष्टु दी को रतौंधी से मिलता जुलता कोई रोग था। उन्हें लगभग कुछ भी दिखाई नहीं देता था। पर अपने छोटे-छोटे कदमों से बगैर लड़खड़ाए वे पूरी कुशलता से रसोई और घर के तमाम कामकाज निबटाया करतीं। 
     एक नजर में घर के अंदर का ढांचा किसी को बेतरतीब लग सकता ता, पर दरअसल देबूदा के यहां हर चीज पूरी तरह व्यवस्थित थी। टेढ़ी-मेढ़ी एक पर एक रखी किताबों में देबूदा को बिल्कुल सटीक पता होता कि शापेनहावर की फलां किताब उनमें कितनी किताबों के नीचे है, कि उसकी किस पृष्ठ संख्या पर किस बात का उल्लेख है। रसोई में मसाले, चीनी-चाय के डिब्बे बंद ढक्कनों के बावजूद उल्टे पॉलीथिन से ढंके रहते, ताकि वे गर्द और गंदे होने से बचे रहें। यह आज से लगभग ग्यारह-बारह साल पहले के दिन थे। भूमंडलीकरण के इस दौर को देबूदा `बेलगाम अराजकता का दौर' कहते थे। इस दौर में आसपास के जीवन की मक्कारियों, मूर्खताओं और मुद्रास्फीति से देबूदा को अपनी अदना सी पेंशन के जरिए निबटना था, जो उन्हें अरसा पहले `होलटाइमर' बनने के लिए छोड़ दी गई वित्त मंत्रालय की नौकरी के कारण मिलती थी। आमदनी सामाजिक हैसियत का बड़ा कारण होती है, इसलिए देबूदा पेंशन की रकम के बारे में कभी नहीं बताते थे। `हो सकता है वह तुम्हें इतनी कम लगे कि तुम्हारी नजरों में मेरी इज्जत कम हो जाए' - वे कहते। निश्चित ही इज्जत से उनका तात्पर्य औकात से होता।
     देबूदा पुराने कम्युनिस्ट थे। उनकी जिंदगी में एक ऐसी सचेतनता और संजीदगी थी कि उनकी हर गतिविधि और क्रियाकलाप में सोचे समझे सहीपन की एक व्याख्या निहित होती। कई बार मुझे लगता, मानो वे अपनी जिंदगी को एक थ्योरी के रूप में जी रहे हों। देश दुनिया के बारे में उनकी रायें सटीक नतीजों की शक्ल में होतीं। जैसे कि दुनिया में कॉफी हाउस संस्कृति उन्नीसवीं शताब्दी की किस तारीख को शुरू हुई, कि दिल्ली जब ब्रिटिश हुक्मरान की राजधानी थी तब गोरों की संख्या यहां एक हजार से ज्यादा नहीं थी, कि भारतीय जीवन का मूल दर्शन आनंदवाद है, कि काके दा ढाबा और करीम होटल में स्वाद के बुनियादी फर्क क्या हैं, कि संगठित क्षेत्र ज्यादा भौंकने वाले कुत्ते की तरह होता है जिसके आगे महंगाई भत्ते की रोटी फेंकते ही वह मालिक के आगे दुम हिलाने लगता है, आदि। उनका कहना था कि आदमी जब भीतर से असंवेदनशील होता है तो उसकी त्वचा भी वैसी हो जाती है। उन्होंने बताया कि एक रोज उन्होंने बस में अपने बराबर में बैठे एक आदमी को पिन चुभोई तो बहुत देर तक उसे इसका पता ही नहीं चला। 
     देबूदा की बहन जब यहां होतीं, तो वे उन्हें इलाज के लिए नियमित गुरुनानक अस्पताल ले जाते। देबूदा उस तरह के व्यक्ति थे जो एक वक्त पर अपनी वैचारिकता को वैयक्तिकता से ज्यादा तवज्जो देते हैं और बाद के दिनों में यह वैयक्तिकता किसी स्तर पर उनकी कुंठा बन जाती है। वे अपने आसपास के प्रति अपनी गंभीरता, सूक्ष्मता और लिहाजा कड़वाहट के कारण काफी कुछ अलग-थलग पड़ गए थे। वे अविवाहित थे और अपनी वैयक्तिकता के स्फुरणों को संभवतः समझ नहीं पाते थे, जिसके परावर्तन उनकी बदजबानी में कई बार दिखाई देते। पर उनमें जिम्मेदार और अपनी निष्ठाओं में दुरुस्त रहने की कोशिश हमेशा होती। बहन को अस्पताल ले जाना उनके जीवन के बहुत कम रह गए कामों में से एक था। एक बार उनके घर जाने पर मिष्टु दी नहीं थीं। पूछने पर उन्होंने बताया कि वे चली गईं हमेशा के लिए।
     एक बार मैं देबूदा के यहां गया, तब शाम का धुंधलका हो चुका था। वे रसोई में कुछ काम कर रहे थे। हवेली में रहने वाले एक परिवार के दो बच्चे भी उनके यहां थे। वह पड़ोस में एकमात्र परिवार था जिससे उनका कोई संपर्क था। वे उन बच्चों को अपने विशिष्ट अंदाज में पढ़ाते थे और ऊटपटांग ढंग से फटकारते भी रहते थे। थोड़ी देर में उन्होंने बच्चों को जाने का निर्देश दिया, और तनिक देर बाद मुझसे कहा- `देखो बिट्टू तो नहीं है।' मैंने झांककर उसके न होने की पुष्टि की तो उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा- `इन बच्चों को नहीं मालूम कि मुझे सेकेंड स्टेज का कैंसर है।' मैं एक क्षण को उनका मुंह देखता रहा। वे बोले- `इलाज चल रहा है। एक-डेढ़ महीने में पता चल जाएगा कि रोकथाम हो पाएगी कि नहीं।' फिर एक क्षण रुककर बोले- `लेकिन मौत मुझपर सवार नहीं है।'
     `लेकिन मौत मुझपर सवार नहीं है'-- क्या कह रहे थे देबूदा। क्या अब भी वे `पॉलिटिकली करेक्ट' होने की फिक्र में थे। कुछ न सूझने पर मैंने कहा- `मुझे तो कुछ पता ही नहीं था।' जवाब में उनका अप्रत्याशित आत्मपीड़ा से भर स्वर सुनकर मैं चौंक-सा गया। वे कह रहे थे-`किसी को मेरी फिक्र क्यों होगी..'  ..पड़ोस में रहने वाले बच्चों के पिता भी तब तक वहां आ गए थे। उन्होंने कहा- `आप ऐसा क्यों सोचते हैं, हमें आपकी पिक्र है न!' लेकिन उस भारी वातावरण में कहे गए इन भारहीन शब्दों को देबूदा ने शायद नहीं सुना। वे शून्य में कहीं और ताक रहे थे।
     मैं देबूदा के यहां बीच-बीच में जाता था, पर जाते हुए झिझकता भी था। वे स्वाभाविक रवैये में भी छिपे हुए आशय ढूंढ़ते और अपनी पूर्वाग्रही खुर्दबीनी से हमेशा माहौल को तनावग्रस्त बना देते। मैं कई बार उनसे कहना चाहता- `देबूदा, जिंदगी हमेशा उतनी सार्थक, सटीक और ठोस नहीं होती, जितना आप सोचते हैं। वो थोड़ी हवाई और खोखली भी होती है।' लेकिन मैं उनसे यह कभी कह नहीं पाया। कई बार लंबे अंतराल पर जाने पर वे मुझे चिढ़े हुए मिलते। चिढ़े होने पर वे जानबूझ कर दूसरे को आहत और दुखी करने वाली बातें करते। अंतिम बार भी ऐसा ही हुआ था। उस रोज उन्होंने अति ही कर दी थी। और एक तीखी झड़प के बाद मैं उनके यहां से निकल आया था। 
     बाद में कई बार उनसे मिलने का मन हुआ। पर उस रोज कही उनकी अपमानजनक बातों और उनपर मेरी उतनी ही तुर्श प्रतिक्रिया की झिझक बार-बार रोक लेती थी। उनकी बीमारी का खयाल आता तो लगता कि हम जिस अप्रत्याशित की आशंका से हमेशा परेशान रहते हैं वैसा जीवन में कुछ भी नहीं होता, और चीजें हमेशा सहज रूप से चला करती हैं। और यह कि कुछ दिनों बाद जब जाऊंगा तो देबूदा हमेशा की तरह मुझे रसोई में काम करते या तख्त पर बैठे हुए मिल जाएंगे। यह सब सोचते चार-पांच महीने निकल गए।
     इसी बीच एक रोज कनाट प्लेस की ओर जाते बस में बिट्टू दिखी। मैं लपक कर उसके पास गया और अभिवादन के बाद पूछा-`देबूदा कैसे हैं?' उसने एक क्षण को देखा और बोली- `वे तो नहीं हैं। दो महीने हो गए उनकी डेथ को।' लगा कहीं गिलट का पुराना बड़ा वाला सिक्का टन्न से नीचे गिरा। ... 
वो कह रही थी- `आपको बार-बार याद करते थे। मुझसे कहते थे, तुम उसको फोन करो, पर मेरा नाम मत लेना।'
`उनके सामान वगैरह का क्या हुआ?' मैंने पूछा।
`मकान तो पुराना किराए का था। कोई रिश्तेदार नहीं आया तो वो मकान मालिक के पास ही चला गया। किताबें उनके एक परिचित कामरेड ले गए। सामान भी आसपास वालों में बांट दिया गया।' उसने बताया।
मुझे याद आया, देबूदा ने एक बार कहा था, `कम्युनिस्ट की कोई निजी संपत्ति नहीं होती, मेरी भी नहीं है।'
सचमुच अपनी बात के खरे निकले देबूदा! 

Tuesday, April 28, 2009

गनीमत है कि गनीमत है



     गनीमत है कि भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी वगैरह के बावजूद लोकतंत्र देश में अभी बचा हुआ है। जैसे गुजरात और कश्मीर के बावजूद सेक्युलरिज्म अभी बचा हुआ है। भूमंडलीकरण के बावजूद न्यूनतम वेतन कानून बचा हुआ है। कम्युनिज्म के दुनिया में न रहने के बावजूद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बची हुई है।
     कवि मदन कश्यप की एक पंक्ति है गनीमत है कि गनीमत है। गनीमतें हमारे वक्त में टूटी पड़ रही हैं। दिन भर बिजली गायब रहती है, लोग कहते हैं गनीमत है कि रात को तो आ जाती है। अखबारों में बलात्कार और छेड़खानी की खबरें बढ़ती हैं तो लोग कहते हैं कि गनीमत समझो कि जीबी रोड और सोना गाछी अभी बचे हैं। कई बार लगता है कि शायद किसी दिन ये गनीमतें चुक जाएंगी। लेकिन गनीमतें भी कभी चुका करती हैं क्या? आज अगर इसलिए गनीमत है कि पड़ोस में हमसे भी गरीब बांग्लादेश है, तो कल क्या इसलिए गनीमत में नहीं होंगे कि कहीं न कहीं कोई इथियोपिया दुनिया में तब भी होगा। जैसे विश्वव्यापी मंदी के बावजूद उपभोक्तावाद बचा हुआ है। बार बार के सूखे और बाढ़ के बावजूद खेती अभी बची हुई है, तमाम विनिवेश के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र अभी बचा हुआ है, क्या वैसे ही गनीमतें भी हमेशा बची नहीं रहेंगी?
     खत्म हो जाना बचे रहने की एक विलोम स्थिति है। जिस तरह खत्म हो जाना सृष्टि की अनिवार्यता है वैसे ही खत्म हो जाना भूमंडलीकरण की दुनिया का एक मूल्य है। हर साल ट्रेन और हवाई दुर्घटनाओं में कितने ही लोग मरते हैं, पर कुछ बच भी जाते हैं। बचे रहने का सुख इन खत्म न हुए लोगों को शायद सबसे अच्छी तरह पता होगा। गुजरात के दंगों पर एक डॉकुमेंटरी देखते हुए लगा कि उसमें कई ऐसे पात्र थे जो बचे रहने के बावजूद काफी हताश थे। एक किशोर था जिसके परिवार के पांच लोगों को मार दिया गया, लेकिन वो अपने बचे रहने पर तनिक भी खुश नहीं दिखा। 
     यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है कि लोकतंत्र इस देश में क्यों बचा हुआ है। प्रत्यक्षतः इसके तीन कारण नजर आते हैं।एक- इससे नेताओं को सत्ता मिलती है, दो- नौकरशाहों को वेतन मिलता है, तीन- जनता को करीबी रेखा से ऊपर रहने के लिए सात सौ ग्राम चावल प्रतिदिन की संभावना मिलती है। गरीबी रेखा से नीचे रह रहे 27 करोड़ लोगों के लिए यह संभावना क्योंकि अभी दूर की कौड़ी है, लिहाजा वे आम की गुठली पीसकर उसके आटे से गुजारा किया करते हैं। जिस बीच 27 करोड़ लोग गुठलियां पीस रहे होते हैं, उस बीच कंपनियां आम के गूदे से आमपापड़ बनाकर बाजार में बेच रही होती हैं। यानी जब तक गरीबों के लिए गुठलियों और अमीरों के लिए आमपापड़ की संभावना बची हुई है तब तक लोकतंत्र बचा हुआ है। 
     लोकतंत्र देश में वैसे ही बचा है जैसे मध्यवर्ग में सहिष्णुता बची है। कुछ लोग आज भी इसे गनीमत के स्तर के आसपास रखते हैं। वे कहते हैं कि गनीमत है कि देश चल रहा है। बड़ी खुशी की बात है कि ठहरे हुए एशिया में हिंदुस्तान चल रहा है। जैसे गड्ढे के पानी में केंचुआ अपना शरीर घसीटते हुए चलता है।जैसे रक्षा सौदों में कमीशन चलता है। जैसे शादियों में दहेज चलता है। जैसे न्यायलयों में मुकदमे चलते हैं, जैसे मुकदमों में पेशेवर गवाह चलते हैं। लोकतंत्र गरीब की पत्तल है जिस पर अमीर खाना खाते हैं और फिर छेद कर देते हैं। लोकतंत्र एक सकोरा भी है जिसमें भरकर सरकार और सरकार के मुलाजिम सत्ता का सोमरस पिया करते हैं। सुकरात को इसी सकोरे में जहर भरकर पीने के लिए दिया गया था। मुकदमे के दौरान अपना पक्ष रखते हुए सुकरात ने एथेंस की तुलना एक शानदार लेकिन आलसी घोड़े से की थी और खुद की खुदा की भेजी हुई मक्खी से, जो डंक मारकर सोए हुए घोड़े को जगाने का काम करती है।एथेंस अगर शानदार घोड़ा था, तो हिंदुस्तान विशालकाय हाथी है। वह अगर आलस्य की नींद में था, तो यह जातीयता के नशे में है। यह कई सदी पुराना नशा है। डंक मारने से यह नहीं टूटेगा, इसके लिए तो पूंछ में आतिशबाजी की लड़ लगानी होगी।